Wednesday, February 24, 2010

समझौतों से नक्सली ही जीतेंगे


जोगिंदर सिंह

पूर्व निदेशक

केंद्रीय जाँच ब्यूरी

दिल्ली

नक्सली दलों से नरमाई से पेश आकर राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है। जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। यही नहीं, ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।


इसबात में कोई दो राय नहीं की नरम मिजाज देश होने का खामियाजा हिन्दुस्तान को भुगतना पड़ रहा है। नक्सलवादी कहिए, माओवादी कहिए या आतंकवादी, इन हिंसा करने वाले संगठनों को किसी भी नाम से पुकारिए, वे बेखौफ होकर कभी भी, कहीं भी आक्रमण कर देते हैं। जैसा कि पश्चिम बंगाल के शिल्दा में हुआ, जहाँ माओवादियों ने निर्दयी तरीके से पुलिसवालों की नृशंस हत्याएँ कीं। यह हमला उनके योजनाबद्ध आतंकी अभियान का हिस्सा है।भले ही माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हों, पर इसके बावजूद उनमें यह क्षमता है कि वे ऐसे कामों को अंजाम दे सकें।


नक्सलियों का एकमात्र उद्देश्य पुलिस का मनोबल गिराना नहीं बल्कि उन्हें सीमित कर देना भी है जिससे पुलिस अपने क्षेत्र में मुख्यालयों तथा साजो-सामान की रक्षा में लगी रहे। नक्सलियों ने साल २००९ में ६ अप्रैल से १२ जून तक पश्चिम बंगाल के तथा अन्य क्षेत्रों में अपने ऑपरेशन चलाए थे, जिनमें उन्होंने ११२ पुलिस वालों की जानें ले लीं।माओवादियों व नक्सलियों की समस्या से पार पाना कोई असंभव कार्य नहीं है। मुश्किल यह है कि इनसे निपटने की कोई दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई है। पश्चिम बंगाल में २५ लोगों को मारने के बाद माओवादियों ने फरवरी २०१० के तीसरे हफ्ते में बिहार के कोसारी गाँव में ११ लोगों की हत्या कर दी। इस नरसंहार में १०० से ज्यादा माओवादी शामिल थे जिन्होंने डायनामाइट से घरों को उड़ा दिया। इन मारे गए लोगों के अलावा अन्य २५ लोग भी शिकार हुए जो जलने से या गोली से घायल हुए।वास्तव में राज्यों के नेता इस मुद्दे पर जो दृष्टिकोण रखते हैं, वह केंद्र में बैठे नेताओं तथा देश के बाकी लोगों के मतों से भिन्ना है। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना था कि मैं माओवादियों के खिलाफ बल प्रयोग के खिलाफ हूँ।


जमीनी स्तर पर विकास एवं प्रजातंत्र माओवाद को हल करने का एकमात्र तरीका है। कितना अच्छा होता यदि मुख्यमंत्रीजी का यह बयान सच हो पाता। लेकिन सच यह है कि शांति का कोई विकल्प नहीं है, चाहे वह बंदूक से आए या बातचीत से या फिर आत्मसमर्पण से। दुर्भाग्य से बंदूक के सामने झुकना हमारे देश में एक मान्य परंपरा बन गई है। इसकी शुरुआत १९८९ में हुई थी जब स्थानीय लोगों की मदद से पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने साथियों को छुड़वाने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री की बेटी को अगवा कर लिया था। इस घटना के बाद से आतंकियों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों या शुभचिंतकों को छुड़वाने के लिए लोगों को बंधक बनाना आरंभ कर दिया। वर्ष २००८ में एक पुलिस अधिकारी को कैद से छुड़ाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को कुछ माओवादी कमांडरों को रिहा करना पड़ा। २००९ में माओवादियों ने झारखंड में एक पुलिस इंस्पेक्टर का अपहरण करके उसका सिर कलम कर दिया। अब उन्होंने झारखंड के एक प्रखंड विकास अधिकारी को अगवा कर लिया है जिसे छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री १४ माओवादियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गए हैं।यदि गुप्तचर और अन्य स्रोतों की रपटों पर यकीन किया जाए तो पता लगता है कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। जून २००९ के अंत तक ४५५ लोग (२५५ नागरिक व २०० सुरक्षाकर्मी) नक्सलियों ने मार डाले थे और ये कत्लेआम जारी है। ये आँकड़े केंद्रीय गृह मंत्रालय के हैं। इस अवधि में सबसे अधिक यानी ६० प्रतिशत हत्याएँ छत्तीसगढ़ व झारखंड में हुईं जो कि सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य हैं। आँकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा नक्सली हिंसा होती है। पिछले तीन वर्षों के आँकड़े इस बात के गवाह हैं।


समस्या की भयावहता को स्वीकारते हुए केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने फरवरी २०१० में कहा कि नक्सलवाद का खतरा सरकार की उम्मीद से कहीं अधिक भयंकर है। जब तक हम उन्हें छेड़ेंगे नहीं वे आराम से अपना विस्तार करते रहेंगे। वे तब तक फैलते रहेंगे जब तक हम उन्हें चुनौती नहीं देंगे। लोगों का सहयोग हासिल करने के लिए माओवादी हरसंभव तरीके अपनाएँगे। वे मीडिया को फुसलाएँगे, गलत आरोप लगाएँगे और अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाएँगे। अधिकतर लोग सोचेंगे कि समझौता किया जाए या कोई अन्य बीच का रास्ता अपनाया जाए लेकिन यह बहुत बेवकूफी होगी। सबसे मुश्किल चुनौती जो हमारे सामने है, वह है अच्छी तरह प्रशिक्षित तथा बेहतरीन साजो-सामान से लैस पुलिस बल। नक्सलवाद व माओवाद की समस्या से निपटने के लिए मजबूत दिमाग, उससे भी ज्यादा मजबूत दिल तथा इरादों पर टिके रहने की आवश्यकता है। अल्पकालिक समाधानों से कुछ नहीं होगा। एक मासूम व निहत्थे अफसर का अपहरण कर लिया जाता है और उसे छुड़ाने के लिए १४ पके हुए अपराधियों को छोड़ दिया जाता है, इन सब घटनाओं से माओवादियों के हौसले और बुलंद होंगे। मुँह में खून लगने के बाद नक्सली अब और आगे बढ़ेंगे।


राज्य सरकारें आतंकियों, नक्सलियों व माओवादियों के हाथों खिलौना बन रही हैं। वे जैसे चाहे सरकारों को नचाते हैं और अपनी माँगें मनवाते हैं।नक्सली दलों से नरमाई से बातचीत करके राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है। जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। खराब हालात झेल रहे क्षेत्रों को विकसित करने के बजाय ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।


कोई भी आतंकी समूह तब तक कोई समझौता नहीं करेगा जब तक कि वह यह जानता है कि वह जीत रहा है। ऐसा पंजाब, असम व अन्य राज्यों में हो चुका है। दुनिया का कोई भी कोना हो, ऐसे तत्वों से निपटने के लिए गोली का जवाब गोली ही एक तरीका होता है । केवल समर्पण के लिए माओवादियों से बात करना एक कदम पीछे हटना हैऔर उस नीति के खिलाफ जाता है जो भारत सरकार ने नक्सलवाद से लड़ने के लिए बनाई थी । और फिर समझौते तभी होते हैं जब किसी एक पक्ष की रीढ़ टूट चुकी होती है । इस किस्म के समझौते से तो सुरक्षा और पुलिस बलों का मनोबल ही टूटेगा जो अपनी जान की बाजी लगाकर ऐसे तत्वों के खिलाफ लड़ रहे हैं ।

नई दुनिया, में प्रकाशित आलेख

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