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Thursday, May 27, 2010

पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष की नक्सलियों द्वारा हत्या

दंतेवाड़ा । छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष की गोली मारकर हत्या कर दी है।राज्य की पुलिस विभाग के प्रवक्ता पुलिस महानिरीक्षक आर के विज ने बताया कि दंतेवाड़ा जिले के केरलापाल गांव में नक्सलियों ने आज शाम जिले के पूर्व भाजपा अध्यक्ष बुधरा सोढ़ी की गोली मारकर हत्या कर दी है। विज ने बताया कि जिले के सुकमा कस्वे में रहने वाले सोढ़ी आज अपने रिश्तेदार के यहां वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने केरलापाल गांव गए हुए थे। इस दौरान तीन नक्सलियों ने सोंढ़ी को घर से बाहर बुलाया और देशी कटे से गोली मार कर उसकी हत्या कर दी। पुलिस अधिकारी ने बताया कि घटना की जानकारी मिलते ही परिवारजनों ने सोढ़ी को अस्पताल पहुंचाया जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

विज ने बताया कि पुलिस ने मामला दर्ज कर किया है तथा हमलावरों की खोज शुरू कर दी गई है।इधर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सोढ़ी की हत्या पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे नक्सलियों का अमानवीय क्रत्य कहा है।सिंह ने कहा है कि सोढ़ी की हत्या कर नक्सलियों ने अपने अमानवीय चेहरे को एक बार फिर उजागार किया है। नक्सलियों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाकर कम, हिंसा और आतंक के जरिए अपनी लोकतंत्र विरोधी निरंकुश मानसिकता का परिचय दिया है।

गौरतलब है कि राज्य का बस्तर क्षेत्र सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्र है तथा नक्सली यहां लगालगातार जनप्रतिनिधियों को भी निशाना बना रहे है। बीते विधानसभा चुनाव के दौरान नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में जहां भाजपा के ब्लाक अध्यक्ष की हत्या कर दी थी वहीं लगभग छह महीने पहले राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मंत्री केदार कश्यप के भाई तानसेन कश्यप की जगदलपुर जिला मुख्यालय से कुछ दूरी पर गोली मार कर हत्या कर दी थी।

Monday, May 24, 2010

नक्सली हमले में शामिल कमांडर गिरफ़्तार

६ अप्रैल, २०१० को दंतेवाड़ा के चिंतलनार में हुए हमले में शामिल नक्सली कमांडर को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। नक्सली कमांडर को सोमवार को मीडिया के सामने पेश किया गया।आरोपी कमांडर बारसे लखमा के साथ पुलिस ने 5 और लोगों को भी मीडिया के सामने पेश किया। इन तमाम लोगों की गिरफ़्तार रविवार को हुई थी।गिरफ़्तार नक्सली ने बताया कि वो हमले के दिन अपने साथ 30 लोगों के साथ चल रहा था। इन लोगों पर चिंतलनार से निकली फोर्स की निगरानी की ज़िम्मेदारी थी। नक्सली ताड़मेटला में घात लगाकर बैठ गए जहां डेढ़ घंटे तक फ़ायरिंग हुई। इस हमले में नक्सलियों ने घायल जवानों को गोली मारकर उनका सामान लूट लिया था।घटना को अंजाम देने के बाद नक्सली कमांडर पापा राव ने गांव में जाकर नक्सलियों को बधाई भी दी थी । पापा राव ने कहा था कि लड़ाई जारी रखना है।मालूम हो कि हमले के दौरान जवानों के गुम हुए वायरलेस सेट से नक्सलियों को ताज़ा जानकारी मिल रही थी । इसी जानकारी के आधार नक्सलियों ने चिंतलनार में बड़ी वारदात को अंजाम दिया जिसमें कुल 76 जवानों की मौत हुई थी । इनमें 74 सीआरपीएफ़ के जवान थे जबकि दो लोग स्थानीय पुलिस के भी थे ।

नक्सली हमले में शामिल कमांडर गिरफ़्तार

दंतेवाड़ा के चिंतलनार में हुए हमले में शामिल नक्सली कमांडर को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। नक्सली कमांडर को सोमवार को मीडिया के सामने पेश किया गया।आरोपी कमांडर बारसे लखमा के साथ पुलिस ने 5 और लोगों को भी मीडिया के सामने पेश किया। इन तमाम लोगों की गिरफ़्तार रविवार को हुई थी।गिरफ़्तार नक्सली ने बताया कि वो हमले के दिन अपने साथ 30 लोगों के साथ चल रहा था। इन लोगों पर चिंतलनार से निकली फोर्स की निगरानी की ज़िम्मेदारी थी। नक्सली ताड़मेटला में घात लगाकर बैठ गए जहां डेढ़ घंटे तक फ़ायरिंग हुई। इस हमले में नक्सलियों ने घायल जवानों को गोली मारकर उनका सामान लूट लिया था।घटना को अंजाम देने के बाद नक्सली कमांडर पापा राव ने गांव में जाकर नक्सलियों को बधाई भी दी थी । पापा राव ने कहा था कि लड़ाई जारी रखना है।मालूम हो कि हमले के दौरान जवानों के गुम हुए वायरलेस सेट से नक्सलियों को ताज़ा जानकारी मिल रही थी । इसी जानकारी के आधार नक्सलियों ने चिंतलनार में बड़ी वारदात को अंजाम दिया जिसमें कुल 76 जवानों की मौत हुई थी । इनमें 74 सीआरपीएफ़ के जवान थे जबकि दो लोग स्थानीय पुलिस के भी थे ।

Wednesday, May 19, 2010

नक्सल बंद के दौरान नागरिकों में डर कायम

रायपुर। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नक्सल बंद के दूसरे दिन पश्चिम बंगाल में नक्सली घटना के बाद राज्य में पुलिस को सतर्क रहने के लिए कहा गया है। वहीं बस्तर क्षेत्र के निवासी डरे हुए है।

राज्य में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने आज बताया कि नक्सलियों द्वारा बंद के आहवान को देखते हुए राज्य में सभी जिलों और थानों को सतर्क कर दिया गया है वहीं पश्चिम बंगा की घटना के बाद राज्य के सीमावर्ती जिलों और थानों को विशेष चौकसी बरतने के लिए कहा गया है।

अधिकारियों ने बताया कि दंतेवाड़ा क्षेत्र में नक्सली लगातार रेल्वे ट्रेक को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते है इसलिए इन क्षेत्रों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

दंतेवाड़ा जिले के सूत्रों ने बताया कि यात्री बस पर नक्सली हमले में 31 लोगों के मारे जाने की घटना के बाद से यहां के बस नहीं चला रहे है। दंतेवाड़ा के नागरिकों और दुकानदारों ने घटरना के विरोध में मंगलवार को शहर बंद रखा था लेकन आज बाजार खुले हुए है।

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय के एक व्यापारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि क्षेत्र में लगातार हो रही घटनाओं और बंद से उनका व्यापार प्रभावित हुआ है तथा अब यात्राकरने में भी डर लग रहा है। व्यापारी ने बताया कि उसे जरूरी काम से सुकमा जाना था, लेकिन परिजनों के कहने के बाद अभी उसने यात्रा टाल दी है।

उन्होंने बताया कि लोग सुकमा और कोंटा जैसे जगहों पर यात्रा करने से डर रहे है।

इधर बस्तर क्षेत्र के बीजापुर जिले के पुलिस अधीक्षक अविनाश मोहंती ने बताया कि बंद के दूसरे दिन शहरी क्षेत्रों में बसे और अन्य वाहन चल रहे है लेकिन आवापल्ली जैसे अंदरूनी क्षेत्रों में बस आपरेटरों द्वारा बस नहीं चलाने के कारण लोगों को आवागमन में दिक्कते आ रही है।

मोहंती ने बताया कि बल के जवान मुस्तैद है तथा क्षेत्र में अभियान जारी है।

कांकेर जिले के पुलिस अधीक्षक अजय यादव ने बताया कि जिले के शहरी क्षेत्र में बंद का कोई असर नहीं है तथा अभी तक स्थिति सामान्य है। अंदरूनी क्षेत्रों में आवागमन पर असर पड़ा है लेकिन सुरक्षा बल के जवान स्थिति को सामान्य करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दंतेवाड़ा जिले में नागरिकों पर नक्सली हमले के बाद बस्तर क्षेत्र के निवासी सहमे हुए है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बल उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे है।

जब एसपीओ ने ड्रायवर बन बचाई कई जानें

रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने बस को निशाना बनाकर जहां आम लोगों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया वहीं बस में कुछ ऐसे जांबाज विशेष अधिकारी भी थे जिन्होंने न केवल नक्सलियों को वहां से खदेड़ा बल्कि ड्रायवर बन घायल लोगों को अस्पताल भी पहुंचाया।

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से सुकमा कस्बे की ओर रवाना हुए यात्रियों और नक्सल विरोधी अभियान से वापस लौट रहे विशेष पुलिस अधिकारियों को शायद इस बात का अंदेशा नहीं था कि आने वाले दूसरे घंटे में उनके सामने भयानक मौत नाचेगी।

नक्सली हमले में घायल यात्रियों के मुताबिक जब दंतेवाड़ा से यात्री बस करीब सवा दो बजे सुकमा के लिए रवाना हुई तब उसमें सवार लोगों को भारी गर्मी से कुछ राहत मिली। बस जब कुछ दूर पहुंची तब गादीरास गांव के करीब उसे कुछ वर्दीधारी एसपीओ ने रोक लिया और वे बस के भीतर तथा कुछ छत पर सवार हो गए।

बस जब कुछ दूर भूसारास गांव से आगे चिंगावरम के पास पहुंची तब लगभग पौने पांच बज रहे थे और इसी दौरान जोरदार धमाका हुआ और लोगों की चीखें सुनाई देने लगी। इसके बाद घटनास्थ्ल पर कोहराम मच गया और सामने मंजर दहला देने वाला था।

बस में सवार एक विशेष पुलिस अधिकारी वटटी ने बताया कि बस में जब धमाका हुआ तो बस वहां से उछली तथा उसका पिछला हिस्सा छत विक्षत हो गया था। इसमें सवार कुछ यात्रियों के चिथड़े उड़ गए थे तथा कुछ बाहर दूर तक छिटक गए थे। इस दौरान वह वहीं पड़ा था और उसने देखा कि लगभग चार की संख्या में ए क 47 बंदूकधारियों ने गोली चलाना शुरू कर दिया। इस दौरान कुछ और एसपीओ वहां थे और उनके पास इंसास रायफल भी था। एसपीओ ने भी जवाबी कार्रवाई की और पीछे से आ रहे अन्य एसपीओ ने भी उनका साथ दिया तब नक्सली वहां से भाग गए। बटटी कहते हैं कि जब यह घटना उनके सामने हुई तब वे लहुलुहान थे और उन्हें लग रहा था कि जल्द ही उनकी जान चली जाएगी। बटटी अभी सुकमा के अस्पताल में भर्ती है।

राज्य के पुलिस प्रवक्ता पुलिस महानिरीक्षक आर के विज कहते हैं कि एसपीओ ने यदि मोर्चा नहीं सम्भाला होता तब शायद नक्सली सभी लोगों को मार देते तथा हथियार भी लूट लेते।

विज बताते हैं कि घायल एसपीओ के पास आटोमेटिक बंदूकें थी और उन्होंने घायल अवस्था में ही नक्सलियों का मुकाबला किया वहीं इसी दौरान पीछे से एक अन्य गाड़ी में और एसपीओ तथा एसपीओ से सिपाही बने कुछ अन्य जवान वहां आ गए और उन्होंने घायलों के आसपास घेरा बना लिया जिससे नक्सली नजदीक आकर शवों को क्षत-विक्षत न कर सकें ओर हथियार नहीं लूट सकें।

अधिकारी बताते हैं कि जब नक्सली वहां से भाग गए तब यहां मौजूद एसपीओ ने जीप को रोका और घायलों को सुकमा ले जाने की गुहार लगाई जब डरा हुआ वाहन चालक राजी नहीं हुआ तब वह खुद ही ड्रायवर सीट पर बैठा और घायलों को सुकमा पहुंचाया और उनकी जान बचाई।

विज बताते हैं कि इस हमले के दौरान एक बात और सामने आई है कि एसपीओ और उसके साथी जवान न तो वहां से भागे और न ही पीठ दिखाई।

बिज के मुताबिक राज्य में अभी लगभग चार हजार विशेष पुलिस अधिकारी कार्यरत हैं और यह बस्तर में नक्सलियों से लोहा ले रहे अर्धसैनिक बल और पुलिस जवानों की आंख के रूप में काम कर रहे हैं और शायद यही कारण है कि नक्सली इन्हें आंख की किरकिरी मान रहे है।

Tuesday, May 18, 2010

दंतेवाडा में नक्सलियों द्वारा बस को उडाने के बाद दहशत व्याप्त

सुकमा ..दंतेवाडा। छत्तीसगढ के दंतेवाडा जिले में सुकमा रोड पर माओवादी नक्सलियों द्वारा कल बारदी सुरंग से विस्फोट कर एक यात्री बस को उडाने के बाद इलाके में दहशत व्याप्त है और बस संचालकों ने नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में बस चलाने से इंकार कर दिया है। इस घटना में 31 यात्री मारे गये थे जिसमें 16 पुलिस कर्मी हैं। कल इस घटना में मृतकों की संख्या 35 बतायी गयी थी । घटना के विरोध में आज दंतेवाडा जिला मुख्यालय में सभी दुकाने बंद हैं।नागरिकों ने एक रैली निकाल कर घटना का विरोध किया।इस बीच नक्सलियों द्वारा दो दिवसीय बंद के दौरान आज पूरे बस्तर संभाग में आवागमन पूरी तरह ठप है तथा बैलाडीला से विशाखापटनम चलने वाली पैंसेंजर ट्रेन को रद्द कर दिया है। पुलिस महानिरीक्षक टीजे लांग कुंमेर ने बताया कि कल दंतेवाडा .सुकमा मार्ग पर ग्राम चिंगावरम के पास हुए एक बारदी सुरंग विस्फोट में 31 लोगों की मौत हो गयी ।जिसमें सीमा सुरक्षा बल का एक जवान ् पुलिस बल के 11 जवानों और 4 विशेष पुलिस अधिकारी तथा 22 नागरिक गंभीर हैं।जिनमें से कुछ का उपचार सुकमा अस्पताल में तथा कुछ लोगों का जगदलपुर मेडिकल कालेज में उपचार किया जा रहा है। घटना के संबंध में मिली जानकारी के अनुसार यात्री बस दंतेवाडा से सुकमा के लिए रवाना हुयी थी । जिसमें दंतेवाडा से कुल चालीस यात्री सवार हुए थे।जिनमें से कुछ नकुलनार ् मैलावाडा में उतर गए। इसके बाद भूसारास से आगे मिचवार के पास जवानों ने बस को रोका और कई जवान बस में सवार हो गये। यह जवान भूसारास इलाके में सर्चिंग के लिए रविवार की शाम रवाना हुये थे और सुकमा के थाना प्रभारी संदीप चंद्यकर के नेतृत्व में कल वापिस लौट रहे थे ।इन्हें सुकमा पहुंचना था।यह जवान ट्रक ्बस और एक जीप में भूसारास से करीब आठ किलो मीटर की दूरी तय करने के बाद जैसे ही वाहनों का काफिला पडवारास के पास पहुंचा तो घात में बैठे नक्सलियों ने बारदी सुरंग विस्फोट को अंजाम दिया ।इससे काफिले के तीसरे नंबर पर चल रही निजी यात्री बस विस्फोट की चपेट में आ गयी और बस के परखच्चे उड गये । विस्फोट में बस में सवार कोया कमांडों के जवान मौके पर ही शहीद हो गए ।वहीं ंबस चालक ् परिचालक सहित दर्जन भर यात्रियों को भी विस्फोट ने मौत की नींद सुला दिया ।जिसमें चार महिला यात्री भी शामिल हैं।तथा दो यात्री गंभीर रप से घायल हो गये। घटना स्थल से 20. 25. मीटर दूर खेत में पडा एक यात्री का शव हादसे की वीभत्सता को प्रदर्शित कर रहा है।उसके दोनों पांव विस्फोट में अलग हो गये।विस्फोट के बाद सडक के बीचों बीच चार. पांच मीटर बडा सा गड्डा हो गया ।घटना स्थल से तीन .चार मीटर दूर इलेक्ट्रिक तार भी बरामद हुए हैं।जिसे देख अंदेशा जताया जा रहा है कि नक्सलियों ने सडक से कुछ किलोमीटर दूर झाडियों से हमले को अंजाम दिया।

मौत को सामने देख एसपीओ ने चलाई पहली बार गोली

जगदलपुर ! सोमवार को हुई बारूदी विस्फोट में घायल कोया कमांडो कमल सिंह 23 वर्ष निवासी छिंदगढ़ ने सोमवार को पहली बार नक्सलियों के द्वारा गोलीबारी के दौरान मौत को सामने देखकर पहली बार आत्मरक्षार्थ उसकी सरकारी बंदूक से तीन गोलियां चलाई।

कमल सिंह बड़ी मुश्किल से बात कर पा रहा था। वह भूसारास औ चिंगावरम के बीच हुई बारूदी विस्फोट में घायल हो गया है और उनका उपचार मेकॉज में चल रहा है। बड़ी धीमी आवाज से कमल सिंह ने इस प्रतिनिधि से कहा कि उसकी नियुक्ति बतौर एसपीओ वर्ष 2009 हुई है। दो माह के विशेष प्रशिक्षण के बाद उसे पुलिस बल के साथ कार्य करने हेतु भेजा गया। कमल सिंह को कोया कमांडो का प्रशिक्षण दिया गया था और इस प्रशिक्षण के बाद नक्सली विरोधी अभियानों में वह जरूर जाता रहा लेकिन कभी उसे गोली चलाने का अवसर नहीं मिला। बारूदी विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घायलों पर गोली चलाई और कमल सिंह ने अपनी मौत को सामने से देखा और पहली बार उसने अपनी सरकारी बंदूक से तीन गोली चलाई और इस दौरान पुलिस की ओर से गोली चलते देख नक्सली भाग निकले। कमल सिंह का कहना था कि घायल अवस्था के बावजूद जब नक्सलियों ने गोलियां चलाकर उसकी जान लेने की कोशिश पर उसने मौत को सामने देखा और आत्मरक्षार्थ गोली चलाई और यह उसकी सरकारी बंदूक से निकली पहली गोलीबारी की घटना है।

गवर्नर व मुख्यमंत्री ने घायलों का हाल-चाल पूछा


दंतेवाड़ा 18 मई. छत्तीसगढ़ के घने जंगलों वाले दंतेवाड़ा जिले में सोमवार शाम हुए नक्सली हमले में शहीद पुलिसकर्मियों को श्रध्दांजलि देने के लिए मंगलवार को रायपाल शेखर दत्त, मुख्यमंत्री रमन सिंह, गृह मंत्री ननकीराम कंवर, पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन सहित कई वरिष्ठ सुकमा पहुंचे। इन सभी ने सुकमा अस्पताल में भर्ती घायलों से भी मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने कहा- नागरिकों को सुनियोजित ढंग से निशाना बनाना अचंभित करता है। इससे स्पष्ट होता है कि नक्सली पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हतोत्साहित करना चाहते हैं। हमले के चौबीस घंटे के बाद भी स्थानीय लोगों में भय व्याप्त है। नक्सलियों द्वारा 48 घंटे के बंद के आह्वान के मद्देनजर सुरक्षा बलों ने और हमलों की आशंका जताई है। हमले में घायल 15 लोग अभी भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। नक्सलियों ने सोमवार को एक बस को बारूदी सुरंग विस्फोट के जरिए उड़ा दिया था, जिसमें कम से कम 35 विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) और नागरिक मारे गए थे। उधर, मंगलवार से शुरू नक्सलियों के दो दिवसीय बंद की वजह से राय के कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ है। बंद से बस्तर क्षेत्र, राजनांदगांव के कुछ हिस्सों में तथा रायपुर व धमतरी के ग्रामीण इलाकों में जनजीवन बाधित हुआ है। पुलिस मुख्यालय के अनुसार सड़कों पर यात्री बसें नहीं चल रही हैं। बस्तर के कई क्षेत्रों में जंगल से होकर गुजरने वाली सड़कों पर लकड़ी के लट्ठे रखकर नक्सलियों ने सड़क मार्ग बाधित किया है। बस्तर क्षेत्र के मुख्यालय जगदलपुर में कार्यरत एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा- बस्तर में पूर्ण आतंक जैसी स्थिति है। नक्सली हमले की आशंका को देखते हुए लोग डरे हुए हैं। दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा ने कहा- अब तक हमने 31 शव बरामद कर लिए हैं, जिसमें एसपीओ और नागरिक शामिल हैं। कई शव क्षत-विक्षत अवस्था में मिले, इसी वजह से शवों की शिनाख्त मुश्किल हो रही है, लेकिन मरने वाले एसपीओ की संख्या बढ़कर 10 हो गई है। मिश्रा ने कहा- मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि हमें खबर मिली है कि स्थानीय लोगों की सहायता से पांच नागरिकों के शव बरामद किए गए हैं। 15 घायलों में से 14 एसपीओ की हालत नाजुक बनी हुई है। घायलों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती करवाया गया है। मिश्रा ने कहा- हमले में घायल 25 अन्य नागरिकों को मामूली चोटें लगी थी। पुलिस को सूचित किए बगैर वे अपने घर लौट चुके हैं। हम उनके घरों का पता लगा रहे हैं ताकि उन्हें चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाई जा सके।

Monday, May 17, 2010

दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में 40 लोग मारे गए


दंतेवाड़ा। १७ मई । नक्सलियों ने आज छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक बस को विस्फोट से उड़ा दिया, जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए। मृतकों में 20 विशेष पुलिस अधिकारी शामिल हैं।

यात्री बस सुकमा से दंतेवाड़ा जा रही थी। माओवादियों ने चिंगावरम गांव के निकट भूसारास और गदिरास के बीच बस को विस्फोट से उड़ाया। रायपुर से करीब 450 किलोमीटर दूर किए गए इस हमले में नक्सलियों ने जिलेटिन की छड़ वाली विस्फोटक प्रणाली का इस्तेमाल किया।

विस्फोट इतना जबर्दस्त था कि बस कई फुट दूर उछलकर चली गई और क्षत विक्षत मानव अंग सड़क के किनारे पडे़ नजर आए।

यह हमला शाम करीब पौने पांच बजे किया गया। इस घटना में मानक नियमों के उल्लंघन की बात भी सामने आई है। मानकों के अनुसार पुलिसकर्मियों और विशेष पुलिस अधिकारियों को असैन्य वाहन में सफर करना प्रतिबंधित है।

इस बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 35 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है हालांकि विशेष सचिव उत्थान कुमार बंसल ने मरने वालों की संख्या आशंका से कहीं अधिक होने की बात स्वीकारते हुए कहा कि बस पर 65 से 70 व्यक्तियों के सवार होने की क्षमता थी। बस पर सवार लोगों में पुलिसकर्मी और आम नागरिक शामिल थे।

रमन सिंह ने इस घटना को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी चिदंबरम से बातचीत की है और कल वह दिल्ली पहुंच रहे हैं।

रमन सिंह ने बताया कि मारे गए लोगों में 11 विशेष पुलिस अधिकारी और 24 आम नागरिक हैं। इन घटना में 15 लोग घायल हुए हैं, जिनमें 14 विशेष पुलिस अधिकारी और एक महिला है।

उन्होंने बताया कि घायलों को सुकमा के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रमन सिंह ने कहा कि वह प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से इस मसले पर बातचीत के दौरान रणनीति बदलने पर विचार करने को कहेंगे। '' मैं उनसे चर्चा करूंगा कि जिस हिसाब से नक्सलियों ने नागरिकों को मारना शुरू किया है, उस हिसाब से क्या तैयारी की जा सकती है। ''

उन्होंने कहा कि जिस तरह आम नागरिकों, पंचायती राज के लोगों और पुसिलकर्मियों पर हमला किया जा रहा है, उससे ऐसा लग रहा है कि नक्सली बौखला गए हैं। माओवादी राज्य में जनता और सुरक्षाबलों का मनोबल तोड़ना चाह रहे हैं।

यह पूछने पर कि क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को सेना के हवाले करना चाहिए, सिंह ने कहा कि यह केन्द्र सरकार का विषय है। इन सभी मुद्दों पर प्रधानमंत्री से बातचीत की जाएगी।

उन्होंने मारे गए नागरिकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपए, मारे गए विशेष पुलिस अधिकारियों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए सहायता राशि देने का ऐलान किया।

उधर गृह सचिव जी के पिल्लै ने मंत्रालय के आला अधिकारियों की बैठक के बाद नई दिल्ली में संवाददाताओं को बताया, '' किसी ने भी माओवादियों को निर्दोष और निहत्थे लोगों की हत्या करने का अधिकार नहीं दिया है।

पिल्लै ने कहा, '' निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाने की माओवादियों की यह प्रवृत्ति बरसों से देखने को मिल रही है। ''

मरने वालों की संख्या के बारे में कुछ कहने से इंकार करते हुए पिल्लै ने कहा कि सात लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उनमें से कुछ की हालत चिन्ताजनक है।

जिस बस को नक्सलियों ने विस्फोट से उड़ाया, वह पूरी तरह नष्ट हो गई है। बस का आगे का हिस्सा एक लोहे की गेंद की शक्ल में बदल गया है। बस से निकाले गए कई शव बुरी तरह झुलसे हुए थे।

इन्सास राइफलों सहित विशेष पुलिस अधिकारियों के शव, आम नागरिकों के शव, जूते-चप्पलें और जले हुए कपडे़ घटनास्थल पर पडे़ नजर आए।

इससे पहले नक्सलियों ने छह अप्रैल को अब तक का सबसे घातक हमला करते हुए दंतेवाड़ा जिले के ही मुकराना के जंगलों में 76 सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी थी।

आठ मई को नक्सलियों ने बीजापुर जिले में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के सात जवानों की हत्या कर दी थी।

इससे एक दिन पहले माओवादियों ने केंद्र सरकार द्वारा उनके खिलाफ शुरू किए गए सुरक्षा अभियानों के विरोध में छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों में 48 घंटे बंद का आह्वान किया था।

नक्सली-हमला-घटनाक्रम

-31 जुलाई, 2009 : बीजापुर, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने विशेष पुलिस अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति की हत्या की।

-27 जुलाई, 2009 : दंतेवाडा, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का विस्फोट कर छह लोगों को मौत के घाट उतारा।

-23 जुलाई, 2009 : गढचिरोली, महाराष्ट्र : नक्सलियों ने एटटापल्ली तालुका में एक आदिवासी की हत्या की।

-18 जुलाई, 2009 : बस्तर, बीजापुर, छत्तीसगढ : नक्सलियों ने एक ग्रामीण की हत्या की और एक वाहन जलाया।

-23 जून, 2009 : लक्खीसराय, बिहार : मोटरसाइकिल पर सवार नक्सलियों ने जिला अदालत परिसर में गोलीबारी कर अपने चार साथियों को छुडाया।

-16 जून, 2009 : पलामू, झारखंड : माओवादियों का बारूदी सुरंग विस्फोट, 11 पुलिस अधिकारियों की मौत, घात लगाकर किए गए एक अन्य हमले में चार पुलिसकर्मियों की हत्या।

-13 जून, 2009 : बोकारो, झारखंड : नक्सलियों का दो बारूदी सुरंग विस्फोट और बम हमला, दस पुलिसकर्मियों की मौत।

-10 जून, 2009 : सरंदा वन, झारखंड : माओवादियों का पुलिस दल पर हमला।

-22 मई, 2009 : गढचिरोली, महाराष्ट्र : माओवादियों ने 16 पुलिसकर्मियों की हत्या की।

-22 अप्रैल, 2009 : लातेहर, झारखंड : माओवादियों ने ट्रेन अगवा की।

-13 अप्रैल, 2009 : कोरापुट, उडीसा : माओवादियों के हमले में अर्धसैनिक बलों के 10 जवानों की मौत।

-16 जुलाई, 2008 : मलकानगिरि, उडीसा : बारूदी सुरंग विस्फोट कर पुलिस वैन उडाई, 21 पुलिसकर्मियों की मौत।

-29 जून, 2008 : बालीमेला जलाशय, उडीसा : नक्सलियों का नौका पर हमला, 38 पुलिसकर्मियों की मौत।

मुठभेड़ में दो नक्सली ढेर

रायपुर। १६ मई । सूबे के दंतेवाड़ा जिले में पुलिस ने मुठभेड़ में दो नक्सलियों को मार गिराया है। घटनास्थल से बंदूक और विस्फोटक सामग्री भी बरामद हुई है।

दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा ने बताया कि जिले के किरंदुल थाना क्षेत्र के अंतर्गत गुमियापाल गांव के जंगल में पुलिस ने दो नक्सलियों को मार गिराया है तथा घटनास्थल से 12 बोर की दो बंदूक टिफिन बम और पोस्टर भी बरामद किया गया है।

मिश्रा ने बताया कि पुलिस को किरंदुल थाना क्षेत्र में नक्सली गतिविधि की सूचना मिली थी। सूचना मिलने के बाद क्षेत्र के लिए एएटीएफ जिला पुलिस बल ओर विशेष पुलिस अधिकारियों का संयुक्त दल खोजी अभियान में रवाना हुआ था।

दल जब गुमियापाल गांव के करीब पहुंचा तब नक्सलियों ने पुलिस दल पर गोलीबारी शुारु कर दी। इसके बाद पुलिस दल ने भी जवाबी कार्रवाई के बाद नक्सली वहां से फरार हो गए।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पुलिस दल ने जब बाद में घटनास्थल की तलाशी ली तब दोनों नक्सलियों का शव 12 बोर की दो बंदूक ओर टिफिन बम बरामद किया गया।

पुलिस अधीकारी ने बताया कि पुलिस ने मौके से राष्ट्रीय खनिज विकासव निगम ओर स्चयं सेवी संस्था समिता मठ के खिलाफ बैनर भी बरामद किया है। मिश्रा ने बताया कि क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ तलाशी अभियान जारी है।

Monday, April 26, 2010

याद किये गये नक्सली हमले में शहीद जवान

कोलकाता।छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में शहीद सीआरपीएफ के जवानों की स्मृति में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की कोलकाता शाखा की तरफ से कालेज स्क्वायर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। सभा का उद्घाटन सीआरपीएफ के 167 बटालियन के कमांडेंट श्यामल चंद्र दे की पत्नी रुमा दे ने किया। शहीदों को श्रद्धांजलि देने मोर्चा प्रमुख विमल गुरुंग की पत्नी आशा गुरुंग, रिमबिक क्षेत्र में नारी मोर्चा की प्रमुख शशि डोमा, केन्द्रीय कमेटी के सदस्य पूरन थामी समेत मोर्चा के कई विशिष्ट लोग आये थे। श्रीमती गुरुंग ने कोलकाता शाखा द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की और इसे जारी रखने को कहा। श्रद्धांजलि सभा के आयोजन में कोलकाता शाखा के अध्यक्ष रतन बहादुर बूढा, संयुक्त उपाध्यक्ष प्रकाश राई व अविनाश छेत्री, संयुक्त सचिव अर्जुन विश्वकर्मा, महासचिव एम के लोपचांद की अहम भूमिका रही। प्रवक्ता किशोर भान ने कहा कि इसके आयोजन का उद्देश्य नौजवानों के सामने जवानों की शहादत पेश कर उनमें देशभक्ति का जज्बा भरना है ताकि वे फौज व केन्द्रीय बलों में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित हों। मोर्चा ने शहीदों के परिजनों को मुआवजा दिलाने के लिए सीआरपीएफ के डीआईजी से बातचीत की है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि मुआवजा मिलने में समस्या नहीं होगी। सभी परिवारों को केन्द्रीय नियमों के मुताबिक जल्द मुआवजा दिया जायेगा। श्री भान ने कहा कि सरकार को राज्य के वनांचल के विकास के लिए ठोस कदम उठाने चाहिये। वहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिये ताकि माओवादियों की मदद की तरफ उनका झुकाव न बढ़े। मोर्चा ने इससे पहले सिलदा कांड में शहीद जवानों की स्मृति में धर्मतल्ला में भी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया था।

Wednesday, April 21, 2010

केन्द्र सरकार के जांच अधिकारी पर नक्सली हमला

जगदलपुर ! छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 76 कर्मियों की शहादत के मामले की जांच हेतु केन्द्र सरकार द्वारा भेजे गए जांच अधिकारी ईएल राममोहन को लक्ष्य कर आज 17 अप्रैल को उस वक्त नक्सलियों ने फायरिंग और विस्फोट किया जब वे चिंतलनार से घटनास्थल ताड़मेटला गांव की ओर सुरक्षा बल के काफिले के साथ पैदल जा रहे थे।
अधिकारिक सूत्रों के अनुसार शनिवार की सुबह बीएसएफ के पूर्व डीजीपी राममोहन संभाग के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों सहित यहां से हेलीकाप्टर से चिंतलनार पहुंचे। चिंतलनार से वे सुरक्षा बलों के साथ पैदल ही घटनास्थल जहां 76 जवान शहीद हुए, ताड़मेटला के लिए रवाना हुए थे और यह काफिला कुछ ही दूरी तय कर पायी थी कि जंगल की ओर से 5-6 राऊंड फायरिंग हुई और दो विस्फोट किए गए। हालांकि हमला जंगल के अंदर काफी दूर से किया गया था, इसीलिए कोई हताहत नहीं हुआ। फायरिंग की आवाज सुनते ही सुरक्षा बल के जवान फौरन मोर्चा संभाल जंगल में फैल गए। समझा जाता है कि फायरिंग के पीछे नक्सलियों के द्वारा जांच अधिकारी को भयभीत करने की सोची-समझी रणनीति रही हो। जांच अधिकारी के साथ भारी संख्या में तैनात सुरक्षा बलों की मौजूदगी से नक्सली किसी वारदात को अंजाम देने की हिम्मत नही जुटा पाए

दंतेवाडा हत्याओं से सबक


प्रफुल्ल बिदवई

हजारों साल तक विश्व के अधिकतर लोग तानाशाह शहंशाहों, बादशाहों और शहजादों की रियाया बन कर रहते रहे। अभी पिछली सदी में ही कहीं जाकर बहुत से लोग नागरिक बन पाए जिनके कुछ राजनीतिक अधिकार थे। इतिहास के ज्यादातर हिस्से में कोई कानून का शासन नहीं था। राजा की मर्जी ही चलती थी। अभी हाल ही तक वास्तविक सशस्त्र सेनाओं और पुलिस के बीच कोई भेद नहीं था। सिपाही संदिग्ध अपराधियों को गिरफ्तार करके न्यायिक जांच केलिए न्यायाधीशों के सामने ले आते थे, जो बादशाह से स्वतंत्र नहीं होते थे। सेना और पुलिस के बीच का फर्क आधुनिक युग में ही पैदा हुआ।

भारत में यह फर्क उपनिवेशीय काल में ही साफ तौर पर कायम हो गया था। लेकिन आजादी के बाद इसके मजबूत हो पाने से पहले ही नई परासैनिक इकाइयां उभर कर सामने आईं। पुनर्गठित केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और उसकी राज्यस्तरीय किस्म की इकाइयां-सीमा सुरक्षा बल, भारत-तिब्बती सीमा पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड आदि। परासैनिक बल भारत के सुरक्षा, पुलिस अमले का सबसे तेजी से बढता हुआ घटक हैं।

फिर भी परासैनिक बलों और सशस्त्र सेनाओं के बीच एक स्पष्ट, स्वस्थ सीमा रेखा कायम हो चुकी है। परासैनिक बल गृहमंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं जबकि सशस्त्र सेनाएं रक्षा मंत्रालय को रिपोर्ट करती हैं। परासैनिक बल आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का काम करते हैं, जबकि सशस्त्र सेनाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बाहरी खतरों से निबटें। इस फर्क के चलते यह एक मजबूत आम राय रही है कि परासैनिक बल 'संस्कृति, प्रकृति और प्रशिक्षण के लिहाज से गैर सैनिक ही हों। रक्षा सेनाओं के बरअक्स ,उनका मकसद मुखालिफों को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पंहुचाना नहीं, बल्कि उन्हें सिर्फ नियंत्रण में रखना होता है, ताकि उनपर सामान्य, दीवानी और फौजदारी कानूनों के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सके। आज कानून का शासन और परासैनिक बलों तथा सशस्त्र सेनाओं के बीच का फर्क दोनों ही खतरे में पड ग़ए हैं। सुरक्षा कट्टरपंथियों और आत्मघोषित विद्रोह विशेषज्ञों की ओर से कानून के शासन को ताक पर रखने और परासैनिक बलों की संस्कृति को बदलकर और उनके प्रशिक्षण और बल प्रयोग के स्तर को बढा कर उनका सैन्यीकरण करने के लिए दबाव डाला जा रहा है। छत्तीसगढ क़े दांतेवाडा जिला में केंद्रीय सुरक्षा बल की कंपनी पर माओवादियों के हमले ने, जिसमें 76 परासैनिक कर्मी मारे गए थे, जिस बहस को जन्म दिया है उसके जहरीले प्रभावों में से एक है महादबाव। नक्सलवाद या माओवाद को एक विद्रोह परिभाषित करने के किए कर्कश आवाजें उठाई जा रही हैं ठीक कश्मीर और उत्तरपूर्व में सैन्यवादी अलगाव वाद की तरह और इस प्रकार ऑपरेशन ग्रीन हंट में तैनात परासैनिक बलों की भूमिका को साफ तौर पर सेना की भूमिका का रूप दिया जा सके। जिस सनसनीखेज अंदाज में इन हत्याओं को मीडिया ने युध्द, कत्लेआम और निर्मम हत्या बताया दांतेवाडा बहस को शक्ल देने में उसका बहुत बडा हाथ था। टीवी ऐंकरों ने जनता को एक तरफ भारतीय राज्य, लोकतंत्र और तिरंगे और दूसरी तरफ विनाश, अराजकता और हिंसा के बलों के बीच किसी एक को चुनने के लिए प्रबोधित किया। नक्सलवाद, चरमपंथ और आतंकवाद को एक कोटि में रख दिया गया। बंदूकधारी माओवादियों, आदिवासियों के लिए न्याय के समर्थकों, नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं, यहां तक कि गांधीवादियों के बीच का सारा भेदभाव मिटा कर रख दिया गया। यदि आप भारतीय राज्य के साथ नहीं हैं, तो आप माओवादियों के साथ हैं-उनके सहअपराधियों और सहयोगियों की तरह।

उन्मादपूर्ण संदेश यह दिया जा रहा था '' गोली पहले चलाओ, सोचो बाद में'' इस हत्या की घटना को लेकर गृह मंत्री पी चिदम्बरम से लेकर राज्य के पुलिस निदेशकाें तक के शीर्ष सरकारी पदधारियों की प्रतिक्रिया एक जैसी थी। दांतेवाडा की घटना एक ऐतिहासिक मोड अौर चरम पंथियों की ओर से, जो राज्य को नष्ट करना चाहते हैं, की गई एक युध्द की कार्रवाई है। राज्य को इसका जवाब बल की परिधि और उसका स्तर बढाकर देना चाहिए। चिदम्बरम ने यह धमकी दे डाली कि राज्य माओवादियों के खिलाफ हवाई ताकत के इस्तेमाल पर विचार कर सकती है, जिसके बारे में अब तक कोई जनादेश नहीं है। माओवादियों के साथ बातचीत की अब कोई संभावना नहीं रह गई है क्योंकि वैसा करके 76 जवानों की शहादत का मजाक उडाना होगा। स्पष्ट बात यह है कि काफी बेरोजगार और गरीब भारतीय परासैनिक बलों में भर्ती होने को तैयार हैं। इन बलों के आका, उन्हें पर्याप्त नेतृत्व, प्रशिक्षण और अनुशासन के बिना ही क्षेत्र में भेज देंगे। दांतेवाडा में उन्होंने अपने शिविर की रखवाली करने की मानक कार्यविधि तक का पालन नहीं किया और उन्होंने लौटते समय वही रास्ता भी नहीं अपनाया, जिस रास्ते से वे गए थे। हमारे परासैनिक बलों में सामान्य साक्षरता, कुशलता और बुनियादी निपुणता की कमी के चलते जो कि संभवत: नियमित पुलिस की तुलना में जरा सी बेहतर होती है- यह मान पाना मुश्किल है कि वे थोडी सी अवधि में एकदम बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे, या यह कि उनका नेतृत्व उन्हें तोप के निवाले के तौर पर इस्तेमाल करना बंद कर देगा।
ये सब बातें राज्य की सदोषता को हमारे सामने लाती हैं। और यह सदोषता गंभीर किस्म की है। वनों, खनिजों और भूमि की विशाल संपदा के निजीकरण की नवउदारवादी नीति को कार्यान्वित करने के प्रयास में उसने आदिवासी क्षेत्रों में गृहयुध्द छेड दिया है। वेदांत, पास्को, जिंदल और टाटा जैसे ग्रुपों के साथ उसने खनन के पट्टों के सैकडाें समझौता ज्ञापनों पर दस्तखत किए हैं जिनसे जनता को लोहे की कच्ची धातु के प्रतिटन के लिए मात्र 27 रुपए की अल्प रायल्टी मिलती है, जबकि यह धातु 4000 रुपए प्रतिटन के हिसाब से बिकती है। समझौता ज्ञापनों को कार्यान्वित करने के लिए राज्य ने लाखों बेबस लोगों को बेघर कर दिया है। इससे पर्यावरण नष्ट हो रहा है, जिसमें नदियां, पर्वत और वन शामिल हैं। इन नवउदारवादी नीतियों को मिलीभगत की व्यवस्थाओं के जरिए कार्यान्वित किया जा रहा है, जिनमें हितों का जबरदस्त टकराव होता है। राज्य के उच्च पदधारी, जिनमें पी चिदम्बरम भी शामिल हैं, इन कंपनियों के निदेशक रहे हैं, या उन्होंने उनका कानूनी प्रतिनिधित्व किया है। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी इन कंपनियों में अपने शेयर होने की बात स्वीकार की है लेकिन उन्होंने इन कंपनियों के खिलाफ मामलों की सुनवाई करने से इंकार नहीं किया। नवउदारवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू और पूर्व शर्त है उन लोगों के खिलाफ जोरजबरदस्ती, जिन्होंने बेघर होने और अपनी जायदाद से बेदखल किए जाने का विरोध किया है जिसके लिए राज्य ढांचागत हिंसा का इस्तेमाल करता है। ग्रीनहंट ऑपरेशन में तेजी लाने से आदिवासी क्षेत्रों में निर्दोष नागरिकों को जबरदस्त क्षति पहुंचेगी। पुलिस और परासैनिक बलोें और सलवाजुडूम की निरंतर हिंसा के कारण तीन लाख आदिवासी बेघर हो चुके हैं। इस सहायक सेना को राज्य द्वारा प्रायोजित और हथियारबंद किया गया है और उसका सारा खर्चा भी राज्य सरकार उठाती है।

इस घटना को लेकर तीन सवाल उठते हैं। क्या माओवादियों के दांतेवाडा हमले को जरा भी जायज ठहराया जा सकता है? क्या 60,000 से भी ज्यादा ग्रीनहंट परासैनिकों की मदद से माओवादियों के खिलाफ जबरदस्त बल का प्रयोग करना राज्य का सही कदम है? इसमें अनिवार्य रूप से असंख्य नागरिक हताहत होंगे। क्या माओवादियों से निपटने की कोई समझदार रणनीति हो सकती है?

बडे पैमाने पर हिंसा की और वहशियाना कार्रवाईयों द्वारा माओवादी, जो पिछड़ों की रक्षा करने और एक न्यायपूर्ण समाज का समर्थक होने का दम भरते हैं, अपने लिए कोई श्रेय अर्जित नहीं कर पाएंगे। इन कार्रवाइयों से तो उन्हीं आदिवासियों के खिलाफ जिनकी रक्षा करने का वे दावा करते हैं, जबरदस्त जवाबी कार्रवाई करने की संभावना पैदा हो जाएगी।

Sunday, April 18, 2010

विकास ही माओवाद के हल की कुंजी


दंतेवाड़ा नरसंहार की घटना से समूचा राष्ट्र स्तब्ध है। हर तरफ से इस नक्सली कार्रवाई की निन्दा के स्वर उठ रहे हैं लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविघालय के वामपंथी छात्र संगठनों ने नरसंहार का समर्थन कर सबको सकते में डाल दिया है।

‘फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल’ के बैनर तले इन छात्रों ने नक्सलियों के तांडव का समर्थन करते हुए जश्न मनाया और पोस्टरबाजी की। हालांकि इसे महज बचकाना मार्क्सवाद ही कहेंगे और निहायत ही अपरिपक्व और अराजनीतिक समझ, क्योंकि खुद माआ॓वादियों ने दंतेवाड़ा कांड पर यह कहते हुए दुख जताया है कि उन्होंने यह सब बहुत मजबूरी में किया है।

बहरहाल, इस घटना के बाद से ही नक्सल समस्या से निपटने को लेकर केंद्र सरकार की पहल पर भी अंगुलियां उठ रही हैं। हिंसा के जरिए कानून को हाथ में लेने वाले नक्सलियों से निपटने का रास्ता क्या हो, यह अहम सवाल है? इसकी आड़ में खनिज सम्पदा का दोहन, विकास कार्यों में रंगदारी और तरह-तरह की अराजक गतिविधियां भी फल-फूल रही हैं और आदिवासियों का जीवन स्तर ऊपर उठाने का असल सवाल दबता जा रहा है। देश के लगभग आठ राज्य आज नक्सल समस्या से बुरी तरह प्रभावित हैं।

गरीबी, अशिक्षा और असंतुलित विकास ही इसकी जड़ हैं किंतु सरकार का ध्यान आकृष्ट करने का हिंसा ही एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपनी मांगें मनवाने का यह बहुत कारगर तरीका भी नहीं है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही देश को आजाद कराया था। इसलिए हिंसा के जरिए सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक विचारधारा रखने वालों को भली-भांति समझ लेना चाहिए कि उन्हें अपनी राजनीतिक विचारधारा क्रियान्वयन के तरीके पर पुनर्विचार करना होगा।

गरीब आदिवासियों के हक की लड़ाई के और भी लोकतांत्रिक तरीके हैं। गरीबी हिंसा का बहाना नहीं बन सकती। यह इस आतंक को जायज ठहराने का कारण भी नहीं बन सकती। गरीबी और दमन को हथियार उठाने की वजह समझना बड़ी भूल होगी। इस तरह की राजनीतिक सोच रखने वालों को इस समस्या की जड़ में जाकर देखना-सोचना होगा क्योंकि इसके प्रवर्तक माआ॓वादी राज्य-व्यवस्था को मुख्य शत्रु और वर्ग संघर्ष को ही युद्ध का मुख्य रास्ता मानते हैं। दंतेवाड़ा की लोमहर्षक घटना उनकी इस सोच की परिणति है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए हैं। उनकी इस चरमपंथी सोच के प्रति सहानुभूति रखने वालों को भी अब आत्मलोचन करने की जरूरत है कि क्या माआ॓वादी बिना बड़े जनांदोलन के किसी क्रांति की बुनियाद रख सकते हैं।

एक खुफिया रिपोर्ट पर यकीन करें तो उसमें कहा गया है कि देश में विकास कार्यों के लिए बढ़ रहे सरकारी बजट का सीधा असर नक्सलियों की लेवी वसूली पर पड़ रहा है। नक्सली संगठनों ने वसूली के लक्ष्य में पच्चीस प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है। वर्ष 2010 के लिए 1500 करोड़ रूपये वसूली का लक्ष्य है। इसमें अकेले बिहार-झारखंड से 500 करोड़ रूपये की वसूली की जानी है। इसी वसूली के लिए इन नक्सलियों ने अभी हाल के कुछ महीनों में निर्माण एजेंसियों के दर्जनों वाहनों को जला दिया और ये लगातार उनके निशाने पर हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में यह समस्या और विकट है। यहां इनकी समानांतर सरकार चलती है और दरअसल इसी पहलू में इस समस्या की जड़ें भी तलाशनी होंगी। गौरतलब है कि अबूझमाड़ का इलाका लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला है, इसकी सीमाएं महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश से सटी हैं। यहां विकास की कौन कहे, सरकारी तंत्र के लोग वर्षों से झांकने तक नहीं गये। कुछ तो माआ॓वादियों के भय और ज्यादातर सरकारी तंत्र की नौकरशाहाना जकड़न, उदासीनता और प्रतिबद्धता के अभाव के चलते आदिवासी इलाकों में विकास कार्य हो ही नहीं रहे हैं। सचाई यह है कि नक्सल प्रभावित अति संवेदनशील 33 जिलों के लिए केंद्र सरकार ने साढ़े छह हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया है, किंतु अभी तक मात्र दो हजार करोड़ रूपये ही खर्च हुए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण योजना के तहत महाराष्ट्र, आंध्र, बिहार और छत्तीसगढ़ में औसतन पांच से बारह प्रतिशत ही कार्य हुए हैं।

दरअसल नक्सल समस्या केवल केंद्र सरकार की चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। राज्य सरकारों को भी राजनीति से ऊपर उठकर इससे निजात पाने के लिए एकजुटता दिखानी होगी, जो अभी तक नहीं दिख रही है। नक्सलियों ने अभी तक इसी कमजोरी का फायदा उठाया और एक से दूसरे राज्य में भागते रहे हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री पर माआ॓वादियों की मदद से चुनाव जीतने का आरोप है। अभी कुछ दिन पहले उन्होंने एक अपहृत अधिकारी को छुड़ाने के बदले में एक माआ॓वादी को जेल से छोड़ दिया। बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री आसन्न विधानसभा चुनावों को देखते हुए फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं किंतु दंतेवाड़ा के हमले के बाद इस आतंक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए नई राजनीतिक सहमति बनी है।

इस आतंक के सफाये में सरकार को दृढ़ता दिखानी होगी क्योंकि माआ॓वादी सुरक्षा बलों के खिलाफ आदिवासी महिलाओं और बच्चों को आगे कर हमले कर रहे हैं। दंतेवाड़ा की घटना में भी महिला के शामिल होने की पुष्टि हुई है। उनके इस खतरनाक खेल का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। इस कठोर कार्रवाई की पहल अब राज्यों को ही करनी होगी। सरकार को भी यह समझना होगा कि हिंसा के जरिये सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक विचारधारा रखने वाले ये माआ॓वादी भटके हुए लोग हैं। जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों की हरकत भयंकर भटकाव और राजनीतिक दिवालियापन की ही परिचायक है। माआ॓वादियों पर पुलिस कार्रवाई को गलत ठहराने वाले अब पुलिस बल पर उनके हमले को कैसे जायज ठहरा रहे हैं।

उनकी यह सोच राष्ट्र विरोधी है, जो उन्हें जेहादी आतंक के करीब ले जाती है। इसीलिए इसकी पुरजोर निंदा होनी चाहिए। किसी समस्या का हल हिंसा कतई नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से ही हल ढूंढा जा सकता है। खासतौर पर उन राजनीतिक दलों को, जिनसे इनका जुड़ाव है, उन्हें उनकी सोच को बदलने के लिए पहल करनी चाहिए। यह सच है कि नक्सलियों ने इतनी बड़ी चोट कभी नहीं दी, इसलिए सरकार को इनसे निपटने के लिए कड़े से कड़े कदम उठाने से हिचकना नहीं चाहिए। तरीका क्या हो, यह उसे खुद तय करना है। साथ ही साथ उसे ईमानदार समर्पण, संवाद और विकास की अपनी नीति को और अधिक प्रभावी बनाना होगा। इस अभियान में प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना होगा। इन क्षेत्रों में इस तरह विकास किया जाना चाहिए कि आमजन को लगे कि सरकार से बड़ा उनका कोई हितैषी नहीं है। उनका उत्थान सरकार के प्रयास से ही होगा, किसी अन्य तरीके से नहीं।

उनके मन में भरना होगा कि हथियारों के सहारे परिवर्तन की वकालत करने वाले उनके दुश्मन हैं और उनकी यह नीति विकास में बाधक है। वह उनकी आड़ में निर्माण एजेंसियों से वसूली के साथ ही साथ प्राकृतिक संपदा का दोहन कर रहे हैं। इस अभियान के जरिये भटके हुए लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जानी चाहिए तभी उनके दिलों में विश्वास पैदा हो सकेगा और नक्सलियों से निपटने में उनकी मदद मिल सकेगी। अगर वाकई केन्द्र और राज्य सरकारें इस समस्या के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें भी एक परिपक्व राजनीतिक समझ का परिचय देना होगा। हमारे गृहमंत्री से और परिपक्व समझ और गंभीर व ईमानदार पहल अपेक्षित है।

क बड़ा तबका है और मुख्यधारा के दलों में भी है, जो मानता है कि नक्सलवाद एक राजनीतिक समस्या है। तो फिर राजनीतिक समस्या का कोई राजनीतिक हल ही होना चाहिए चाहे वह कितना ही जटिल और कठिन क्यों न हो। ऐसे में चिदम्बरम साहब को भी ऐसे बयानों से बचना चाहिए कि नक्सली देश के दुश्मन हैं। खुद कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर मानते हैं कि पंचायतों को मजबूत कर ही हम इसके हल की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। सिर्फ फौज और अर्धसैनिक बलों के जरिए यह समस्या नहीं हल होने वाली। विकास ही वह कुंजी है जिसमें इसका हल छिपा है। अब विकास कैसे हो, यह तो सरकार को ही सोचना होगा। सरकार राजनीतिक और रणनीतिक कौशल का सही इस्तेमाल कर अपने मिशन में कामयाब हो सकती है।

रणविजय सिंह

इस अप्रत्यक्ष हिंसा को भी समझिए


तेवाड़ा में केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल के 76 जवानों की नक्सली हमले में मृत्यु के बाद हमारे राजनीतिक और मीडियाई इलाकों में जिस तरह की फौरी हलचल की उम्मीद थी वैसी हुई।

नक्सल विरोधियों ने कठोरतम भाषाई विरोध दर्ज कराया और नक्सलवादियों को हत्यारा, आतंकवादी, देशद्रोही तथा इसी तरह के अन्याय निंदक पदों से नवाजा और उनके विरूद्ध कड़ी कार्रवाई न करने के लिए सरकार को धिक्कारा भी और आगे कठोर कदम उठाने के लिए नसीहतें भी दी।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस समूचे भाषाई प्रलाप में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के आदिवासियों की आर्थिक, ऐतिहासिक सांस्कृतिक परिस्थितियों और इनसे मौजूदा राज्य व्यवस्था की नीतियों के साथ टकराहट की आधारभूत समझ सिरे से गायब थी। अगर इनमें से किसी ने भी दंतेवाड़ा क्षेत्र में जाकर वस्तुस्थिति को खुले दिमाग से देखा होता तो शायद उनका नजरिया दूसरा होता। वे नक्सलवादी हिंसा के समर्थक तो नहीं ही होते मगर इस हिंसा की जड़ों तक पहुंचने में जरूर सफल होते। अगर उन्हें जहां जाकर देखने में असुविधा होती थी तो वे कम से कम उन लोगों के विचारों और वर्णनों को ही पढ़ लेते जिन्होंने लगातार आदिवासियों के बीच काम किया है। और समय-समय पर उनके शोषण-दोहन-बंधन को विविध तरीकों से उजागर किया है।

ऐसा करने वालों में उचक्के कलमकारों के विरूद्ध वे कलमकार ज्यादा रहे हैं जो इस देश में एक न्यायपूर्ण लोकतंत्र के हामी रहे हैं और जो वंचित तबकों की कठिनाइयों-समस्याओं के प्रति सरोकारी तथा संवेदनशील नजरिया अपनाए रहे हैं। अगर हमारे कथित देशप्रेमियों और लोकतंत्रवादियों ने अपने विचारों में वनवासियों के हालात की थोड़ी सी भी समझ शामिल कर ली होती तो उनका थोड़ा बहुत गुस्सा हिंसा और प्रतिहिंसा के दुराचक्र को पैदा करने वाले राज्यतंत्र की आ॓र अवश्य ही स्थानांतरित हो गया होता। मैंने आदिवासी इलाकों को थोड़ा बहुत जानने-समझने की कोशिश की है।

1984 में मैंने मध्यप्रदेश के (तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं था) कुछ आदिवासी क्षेत्रों का दौरा किया था। तब मेरे सामने उनके कदम-कदम कठिन जीवन के ऐसे डरावने रूप उजागर हुए थे जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकते थे। यहां सिर्फ एक घटना बताना चाहता हूं। मेरी एक ऐसे आदिवासी से मुलाकात हुई थी जो छह महीने जेल में बिता कर आया था। उसका अपराध सिर्फ इतना था कि उसे अपने खेत की जुताई के लिए हल की जरूरत थी जिसके लिए उसने जंगल से लकड़ी काट ली थी। वन अधिकारी ने इसे पकड़ लिया और इसके सामने शर्त रखी कि अगर वह अपनी औरत को उसके पास छोड़ जाएगा तो उसे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा पुलिस के हवाले कर दिया जायेगा। क्योंकि उसने वन अधिकारी की बात नहीं मानी इसलिए उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। उस साल वह खेती नहीं कर सका और उसका पूरा परिवार तबाह हो गया। मैं यहां यह भी बता दूं कि यह सिर्फ उस अकेले आदिवासी की कहानी नहीं थी बल्कि एक महागाथा थी जो समूचे आदिवासी क्षेत्र में पसरी हुई थी।

जो दूसरी बात मेरे देखने में आयी थी वह यह थी कि चुनाव राजनीति ने जिन गिने-चुने आदिवासी नेताओं को जन्म दिया था, वे आदिवासियों के पक्ष में कम अपने लालच के चलते दोहन करने वालों के दलाल के रूप में ज्यादा सक्रिय थे। जो वर्तमान चुनावी लोकतंत्र की कुटिलताओं को समझते हैं वे इसका कारण भी समझ सकते हैं। अब मैं राज्य की भूमिका के संदर्भ में उन जवानों को बात करना चाहता हूं जो दंतेवाड़ा में शहीद हो गये और श्रद्धांजलि स्वरूप जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को प्रकाशित करने का पुनीत कार्य इधर ‘राष्ट्रीय सहारा’ कर रहा है। इनमें से एक भी जवान, बड़े की बात तो छोड़ दें, किसी छोटे नेता, व्यवसायी, अधिकारी या किसी माफिया का भी बेटा नहीं है। सबके सब बेहद निम्न पृष्ठभूमि से आये लड़के थे। जो अपने से थोड़ी और निम्न पृष्ठभूमि के हथियारबंद आदिवासियों से मुठभेड़ के लिए भेजे गये थे। जाहिर है कि ये लोग नक्सली आदिवासियों के साथ गलबहियां करने नहीं गये थे। अगर नक्सली इनके हत्थे चढ़ जाते तो ये भी उन पर गोलियों की बौछार करते। परंतु जंगल के युद्धक्षेत्र में नक्सली अधिक चालाक निकले। परिणामत: 76 जवानों को अपनी जान से हाथ धोने पड़े।

मारक स्थिति देखिए कि मारने और मरने वाले एक ही विसंगति के शिकार हैं। और यह विसंगित किसी आ॓र ने नहीं, आपाद भ्रष्ट और संवेदनहीन हो चुके राज्यतंत्र ने पैदा की है। सारतत्व यह है कि जब तक मौजूदा चुनावी राज्यतंत्र का नैतिक चरित्र नहीं बदलेगा, तब तक नक्सली समस्या का कोई समाधान नहीं निकलेगा। बल्कि यह समस्या और अधिक उग्र होगी। निरीह जवानों और निरीह आदिवासियों की जानें जाती रहेंगी। जिनकी हवस और कुत्सित महत्वाकांक्षा के चलते यह सब हो रहा है, वे इसी तरह मजे में बने रहेंगे। जवान मरें या आदिवासी, उनके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए वे लोग, जो नक्सलियों को भर-भर गरिया रहे हैं, अपना थोड़ा बहुत ध्यान इस राज्यतंत्र के सुधार की आ॓र भी लक्षित करें। उन्हें समझना चाहिए कि झारखंड जैसे राज्य का एक भ्रष्ट मुख्यमंत्री रातोंरात अरबों में खेलने लगता है या मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का एक अधिकारी अरबों की अवैध संपत्ति जुटा लेता है तो यह सब किसके हकों पर डकैती होती है।

यह वह मौन अप्रत्यक्ष हिंसा होती है जो प्रत्यक्ष हिंसा से कहीं अधिक क्रूर और भयावह है। इसको समाप्त किये बिना प्रत्यक्ष हिंसा समाप्त नहीं हो सकती।

विभांशु दिव्याल

लेखक

Saturday, April 17, 2010

दंतेवाड़ा हमले पर सांसद आमने-सामने

रायपुर। दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार में 76 जवानों के शहीद होने के मामले में प्रदेश के सांसद आमने-सामने हो गए हैं। संसद में बहस के दौरान कांग्रेस सांसद चरणदास महंत ने राज्य की भाजपा सरकार और यहां के सांसदों पर निशाना साधा। इसका भाजपा सांसदों ने विरोध किया। छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने श्री महंत के बयान की आलोचना की है।

श्री महंत ने कहा कि राज्य में जब कांग्रेस की सरकार थी तब केवल 44 जाने गई थीं। रमन सरकार के आने के बाद 203 लोगों की मौत हो गई। भाजपा ने बस्तर में चुनाव प्रबंधन से 11 में से 10 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस को धोखे से एक में जीत मिल गई।

सांसद बलीराम कश्यप पर उन्होंने नक्सलियों से समझौता करने का आरोप लगाया। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार नक्सलियों के लिए मुफीद हो गई है। प्रदेश में नक्सलियों के समर्थक माने जाने वाले विधायक को प्रदेश का गृहमंत्री बना दिया जाता है। सांसद सरोज पांडे ने श्री महंत पर आरोप लगाया कि नक्सली हिंसा पर वे राजनीति कर रहे हैं। श्री महंत को उन्होंने आरोपों को साबित करने की चुनौती दी।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और सांसद विष्णुदेव साय ने श्री महंत की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ सांसद बलिराम कश्यप का अपमान किया है। उन्हें अपने कृत्य के लिए सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। असर में कांग्रेस छत्तीसगढ़ में बिखर रही है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता अपने ही गृहमंत्री की आलोचना कर रहे हैं। इससे कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति सामने आ रही है।

उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की समस्या के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। प्रदेश ही नहीं पूरे देश में कांग्रेस ने नक्सली समस्या विरासत में दी है। कांग्रेसी ही नहीं चाहते कि नक्सलियों के लिए खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव ने कहा कि महंत मनगढ़ंत आरोप लगाकर प्रदेश को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं।

देश के गृहमंत्री राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर नक्सलियों के खिलाफ आरपार की लड़ाई लड़ रहे हैं तब महंत इस तरह का बयान देकर अभियान को डिस्टर्ब करने का प्रयास कर रहे हैं।

दंतेवाड़ा की जांच टीम पर नक्सलियों की फायरिंग

दंतेवाड़ा । छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सली हमले की जांच के लिए गई टीम पर शनिवार को नक्सलियों ने फायरिंग की। हालांकि इस हमले में किसी के घायल होने की सूचना नहीं है। बताया गया है कि नक्सली अब भी आसपास मौजूद हैं। मामले की जांच कर रहे बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक इएन राममोहन शनिवार को घटनास्थल पर पहुंचे।

अधिकारिक सूत्रों ने बताया कि वरिष्ठ अवकाशप्राप्त अधिकारी राममोहन आज घटना स्थल चिंतलनाड़ पहुंचे और घटना की जांच शुरू की। इस दौरान छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन और अन्य पुलिस अधिकारी भी मौजूद हैं। अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक राममोहन इस दौरान मौजूद सीआरपीएफ के जवानों से पूछताछ की।

इस महीने की छह तारीख को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ताड़ और मेंटला के जंगल में नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया था, इस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। घटना की जांच की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बीएसएफ के पूर्व डीजी राममोहन को सौंपी है। राममोहन 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट देंगे।

Friday, April 16, 2010

नक्सली आतंकवादी ही हैं




एक तरफ दिल्ली में 7 फरवरी, 2010 को आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह कहते हैं, ‘नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ वहीं दूसरी ओर, 4 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के नक्सलवाद प्रभावित इलाकों-लालगढ़ और मिदनापुर के दौरे पर गए हमारे गृहमंत्री पी. चिदंबरम माओवाद विरोधी अभियान में सेना को शामिल किए जाने की मांग को ठुकरा देते हैं और कहते हैं, ‘हमने माओवादियों के सामने वार्ता का ताजा प्रस्ताव रखा है।’ और इस दौरे के महज दो दिन बाद 06 अप्रैल, 2010 को नक्सली छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बर्बर हमले कर सीआरपीएफ के 74 जवानों को घेर कर मार डालते हैं। वास्तव में नक्सलियों ने लोकतांत्रिक भारत के अस्तित्व को चुनौती दी है।

नक्सलियों को नेस्तनाबूत करने का साहस गृहमंत्री को दिखाना चाहिए तो वो अच्छी अंग्रेजी में पिलपिला बयान देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। सवाल ये है कि आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा? कब तक गरीब, आदिवासियों, किसानों की लाशें ढेर होती रहेंगी? कब तक हमारे जवान नालायक नेताओं की वजह से नक्सली-आतंक के शिकार होते रहेंगे? कब जागेगी हमारी सरकार और कब जागेंगे हम? आख़िर कब?

पिछले चार दशकों से हमारा देश नक्सली आतंकवाद का दंश झेल रहा है। नक्सली आतंक से उपजे हालात ने आज देशवासियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। नक्सलियों के साथ समझौती करनेवाली कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के शासन में उनके हौंसले बुलंद हैं। वे सुरक्षा बलों और निर्दोष लोगों के खून से न जाने कौन सी क्रांति की इबारत लिख रहे हैं? स्कूल भवनों, रेल पटरियों, सड़कों, पुलों, स्वास्थ्य केन्द्रों को बमों से उड़ाकर न जाने किस तरह के विकास का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं।

25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में हुए भूमि विवाद में जमींदार और किसानों के बीच संघर्ष हुआ। बंगाल पुलिस ने 11 किसानों को मौत के घाट उतार दिया। यहीं से नक्सलवाद की चिंगारी भड़की। माकपा से अलग हुए चारू मजूमदार व कानू सान्याल ने इस असंतोष का नेतृत्व किया।

21 सितंबर 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर के विलय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ। माओवादियों का सैनिक संगठन ‘पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) है।’

माओवादियों से प्रभावित क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता है। यह ‘रेड कॉरिडोर’ आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार से होते हुए नेपाल के माओवादी ठिकानों को जोड़ता है। नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है। ये ऐसे जंगलवासी हैं जो सदियों से शोषण का शिकार हैं।

नक्सली समस्या भारतीय शासन व्यवस्था की विफलता की निशानी है। आज भी आजादी के 62 साल बाद बहुसंख्यक आबादी को पीने का साफ पानी नसीब नहीं है। बेरोजगारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अशिक्षा के चलते लोगों का जीवन अंधकारमय है। भूख व कुपोषण से मौतें हो रही है। जानलेवा कर्ज है। ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं। नक्सलवादी इसी स्थिति का लाभ उठाकर अपना संकीर्ण स्वार्थ साधते हैं। वे लोगों को जनता के राज का सपना दिखाकर उन्हें अपने साथ जोड़ लेते हैं।

अब युवा माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर क्रांतिकारी नहीं बनते। माओवादियों ने अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए बेरोजगार युवाओं को गुमराह करना शुरू कर दिया है। माओवादियों ने उनसे जुड़ने वाले हर युवा को 3 हजार रूपए प्रतिमाह तनख्वाह तथा रंगदारी से उगाही गई रकम में से भी कमीशन देने की बात कही है। इस लालच में फंस कर माओवादियों से जुड़ रहे युवाओं को लेकर गृहमंत्रालय ने चिंता जताई है।

दूसरी ओर, सर्वहारा के शासन का सपना देखनेवाले नक्सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्य बरामद नहीं होते। कुछ दिनों पहले एक नक्सली Bangetudi शिविर में छापे के दौरान पुलिस ने ब्लू फिल्म की सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्योद्धाटन हुआ कि बड़ी तेजी से नक्सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। संगठन में शामिल युवती चाहकर भी इसके खिलाफ न आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है। वास्तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है।

पिछले दिनों केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने मानवाधिकार विभाग के सम्मेलन में भरोसा दिलाया कि देश के माओवाद प्रभावित इलाकों को अगले तीन साल में नक्सलियों के चंगुल से मुक्त करा लिया जाएगा। गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) में एक जनसमूह को संबोधित करते हुए 06 मार्च 2010 को कहा कि वर्ष 2050 तक नक्सली भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। पिल्लई ने स्वीकार किया कि नक्सलवाद प्रभावित राज्यों को नक्सलियों को कुचलने की स्थिति में आने में अभी सात से 10 वर्ष लगेंगे।

केन्‍द्र सरकार नक्सली हिंसा को रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है। इसी के चलते नक्सली हिंसा में लगातार इजाफा होता जा रहा है। नक्सलवाद के खात्मे के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत हैं, जिसका संप्रग सरकार में अभाव दिखता है। कभी सरकार नक्सलवाद को आतंकवाद की श्रेणी में रखती है तो कभी बातचीत के लिए टेबल पर बुलाती हैं। सरकार का यह ढुलमुल रवैया बेहद चिंताजनक हैं।

नक्सलवाद का सिद्धान्त है ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’ नक्सलवादी ‘वर्ग शत्रुओं’ का कत्लेआम कर क्रांति लाना चाहते हैं। उनका भारतीय लोकतंत्र मे विश्वास नहीं है। वे चुनावों का बहिष्कार करते हैं। वे हिंसा के माध्यम से सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करना चाहते हैं।

नक्सलवाद के पक्ष में तर्क गिनाने वाले उनके समर्थक दंडकारण्य का उदाहरण देते हैं, जहां आदिवासियों का बड़े पैमाने पर शोषण हुआ। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य क्षेत्र में नक्सलियों ने तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी बढ़वाने के लिए अभियान चलाया। शराबबंदी को लेकर महिलाओं को लामबंद किया। नक्सल आंदोलन के चलते आदिवासियों ने हजारों एकड़ वनभूमि पर कब्जा कर लिया। नक्सलवादियों का कहना है कि उन पर पूंजीपतियों, पुलिसकर्मियों, अधिकारियों की हत्या का जो आरोप लगता है वह आत्मरक्षा में उठाया गया कदम है। उनकी हिंसा ‘टारगेटेड वाइलेंस’ है।

प्रवक्‍ता डॉट कॉम का मानना है नक्सलवाद का सामाजिक परिवर्तन से कोई लेना-देना नहीं है, वस्तुत: यह एक विशुद्ध आतंकवाद है, जिसका लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता कब्जाना है। नक्सलवाद मानवता का दुश्मन है। यह भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा है। यह सिरफिरे लोगों का गिरोह है जो जनता व जवान के खून से भारत की धरती को बस लाल करना जानते हैं। सच में ये रक्तपिपासु हैं। ये राष्ट्रद्रोही हैं।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए नक्‍सली हिंसा का रास्‍ता छोडे। वे चुनावों में भाग लेकर अपने विचारों की श्रेष्‍ठता साबित करें। वहीं केन्‍द्र सरकार हिंसक माओवादियों से बातचीत का स्‍यापा छोडे और उस पर सीधे प्रहार करें। आज जिस तरीके से देशभर में नक्सली हमले बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए केन्द्र और राज्य में समन्वय स्‍थापित करे। पुलिस संख्या बल में इजाफा हो। सुरक्षा बलों को बेहतर प्रशिक्षण मिले। अत्याधुनिक हथियार मिले। वास्तव में अब सख्त कार्रवाई का वक्त आ गया है। इसके साथ ही आम जनता को भी एकजुट होकर नक्सली आतंकवाद के खात्मे के लिए जन-अभियान चलाना चाहिए।