Saturday, February 27, 2010

नक्सलवाद के जहरीले डंक

विमलेश झा
१९६७ में एक छोटी सी जगह नक्सलवाड़ी से किसान विद्रोह के रूप में शुरू हुई नक्सलवादी समस्या आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में खड़ी है ।जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते है तो वो देश के २० राज्यों के लगभग २२३ जिलों में पैर पसार चुके उस जहरीले नाग की ओर इशारा करते है जिसके डंक ने अबतक हजारो निर्दोषों को मौत की नींद सुला दिया है । सितम्बर २००४ में जब वामपंथी संगठनों ने मिल कर सी पी आई माओवादी ग्रुप की स्थापना की तबसे उनकी बढती ताकत को पुरे देश ने बढती हिंसा के रूप में महसूस किया है । अब पानी सर के ऊपर निकल चुका है और पूरा देश इस समस्या का कोई ठोस ,स्थाई और त्वरित समाधान चाहता है ।
वास्तव में माओवादी समस्या के पनपने की उर्वर जमीन सामाजिक शैक्षिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वे जंगली और आदिवासी क्षेत्र है जहाँ विकास की रौशनी अभी तक नहीं पहुच पाई है ।छतीसगढ़ जो कि इस समस्या से सर्वाधिक ग्रस्त राज्य है के कुछ चौकाने वाले आंकड़े इस सच्चाई को साफ बयां करते है ।इस राज्य के 18 में से १० जिलों में जिला अस्पताल नहीं है। शिशु मृत्यु दर ८६% है । ६८% के पास बिजली और ४९% के पास पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। टेलीफ़ोन तक केवल १% जनता कि पहुँच है जबकि राज्य की मात्र २७% सड़के ही पक्की है ।राज्य कि ३१.७६ आबादी आदिवासी है तथा कूल क्षेत्रफल का ४३.75% जंगल है । कमोबेश यही स्थिति अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की भी है ।अत: नक्सलवाद एक सामाजिक - आर्थिक समस्या है जो हिंसक रूप धारण कर चुकी है ।
समस्या की व्यापकता तथा इसकी विकरालता को देखते हुए वर्तमान सरकार नींद से जग चुकी है तथा इसके समाधान के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ने को तैयार दिख रही है ।सबसे पहली जरूरत एक राष्ट्र के रूप में हमें इस समस्या से लड़ने के लिए दृढ - संकल्पित होने की है। हमें अपने सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर इस समस्या को जड़ से मिटाना होगा ।
माओवादी हिंसा से निपटने का पहला समाधान सैन्य कार्रवाई है । केंद्र सरकार ने लगभग ७०००० सुरक्षा बलों की तैनाती कर माओवादिओं पर दबाब बनाने की कोशिस की है ।लेकिन यह ध्यान देना होगा की हमारे जैसे लोकतान्त्रिक देश में सैन्य कार्रवाई मानवाधिकारों का उल्लंघन न करे। हमारे सुरक्षाबलों को बड़े धैर्य के साथ आम जनता का विश्वास जीतते हुए हिंसक तत्वों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी। यह एक श्रमसाध्य और समयसाध्य प्रक्रिया है ।सैन्य कार्रवाई के पश्चात् तुरत ही उन क्षेत्रों में सिविल प्रशासन की स्थापना करनी होगी। देश के आर्थिक संसाधनों का पूरा इस्तेमाल कर इन क्षेत्रों में आधारभूत संरचनाओं का त्वरित विकास करना होगा ।
मुख्यत: इन्ही दो तरीकों से इस समस्या को जड़ से मिटाया जा सकता है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि इन्हें आधे अधूरे मन से लागू न किया जाये ।राजनितिक मजबूरियों के चलते कई बार पूर्व में एक कदम आगे चलने और दो कदम पीछे हटने की तरकीब अपनाई जाती रही है जिससे यह समस्या और विकराल होती जा रही है ।जब हम पूरी प्रतिबद्धता से इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे तो हमें सैन्य कार्रवाई और विकास के समन्वित उपायों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कई आवश्यक तैयारियां करनी होगी ।
सबसे पहले हमें अपने सुरक्षाबलों को इस कठिन लड़ाई के लिए तैयार करना होगा। सुरक्षाबलों में खाली पदों को भरने से लेकर उनके गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण की मांग को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करना होगा ।उनका मनोबल बनाये रखने के लिए वेतन विसंगतियों को दूर कर उन्हें समाज में उचित मान सम्मान देना होगा । जंगल में लड़ाई लड़ने के लिए आवश्यक उपकरण तथा तकनिकी सहयोग उपलब्ध कराने होंगे ।एकीकृत कमान की स्थापना कर आसूचना का आदान प्रदान करना होगा । इस सम्बन्ध में वर्तमान गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम का गृह मंत्रालय के पुनर्गठन करने की मंशा सराहनीय है । नक्सल प्रभावित राज्यों को आपसी ताल मेल कायम कर एक साथ साझा अभियान चलाने की जरूरत है । सुरक्षाबलों की कार्रवाई को संचालित करने के लिए अच्छे अधिकारिओं की तैनाती करनी होगी । मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए हर कार्रवाई पर कड़ी निगरानी रखनी होगी ।इन सब तैयारियों के साथ हमें अपने सुरक्षाबलों को इस कठिन लड़ाई में उतारना होगा ।
सुरक्षाबलों को जब कहीं किसी क्षेत्र में कामयाबी मिलती है तो उस क्षेत्र में जितनी जल्दी हो सके सिविल प्रशासन की स्थापना करनी होगी । बड़े पैमाने पर विकास कार्य शुरू करने होंगे । इसके लिए हमें पहले से ही आर्थिक संसाधन जुटा कर रखने होंगे ताकि उस वक़्त किसी किस्म की देर न हो । विकास कार्यों के लिए पहले से ही बजट और योजनाये तैयार रखनी होंगी ।विकास कार्यों को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए केंद्रीय स्तर पर कड़ी निगरानी रखनी होगी वरना सारी मिहनत पर पानी फिर सकता है । विकास कार्यों में क्षेत्रीय विषमता और राजनितिक स्वार्थों से बचना होगा । ऐसा तभी हो सकता है जब विकास का कार्य केंद्रीय एजेंसिओं के माध्यम से हो ।गैर सरकारी संगठनों को विकास कार्यों की निगरानी का दायित्व दिया जा सकता है । इन तैयारियों के साथ हमें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को देश के विकास की मुख्या धारा से जोड़ना होगा ।
उपरोक्त तैयारियों के साथ-साथ सिविल सोसाइटी को भी देश की इस विकराल समस्या को मिटाने के लिए आगे आना होगा । निगरानी तथा मार्गदर्शन के लिए देश के विशेषज्ञों और चिंतकों का एक संगठन गठित करना होगा जो कार्रवाई के दौरान पूरी प्रक्रिया पर सरकार को आवश्यक सलाह दे सके ।
प्राचीन काल से ही एक राष्ट्र के रूप में हमने अनेक समस्यों का सफलतापूर्वक सामना किया है और इस समस्या का भी हम बखूबी सामना करेंगे ।बस जरूरत है कमर कस कर इस मैदान में उतरने की ।ऐसे ही इकबाल ने नहीं कहा था कि -- "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी...."

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