Wednesday, May 19, 2010

मध्य प्रदेश में घुसे नक्सली

भोपाल। १९ मई । छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में कल शाम बारूदी सुरंग में विस्फोट की नक्सली घटना के बाद मध्यप्रदेश के सीमावर्ती बालाघाट एवं रीवा जिले में तीस से चालीस नक्सलियों के घुसने की गुप्तचर सूचना के मद्देनजर दोनों जिलों में पुलिस के लिए 'अलर्ट' जारी किया गया है।

प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) संतोष कुमार राउत ने आज यहां संवाददाताओं से अनौपचारिक बातचीत में यह जानकारी देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की ताजा नक्सली घटना के बाद छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे मध्यप्रदेश के बालाघाट एवं सीधी जिले में तीस से चालीस नक्सलियों के एक साथ 'मूवमेंट' की गुप्तचर सूचना के मद्देनजर 'अलर्ट' जारी करने के साथ ही पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है।

उन्होंने कहा कि बालाघाट रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) मुनिराजू एवं रीवा रेंज के आईजी जी.आर. मीणा से इस बारे में उनकी बात हुई है और दोनों जिलों में उन्हें सूचना तंत्र मजबूत करने तथा गश्त बढ़ाने को कहा गया है। डीजीपी ने कहा कि किसी नक्सली दलम में अमूमन दस से बारह नक्सली होते हैं, लेकिन जो सूचना मिली है, उसके अनुसार बालाघाट एवं सीधी जिलों में तीस से चालीस नक्सलियों के एक साथ 'मूवमेंट' की जानकारी चौंकाने वाली है।

उल्लेखनीय है कि पांच राज्यों में नक्सलियों के बंद के दौरान कल शाम छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नक्सलवादियों द्वारा बारूदी सुरंग में विस्फोट के जरिए सुकमा से दंतेवाड़ा जा रही एक यात्री बस में सवार पन्द्रह पुलिसकर्मियों सहित तीस लोगों को मार दिया था, जबकि इस घटना में इतने ही पुलिसकर्मियों सहित 29 लोग घायल हुए हैं।

नक्सली बंद से झारखंड को तीन अरब की चपत

रांची । नक्सलियों की बंदी ने झारखंड के आर्थिक विकास की गति धीमी कर दी है। हर महीने होने वाली बंदी से कारोबार का बुरा हाल है। दो दिनों की ताजा बंदी में करोड़ों रुपए का कारोबार प्रभावित हुआ है। इसके अतिरिक्त नक्सल प्रभावित इलाकों में बाजार, बैंक और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहने से भी करोड़ों का नुकसान हुआ है। इन दो दिनों में झारखंड में कम से कम तीन सौ करोड़ के नुकसान का अनुमान है।

सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों में ढुलाई नहीं होने से दो दिनों में तीस करोड़ के नुकसान का अनुमान लगाया गया है। इसी तरह अयस्कों की ढुलाई ठप होने से प्रति दिन 47 करोड़ अर्थात दो दिनों में 92 करोड़ रुपए, बाजारों में कारोबार नहीं होने से दो दिनों में एक सौ करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। ढुलाई कार्य में लगे लगभग पांच हजार ट्रक व ढाई हजार बसें भी नक्सली बंद के चलते दो दिनों तक नहीं चलीं। इससे भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।

डालटनगंज में दो दिनों की नक्सली बंदी के कारण जिले के व्यवसायियों को करीब 15 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। आरएमडी सेल भवनाथपुर में लाइम स्टोन व डोलोमाइट ढुलाई ठप रही। लातेहार में बंदी से दो करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। हजारीबाग जिले को करीब एक सौ करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। सीसीएल महाप्रबंधक प्रभाकर चौकी ने बताया कि उनकी चार परियोजना तापिन, परेज, केदला वाशरी व झारखंड में कोयले का उत्पादन तो हुआ, लेकिन न ही ढुलाई हो सकी और न ही डिस्पैच। इस कारण हमें दो दिनों में तकरीबन 60 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। वहीं ट्रांसपोर्टरों को भी लाखों का नुकसान पहुंचा।

रेलवे को भी हुआ भारी नुकसान

कोडरमा जिले में धनबाद रेल मंडल में कोयले की ढुलाई का काम ठप रहा इसमें करीब दस लाख से अधिक का नुकसान रेलवे को हुआ। लोहरदगा में भी दस करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। जिले में बाक्साइट खनन पूरी तरह से बंद रहा। बेरमो जिले में सीसीएल को करीब दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है वहीं बोकारो थर्मल पावर प्लांट, चंद्रपुरा थर्मल पावर प्लांट और तेनुघाट थर्मल पावर प्लांट को भी अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। धनबाद रेल मंडल में कोयला समेत अन्य सामानों अन्य सामानों की दोनों दिन 9-9 रैक की ढुलाई नहीं हो सकी। इससे करीब साढ़े चार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। वहीं कई सवारी ट्रेनों के रद होने से यात्री किराये के मद में 40 लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बंद असरदार

रांची । माओवादियों की 48 घंटे की बंदी के दूसरे व अंतिम दिन बुधवार को पश्चिम बंगाल, झारखंड व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बंद असरदार रहा। उल्लेखनीय है कि माओवादियों ने दस सूत्री मांगों को लेकर बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व बिहार में दो दिवसीय बंद का आह्वान किया था।

बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिला के जंगल महल क्षेत्र में बंद प्रभावी रहा, जबकि पुरुलिया व बांकुड़ा में बंद का मिलाजुला असर दिखा। राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों का आवागमन अपेक्षाकृत काफी कम हुआ। झाड़ग्राम व मेदिनीपुर तहसील के बीनपुर, बेलपहाड़ी, नयाग्राम, लालगढ़, सिंजुआ, धर्मपुर, मालबांधी, शालबनी, ग्वालतोड़ समेत झाड़ग्राम शहर में बंद के कारण सन्नाटा पसरा रहा। उड़ीसा के नक्सल प्रभावित मलकानगिरी क्षेत्र में बंद असरदार रहा, जबकि सुंदरगढ़ जिले में आंशिक असर देखा गया।

झारखंड के पलामू, सिमडेगा, लातेहार, गुमला, पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला, खूंटी में बंद असरदार रहा। गढ़वा, चतरा, लोहरदगा, गिरिडीह व रांची के ग्रामीण क्षेत्रों में बंद का मिलाजुला असर देखा गया, जबकि अन्य जगहों में जनजीवन सामान्य रहा।

नक्सल बंद के दौरान नागरिकों में डर कायम

रायपुर। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नक्सल बंद के दूसरे दिन पश्चिम बंगाल में नक्सली घटना के बाद राज्य में पुलिस को सतर्क रहने के लिए कहा गया है। वहीं बस्तर क्षेत्र के निवासी डरे हुए है।

राज्य में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने आज बताया कि नक्सलियों द्वारा बंद के आहवान को देखते हुए राज्य में सभी जिलों और थानों को सतर्क कर दिया गया है वहीं पश्चिम बंगा की घटना के बाद राज्य के सीमावर्ती जिलों और थानों को विशेष चौकसी बरतने के लिए कहा गया है।

अधिकारियों ने बताया कि दंतेवाड़ा क्षेत्र में नक्सली लगातार रेल्वे ट्रेक को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते है इसलिए इन क्षेत्रों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

दंतेवाड़ा जिले के सूत्रों ने बताया कि यात्री बस पर नक्सली हमले में 31 लोगों के मारे जाने की घटना के बाद से यहां के बस नहीं चला रहे है। दंतेवाड़ा के नागरिकों और दुकानदारों ने घटरना के विरोध में मंगलवार को शहर बंद रखा था लेकन आज बाजार खुले हुए है।

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय के एक व्यापारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि क्षेत्र में लगातार हो रही घटनाओं और बंद से उनका व्यापार प्रभावित हुआ है तथा अब यात्राकरने में भी डर लग रहा है। व्यापारी ने बताया कि उसे जरूरी काम से सुकमा जाना था, लेकिन परिजनों के कहने के बाद अभी उसने यात्रा टाल दी है।

उन्होंने बताया कि लोग सुकमा और कोंटा जैसे जगहों पर यात्रा करने से डर रहे है।

इधर बस्तर क्षेत्र के बीजापुर जिले के पुलिस अधीक्षक अविनाश मोहंती ने बताया कि बंद के दूसरे दिन शहरी क्षेत्रों में बसे और अन्य वाहन चल रहे है लेकिन आवापल्ली जैसे अंदरूनी क्षेत्रों में बस आपरेटरों द्वारा बस नहीं चलाने के कारण लोगों को आवागमन में दिक्कते आ रही है।

मोहंती ने बताया कि बल के जवान मुस्तैद है तथा क्षेत्र में अभियान जारी है।

कांकेर जिले के पुलिस अधीक्षक अजय यादव ने बताया कि जिले के शहरी क्षेत्र में बंद का कोई असर नहीं है तथा अभी तक स्थिति सामान्य है। अंदरूनी क्षेत्रों में आवागमन पर असर पड़ा है लेकिन सुरक्षा बल के जवान स्थिति को सामान्य करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दंतेवाड़ा जिले में नागरिकों पर नक्सली हमले के बाद बस्तर क्षेत्र के निवासी सहमे हुए है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बल उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे है।

जब एसपीओ ने ड्रायवर बन बचाई कई जानें

रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने बस को निशाना बनाकर जहां आम लोगों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया वहीं बस में कुछ ऐसे जांबाज विशेष अधिकारी भी थे जिन्होंने न केवल नक्सलियों को वहां से खदेड़ा बल्कि ड्रायवर बन घायल लोगों को अस्पताल भी पहुंचाया।

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से सुकमा कस्बे की ओर रवाना हुए यात्रियों और नक्सल विरोधी अभियान से वापस लौट रहे विशेष पुलिस अधिकारियों को शायद इस बात का अंदेशा नहीं था कि आने वाले दूसरे घंटे में उनके सामने भयानक मौत नाचेगी।

नक्सली हमले में घायल यात्रियों के मुताबिक जब दंतेवाड़ा से यात्री बस करीब सवा दो बजे सुकमा के लिए रवाना हुई तब उसमें सवार लोगों को भारी गर्मी से कुछ राहत मिली। बस जब कुछ दूर पहुंची तब गादीरास गांव के करीब उसे कुछ वर्दीधारी एसपीओ ने रोक लिया और वे बस के भीतर तथा कुछ छत पर सवार हो गए।

बस जब कुछ दूर भूसारास गांव से आगे चिंगावरम के पास पहुंची तब लगभग पौने पांच बज रहे थे और इसी दौरान जोरदार धमाका हुआ और लोगों की चीखें सुनाई देने लगी। इसके बाद घटनास्थ्ल पर कोहराम मच गया और सामने मंजर दहला देने वाला था।

बस में सवार एक विशेष पुलिस अधिकारी वटटी ने बताया कि बस में जब धमाका हुआ तो बस वहां से उछली तथा उसका पिछला हिस्सा छत विक्षत हो गया था। इसमें सवार कुछ यात्रियों के चिथड़े उड़ गए थे तथा कुछ बाहर दूर तक छिटक गए थे। इस दौरान वह वहीं पड़ा था और उसने देखा कि लगभग चार की संख्या में ए क 47 बंदूकधारियों ने गोली चलाना शुरू कर दिया। इस दौरान कुछ और एसपीओ वहां थे और उनके पास इंसास रायफल भी था। एसपीओ ने भी जवाबी कार्रवाई की और पीछे से आ रहे अन्य एसपीओ ने भी उनका साथ दिया तब नक्सली वहां से भाग गए। बटटी कहते हैं कि जब यह घटना उनके सामने हुई तब वे लहुलुहान थे और उन्हें लग रहा था कि जल्द ही उनकी जान चली जाएगी। बटटी अभी सुकमा के अस्पताल में भर्ती है।

राज्य के पुलिस प्रवक्ता पुलिस महानिरीक्षक आर के विज कहते हैं कि एसपीओ ने यदि मोर्चा नहीं सम्भाला होता तब शायद नक्सली सभी लोगों को मार देते तथा हथियार भी लूट लेते।

विज बताते हैं कि घायल एसपीओ के पास आटोमेटिक बंदूकें थी और उन्होंने घायल अवस्था में ही नक्सलियों का मुकाबला किया वहीं इसी दौरान पीछे से एक अन्य गाड़ी में और एसपीओ तथा एसपीओ से सिपाही बने कुछ अन्य जवान वहां आ गए और उन्होंने घायलों के आसपास घेरा बना लिया जिससे नक्सली नजदीक आकर शवों को क्षत-विक्षत न कर सकें ओर हथियार नहीं लूट सकें।

अधिकारी बताते हैं कि जब नक्सली वहां से भाग गए तब यहां मौजूद एसपीओ ने जीप को रोका और घायलों को सुकमा ले जाने की गुहार लगाई जब डरा हुआ वाहन चालक राजी नहीं हुआ तब वह खुद ही ड्रायवर सीट पर बैठा और घायलों को सुकमा पहुंचाया और उनकी जान बचाई।

विज बताते हैं कि इस हमले के दौरान एक बात और सामने आई है कि एसपीओ और उसके साथी जवान न तो वहां से भागे और न ही पीठ दिखाई।

बिज के मुताबिक राज्य में अभी लगभग चार हजार विशेष पुलिस अधिकारी कार्यरत हैं और यह बस्तर में नक्सलियों से लोहा ले रहे अर्धसैनिक बल और पुलिस जवानों की आंख के रूप में काम कर रहे हैं और शायद यही कारण है कि नक्सली इन्हें आंख की किरकिरी मान रहे है।

एसपीओ बने नक्सलियों की आंख की किरकिरी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में शामिल पुलिस जवानों की आंख के रूप में विख्यात विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) नक्सलियों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। यहीं कारण है कि नक्सली समय.समय पर इन एसपीओ को निशाना बनाने से नहीं चूकते हैं।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में वर्ष 2005 में जब जन-आंदोलन सलवा जुडूम की शुरुवात हुई तब से नक्सलियों ने इस इलाके में पुलिस तथा अपने खिलाफ खड़े होने वाले आदिवासियों के खिलाफ एक युद्ध छेड़ दिया है। वर्ष 2005 से लेकर अब तक इन पांच सालों में नक्सलियों ने तीन हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली हैं जिनमें पुलिस कर्मी, विशेष पुलिस अधिकारी और आम आदमी शामिल हैं।

बस्तर में लड़ने वाले अर्ध सैनिक बलों और पुलिस जवानों में एसपीओ का नाम सबसे अंत में भले ही आता है लेकिन यहीं एसपीओ आज बाहर से आने वाले केन्द्रीय बल और राज्य पुलिस बल की आंख के रूप में काम करते हैं।

दंतेवाड़ा जिले में जब सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुवात हुई तब नक्सलियों ने भारी संख्या में आदिवासियों को निशाना बनाना शुरू किया और उनका मुख्य निशाना सलवा जुडूम शिविर था। इस शिविर में रहने वाले आदिवासी युवकों ने जब नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने की बात कही तब इन्हें ट्रेंनिग देकर विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्ति दी गई वहीं इसमें कुछ ऐसे युवक भी शामिल थे जो नक्सलियों की हिंसा को देखकर उनसे अलग हो गए थे। राज्य के पुलिस विभाग के प्रवक्ता आर के विज बताते हैं कि पिछले तीन दशक से छत्तीसगढ़ में आम आदमी के लिए लड़ने की बात कह हिंसा फैला रहे नक्सलियों ने सबसे पहले आदिवासी संस्कृति पर ही धावा बोला और उनके हाट बाजार बंद करवा दिए तथा पूजा स्थलों को क्षतिग्रस्त कर दिया।

नक्सलियों की इन हरकतों से आदिवासी परेशान थे और उन्हें अपनी ही जमीन पर अपनी ही संस्कृति से बेदखल होने का दुख था। वर्ष 2005 में जब सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुवात हुई तब आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने पुलिस का साथ देने का बीड़ा उठाया।

राज्य सरकार ने जब इन्हें एसपीओ बनाने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा तब केन्द्र सरकार ने इनके लिए 15 सौ रुपए प्रतिमाह का मानदेय निर्धारित करते हुए राज्य सरकार के इस प्रस्ताव पर मोहर लगा दी। बाद में इनके मानदेय में 650 रुपए प्रतिमाह की बढ़ोतरी कर दी गई।

पिछले माह जब राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह बस्तर के प्रवास पर थे तब उन्होंने एसपीओ को तीन हजार रुपए प्रतिमाह मानदेय और तीन रुपए किलो प्रति किलो के दर से प्रतिमाह 35 किलो चावल देने की घोषणा की गई। आज बस्तर क्षेत्र में लगभग चार हजार एसपीओ काम कर रहे हैं।

राज्य के दंतेवाड़ा जिले में सलवा जुडूम की शुरुवात हुई और यहां के आदिवासी युवक एसपीओ बन गए तब से यह एसपीओ नक्सलियों की आंख की किरकिरी बने हुए हैं।

राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि एसपीओ क्षेत्र के आदिवासी युवक है और वे जंगल, पहाड़ों और यहां के भूगोल से भली भांति परिचित हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे फोर्स को यह एसपीओ रास्ता बताने में जैसे महत्वपूर्ण काम करते हैं। पुलिस अधिकारी बताते हैं कि एसपीओ के भरोसे सुरक्षा बलों ने कई बड़े अभियान भी चलाए हैं और उन्हें सफलता भी मिली है। एसपीओ स्थानीय नक्सली नेताओं को भी पहचानते हैं और उन्हें गिरफ्तार करवाने में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। इससे नक्सली एसपीओ से नाराज हैं और इन्हें लगातार नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहे हैं और जब इन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं तब वे इनके परिवार वालों की हत्या करने से नहीं चूकते हैं।

ऐसी ही एक घटना में नक्सलियों ने वर्ष 2007 में एसपीओ और पुलिस के रानीबोदली शिविर में हमला कर 55 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था जिसमें 39 एसपीओ शामिल थे।

अधिकारियों के मुताबिक राज्य शासन अब एसपीओ को पुलिस की नियमित भर्ती में प्रमुखता दे रहा है और कई एसपीओ आज सिपाही में रूप में भर्ती हैं। इस महीने की 17 तारीख को जब यात्री बस पर हमला किया गयाय और 31 लोगों की हत्या की गई तब इसमें 15 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए जिसमें पांच एसपीओ थे और 11 एसपीओ से सिपाही बने जवान थे।

पुलिस अधिकारी कहते हैं कि नक्सली इस बात से नाराज हैं कि जिन स्थानीय लोगों को डराकर वे राज करना चाहते हैं वही आज पुलिस का साथ दे रहे हैं तथा पुलिस जंगल में कामयाब भी हो रही है। पुलिस एसपीओ को जंगल में आंख समझती हैं तो नक्सली आंख की किरकिरी।

चिदंबरम के यू-टर्न से भाजपा खफा

नई दिल्ली ।नक्सलवाद से निपटने के मुद्दे पर गृह मंत्री पी. चिदंबरम के यू टर्न से खफा भाजपा ने अब उन पर ही निशाना साधा है। पार्टी ने दो टूक कहा है कि चिदंबरम पहले तो सीमित अधिकार की बात कहकर कड़े तेवर दिखा रहे थे, लेकिन जब उन्हें अपने ही दल व गठबंधन में समर्थन नहीं मिला तो नक्सलवाद से निपटने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल पीछे हट गए।

गृह मंत्री का यह रवैया संवैधानिक व राजनीतिक दोनों तरह से उचित नहीं है और यह उनकी अब तक की छवि के विपरीत है। नक्सली हिंसा के निपटने के मामले में भाजपा शुरू से ही गृहमंत्री पी. चिदंबरम के साथ खड़ी रही है, लेकिन उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पार्टी ने एक बयान जारी कर कहा है कि अभी तक चिदंबरम इस मुद्दे पर ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे थे, लेकिन अब वह अपनी पार्टी के दवाब में इस तर्क की आड़ ले रहे हैं कि माओवाद से निपटने की मुख्य जिम्मेदारी राज्यों की है। केंद्र का काम केवल सहायक की भूमिका निभाने का है।

भाजपा ने दो टूक कहा कि राज्य में केंद्रीय बलों को भेजना भर केंद्र की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उनकी तैनाती भी उसके हिस्से में आती है। ऐसे में केंद्र सरकार किसी भी सूरत में अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती है। भाजपा ने कहा कि अभी 17 मई को चिदंबरम ने कहा था कि वह माओवाद के खिलाफ लड़ाई में वायु सेना के इस्तेमाल के लिए अपनी सरकार को मनाने का प्रयास करेंगे। इसी दिन चिदंबरम ने यह शिकायत भी की थी कि सुरक्षा संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति ने माओवाद के विरुद्ध लड़ाई में उन्हें सीमित अधिकार दिया है। जबकि उन्होंने व्यापक अधिकार की मांग की थी।

बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के 4 जवान शहीद

कोलकाता. 19 मई. पश्चिमी मिदनापुर जिले के लालगढ़ क्षेत्र में बुधवार को गश्त लगा रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों के एक वाहन के बारूदी सुरंग की चपेट में आने से हुए विस्फोट में चार जवान शहीद हो गए और दो घायल हो गए। नक्सलियों द्वारा पांच रायों में किए गए दो दिवसीय बंद के दूसरे दिन लालगढ़ पुलिस थाना क्षेत्र के पिंगबोनी और रामगढ़ के बीच नक्सलियों का यह तांडव हुआ। नक्सली अपने खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा चलाए रहे संयुक्त सुरक्षा अभियान को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। पश्चिमी क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक जुल्फिकार हसन ने विस्फोट की पुष्टि करते हुए बातचीत में कहा- चार जवानों की मौके पर ही मौत हो गई। दो घायल भी हुए हैं। घायलों को पश्चिमी मिदनापुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। सुरक्षा बल घने जंगलों में गश्त लगा रहा थे, उसी दौरान यह विस्फोट हुआ। घायलों में एक सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट हैं, जिनकी हाल ही में यहां तैनाती हुई थी। विस्फोट इतना जोरदार था कि वाहन के परखच्चे उड़ गए और सड़क पर लगभग पांच फुट गङ्ढा हो गया। संयुक्त सुरक्षा बल और राय के पुलिसकर्मी घटनास्थल की ओर कूच कर गए हैं। पिछले 11 महीने से संयुक्त सुरक्षा बल के जवान इस क्षेत्र में तैनात हैं।

नक्सलियों से निपटने में कमजोर केन्द्र- मायावती


लखनऊ. प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने केन्द्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि केन्द्र सरकार ने नक्सली समस्या से प्रभावित क्षेत्रों के प्रभावी निदान की ओर न तो कोई ध्यान दिया और न ही कोई सार्थक कदम उठाया। उन्होंने कहा कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में राय के कुछ जनपदों में नक्सलवाद धीरे-धीरे पनपा। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में व्याप्त भीषण गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं के अभाव के कारण यहां के लोग अपने को उपेक्षित महसूस करने के कारण मजबूरीवश नक्सलवाद के समर्थक बन गये। उन्होंने इसके लिए केन्द्र और राय की पूर्व सरकारों की गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। मुख्यमंत्री ने आशंका व्यक्त की कि प्रदेश के कुछ पिछडे क्षेत्रों जैसे- बुंदेलखंड तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में नक्सलवाद की समस्या पुन: पनप सकती है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों के विकास के लिए उनके स्तर से केन्द्र सरकार को बार-बार पत्र लिखकर विकास कार्यों के लिए आर्थिक मदद देने की मांग की, किन्तु केन्द्र द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कार्यवाही आज तक नहीं की गयी। उन्होंने कहा कि इसके कारण इन क्षेत्रों के पिछड़ेपन और यहां की बुनियादी सुविधाओं के विकास कार्यों को त्वरित गति से लागू नहीं किया जा पा रहा है। मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि प्रदेश में नक्सलवाद की समस्या केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। उनकी सरकार ने नक्सलवाद को आर्थिक तथा सामाजिक समस्या के रूप में देखकर इसके प्रभावी निदान की पहल की है। प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र तथा कुछ अन्य जिले नक्सल प्रभावित रायों से सटे होने के कारण इस समस्या से ग्रस्त हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि अन्य विकास कार्यों के अन्तर्गत उनकी सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को विकास कार्यों से जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। इसी कड़ी में सरकार ने इन क्षेत्रों में उपलब्ध उप खनिज क्षेत्रों में से एक तिहाई खनन क्षेत्रों के लिए पट्टा ऐसे स्वयं सहायता समूहों को देने का निर्णय लिया, जिनके सदस्य उसी ग्राम के निवासी हों जिस क्षेत्र में ऐसा पट्टा क्षेत्र स्थित है। उन्होंने कहा कि इसके लिए यह भी तय किया गया है कि इन स्वयं सहायता समूहों में कम से कम एक तिहाई सदस्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति के हों। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित मिर्जापुर, सोनभद्र, चन्दौली, देवरिया, कुशीनगर, मऊ, बलिया तथा गाजीपुर जनपदों में पिछले तीन वर्षों में लगभग 54 हजार हैण्डपम्प स्थापित किये गये। इन आठ नक्सल प्रभावित जनपदों में 19,181 आवंटियों को कृषि पट्टे आवंटित किये गये। इसी प्रकार 31,532 परिवारों को आवास स्थल आवंटित किये गये तथा 2618 लोगों को मत्स्य पालन के लिए पट्टे प्रदान किये गये हैं।

नक्सलियों से निपटने रक्षा विशेषज्ञों की जरूरत : रमन


नई दिल्ली. 19 मई. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नक्सलवादियों के खिलाफ लडाई को विकास कार्यों और सुरक्षा अभियान की दोहरी रणनीति से आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त करते हुये आज केन्द्र से अपील की कि वह एकीकृत कार्ययोजना के लिये रक्षा विशेषज्ञों का एक समूह शीघ्र गठित करें जो राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों तथा वन क्षेत्रों में इस समस्या के खात्मे के लिये रणनीतिक मार्गदर्शन करे। डा. रमन सिंह ने आज यहां एक संवाददाता सम्मेलन में नक्सलवाद को आतंकवाद करार देते हुये राजनीतिक दलों और मानवाधिकारवादियों से सवाल किया कि बाहरी मदद और हथियारों के सहारे सार्वजनिक वाहनों स्कूलों अस्पतालों पर हमले और निर्दोष लोगों के सामूहिक संहार को आतंकवाद नहीं कहेंगे तो फिर आतंकवाद किसे कहेंगे। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि छत्तीसगढ में बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में सरकार के सक्रियता से चलाये जा रहे विकास कार्यों और नक्सलवाद के खिलाफ आगे बढ़कर कार्रवाई करने से जनता सरकार के साथ खड़ी हो रही है तथा नक्सलवादी इससे बौखला कर सुकमा जैसे हमले कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि उनकी सरकार ने बस्तर में विकास के लिये 9000 करोड़ रूपये की एक अलग से योजना बनायी है और योजना आयोग से उसकी स्वीकृति हासिल करने का प्रयास करेगी। मुख्यमंत्री ने एक प्रश्न के उत्तर में माना कि नक्सलवाद के मुद्दे पर केन्द्र और छत्तीसगढ के बीच बेहतर तालमेल है तथा राज्य में मौजूद अर्ध्दसैनिक बल और राज्य पुलिस बल समन्वय पूर्वक काम कर रहे हैं।

भाजपा यूपीए के साथ और कांग्रेस टकराव में?

सुनील कुमार

संपादकीय, दैनिक छत्तीसगढ़, 19 मई, 2010

कल जिन लोगों ने टीवी पर भाजपा के प्रवक्ता और नेता अरूण जेटली की प्रेस कांफ्रेस देखी-सुनी हो उन्हें भाजपा के ये तर्क तो सही लगेंगे कि नक्सल मोर्चे पर आज भाजपा तो यूपीए के साथ है लेकिन खुद यूपीए के भीतर बिखराव है। जेटली ने यह बात सही कही कि लोकतंत्र में सरकार के बाहर के नेता सरकार के किसी बात के लिए जवाबदेह नहीं होते और कांगे्रस महासचिव दिग्विजय सिंह उसी दर्जे के नेता हैं इसलिए जब वे चिदंबरम के खिलाफ जाकर तरह-तरह की बातें कह रहे हैं तो प्रधानमंत्री को यह खुलासा करना चाहिए कि उनके गठबंधन और उनकी पार्टी की नक्सल-नीति क्या है? कल जब एक तरफ चिदंबरम का मीडिया के साथ बातचीत का समाचार छपा कि वे नक्सल मोर्चे पर और अधिक सहमति-अनुमति के लिए प्रधानमंत्री से बात करेंगे और उन्होंने वायुसेना के उपयोग के बारे में अपना झुकाव उजागर किया तो उसी के जवाब में उत्तरप्रदेश के दौर पर दिग्विजय सिंह ने खुलकर इसके खिलाफ कहा और यहां तक कहा कि ऐसी बात करने वालों को बस्तर के दंतेवाड़ा जैसे इलाकों की जमीनी हकीकत नहीं मालूम है। इसी के आसपास दिग्विजय ने सलवा जुडूम के खिलाफ एक सख्त बयान दिया और छत्तीसगढ़ की रमन सरकार को इसके लिए कोसा। कम से कम छत्तीसगढ़ की जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि रमन सरकार के पिछले पांच बरसों के कार्यकाल में कांगे्रस विधायक दल के नेता महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम के सबसे बड़े नेता थे और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को छोडक़र लगभग सभी कांगे्रस नेता या तो सलवा जुडूम के साथ थे या सलवा जुडूम पर चुप थे। इन बरसों में हमने लगातार कांगे्रस के इस आंतरिक विरोधाभासा पर लिखा था कि इस पार्टी को साफ करना चाहिए कि सलवा जुडूम पर इसकी नीति क्या है। अब जाकर अगर दिग्विजय सिंह महेंद्र कर्मा के इस मोर्चे के खिलाफ कहते हैं तो फिर अपनी ही पार्टी के पिछले पांच बरसों के बारे में उनका क्या कहना है? छत्तीसगढ़ में कांगे्रस और भाजपा-सरकार की आधी-आधी भागीदारी वाले सलवा जुडूम के बारे में क्या दिग्विजय को कर्मा का वह छपा हुआ बयान याद नहीं है जिसमें उन्होंने इस अभियान का समर्थन करने के लिए पार्टी तक छोड़ देने की बात कही थी?

अरूण जेटली और भाजपा की यह बात पूरी तरह सच है कि नक्सल मोर्चे पर रमन सरकार तो पूरी तरह चिदंबरम-मनमोहन सिंह के साथ है, भाजपा पूरे देश में केंद्र सरकार के साथ है और दूसरी तरफ गृह मंत्री चिदंबरम अपने गठबंधन, अपनी पार्टी और अपनी सरकार के भीतर बंधे हुए हाथों से काम कर रहे हैं। नक्सल हिंसा को देश की आंतरिक सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा बताने वाले प्रधानमंत्री यह जरूर कहते हैं कि एक मंत्री दूसरे मंत्री के विभाग के बारे में बयानबाजी न करे, यह भी कहते हैं कि नक्सल मोर्चे के बारे में अकेला गृह मंत्रालय बयान देगा लेकिन अपनी पार्टी पर उनका कोई काबू नहीं है। छत्तीसगढ़ में कांगे्रस के छोटे-छोटे नेता यह बयान देकर अपनी पार्टी को हंसी का सामान बना रहे हैं कि इस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। केंद्रीय गृह मंत्री चिदंबरम ने आज तक नक्सल मोर्चे पर छत्तीसगढ़ सरकार को न तो नाकामयाब कहा और न ही केंद्र की किसी और दखल की तरफ इशारा किया। जब राज्य और केंद्र पूरे तालमेल से देश के इस सबसे बड़े खतरे से जूझ रहे हैं तब देश में घूम-घूमकर दिग्विजय केंद्र और इस राज्य दोनों के खिलाफ सीधे-सीधे या गोलमोल शब्दों में बयान दे रहे हैं और मानो उसी को दिशा-निर्देश मानकर छत्तीसगढ़ के छोटे-छोटे कांगे्रस नेता राष्ट्रपति शासन की मांग कर रहे हैं।

यह कांगे्रस के लिए एक बहुत ही बेकाबू हालत है और यह उस पार्टी में तालमेल के संकट का सुबूत भी है। इस पार्टी ने पिछले कुछ ही महीनों के भीतर अपने बड़बोले नेताओं की बयानबाजी की कई मिसालें देखी हैं। शशि थरूर को जाते देखा है और जयराम रमेश को जाने की कगार से लौटते देखा है। यह सिलसिला अपनी सरकार और अपनी पार्टी के भीतर ही खत्म हो जाता तो भी ठीक रहता, लेकिन दिग्विजय की छोड़ी गई विरासत का जो नक्सल बोझ छत्तीसगढ़ ढो और झेल रहा है उसकी आत्मग्लानि से इतनी आसानी से मुक्त होकर अविभाजित मध्यप्रदेश के इस आखिरी मुख्यमंत्री के बयान देखते ही बनते हैं। बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों की जमीनी हकीकत की इतनी ही समझ अगर दिग्विजय सिंह को होती तो अविभाजित मध्यप्रदेश के इस छत्तीसगढ़ नाम के हिस्से के साथ भोपाल से चालीस बरस तक बेईमानी नहीं हुई होती। यह दिग्विजय का ही कार्यकाल था जब मध्यप्रदेश के बहुत से अभियानों में छत्तीसगढ़ का छ भी नहीं दिखता था और बाकी मध्यप्रदेश में कमलनाथ के एक संसदीय क्षेत्र में पूरे छत्तीसगढ़ के मुकाबले अधिक सिंचाई पंप कनेक्शन दिए गए थे। आज दिग्विजय सिंह जिस विकास पर जोर दे रहे हैं और नक्सलियों पर कार्रवाई के बजाय विकास को प्राथमिकता देने की बात कह रहे हैं वह विकास उनके पूरे कार्यकाल में बस्तर में पांव क्यों नहीं धर पाया? उस वक्त सबसे अधिक भ्रष्ट शासन तंत्र के चलते अगर किसी के पांव बस्तर में पड़े तो वे विकास के नहीं थे नक्सलियों के थे। लेकिन दिग्विजय सिंह पर अधिक चर्चा आज का मकसद नहीं है, आज हम कांगे्रस पार्टी को यह सुझाना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ रात-दिन अपनी जमीन पर लहू बिखरते देख रहा है और देश के इस सबसे बड़े खतरे से देश भर में सबसे कड़ी लड़ाई भी यही राज्य लड़ रहा है। ऐसे में अगर कांगे्रस पार्टी का एक बड़ा पदाधिकारी छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत को समझे बिना अपनी ही पार्टी के केंद्रीय गृह मंत्री को छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत न समझने वाला करार दे रहा है और लगातार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर इस अंदाज में हमले कर रहा है कि मानो नक्सलियों को न्यौता रमन-राज में दिया गया था, तो इससे दिग्विजय सिंह इस देश में केंद्र-राज्य संबंधों को भी तबाह कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ की आम जनता के बीच कांगे्रस पार्टी को उसी तरह तबाह कर रहे हैं जिस तरह उन्होंने कुछ दूसरे प्रदेशों में किया है। एक वक्त दिग्विजय अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ के भीतर सबसे लोकप्रिय कांगे्रस नेता थे लेकिन राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ ने भोपाल से की गई बेईमानी के जो सुबूत देखे और जितनी तरक्की की उसके चलते अब दिग्विजय सिंह की छत्तीसगढ़ में कोई जमीन बची नहीं है, वे इस राज्य में कांगे्रस के किसी तरह के प्रभारी भी नहीं हैं लेकिन वे जिस तरह की बयानबाजी इस राज्य को लेकर कर रहे हैं उससे इस राज्य में कांगे्रस की ग्यारह में से एक लोकसभा सीट भी अगले चुनाव में बचेगी या नहीं यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। जिस छत्तीसगढ़ में कांगे्रस का गढ़ माना जाता था वह ढह क्यों गया यह देखना हो तो इस बयानबाजी को देखना होगा जिससे छत्तीसगढ़ के ही बहुत से कांगे्रस नेता असहमत हैं लेकिन वे चुप हैं कि दिग्विजय सिंह जैसे ताकतवर नेता के सामने कौन मुंह खोले। आने वाले चुनाव में जनता इस पर मुंह जरूर खोलेगी।

Tuesday, May 18, 2010

राजनीति और बुध्दिजीवी

प्रभाकर चौबे,
साहित्यकार, पत्रकार, ट्रेड युनियन लीडर
रायपुर


छत्तीसगढ़ में माओवादी ज्यादा सक्रिय हैं इसलिए यहां तथा इन घटनाओं को लेकर देश भर में ज्यादा चर्चा हो रही है। माओवादी वर्तमान बुर्जुआ लोकतंत्र को खारिज करते हैं और इसकी जगह जनवाद लाना चाहते हैं। जबकि लोकतंत्रवादी इस लोकतंत्र को कायम रखना चाहते हैं। मतलब यह लड़ाई लोकतंत्र को बचाए रखने वाली ताकत और इसे खतम कर देने के लिए कटिबध्द ताकत के बीच है। इसका यह भी अर्थ है कि यह राजनीतिक लड़ाई है। एक तरफ लोकतंत्रवादी हैं और दूसरी तरफ जनवादवादी। वामदल भी जनवाद चाहते हैं, लेकिन वे लोकतंत्र की संसदीय धारा में हैं, इसलिए वे संसदीय प्रणाली के माध्यम से इस लोकतंत्र को जनवाद में तब्दील करना चाहते हैं। उनका सशस्त्र क्रांति पर भरोसा नहीं है। वे जनता को जागृत कर अपने पक्ष में कर इस तंत्र को बदलने में विश्वास करते हैं। माओवादी इसलिए लोकतंत्रवादियों और वाम जनवादियों दोनों को नकार रहे हैं। लोकतंत्रवादी जिसमें वाम दल भी हैं, वैलेट (वोट) के द्वारा परिवर्तन सोचते हैं जबकि माओवादी बुलेट से क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते हैं। इनके बीच बुध्दिजीवी कहां खड़े हैं। बुध्दिजीवी जो लोकतंत्र को बचाने की जा रही सत्ता की हिंसा और लोकतंत्र बदलने के लिए की जा रही माओवादी हिंसा, दोनों से दु:खी होते हैं, वे शांति चाहते हैं। वे दोनों से ही हिंसा त्यागने का आह्वान कर रहे हैं। ऐसे बुध्दिजीवी किसी के पक्षधर नहीं हैं-वे सरकार के पक्षधर नहीं हैं, वे माओवादियों और माओवाद के पक्षधर नहीं हैं। वे शांति के पक्षधर हैं। वे बुध्दिजीवी हैं सोचते हैं, इसलिए दोनों पक्षों से कहते हैं कि हिंसा छोड़ो और आपस में बात शुरू करो। वे बुध्दिजीवी हैं इसलिए बुध्दि की ही बात करेंगे, समझाएंगे, लड़ाका तो हैं नहीं कि तोप लेकर दोनों पक्षों को शांत करा दें। जहां तक बंदूक से लड़ने का सवाल है, सरकार ज्यादा ताकतवर होती है। उसकी हिंसा सांगठनिक होती है, इसलिए सरकार से वे पहले हिंसा बंद करने का आग्रह करते हैं और बातचीत का रास्ता तलाशने का तरीका ढूंढने को कहते हैं। आज तक किसी भी बुध्दिजीवीने किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं किया, हिंसा को जायज नहीं ठहराया। बुध्दिजीवी भी वर्तमान शोषणतंत्र को समाप्त होते देखना चाहते हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऐसी सत्ता चाहते हैं जो शोषणविहीन हो। आज राजनीतिक छलछंद से बुध्दिजीवी परेशान हैं, आहत हैं, लेकिन वे लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, इसलिए मानते हैं कि जनता में लोकतांत्रिक चेतना गहरी होगी तो वह खुद इसे बदलेगी। दिक्कत यह है कि जब देश के बुध्दिजीवी यह आग्रह करते हैं कि हिंसा का परित्याग कर माओवादियों से चर्चा की जाए तो इन बुध्दिजीवियों को माओवादी समर्थक मान लिया जाता है। उन्हें वापस जाने को कहा जाता है। उनके खिलाफ प्रदर्शन किया जाता है। उनके वाहनों की हवा निकाल दी जाती है। मतलब उनकी बात सुने बगैर उन्हें दंडित कर दिया जाता है। बुध्दिजीवी राजनीति में नहीं हैं वे तटस्थ हैं और न्याय की बात करते हैं। अगर उन्हें सुना ही न जाए और उनके खिलाफ निर्णय दे दिया जाए तो देश में बौध्दिक संवाद ही बंद हो जाएगा। देश में केवल राजनीति का एजेंडा ही चलेगा। होना यह चाहिए कि उन्हें सभा करने दें, उनकी बातें धैर्यपूर्वक सुनी जाएं और उनसे सवाल किया जाएं। बौध्दिक विमर्श को लठैत विमर्श बनाने से देश में बाहुबल ही चलेगा। लोकतंत्र में यह क्यों हो। बुध्दिजीवी न तो चुनाव लड़ रहे न हथियार उठाकर सरकार के खिलाफ खड़े हैं। वे किसी मसले पर अपनी राय दे रहे हैं। उस राय को बौध्दिकता से खारिज करें या स्वीकार करें। महाभारत में वेद व्यास किसी के तरफ नहीं थे। न पांडवों की तरफ न कौरवों की तरफ, वे शांति चाहते थे। उन्हें पीटकर चुप करा दिया गया होता तो इतना महान ग्रंथ, इतने विचारों से भरा विमर्श नहीं आया होता। यह कहना आसान है कि वातानुकूलित कमराें में बैठकर माओवादियों से चर्चा की बातें करते हैं बुध्दिजीवी। यह आम मुहावरा-सा बन गया है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आदिवासी अंचल के लिए आया दलिया, कम्बल, दूध आदि को खुले बाजार में बिकते इन बुध्दिजीवियों ने भी देखा है। इन्होंने जंगल कटते, आदिवासियों का हर तरह से शोषण होते देखा है। अरबों रुपए विकास के नाम आए और कहां गए, यह भी देखा है। सब देख रहे हैं, बुध्दिजीवियों को भी दिखता रहा है। बुध्दिजीवी चाहते हैं कि यह बंद हो। लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि हिंसा से नहीं, लोकतांत्रिक तरीके से सब बंद हो। सरकार के खिलाफ जनता को उठ खड़ा होने को लोकतांत्रिक तरीके से तैयार किया जाए। इसके लिए अगर वे सरकार से हिंसा छोड़ बातचीत का रास्ता अख्तियार करने कहते हैं तो क्या वे माओवादी समर्थक हो गए। जब पुलिस जवान, सी.आर.पी.एफ. के जवान माओवादियों के साथ लड़ते हुए मारे जाते हैं तो हर नागरिक का दिल दहल जाता है। पीड़ा होती है। गुस्सा आता है। एक भी ऐसा नहीं है जो इसे अच्छा कहे। सब इसकी निंदा करते हैं और बुध्दिजीवी भी करते हैं। इसलिए वे शांति स्थापना कासुझाव देते हैं। आज राजनीतिक व्यवस्था तथा सरकारों पर भरोसा उठ गया है। सरकारें विश्वसनीयता खो रही हैं और केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने भी अपने हाल के बयान में कहा है कि माओवादी प्रभावित राज्यों में बड़ी समस्या प्रभावी सरकार की कमी है। लोगों ने सरकार से खुद ही दूरी बना रखी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह हमारे लिए चेतावनी है। हमें सवाल करना चाहिए कि आखिर भारत के लोगों, देश की सरकार और राज्यों की सरकारों के बीच इतना अविश्वास क्यों है। बुध्दिजीवी न औद्योगीकरण का विरोधी है, न विकास का। बुध्दिजीवी समान विकास चाहते हैं। बुध्दिजीवी लोकतांत्रिक पर अटूट श्रध्दा रखते हैं। हिंसा के दौर में बुध्दिजीवी तटस्थ नहीं रह सकते-वे हर तरह की हिंसा का विरोध करते हैं। तर्कपूर्ण लिखते, बोलते हैं। बुध्दिजीवी सरकार की आर्थिक विकास की नीतियों को खारिज करते हैं, इसे जन पक्षधर देखना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए वह हथियार के उपयोग को भी खारिज करते हैं, वे लोकतंत्र में आई खराबियों में लोकतंत्र के औजारों से ही दुरुस्त करने पर विश्वास करते हैं। माओवादियों से चर्चा क्या होगी-यह दो तरह के तौर-तरीकों के बीच संघर्ष है। यह कोई वेतनवृध्दि या महंगाई दर में वृध्दि की लड़ाई नहीं है। इसलिए सरकार अपनी विकास की अवधारणा व नीतियां तथा कार्यक्रम को जनपक्षधर बनाए तो माओवादी समस्या शायद हल हो जाए। देश के बुध्दिजीवी लगातार लोकतंत्र के पक्ष में हस्तक्षेप कर रहे हैं और आदिवासी, गरीब किसान, मध्यवर्ग की परेशानियों को रेखांकित कर रहे हैं। बुध्दिजीवी न दबाव में काम करते न लालच में पड़कर लिखते हैं। वे विवेक की बातें कह रहे हैं। वे सत्ता, प्रतिष्ठान तथा इस हजारों छिद्रवाली राजनीति के समर्थक भी नहीं हो सकते, उसे ढंकने का काम राजनीति में जो हैं, वे कर रहे हैं।

पीढ़ापाल में नक्सली पर्चा, बाजार में पसरा सन्नाटापीढ़ापाल में नक्सली पर्चा, बाजार में पसरा सन्नाटा

कांकेर । नक्सलियों द्वारा दो दिन बंद के चलते रविवार की रात नक्सलियों का एक समुह नगर से दस किमी.दूर स्थित ग्राम पीढ़ापाल पहुंचे और सोमवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार बंद रहेगा लिखा पर्चा जगह-जगह चिपकाया तथा जिसके चलते आसपास के 24 ग्रामों का बड़ा बाजार पीढ़ापाल में सन्नाटा पसरा रहा। बाजार में इक्का-दुक्का ग्रामीण तो नजर आये लेकिन व्यापारी सिरे से गायब रहे। दिनभर बाजार में दहशत का माहौल था।

दंतेवाडा में नक्सलियों द्वारा बस को उडाने के बाद दहशत व्याप्त

सुकमा ..दंतेवाडा। छत्तीसगढ के दंतेवाडा जिले में सुकमा रोड पर माओवादी नक्सलियों द्वारा कल बारदी सुरंग से विस्फोट कर एक यात्री बस को उडाने के बाद इलाके में दहशत व्याप्त है और बस संचालकों ने नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में बस चलाने से इंकार कर दिया है। इस घटना में 31 यात्री मारे गये थे जिसमें 16 पुलिस कर्मी हैं। कल इस घटना में मृतकों की संख्या 35 बतायी गयी थी । घटना के विरोध में आज दंतेवाडा जिला मुख्यालय में सभी दुकाने बंद हैं।नागरिकों ने एक रैली निकाल कर घटना का विरोध किया।इस बीच नक्सलियों द्वारा दो दिवसीय बंद के दौरान आज पूरे बस्तर संभाग में आवागमन पूरी तरह ठप है तथा बैलाडीला से विशाखापटनम चलने वाली पैंसेंजर ट्रेन को रद्द कर दिया है। पुलिस महानिरीक्षक टीजे लांग कुंमेर ने बताया कि कल दंतेवाडा .सुकमा मार्ग पर ग्राम चिंगावरम के पास हुए एक बारदी सुरंग विस्फोट में 31 लोगों की मौत हो गयी ।जिसमें सीमा सुरक्षा बल का एक जवान ् पुलिस बल के 11 जवानों और 4 विशेष पुलिस अधिकारी तथा 22 नागरिक गंभीर हैं।जिनमें से कुछ का उपचार सुकमा अस्पताल में तथा कुछ लोगों का जगदलपुर मेडिकल कालेज में उपचार किया जा रहा है। घटना के संबंध में मिली जानकारी के अनुसार यात्री बस दंतेवाडा से सुकमा के लिए रवाना हुयी थी । जिसमें दंतेवाडा से कुल चालीस यात्री सवार हुए थे।जिनमें से कुछ नकुलनार ् मैलावाडा में उतर गए। इसके बाद भूसारास से आगे मिचवार के पास जवानों ने बस को रोका और कई जवान बस में सवार हो गये। यह जवान भूसारास इलाके में सर्चिंग के लिए रविवार की शाम रवाना हुये थे और सुकमा के थाना प्रभारी संदीप चंद्यकर के नेतृत्व में कल वापिस लौट रहे थे ।इन्हें सुकमा पहुंचना था।यह जवान ट्रक ्बस और एक जीप में भूसारास से करीब आठ किलो मीटर की दूरी तय करने के बाद जैसे ही वाहनों का काफिला पडवारास के पास पहुंचा तो घात में बैठे नक्सलियों ने बारदी सुरंग विस्फोट को अंजाम दिया ।इससे काफिले के तीसरे नंबर पर चल रही निजी यात्री बस विस्फोट की चपेट में आ गयी और बस के परखच्चे उड गये । विस्फोट में बस में सवार कोया कमांडों के जवान मौके पर ही शहीद हो गए ।वहीं ंबस चालक ् परिचालक सहित दर्जन भर यात्रियों को भी विस्फोट ने मौत की नींद सुला दिया ।जिसमें चार महिला यात्री भी शामिल हैं।तथा दो यात्री गंभीर रप से घायल हो गये। घटना स्थल से 20. 25. मीटर दूर खेत में पडा एक यात्री का शव हादसे की वीभत्सता को प्रदर्शित कर रहा है।उसके दोनों पांव विस्फोट में अलग हो गये।विस्फोट के बाद सडक के बीचों बीच चार. पांच मीटर बडा सा गड्डा हो गया ।घटना स्थल से तीन .चार मीटर दूर इलेक्ट्रिक तार भी बरामद हुए हैं।जिसे देख अंदेशा जताया जा रहा है कि नक्सलियों ने सडक से कुछ किलोमीटर दूर झाडियों से हमले को अंजाम दिया।

नक्सली तो 229 जवानों को उड़ाना चाहते थे, योजना विफल

जगदलपुर ! माना जा रहा है दंतेवाड़ा जिले के चिंगावरम क्षेत्र में नक्सलवादियों ने 229 जवानों को उड़ाने की योजना बना रखी थी। योजना विफल हो गई। नक्सलियों द्वारा किए गए विस्फोट में बस में सवार 33 यात्रियों की मौत हो गई। मृत लोगों में एसपीओ भी शामिल हैं।

16 मई को खुफिया सूचना के आधार पर सुकमा थानेदार संदीप चंद्रा के नेतृत्व में भूसारास, चिंगावरम एवं गादीरास क्षेत्र के जंगलो की सर्चिंग हेतु निकली 125 छ.ग. सशस्त्र बल, 104 कोया कमांडो एवं एसपीओ की टीम 17 मई की शाम 4.30 बजे वापस लौट रही थी। थके-हारे जवानों ने अश्वनी राजकुमार बस क्र. सीजी-17 एसएस 9295 में भूसारास के पास शरण लिया किन्तु यह बस नक्सलियों का निशाना बन गया। सूत्रों का कहना है कि कुल 229 जवान जिसमें एसटीएफ, जिला पुलिस बल, कोया कमांडो एवं एसपीओ थे वे निशाना नहीं बन सके यदि अश्वनी राजकुमार की बस लैंडमाईन्स की चपेट में नहीं आती तो पीछे से आ रही जवानों से भरी वाहन चपेट में आ जाती । गत माह चिंतलनार के ताड़मेटला में घटित हुई नक्सली घटना में 65 वीं बटालियन का पूरी तरह सफाया हो गया। इसी प्रकार कल की घटना में सैकड़ों संयुक्त जवान मारे जाते।
आरक्षक बनने का सपना टूटा
दंतेवाड़ा जिले के गादीरास थाना क्षेत्र के भूसारास के पास लैण्डमाईंस विस्फोट में घायल हुई सुश्री संगीता नाग ने इलाज के दौरान मेडिकल मॉलेज में अपना दम तोड़ दिया।दंतेवाड़ा जिला पुलिस मुख्यालय में आरक्षक हेतु चयनित हुई जिसकी परीक्षा देकर संगीता नाग पिता मंगराम लौट रही थी तभी वह भूसारास के निकट नक्सलियों द्वारा लैण्डमाईंस विस्फोट में घायल हो गई। उपचार के दौरान संगीता ने मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया जिसके कारण उसकी आरक्षक बनने की चाहत मरहुम हो गई।

काउंसलिंग से लौट रही भावी शिक्षाकर्मी घायल
गादीरास थाना क्षेत्र के भूसारास के पास लैण्डमाईंस विस्फोट में घायल छिन्दगढ़ निवासी देवव्रत की पत्नी बुरी तरह घायल हो गई है। बड़ी जद्दोजहद के बाद उसे मेडिकल कॉलेज लाया गया। छत्तीसगढ़ निवासी देवव्रत का कहना था कि उनकी पत्नी का शिक्षाकर्मी में चयन हो गया है जिसकी काउंसलिंग कल थी। काउंसलिंग समाप्ति के बाद सुकमा लौट रही थी मगर हम भूसारास के पास इस घटना शिकार हो गए।

राजनीति चश्मे को हटाने की आवश्यकता-लखमा
दंतेवाड़ा कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष एवं कोन्टा विधायक कवासी लखमा का कहना है कि सभी लोगों को विश्वास में लेकर नक्सलियों से लड़ने की ठोस रणनीति बनानी होगी तभी नक्सलियों का सफाया हो जायेगा। श्री लखमा ने फोन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक चश्मे को निकालकर सरकार को एक ठोस रणनीति बनानी चाहिये क्योंकि सरकार की गलत नीति के कारण ही नक्सलियों ने अपना पैठ बनाया।

मौत को सामने देख एसपीओ ने चलाई पहली बार गोली

जगदलपुर ! सोमवार को हुई बारूदी विस्फोट में घायल कोया कमांडो कमल सिंह 23 वर्ष निवासी छिंदगढ़ ने सोमवार को पहली बार नक्सलियों के द्वारा गोलीबारी के दौरान मौत को सामने देखकर पहली बार आत्मरक्षार्थ उसकी सरकारी बंदूक से तीन गोलियां चलाई।

कमल सिंह बड़ी मुश्किल से बात कर पा रहा था। वह भूसारास औ चिंगावरम के बीच हुई बारूदी विस्फोट में घायल हो गया है और उनका उपचार मेकॉज में चल रहा है। बड़ी धीमी आवाज से कमल सिंह ने इस प्रतिनिधि से कहा कि उसकी नियुक्ति बतौर एसपीओ वर्ष 2009 हुई है। दो माह के विशेष प्रशिक्षण के बाद उसे पुलिस बल के साथ कार्य करने हेतु भेजा गया। कमल सिंह को कोया कमांडो का प्रशिक्षण दिया गया था और इस प्रशिक्षण के बाद नक्सली विरोधी अभियानों में वह जरूर जाता रहा लेकिन कभी उसे गोली चलाने का अवसर नहीं मिला। बारूदी विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घायलों पर गोली चलाई और कमल सिंह ने अपनी मौत को सामने से देखा और पहली बार उसने अपनी सरकारी बंदूक से तीन गोली चलाई और इस दौरान पुलिस की ओर से गोली चलते देख नक्सली भाग निकले। कमल सिंह का कहना था कि घायल अवस्था के बावजूद जब नक्सलियों ने गोलियां चलाकर उसकी जान लेने की कोशिश पर उसने मौत को सामने देखा और आत्मरक्षार्थ गोली चलाई और यह उसकी सरकारी बंदूक से निकली पहली गोलीबारी की घटना है।

नक्सली हिंसा: सूत्रधार कौन?

सोमवार की दोपहर बस्तर की धरती एक बार फिर निर्दोष व निहत्थे जनों के खून से लाल हुई। इनकी हत्याएं जिन्होंने की, वे अपने को नक्सलवादी अथवा माओवादी कहते हैं। किंतु ये नक्सलवादी नहीं हैं। ये माओवादी भी नहीं हैं। जहां वाद होगा वहां कोई विचार भी होगा, किंतु बस्तर में दिन प्रतिदिन जिस नृशंस तरीके से और बिना किसी जाहिर कारण के हत्याएं की जा रही हैं इसे किस विचार प्रतिक्रिया का हिस्सा माना जाए! जैसा कि हम समझ पा रहे हैं ये तथाकथित माओवादी किसी और की लड़ाई लड़ रहे हैं। ये किन्हीं अदृश्य शक्तियों के लिए काम कर रहे भाड़े के सिपाही हैं। मैंने कुछ समय पहले लिखा था कि ये 1967 के नक्सली नहीं हैं और न वे 1948 के तेलंगाना के विद्रोहियों के उत्तराधिकारी हैं। आज ारूरत यह समझने की है कि हत्यारों की यह फौज किसके लिए काम कर रही है और इनका असली मकसद क्या है।

ये जितनी ज्यादा हिंसा फैलाएंगे, उतनी ही आम जनता के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ेगी। उतना ही चुनी हुई सरकार और प्रशासन पर से विश्वास उठेगा। उतना ही बस्तर को पुलिस के बजाय सेना के हवाले करने का विचार जोर पकड़ेगा। ध्यान रहे कि ऐसी मांग उठी तो आदिवासी की भूमिका मूकदर्शक की ही होगी। आज भी वह कहां कुछ कह पा रहा है! वह तो अपने घर से बेदखल है और विचारों की दुनिया से विस्थापित। उसके हित-अहित के सारे निर्णय, बहुत दूर बैठकर लिए जा रहे हैं। अगर इस माहौल में कोई जनतांत्रिक विमर्श और शांति स्थापना की बात करता है तो उसके लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है। कुल मिलाकर ये कथित माओवादी ऐसा वातावरण बना देना चाहते हैं कि विवेक, संयम, सोच जैसे शब्द बेमानी हो जाएं। इससे किसका हित होगा, यह समझना कठिन लेकिन जरूरी है।

ध्यान दीजिए कि आज भारत की आबादी एक अरब से ज्यादा है। यद्यपि न्यायसंगत वितरण व आर्थिक असमानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर है, फिर भी पहले के मुकाबले स्थितियां बेहतर दिखाई देती हैं। आजादी के समय 33 करोड़ आबादी थी। आज लगभग उतनी ही बड़ी संख्या उन भारतीयों की है जो विश्व बाजार में उपभोक्ता के रूप में गिने जा रहे हैं। एक तरफ इनके लिए मायाजाल बिछाया जा रहा है तो दूसरी तरफ विश्व में बढ़ते उपभोग के कारण तीसरी दुनिया के नैसर्गिक संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय घरानों की गिध्द दृष्टि लगी हुई है। यह मात्र संयोग नहीं है कि जिन इलाकों में नक्सलियों ने अपने पैर जमाए हैं, वहीं ये सारे संसाधन हैं।

इन दस-बीस सालों में नक्सलियों या माओवादियों ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे नैसर्गिक संसाधनों पर मूल निवासियों का प्रथम दावा पुख्ता हुआ हो। ऐसे में यही समझ आता है कि बस्तर हो या कोई अन्य अंचल, ये हत्यारे दस्ते राष्ट्रीय अथवा अन्तरराष्ट्रीय कॉरपोरेट घरानों के इशारों पर ही काम कर रहे हैं। कहना होगा कि देश के कुछ राजनैतिक दलों में भी ऐसे लोग हैं जो उनके ही इंगित पर चल रहे हैं। दूसरे शब्दों में बैलेट हो या बुलेट-सारा खेल परदे के पीछे से संचालित हो रहा है और सूत्रधार दिखाई नहीं देता। इसीलिए हिंसक दुर्घटनाओं की जितनी भी निंदा या भर्त्सना की जाए, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

इस दुष्चक्र से बाहर निकलने का एक ही उपाय है कि केंद्र व प्रदेशों की चुनी हुई सरकारों की विश्वसनीयता जनता के बीच कायम हो। इसके लिए उन्हें तात्कालिक राजनैतिक लाभ का मोह छोड़कर व्यापक जनहित की नीतियों पर पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा। यदि जनता का भरोसा आप पर है तो वह खुद इन भाड़े के सिपाहियों का सामना कर लेगी। जिस जनता ने अंग्रेजी राज खत्म किया, वह इस देश की ही जनता तो थी।
ललित सुरजन
प्रधान संपादक, देशबंधु

सफाए का समय

पानी सचमुच सिर के ऊपर गुजर रहा है, लेकिन हमारी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार में नक्सलवाद से लड़ने की इच्छा-शक्ति दिखाई नहीं पड़ रही है। अब समय आ गया है, जब सरकारों से पूछा जाना चाहिए कि वे कब तक नक्सलवादियों को निर्दोष नागरिकों को बमों और बारूदी सुरंगों से उड़ाने की अनुमति देती रहेंगी? यह वक्त नक्सलवाद के कारणों पर विचार-विमर्श का समय नहीं है। यह समय तो नक्सलवादियों को उखाड़ फेंकने या उन्हें आत्म समर्पण करने के लिए मजबूर करने का समय है। नक्सलियों ने एक के बाद दूसरा घृणित खूनखराबा करके सरकार को युद्ध की चुनौती दे दी है, इसलिए उनके सफाए के लिए जो भी जरूरी है, वह तत्काल किया जाना चाहिए। नक्सलवाद की समस्या को राज्यों की कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना निहायत गलत होगा । छत्तीसगढ़ में जो गलतियाँ दंतेवाड़ा-१ में सामने आईं, वहीं दंतेवाड़ा-२ में दिखाई दी हैं। केंद्र सरकार को राज्यों के तमाम अर्द्धसैनिक बलों की कमान अब अपने हाथ में लेकर केंद्रीय सैन्य बलों के नेतृत्व में निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी और अगर इस लड़ाई के लिए वायु सेना की मदद की जरूरत हो तो निःसंकोच वह भी मुहैया करानी होगी। जंगल वार फेयर कोई ऐसी भी चीज नहीं है, जिसमें निपुणता के लिए वर्षों प्रतीक्षा की जाए। निर्णायक कार्रवाई करने से पहले दंतेवाड़ा और तमाम नक्सलियों के गढ़ों में बाकायदा प्रचार करके आदिवासियों से सुरक्षित बाहर निकलने की अपील की जाए और उन्हें जान-माल की पूरी सुरक्षा प्रदान की जाए। सरकार ने अब भी यह लड़ाई प्राथमिकता के साथ नहीं लड़ी तो दंतेवाड़ा जैसी नृशंस घटनाओं की बार-बार पुनरावृत्ति होगी। यह साफ हो चुका है कि अर्द्ध सैनिक बलों को मारने के नाम पर नक्सली निर्दोष नागरिकों को मार रहे हैं। उन्होंने बारूदी सुरंगें बिछाकर अपने इलाकों की मजबूत किलेबंदी कर रखी है और निर्दोष आदिवासियों को वे ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उनकी मुद्रा रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक है और वे किसी भी राजनैतिक संवाद के लिए तैयार नहीं हैैं। वे बंदूक के बल पर देश पर कब्जा करना चाहते हैं और इस लोकतांत्रिक मुल्क को माओ त्से तुंग का चीन बना देना चाहते हैं, जो चीन भी अब नहीं रहा है। अपनी जनता की हिफाजत की जिम्मेदारी राज्य की होती है, इसलिए केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इन सारे इलाकों के विकास को भी फिर उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी, लेकिन अभी सबसे पहले तो नक्सलियों का सफाया जरूरी है। देश में इस बारे में प्रायः आम राय भी बन चुकी है, लेकिन दुःख की बात है कि यूपीए सरकार साहस नहीं दिखा रही है। आंध्रप्रदेश और उससे पहले पश्चिम बंगाल ने बंदूक के बल पर ही नक्सलियों का सफाया किया था। आज केंद्र और सभी राज्यों को मिलकर यही दृष्टिकोण अपनाना होगा।


संपादकीय, नई दुनिया, रायपुर, १९ मई, 2010



मानवता के दुश्मनों को मसलने का सही वक्त

राज हिन्दुस्तानी
सोमवार को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में रणनीति बदलकर निहत्थे और निर्दोष ग्रामीणों का भी खून बहाया। बारूदी विस्फोट करके उन्होंने एक यात्री बस उड़ा दी। अभी तक नक्सली यह कहते रहे कि वे वनवासियों के हिमायती हैं, उनके हक और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन इस घटना के बाद यह साबित हो गया कि नक्सली उन वनवासियों के कतई सगे नहीं हैं,जिनके नाम पर वे सरकार से हिंसक लड़ाई लड़ रहे हैं। कुछ दिनों पहले नक्सलियों ने जनगणना का विरोध करते हुए ११ सूत्री माँग-पत्र जारी किया था, जिसमें कई ऐसी बातें थीं, जिन्हें पढ़कर लगा कि नक्सली वनवासियों के चिंतक हो सकते हैं।


उनके माँग-पत्र में सभी को रोजगार और राशन कार्ड देने की बात थी। उन्होंने हर पंचायत में अस्पताल खोले जाने और दवा वितरण पर जोर दिया था। स्थापित आश्रमों को फिर से ग्रामों में संचालित करने और हर पंचायत में पहली से आठवीं तक आश्रम स्कूल खोलने का मुद्दा उठाया था। इन माँगों को सरकार के साथ मिल-बैठकर भी पूरा कराया जा सकता है। इसके लिए निर्दोषों का लहू बहाने की कोई जरूरत नहीं। सरकार खुद भी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ चलाकर वनवासियों की जरूरतें पूरी कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह बराबर यह प्रयास करते रहे हैं कि नक्सली समर्पण कर मुख्यधारा में लौट आएँ और बेहतर जिंदगी की शुरुआत करें। केंद्र सरकार भी नक्सलियों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण अपनाए हुए है कि शायद वे देर-सबेर सुधरें, लेकिन जिस तरह की लड़ाई नक्सली अब लड़ रहे हैं, उससे तो सरकार को अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए मुँहतोड़ जवाब देना ही होगा। बहुत हो चुका नक्सलियों को समझाना, मुख्यधारा में लौटने का आग्रह करना, बातचीत के लिए रास्ता खुला रखना, बैठक, बयानबाजी, निंदा, आक्रोश, शांतियात्रा। अब तो वही कार्रवाई जायज होगी, जिससे नक्सलियों का सफाया हो सके। उनके प्रति तनिक भी नरमी छत्तीसगढ़ के विकास के लिए घातक होगी। कथित मानवाधिकारवादियों के विरोध की परवाह न करते हुए हर वह कदम उठाया जाए, जिससे पैशाचिक प्रवृत्ति वाले नक्सली छत्तीसगढ़ की पावन माटी को अब और खून से न रंगने पाएँ। बहुत खेल चुके वे खून की होली, अब उन्हें यह जता देना है कि सरकार किसी मामले में कमजोर नहीं है। वह तो संभलने व सुधरने का मौका दे रही थी।


अब तो चाहे नक्सलियों के खात्मे के लिए वायुसेना का सहारा लेना पड़े या मौजूदा पुलिस बल बढ़ाना पड़े, कुछ भी करना पड़े, लेकिन मानवता के इन विरोधियों को समूल मिटाना होगा। जो लोग देश को आंतरिक रूप से कमजोर करने की कोशिश में लगे हुए हैं, उनके फन को कुचलना समय की माँग है। राज्य में सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव से बौखलाए नक्सलियों को ठिकाने लगाने का यही सही वक्त है। वरना वे बौखलाहट में आम जनता को और भी अधिक नुकसान पहुँचा सकते हैं। वनवासी भी यह समझें कि नक्सली उनके कितने शुभचिंतक हो सकते हैं। गाँव के लोग एकजुट होकर नक्सलियों का विरोध करें, वे डरे नहीं कि नक्सली उन पर हमला करेंगे। यह डर और पनाह देने का ही दुष्परिणाम है कि नक्सली आज समूचे छत्तीसगढ़ में अपने पैर जमाकर राज्य के विकास के लिए घातक बने हुए हैं।

फिर काम आए एसपीओ

आर के विज
१७ मई, २०१० को नक्सलियों द्वारा ३१ ग्रामीण आदिवासियों एवं जवानों की नृशंस हत्या कर क्षेत्र में भय का वातावरण कायम रखने का जो संदेश जनता को देने का घिनौना प्रयास किया है, उसे जनता कभी पूरा नहीं होने देगी। नक्सलियों के आतंक से पीड़ित जनता के चंद नुमाइंदे पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े क्या हो गए, नक्सलियों के हाथ-पाँव फूलने लगे। यह दौर २००५ में सलवाजुड़ूम के साथ चालू हुआ एवं अब इस आतंकवाद को नेस्तनाबूद करके ही दम लेगा।



आतंकवाद की पीड़ा सहने की भी एक हद है। यह हद जून २००५ में तब पार हो गई, जब निर्दोष जनता जो न केवल नक्सलियों की सीधी मार से दुखी थी, बल्कि उनके हाट-बाजार बंद करा देने एवं पूजा के स्थानों को क्षतिग्रस्त कर उनके सामाजिक जनजीवन एवं संस्कृति पर कुठाराघात करने से भी आहत थी। सलवाजुड़ूम की ऑंधी में भारी संख्या में कुछ नक्सलियों व उनके समर्थकों ने न केवल आत्मसमर्पण किया, बल्कि पुलिस का साथ देने का भी जोखिम भरा बीड़ा उठाया। भारत सरकार ने तत्काल १,५०० रुपए प्रतिमाह का मानदेय निर्धारित करते हुए राज्य सरकार के इस प्रस्ताव पर अपनी मोहर लगा दी। इन जाँबाज विशेष पुलिस अधिकारियों की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है। ये वीर है, साहसी हैं एवं सही कहें तो कई मायनों में पुलिस के पथ-प्रदर्शक भी है, वरना इतनी कम राशि में भला कौन अपनी प्राणों की आहुति देने के लिए हर पल तैयार रहता है। बस्तर के ये वो वीर सपूत हैं, जिन्होंने गंगालूर-बीजापुर सड़क निर्माण करने का बीड़ा उठाया और अपनी आहुति दी । ये वो साहसी माटी पुत्र है, जिन्होंने अरपलमेटा की घटना के दौरान सीआरपीएफ के कुछ जवानों को मौत के मुँह से निकालने का साहस दिखाया। ऐसे साहसी मददगारों को सरकार ने अतिरिक्त सहायता देने के लिए न केवल ६५० रुपए प्रतिमाह अतिरिक्त राशि स्वीकृत की, बल्कि उन्हें पुलिस की भाँति विशेष वर्दी धारण करने का भी गौरव प्रदान किया। १७ मई की घटना में इन विशेष पुलिस अधिकारियों ने पुनः यह साबित कर दिया कि चाहे आम सभाओं एवं बैठकों के अनवरत दौर समाप्त हो गए हों, परंतु नक्सलियों से दो-दो हाथ करने जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। यही कारण है कि इतनी बड़ी संख्या में शहादत देने के बावजूद भी न केवल इनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है, बल्कि पुलिस में भर्ती होने के आकर्षण में वृद्घि हुई है। सभ्य समाज चाहे उनके बस में सवार होने पर उँगलियाँ उठाता रहे, परंतु बस के विस्फोट होने के पश्चात इधर-उधर पड़े घायल विशेष पुलिस अधिकारियों ने जिस साहस का प्रदर्शन किया, उसका कोई समानांतर नहीं है। घायल एसपीओ के पास आटोमेटिक बंदूकें थीं, उन्होंने जल्दी ही अपने आप को संभाला और ए.के.४७ से फायर कर रहे नक्सलियों पर जवाबी हमला शुरू कर दिया। यही नहीं पीछे वाहनों से आने वाले अन्य सुरक्षाकर्मियों ने घायलों के आसपास घेरा बनाया, ताकि नक्सली नजदीक आकर शवों को क्षत-विक्षत न कर सकें एवं शहीदों के हथियार न लूट सकें। स्थिति पर नियंत्रण पाते ही एक जवान ने एक वाहन को रोका एवं घायलों को सुकमा ले जाने की गुहार लगाई।


ड्राइवर के न मानने पर एक एसपीओ से बना सिपाही खुद ही ड्राइवर की सीट पर जा बैठा एवं घायलों को लेकर सुकमा पहुँचकर उनकी जान बचाई। मौके पर नक्सलियों की कायराना हमले का जवाब देकर सूझबूझ से घायलों को सुरक्षित निकाल लेना किसी चुनौती से कम नहीं, परंतु एसपीओ की सूझबूझ तो देखिए, न तो कोई मौके से भागा, न ही, किसी ने पीठ दिखाई। ऐसे जज्बे वाले विशेष पुलिस अधिकारियों का जितना गुणगान किया जाए कम है। वीर गति को प्राप्त हुए १५ विशेष पुलिस अधिकारियों एवं जवानों का योगदान छत्तीसगढ़ की जनता के लिए चिरस्मरणीय रहेगा।
(लेखक छग में पुलिस महानिरीक्षक हैं )