Monday, May 17, 2010

दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में 40 लोग मारे गए


दंतेवाड़ा। १७ मई । नक्सलियों ने आज छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक बस को विस्फोट से उड़ा दिया, जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए। मृतकों में 20 विशेष पुलिस अधिकारी शामिल हैं।

यात्री बस सुकमा से दंतेवाड़ा जा रही थी। माओवादियों ने चिंगावरम गांव के निकट भूसारास और गदिरास के बीच बस को विस्फोट से उड़ाया। रायपुर से करीब 450 किलोमीटर दूर किए गए इस हमले में नक्सलियों ने जिलेटिन की छड़ वाली विस्फोटक प्रणाली का इस्तेमाल किया।

विस्फोट इतना जबर्दस्त था कि बस कई फुट दूर उछलकर चली गई और क्षत विक्षत मानव अंग सड़क के किनारे पडे़ नजर आए।

यह हमला शाम करीब पौने पांच बजे किया गया। इस घटना में मानक नियमों के उल्लंघन की बात भी सामने आई है। मानकों के अनुसार पुलिसकर्मियों और विशेष पुलिस अधिकारियों को असैन्य वाहन में सफर करना प्रतिबंधित है।

इस बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 35 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है हालांकि विशेष सचिव उत्थान कुमार बंसल ने मरने वालों की संख्या आशंका से कहीं अधिक होने की बात स्वीकारते हुए कहा कि बस पर 65 से 70 व्यक्तियों के सवार होने की क्षमता थी। बस पर सवार लोगों में पुलिसकर्मी और आम नागरिक शामिल थे।

रमन सिंह ने इस घटना को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी चिदंबरम से बातचीत की है और कल वह दिल्ली पहुंच रहे हैं।

रमन सिंह ने बताया कि मारे गए लोगों में 11 विशेष पुलिस अधिकारी और 24 आम नागरिक हैं। इन घटना में 15 लोग घायल हुए हैं, जिनमें 14 विशेष पुलिस अधिकारी और एक महिला है।

उन्होंने बताया कि घायलों को सुकमा के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रमन सिंह ने कहा कि वह प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से इस मसले पर बातचीत के दौरान रणनीति बदलने पर विचार करने को कहेंगे। '' मैं उनसे चर्चा करूंगा कि जिस हिसाब से नक्सलियों ने नागरिकों को मारना शुरू किया है, उस हिसाब से क्या तैयारी की जा सकती है। ''

उन्होंने कहा कि जिस तरह आम नागरिकों, पंचायती राज के लोगों और पुसिलकर्मियों पर हमला किया जा रहा है, उससे ऐसा लग रहा है कि नक्सली बौखला गए हैं। माओवादी राज्य में जनता और सुरक्षाबलों का मनोबल तोड़ना चाह रहे हैं।

यह पूछने पर कि क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को सेना के हवाले करना चाहिए, सिंह ने कहा कि यह केन्द्र सरकार का विषय है। इन सभी मुद्दों पर प्रधानमंत्री से बातचीत की जाएगी।

उन्होंने मारे गए नागरिकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपए, मारे गए विशेष पुलिस अधिकारियों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए सहायता राशि देने का ऐलान किया।

उधर गृह सचिव जी के पिल्लै ने मंत्रालय के आला अधिकारियों की बैठक के बाद नई दिल्ली में संवाददाताओं को बताया, '' किसी ने भी माओवादियों को निर्दोष और निहत्थे लोगों की हत्या करने का अधिकार नहीं दिया है।

पिल्लै ने कहा, '' निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाने की माओवादियों की यह प्रवृत्ति बरसों से देखने को मिल रही है। ''

मरने वालों की संख्या के बारे में कुछ कहने से इंकार करते हुए पिल्लै ने कहा कि सात लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उनमें से कुछ की हालत चिन्ताजनक है।

जिस बस को नक्सलियों ने विस्फोट से उड़ाया, वह पूरी तरह नष्ट हो गई है। बस का आगे का हिस्सा एक लोहे की गेंद की शक्ल में बदल गया है। बस से निकाले गए कई शव बुरी तरह झुलसे हुए थे।

इन्सास राइफलों सहित विशेष पुलिस अधिकारियों के शव, आम नागरिकों के शव, जूते-चप्पलें और जले हुए कपडे़ घटनास्थल पर पडे़ नजर आए।

इससे पहले नक्सलियों ने छह अप्रैल को अब तक का सबसे घातक हमला करते हुए दंतेवाड़ा जिले के ही मुकराना के जंगलों में 76 सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी थी।

आठ मई को नक्सलियों ने बीजापुर जिले में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के सात जवानों की हत्या कर दी थी।

इससे एक दिन पहले माओवादियों ने केंद्र सरकार द्वारा उनके खिलाफ शुरू किए गए सुरक्षा अभियानों के विरोध में छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों में 48 घंटे बंद का आह्वान किया था।

नक्सली-हमला-घटनाक्रम

-31 जुलाई, 2009 : बीजापुर, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने विशेष पुलिस अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति की हत्या की।

-27 जुलाई, 2009 : दंतेवाडा, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का विस्फोट कर छह लोगों को मौत के घाट उतारा।

-23 जुलाई, 2009 : गढचिरोली, महाराष्ट्र : नक्सलियों ने एटटापल्ली तालुका में एक आदिवासी की हत्या की।

-18 जुलाई, 2009 : बस्तर, बीजापुर, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने एक ग्रामीण की हत्या की और एक वाहन जलाया।

-23 जून, 2009 : लक्खीसराय, बिहार : मोटरसाइकिल पर सवार नक्सलियों ने जिला अदालत परिसर में गोलीबारी कर अपने चार साथियों को छुडाया।

-16 जून, 2009 : पलामू, झारखंड : माओवादियों का बारूदी सुरंग विस्फोट, 11 पुलिस अधिकारियों की मौत, घात लगाकर किए गए एक अन्य हमले में चार पुलिसकर्मियों की हत्या।

-13 जून, 2009 : बोकारो, झारखंड : नक्सलियों का दो बारूदी सुरंग विस्फोट और बम हमला, दस पुलिसकर्मियों की मौत।

-10 जून, 2009 : सरंदा वन, झारखंड : माओवादियों का पुलिस दल पर हमला।

-22 मई, 2009 : गढचिरोली, महाराष्ट्र : माओवादियों ने 16 पुलिसकर्मियों की हत्या की।

-22 अप्रैल, 2009 : लातेहर, झारखंड : माओवादियों ने ट्रेन अगवा की।

-13 अप्रैल, 2009 : कोरापुट, उडीसा : माओवादियों के हमले में अर्धसैनिक बलों के 10 जवानों की मौत।

-16 जुलाई, 2008 : मलकानगिरि, उडीसा : बारूदी सुरंग विस्फोट कर पुलिस वैन उडाई, 21 पुलिसकर्मियों की मौत।

-29 जून, 2008 : बालीमेला जलाशय, उडीसा : नक्सलियों का नौका पर हमला, 38 पुलिसकर्मियों की मौत।

1 comment:

  1. बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

    बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
    अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर

    सनसनाते पेड़
    झुरझुराती टहनियां
    सरसराते पत्ते
    घने, कुंआरे जंगल,
    पेड़, वृक्ष, पत्तियां
    टहनियां सब जड़ हैं,
    सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

    बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
    पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
    पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
    तड़तड़ाहट से बंदूकों की
    चिड़ियों की चहचहाट
    कौओं की कांव कांव,
    मुर्गों की बांग,
    शेर की पदचाप,
    बंदरों की उछलकूद
    हिरणों की कुलांचे,
    कोयल की कूह-कूह
    मौन-मौन और सब मौन है
    निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
    और अनचाहे सन्नाटे से !

    आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
    महुए से पकती, मस्त जिंदगी
    लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
    पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
    जंगल का भोलापन
    मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
    कहां है सब

    केवल बारूद की गंध,
    पेड़ पत्ती टहनियाँ
    सब बारूद के,
    बारूद से, बारूद के लिए
    भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
    भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

    फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    बस एक बेहद खामोश धमाका,
    पेड़ों पर फलो की तरह
    लटके मानव मांस के लोथड़े
    पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
    टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
    सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
    मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
    वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
    ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
    निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
    दर्द से लिपटी मौत,
    ना दोस्त ना दुश्मन
    बस देश-सेवा की लगन।

    विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
    अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
    बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
    अपने कोयल होने पर,
    अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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