Wednesday, February 24, 2010

नक्सलियों ने वार्ता के लिए सरकार को दिया फोन नंबर

कोलकाता ! केंद्र सरकार द्वारा नक्सलियों को फैक्स नंबर दिए जाने के चंद घंटों बाद पश्चिम बंगाल के नक्सलियों ने जवाब में गृह मंत्रालय को एक मोबाइल नंबर दिया है और कहा है कि वह शांति वार्ता के लिए उस नंबर पर उनसे संपर्क करे।

सूत्रों के अनुसार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने केंद्र सरकार से कहा है कि यदि वह नक्सलियों के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाना चाहती है तो उक्त नंबर पर 25 फरवरी को संपर्क करें।

किशनजी ने कहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को नक्सलियों से 9734695789 पर गुरुवार अपराह्न ठीक पांच बजे बात करनी होगी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंगलवार को नक्सलियों के लिए एक फैक्स नंबर जारी किया था। मंत्रालय ने कहा था कि इस नंबर पर वे सरकार से सीधे संपर्क कर सकते हैं।

नक्सलियों की शर्त में शामिल 14 में से दो ग्रामीण जेल से रिहा

जमशेदपुर ! २० फरवरी । झारखंड में नक्सलियों द्वारा अपहृत धालभूमगढ़ के बीडीओ प्रशांत कुमार लायक की रिहाई के एक दिन बाद आज पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला की एक अदालत ने राज्य सरकार की पहल पर माओवादियों की मांग में शामिल जेल में बंद 14 लोगों में से एक महिला समेत दो को जमानत पर रिहा कर दिया !अपर जिला न्यायाधीश एम एम सिंह की अदालत ने श्रीमती जश्मी मार्डी तथा उसके पिता बहादुर मार्डी को जमानत पर रिहा कर दिया ! पुलिस ने सरकार के निर्देश पर की गयी पुनर्जांच में पाया कि जश्मी के पुलिसकर्मी पति रामराय हेम्ब्रम ने इन्हें पिछले साल हुई अपने भाई की हत्या के मामले में गलत तरीके से पंसाया है ! अदालत को नये सिरे से यह जानकारी मिलने के बाद दोनों को रिहा कर दिया गया !ज्ञातव्य है कि नक्सलियों ने गत 13 फरवरी को श्री लायक को उनके कार्यालय से अगवा कर लिया था1 उन्होंने इसके बदले में उक्त दोनों समेत जेल में बंद 14 लोगों को रिहा करने की मांग की थी ! उन्होंने कहा था कि ये सभी लोग झूठे मामलों में फंसाये गये हैं ! 17 फरवरी को मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पहल पर इनके मामलों की पुनर्जांच शुरू की गयी थी ! इस बीच पुलिस सूत्रों ने बताया कि नक्सलियों की सूची में शामिल कुछ अन्य ग्रामीणों को भी जल्द ही रिहा किया जा सकता है !

बीजापुर 4 संघम सदस्य गिरफ्तार

बीजापुर ! आपरेशन ग्रीन हंठ के तहत बीजापुर पुलिस को दो अलग-अलग क्षेत्र व मामलों में चार संघम सदस्यों को गिरफ्तार करने में सफलता मिली है। पुलिस कप्तान अविनाश मोहंती के कुशल मार्ग निर्देशन में ग्राम मारूढ़बाका के जंगलों में पूनेम भीमा 25 को गिरफ्तार किया गया। पुलिस थाना उसूर से डीएफ एवं एसपीओ की संयुक्त पार्टी मारूढ़बाका क्षेत्र के जंगलों में सघन गश्त अभियान में जुटी थी, इस दौरान नक्सलियों से दो बार मुठभेड़ हुआ। दोनों ओर से गोलीबारी हुई। पुनेम भीमा के पास एक माइक सेट, एक सोलर प्लेट, नाच पार्टी का सामान, राशन को पुलिस ने जब्त किया।पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि एक अन्य घटना थाना मिरतूर क्षेत्र में घटित हुई। डीएफ एवं सीआरपीएफ 195 की संयुक्त पार्टी मिरतूर थाना से कोंदापाल के घने जंगलों में सर्चिंग एवं मूव्मेटिंग के लिए निकली थी। पुलिस पार्टी ने कोंदापाल के पहाड़ी इलाके में नक्सलियों की बैठक की सूचना पर घेराबंदी की। पुलिस को देख नक्सलियों ने फायरिंग शुरू की पुलिस ने जबाबी फायरिंग की। पुलिस ने कोम्दापाल के जंगलों से दामा कड़ियम, लालू कड़ियाम एवं मनकू कड़ियाम को गिरफ्तार किया है। बताया गया तीनों सक्रिय संघम एवं ग्राम कोंदापाल के ही रहने वाले थे और पुलिस को लंबे समय से इनकी तलाश थी। पुलिस ने बताया कि 5 अपराधों में तीनों आरोपी संलग्न थे। मिरतूर थाना में अपराध पंजीबध्द किया गया। धारा 147, 148, 149, 302, 121, 123, 124 आईपीसी 25-27 आर्म्स एक्ट, 3-4 विस्फोटक अधिनियम के तहत अपराध कायम किया गया।

दो इनामी संघम सदस्य गिरफ्तार

बीजापुर ! पुलिस ने कड़ेनार के बियावान जंगलों में दो इनामी संघम सदस्यों को गिरफ्तार किया है। एिएसपी बीपी राजभानू ने सिटी कोतवाली में आयोजित पत्रकार वार्ता में बताया कि बीजापुर पुलिस ने धक्का राजू आयूष 19 एवं हाक्का अंग मासा 252 मासा को कड़ेनार के जंगलों में गिरफ्तार किया है। दोनों नक्सली जांगला थाना के नैमेड़ साप्ताहिक बाजार में एसपीओ की हत्या, तुमनार सड़क निर्माण में 6 ट्रेक्टरों को आग के हवाले करने, मोसला में पुलिस गश्त दल पर हमला एवं घुमड़ा में पुलिस सर्चिंग के दौरान हमला में शामिल थे। पुलिस को इनकी तलाश थी।

बीजापुर कोतवाली, डीएफ एवं एसपीओ की संयुक्त गश्त दल 22 फरवरी की दरम्यानी रात्रि रूटीन गश्त पर कड़ेनार के जंगलों में निकली। सूचना मिली थी कि उसी क्षेत्र में नक्सली सहयोगी, संघम, इनामी सदस्य मीटिंग कर किसी योजना को अंजाम देने के फिराक में है। पुलिस ने घेराबंदी कर हपका राजू एवं हपका मंगू को गिरफ्तार किया। बताया गया कि जांगला थाना में धारा 147, 148, 149, 302, भादवि 25-27 आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया दोनों नक्सलियों की सीजेएम कोर्ट बीजापुर में पेश किया गया, दोनों को दंतेवाड़ा जेल भेजा गया।( देशबंधु, बस्तर, २४ फरवरी, २०१०)

संघर्ष विराम का प्रस्ताव

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह बड़ी राहत है कि माओवादियों की ओर से संघर्ष विराम का प्रस्ताव आया है। बीते दिनों प. बंगाल व झारखंड में नक्सलियों ने भयंकर उत्पात मचाया। यूं भी आए दिन कहींन कहींनक्सलियों की विनाश लीला चलती ही रहती है। शहरी क्षेत्रों के निवासियों के लिए नक्सल समस्या सिर्फ उतनी ही है जितने की जानकारी उन्हें अखबार, टीवी या रेडियो के माध्यम से मिलती है। बेकसूर ग्रामीणों की मौत या डयूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की शहादत थोड़े देर का क्षोभ, दुख उत्पन्न करती हैं। किंतु जिन इलाकों पर नक्सलियों ने अपने गढ़ बना रखे हैं, वहां के निवासियों के लिए नक्सल समस्या इस तरह की है कि आज मौत नहींआई तो जीवनदान मिल गया। वे जान हथेली पर रखकर चलते हैं, उन्हें पता नहींरहता किकब वे नक्सलियों की हिंसा का शिकार बन जाएंगे या पुलिस द्वारा उनकी मदद के लिए प्रताड़ित किए जाएंगे। केवल आदिवासियों या ग्रामीणों के लिए स्थिति दूभर है, ऐसा नहींहै। उन इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों की जान भी हरदम सांसत में रहती है। गत दिनों शिल्दा कैंप पर हुए हमले के बाद एकशहीद जवान का मार्मिक पत्र एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुआ। इसमें वर्णन है कि किस तरह वे रोजाना मौत का सामना करते हैं। इसलिए जब माओवादी 72 दिन के लिए ही सही पर संघर्ष विराम की बात करते हैं तो उम्मीद की किरण दिखती है कि कुछ वक्त के लिए ही सही पर बेकसूर जानें नहींजाएंगी। हालांकि संघर्ष विराम की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही नक्सलियों ने लालगढ़ के पास नरछा गांव में सीआरपीएफ की चौकी पर हमला बोला, इसमें तीन माओवादी मारे गए हैं।
माओवादी यदि सचमुच समस्या का हल चाहते हैं तो उन्हें अपने शब्दों पर कायम रहना आना चाहिए। एक ओर हिंसा रोकने और दूसरी ओर हमला करने से उन पर विश्वास किस तरह बन सकेगा। यह ध्यान रहे कि मौजूदा संघर्ष विराम का प्रस्ताव माओवादी नेता किशनजी की ओर से आया जो अब तक वार्ता के पक्षधर नहींमाने जाते थे। जबकि नक्सलियों का एक गुट सरकार से बातचीत के लिए तैयार था। दो दिन पहले लंबी बैठक के बाद किशनजी ने ही फोन पर संघर्ष विराम की पेशकश की। इसके साथ शर्त यह जोड़ी कि राज्य व केंद्र सरकारें भी अभियान रोकें और आदिवासी इलाकों में विकास कार्य शुरू हो जाएं। यह शर्त नक्सल समस्या की जड़ों की ओर ध्यान दिलाती है। यह तथ्य बारम्बार सामने आया है कि नक्सल समस्या आपराधिक प्रवृत्ति की नहींबल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानता की देन है। इसका स्थाई हल तभी निकलेगा जब उसकी जड़ को खत्म किया जाए। इस संघर्ष विराम के प्रस्ताव में कुछ बुध्दिजीवियों व मानवधिकार कार्यकर्ताओं की मध्यस्थता में बातचीत की पेशकश भी है।
गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने इस माह की शुरुआत में कहा था कि यदि नक्सली हथियार डालें तो वार्ता की जा सकती है। इसी दौरान माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट अभियान भी छेड़ा गया, जिसके जवाब में शिल्दा कैंप पर हमला हुआ। हमले के जवाब में कार्रवाई और कार्रवाई के जवाब में हमले से समस्या का समाधान शायद ही निकले। इसलिए बातचीत का रास्ता सही लगता है। फिलहाल इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार का कहना है कि लिखित प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा, वह भी बिना शर्त के। बुध्दिजीवी व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मध्यस्थता से अगर सचमुच कोई सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद है, तो सरकार को इस प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए। नक्सली यदि सचमुच आदिवासी क्षेत्रों का विकास चाहते हैं और समानता के लिए संघर्षरत हैं तो उन्हें अविचारित हिंसा बंद कर इन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए माहौल बनाने में सहायक होना चाहिए, तभी बेहतर परिणाम सामने आएंगे।

केंद्र को कोई शर्त मंजूर नहीं - नक्सली नेता का शांति प्रस्ताव

नई दुनिया की रपट
उधर शांति की बात, इधर हिंसा इस बीच, हिंसा छोड़ने के प्रस्ताव के ठीक उलट पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के काँटापहाड़ी क्षेत्र में माओवादियों ने सुरक्षा बलों के शिविर पर हमला बोल दिया। माओवादी समर्थक पीसीपीए के सदस्यों और कुछ माओवादियों ने सुरक्षा बलों के शिविर पर अंधाधुँध गोलीबारी की। इस कार्रवाई का सुरक्षा बलों ने करारा जवाब दिया और उनके एक सदस्य को मार गिराया।
बस्तर में २५ को हथियार डालेंगे !
बस्तर में सक्रिय नक्सली संगठन भाकपा माओवादी दक्षिण बस्तर ब्यूरो के रीजनल सेक्रेटरी रमन्ना ने २५ फरवरी से हथियार डालने का ऐलान किया है। इसके बदले में उन्होंने सरकार के सामने कुछ शर्त भी रखी है। नक्सली कमांडर ने फोन पर "नईदुनिया" से कहा कि अब सरकार क्या करती है, उस पर शांति की प्रक्रिया निर्भर होगी। उन्होंने कहा कि किशनजी के बयान से बस्तर के नक्सली सहमत हैं। रमन्ना ने कहा कि उनकी पहल पर सरकार को सकारात्मक ヒख अपनाते हुए शांति का माहौल बनाने की कोशिश करनी चाहिए जिससे बातचीत शुरू हो सके। उन्होंने कहा कि सरकार को आपरेशन ग्रीन हंट बंद करना चाहिए व जेलों में बंद नक्सली नेताओं की निःशर्त रिहाई कर देनी चाहिए। बेगुनाह आदिवासियों की हत्या सरकार बंद करे।
पुलिस सतर्करायपुर (निप्र)। नक्सलियों के युद्धविराम और शांतिवार्ता के प्रस्ताव पर राज्य पुलिस के कान खड़े हो गए हैं। पूर्व अनुभवों के आधार पर राज्य पुलिस के वरिष्ठ अफसर इसे नक्सलियों की चाल मान रहे हैं। पुलिस के रणनीतिकार नक्सलियों के इस पैंतरे की वजह तलाश रहे हैं। नक्सली क्षेत्रों में तैनात अफसरों और जवानों के साथ पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी चौकन्ना कर दिया है। इसके बावजूद आगे की रणनीति के लिए निगाहें केंद्रीय गृहमंत्री पी। चिदंबरम और केंद्र सरकार पर टिकी है। -
केंद्र करे बात - मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़
मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का कहना है कि नक्सलियों से केंद्र सरकार को बातचीत करनी चाहिए। राज्य सरकारें उनसे अलग-अलग बातचीत कर समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं। मंगलवार को विधानसभा परिसर में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि नक्सलियों की सशर्त बातचीत की पेशकश मंजूर नहीं की जानी चाहिए। डॉ. सिंह के मुताबिक पश्चिम बंगाल से किसी नक्सली नेता ने एसएमएस भेज कर बातचीत की पेशकश की है। बातचीत का यह तरीका उचित नहीं है।उधर शांति की बात, इधर हिंसा इस बीच, हिंसा छोड़ने के प्रस्ताव के ठीक उलट पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के काँटापहाड़ी क्षेत्र में माओवादियों ने सुरक्षा बलों के शिविर पर हमला बोल दिया। माओवादी समर्थक पीसीपीए के सदस्यों और कुछ माओवादियों ने सुरक्षा बलों के शिविर पर अंधाधुँध गोलीबारी की। इस कार्रवाई का सुरक्षा बलों ने करारा जवाब दिया और उनके एक सदस्य को मार गिराया।
नक्सली अपना प्रस्ताव फैक्स करें
दिल्ली (प्रे)। माओवादियों द्वारा की गई संघर्ष विराम की घोषणा के बाद सरकार ने मंगलवार को स्पष्ट कर दिया कि वार्ता हेतु उसे कोई शर्त मंजूर नहीं है। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने सरकार का यह रुख स्पष्ट करते हुए कहा- हम माओवादियों से संक्षिप्त और सीधा बयान चाहते हैं कि वे हिंसा छोड़ने को तैयार हैं। उसमें किसी किंतु, परंतु की गुंजाइश नहीं है। वे अपना यह बयान ०११-२३०९३१५५ नंबर पर फैक्स कर सकते हैं। बयान मिलने के बाद मैं प्रधानमंत्री अन्य साथियों के साथ चर्चा कर जवाब दे सकूँगा। लेकिन सोमवार रात ७२ दिन के सशर्त संघर्ष विराम की घोषणा के अगले ही दिन मंगलवार को माओवादियों ने प. बंगाल में सुरक्षा बलों के एक शिविर पर हमला बोला और आंध्रप्रदेश में बीएसएनएल के कंट्रोल रूम में आग लगा दी।- केंद्रीय गृहमंत्री पी। चिदंबरम ने कहा- माओवादी नेता किशनजी जो कह रहे हैं, ऐसी शर्तें नहीं चलेंगी। सरकार ने भाकपा (माओवादी) नेताओं के कई बयान देखे हैं। इसमें प्रामाणिकता नहीं है।किशनजी ने भी दिया नंबर : माओवादी नेता किशनजी ने भी मंगलवार रात अज्ञात स्थान से प्रेट्र को फोन पर कहा- केंद्रीय गृह मंत्रालय को पहल करते हुए संघर्ष विराम की घोषणा करनी चाहिए तथा इसके लिए मीडिया में एक लिखित बयान जारी करना होगा। उस बयान की पड़ताल के बाद हम अपना जवाब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को फैक्स कर देंगे। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम २५ फरवरी को शाम ५ बजे ९७३४६-९५७८९ नंबर पर कॉल कर सकते हैं। हम उनके कॉल का जवाब देंगे।
आंध्र में भी हिंसा
माओवादियों की ओर से हिंसा का मार्ग छोड़ने का प्रस्ताव खोखला दिखाई देता है। माओवादियों ने सोमवार रात आंध्रप्रदेश में विशाखापट्टनम जिले के पेड्डाबैलूर गाँव में बीएसएनएल का कंट्रोल रूम फूँक दिया। इस घटना को एक महिला सहित तीन माओवादियों ने अंजाम दिया।
समर्पण के बाद वार्ता - भाजपा
माओवादियों के प्रस्ताव पर भाजपा ने कहा कि पार्टी उनके साथ वार्ता के पक्ष में है, लेकिन ऐसा करने से पहले उनसे हथियार डलवाना जाना चाहिए। पार्टी के अनुसार आंध्र में पिछली बार माओवादियों के साथ संघर्ष विराम के बाद वार्ता की पहल के नतीजे अच्छे नहीं रहे थे।
हिंसा रोके बिना वार्ता नहीं
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि जब तक माओवादी संगठन हिंसा नहीं छोड़ देते, उनके साथ वार्ता नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वार्ता के पहले माओवादियों से समर्पण कराया जाना चाहिए।वार्ता की मेज पर आएँ दोनों पक्ष : वामदल समर्थक आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक ने माओवादियों के प्रस्ताव पर केंद्र की कड़ी प्रतिक्रिया के मद्देनजर कहा कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे के खिलाफ हथियार रोककर वार्ता की मेज पर आना चाहिए।
प्रस्ताव पर ...
राज्य पुलिस के अफसर फिलहाल इस प्रस्ताव पर आधिकारिक रूप से कुछ भी नहीं कहना चाह रहे हैं, लेकिन राय व्यक्त कर रहे हैं कि नक्सलियों ने यह प्रस्ताव संयुक्त अभियान के दबाव में दिया है। सूत्र कहते हैं कि पहले ऑपरेशन ग्रीन हंट और उसके बाद शुरू हुए संयुक्त अभियान से राज्य में नक्सलियों को झटका लगा है। यह स्थिति तब है जब संयुक्त अभियान छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और उड़ीसा में चल रहा है। अब इसका विस्तार झारखंड, बिहार व प।बंगाल सहित अन्य राज्यों में किया जाना है। पुलिस के रणनीतिकारों के अनुसार नक्सली फिलहाल हमला झेलने की स्थिति में नहीं हैं। इसी वजह से उन्होंने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा है। अफसरों के अनुसार ग्रीन हंट और संयुक्त अभियान शुरू होने से पहले नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में वार्ता की इच्छा जाहिर की थी। इस प्रस्ताव के चक्कर में उन्होंने सरकार और सुरक्षाबलों को करीब महीनेभर तक उलझाए रखा। इस दौरान उन्होंने सुरक्षाबलों और सरकार के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया। इसके बाद अचानक खामोश हो गए। संभवाना है कि इस बार भी नक्सली केंद्र और राज्य सरकार को उलझाने की कोशिश में हों। सूत्रों के अनुसार नक्सली कार्रवाई की तैयारी की आशंका को देखते हुए राज्य पुलिस ने प्रभावित क्षेत्रों के सभी एसपी को पूरी तरह सतर्क रहने का निर्देश दिया है। अफसरों ने कहा कि नक्सलियों ने केंद्र सरकार को वार्ता का प्रस्ताव भेजा है और इस मामले पर केंद्रीय गृहमंत्री श्री चिदंबरम स्वयं नजर रखे हुए हैं। इसकी वजह से इस मामले में जल्दबाजी में कुछ कहना ठीक नहीं होगा। आगे की रणनीति तय करने से पहले केंद्र सरकार के ヒख को भी ध्यान में रखना पड़ेगा।
आंध्रप्रदेश में भी हुई थी कोशिश
पुलिस अफसरों के अनुसार नक्सलियों के सफाए के लिए आंध्रप्रदेश में चलाए गए अभियान के दौरान भी युद्धविराम और वार्ता का प्रस्ताव नक्सलियों की तरफ से रखा गया था। सरकार की सहमति के बावजूद नक्सली वार्ता को राजी नहीं हुए।

संघर्ष विराम का कठिन मार्ग

संघर्ष विराम की ओट में नक्सली संगठन हिंसा की व्यापक तैयारी करना चाहते हैं । संघर्ष विराम सफेद झंडा लहराकर होता है या बंदूक-बम के धमाके से? पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार सहित विभिन्न राज्यों में हिंसक हमले कर रहे माओवादियों ने सरकार के ग्रीन हंट ऑपरेशन को थामने के लिए सशर्त संघर्ष विराम की घोषणा की है। माओवादी कमांडर एम।कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने अपने संगठन के ३० प्रमुख साथियों से विचार-विमर्श के बाद यह पत्ता फेंका है। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि माओवादी गृह मंत्रालय को फैक्स भेजकर लिखित में पेशकश करें और बातचीत के लिए कोई शर्त नहीं हो सकती। उन्होंने पिछले दिनों ऐलान किया था कि माओवादियों के हथियार डालने पर सरकार ७२ घंटे में उनसे बातचीत को तैयार है। माओवादियों ने बड़ी चालाकी से ७२ दिनों के संघर्ष विराम की पेशकश की है। वे चाहते हैं कि इस दौरान पुलिस, अर्द्ध सैन्य बलों की कार्रवाई रोक दी जाए और उन्हें नक्सल प्रभावित इलाकों से भी बाहर कर दिया जाए। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठन और उन्हें समर्थन देने वाले विदेशी आका इसी तरह सैन्य बल हटाने की माँग करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में तो सेना को सीमा पार से उत्प्रेरित हमलों का सामना करना होता है। लेकिन यहाँ तो पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में माओवादी हिंसक संगठनों के घातक हमलों से सामान्य पुलिस और प्रशासन लगभग पंगु स्थिति में पहुँच जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर व्यापक स्तर पर ग्रीन हंट ऑपरेशन के लिए बाध्य होना पड़ा। माओवादी कमांडर किशनजी ने संघर्ष विराम का टोटका तो छोड़ दिया, लेकिन कश्मीर के आतंकवादियों की तरह नक्सली संगठनों और गुटों का कोई एकछत्र नेता नहीं है। इसलिए संघर्ष विराम की गारंटी वह कैसे दे सकते हैं। यही नहीं किशनजी की घोषणा के १२ घंटे के अंदर ही नक्सलियों ने बंगाल के एक हिस्से में पुलिस बल पर घातक हमला किया। पिछले सप्ताहों के दौरान बंगाल, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा से बड़ी संख्या में सामान्य लोग और साधारण पुलिसकर्मी मारे गये, झोंपड़ियाँ और स्कूल की इमारतें जलाई गईं। नक्सलियों के साथ सहानुभूति रखने वाले कुछ प्रगतिशील बुद्धिजीवी ग्रामीण क्षेत्रों में विकास न होने के कारण ऐसी गतिविधियाँ बढ़ने का दावा करते हैं। माओवादियों ने इस बार संघर्ष विराम के साथ ऐसे बुद्धिजीवियों को वार्ता में मध्यस्थ बनाने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन बंदूकों और गोला-बारूद के धमाकों के जारी रहते किस तरह का संवाद और विकास संभव है? गृह मंत्रालय की यह आशंका अधिक ठीक लगती है कि संघर्ष विराम के नाम पर नक्सली संगठन अधिक एकजुटता के साथ अपने ठिकानों को सुरक्षित बना बड़ी हिंसा की तैयारी करना चाहते हैं। संघर्ष विराम के झाँसे में आने के बजाय दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा सैन्य बलों की कड़ी कार्रवाई से प्रभावित क्षेत्रों की सामान्य जनता को राहत दिलाने की आवश्यकता है।
(संपादकीय, नई दुनिया, इंदौर, २४, फरवरी, २०१०)

संघर्ष विराम का कठिन मार्ग

संघर्ष विराम की ओट में नक्सली संगठन हिंसा की व्यापक तैयारी करना चाहते हैं । संघर्ष विराम सफेद झंडा लहराकर होता है या बंदूक-बम के धमाके से? पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार सहित विभिन्न राज्यों में हिंसक हमले कर रहे माओवादियों ने सरकार के ग्रीन हंट ऑपरेशन को थामने के लिए सशर्त संघर्ष विराम की घोषणा की है। माओवादी कमांडर एम।कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने अपने संगठन के ३० प्रमुख साथियों से विचार-विमर्श के बाद यह पत्ता फेंका है। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि माओवादी गृह मंत्रालय को फैक्स भेजकर लिखित में पेशकश करें और बातचीत के लिए कोई शर्त नहीं हो सकती। उन्होंने पिछले दिनों ऐलान किया था कि माओवादियों के हथियार डालने पर सरकार ७२ घंटे में उनसे बातचीत को तैयार है। माओवादियों ने बड़ी चालाकी से ७२ दिनों के संघर्ष विराम की पेशकश की है। वे चाहते हैं कि इस दौरान पुलिस, अर्द्ध सैन्य बलों की कार्रवाई रोक दी जाए और उन्हें नक्सल प्रभावित इलाकों से भी बाहर कर दिया जाए। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठन और उन्हें समर्थन देने वाले विदेशी आका इसी तरह सैन्य बल हटाने की माँग करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में तो सेना को सीमा पार से उत्प्रेरित हमलों का सामना करना होता है। लेकिन यहाँ तो पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में माओवादी हिंसक संगठनों के घातक हमलों से सामान्य पुलिस और प्रशासन लगभग पंगु स्थिति में पहुँच जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर व्यापक स्तर पर ग्रीन हंट ऑपरेशन के लिए बाध्य होना पड़ा। माओवादी कमांडर किशनजी ने संघर्ष विराम का टोटका तो छोड़ दिया, लेकिन कश्मीर के आतंकवादियों की तरह नक्सली संगठनों और गुटों का कोई एकछत्र नेता नहीं है। इसलिए संघर्ष विराम की गारंटी वह कैसे दे सकते हैं। यही नहीं किशनजी की घोषणा के १२ घंटे के अंदर ही नक्सलियों ने बंगाल के एक हिस्से में पुलिस बल पर घातक हमला किया। पिछले सप्ताहों के दौरान बंगाल, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा से बड़ी संख्या में सामान्य लोग और साधारण पुलिसकर्मी मारे गये, झोंपड़ियाँ और स्कूल की इमारतें जलाई गईं। नक्सलियों के साथ सहानुभूति रखने वाले कुछ प्रगतिशील बुद्धिजीवी ग्रामीण क्षेत्रों में विकास न होने के कारण ऐसी गतिविधियाँ बढ़ने का दावा करते हैं। माओवादियों ने इस बार संघर्ष विराम के साथ ऐसे बुद्धिजीवियों को वार्ता में मध्यस्थ बनाने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन बंदूकों और गोला-बारूद के धमाकों के जारी रहते किस तरह का संवाद और विकास संभव है? गृह मंत्रालय की यह आशंका अधिक ठीक लगती है कि संघर्ष विराम के नाम पर नक्सली संगठन अधिक एकजुटता के साथ अपने ठिकानों को सुरक्षित बना बड़ी हिंसा की तैयारी करना चाहते हैं। संघर्ष विराम के झाँसे में आने के बजाय दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा सैन्य बलों की कड़ी कार्रवाई से प्रभावित क्षेत्रों की सामान्य जनता को राहत दिलाने की आवश्यकता है।

(संपादकीय, नई दुनिया, इंदौर, २४, फरवरी, २०१०)

Tuesday, February 23, 2010

किशनजी ने रखा 72 दिनों का प्रस्ताव


कोलकाता। केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा माओवादियों को हथियार डालकर वार्ता के लिए दी गई 72 घंटे की मोहलत पर माओवादी नेता किशनजी ने सोमवार शाम प्रतिक्रिया व्यक्त की। किशनजी ने इस मोहलत को बढ़ाकर 72 दिन किए जाने की शर्त रखी है। 25 फरवरी से 7 मई के बीच की इस अवधि में केंद्र व राज्य सरकार के सुरक्षा बलों की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इस बीच आदिवासी इलाकों में विकास कार्य शुरू होने चाहिए। तब सरकार के साथ शांति वार्ता की स्थितियां बन पाएंगी। किशनजी ने ये बातें एजेंसी से अज्ञात स्थान से किए गए फोन के जरिए कहीं। किशनजी ने कहा है कि अगर समस्या 72 दिनों में सुलझ सकती है, तो यह कोई बड़ा समय नहीं है। बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों और जन संगठनों से मूल समस्या को समझने का अनुरोध करते हुए किशनजी ने कहा है कि वे आगे आएं सरकार से होने वाली बातचीत में बिचौलिए की भूमिका निभाएं। जैसे ही सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा खत्म हो जाएगी, वैसे ही माओवादी भी उसका प्रतिकार बंद कर देंगे। माओवादी नेता ने कहा कि सरकार को हिंसा बंद करने में पहल करनी होगी। पश्चिम बंगाल और झारखंड सीमा पर घने जंगलों में भाकपा की केंद्रीय कमेटी की दो दिन की बैठक के बाद किशनजी ने ये बातें कही हैं।
किशनजी ने कहा कि बंगाल के जंगल महल इलाके में निर्दोष लोगों की हत्या रोककर सरकार अगर वहां पर विकास के सही कार्य शुरू करती है, तो माओवादी अपने-आप शांत हो जाएंगे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा माओवादियों को कायर कहे जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए माओवादी नेता ने कहा कि पिछले एक साल में चार सौ निर्दोष लेकिन हमारे समर्थक ग्रामीणों को सुरक्षा बलों द्वारा मारा जाना, तीन सौ को घायल करना और महिलाओं के साथ बलात्कार करने की घटनाओं से पता चलता है कि कायर कौन है?
गृह मंत्रालय आज अपना रुख स्पष्ट करेगा
नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो : केंद्रीय गृह मंत्रालय में विशेष सचिव यूके बंसल ने कहा है कि माओवादी अगर बिना किसी शर्त के बात करने को तैयार हैं, तो स्वागत है। जबकि गृह सचिव जीके पिल्लै ने मीडिया के माध्यम से आए इस प्रस्ताव पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से इन्कार किया है। मिली जानकारी के अनुसार गृह मंत्रालय में नक्सल समस्या पर विचार के लिए बने कोषांग में माओवादियों की ओर से आए ताजा प्रस्ताव पर विचार शुरू हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को भी माओवादियों के प्रस्ताव की जानकारी दे दी गई है। संकेत हैं कि मंगलवार को गृह मंत्रालय माओवादियों के प्रस्ताव पर अपना जवाब सार्वजनिक कर देगा।

संघर्ष विराम के प्रस्ताव के तत्काल बाद पुलिसकर्मी की हत्या

कोलकाता। जागरण । नक्सली नेता किशनजी द्वारा 72 घंटे के संघर्ष विराम का प्रस्ताव दिए जाने के कुछ ही घंटों के बाद हथियारबंद नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में सोमवार देर रात सुरक्षा बलों के एक शिविर पर हमला कर दिया। इस दौरान पुलिस के साथ मुठभेड़ में एक संदिग्ध नक्सली मारा गया।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि पश्चिम मिदनापुर जिले के कटापहरी इलाके में सोमवार रात लगभग 10।30 बजे नक्सलियों ने पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल [सीआरपीएफ] के शिविर पर हमला किया। दोनों ओर से लगभग दो घंटे तक गोलीबारी हुई।

स्थानीय टेलीविजन चैनलों ने मरने वालों की संख्या तीन बताई है। पश्चिम मिदनापुर के पुलिस अधीक्षक मनोज वर्मा ने आईएएनएस को बताया, 'हमने सिर्फ एक शव बरामद किया है जिसकी पहचान अभी नहीं हुई है। हम शिविर के आसपास खोजी अभियान चला रहे है।'

पुलिस महानिरीक्षक [पश्चिमी क्षेत्र] कुलदीप सिंह ने कहा, 'हमें खबर मिली है कि तीन संदिग्ध नक्सली मारे गए है। परंतु अब तक हमने सिर्फ एक शव बरामद किया है। इलाके से कुछ हथियार भी बरामद किए गए है।'

उधर, कुछ अन्य खबरों में कहा गया है कि बरामद किया गया शव पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ नागरिक समिति के नेता लालमोहन टुडू का है।

Monday, February 22, 2010

माओवाद से प्रभावित हो रहा पर्यटन

भुवनेश्वर। उड़ीसा में दिन प्रतिदिन बढ़ रहे माओवादियों के हिंसाकांड का सीधा असर पर्यटन विभाग पर पड़ रहा है। राज्य के आदिवासी प्रवण इलाकों में स्थित पर्यटन स्थलों में पर्यटकों की संख्या में काफी कमी देखने को मिली है, जो कि राज्य पर्यटन विभाग के लिए चिन्ता का विषय बन गया है। प्राप्त जानकारी अनुसार मयूरभंज जिला में स्थित शिमिलीपाल अभयारण्य को इस साल पर्यटकों के लिए नहीं खोला गया है। खासकर ठंडी व गर्मी के दिनों में यहां पर्यटकों की खासी भीड़ लगती है। इस समय तक हजारों पर्यटक शिमिलीपाल आते है, परन्तु इस साल पर्यटकों के लिए अभयारण्य बंद हो जाने के कारण इन पर निर्भर करने वाले लोगों के जीविका पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष पर्यटन ऋतु से पहले ही यहां माओवादियों का उत्पात चरम पर पहुंच गया। इनके ताडंव लीला से यहां पर्यटकों का आना तो दूर की बात है जंगल विभाग के कर्मचारी भी यहां काम करने के लिए साहस नहीं जुटा पा रहे है। माओवादियों ने जिन अतिथि गृह व दफ्तर इत्यादि नष्ट किए है, उनका अभी तक मरम्मत भी नहीं हो पाया है। शिमिलीपाल के अन्दर जाने के लिए जंगल विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय की अनुमति आवश्यक होती है, परन्तु इस साल एक भी व्यक्ति को प्रवेश के लिए अनुमति पत्र नहीं दिया गया है। वर्षा ऋतु के बाद यहां के रास्तों की मरम्मत होनी चाहिए, मगर वह भी आज तक नहीं हो पायी है।यह स्थिति केवल शिमिलीपाल ही नहीं अविभक्त कोरापुट में भी अनुरूप स्थिति देखने को मिली है। इस जिला में स्थित प्रसिद्ध शिवालय गुप्तेश्वर को पिछले साल की तुलना में काफी कम यात्री आए है। यहां नक्सल उपद्रव के साथ पुलिस बल के कुम्बिंग ऑपरेशन से जो आतंक बना है, उसकी वजह से बाहर राज्यों के पर्यटकों को आना तो दूर की बात है, राज्य के यात्री भी गुप्तेश्वर जाने से डरते है। यहां यह बताना उचित होगा कि गुप्तेश्वर व शिमिलीपाल केवल उदाहरण है। राज्य के कुछ अन्य माओ प्रभावित इलाका जैसे कि बडरमा, बाइसीपल्ली, करलापाट, कोटगड़, सातकोशिया, सोनाबेड़ा आदि जगहों पर पर्यटकों की संख्या में काफी कमी आने की बात पता चली है। गौरतलब है कि उड़ीसा के शिमला जैसे स्थान माने जाने वाले फुलवाणी के दारिंगीबाड़ी को राज्य व राज्य के बाहर से काफी मात्रा में पर्यटक पहुंचकर हर साल प्रकृति के सौंदर्य का उपभोग करते थे, मगर यहां पर बढ़ते माओवादियों के आतंक व हिंसाकाण्ड से डरने की वजह से ज्यादातर पर्यटक उड़ीसा नहीं आ रहे है।

बस्तर में जनसमस्या निवारण शिविर


दंतेवाड़ा. ब्लाक कटेकल्याण की पंचायत मोखपाल में लगे जनसमस्या निवारण शिविर में ये बातें कलेक्टर रीना कंगाले ने कही। उन्होंने कहा मुख्यालय में बैठकर योजनाओं की समीक्षा करने से ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं की सही स्थिति का पता नहीं चल पाता । शिविरों के माध्यम से जिला स्तरीय अधिकारियों को भी उनके विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन एवं लोगो की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिलता है। सरपंच मोखपाल विनोद सोरी ने कहा लोगो से कहा शिविर में मांग व समस्या बताएं जिससे उनका त्वरित निराक रण हो सके।मांग व समस्याओं से संबंधित मिले 148 आवेदन में से 83 का निराकरण किया गया। राष्ट्रीय परिवार सहायता योजनांतर्गत 6 हितग्राहियों को 10-10 हजार रूपये की आर्थिक सहायता राशि के चेक अतिथियों ने वितरित किए। क्षेत्र के भावना, चेतना, विकास, आदर्श, जयदेवा व मां शीतला देवी स्व सहायता समूहों को आर्थिक गतिविधियां संपादित करने हेतु 10-10 हजार रूपये के चेक दिए गए। 10 कृषकों को उड़ावनी पंखा, 4 को स्पे्रयर एवं 6 को लोलिफ्ट पंप सेट मिला। उद्यान विभाग ने प्याज, बैंगन, मिर्ची व लौकी बीज के मिनीकिट्स दिए गए। कलेक्टर ने महिला व बाल विकास विभाग ने 3 गर्भवती माताओं की चांवल एवं श्रीफल से गोदभरी और तीन नौनिहालों को खीर खिलाकर अन्नप्राशन किया। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा आयोजित कला जत्था के माध्यम से लोगों को जीवन में स्वच्छता के महत्व का संदेश नाटक प्रस्तुत कर दिया । स्वास्थ्य एवं आर्युर्वेद विभाग के डाक्टरों ने स्वास्थ्य परीक्षण कर नि:शुल्क दवा दी। इस अवसर पर नवनिर्वाचित जनपद सदस्य कटेकल्याण जनपद पंचायत श्रीमती लक्ष्मी कुंजाम, छन्नूराम सोरी,चमन कुंजाम, अपर कलेक्टर ईमिल लकड़ा, एसडीओ अजय यादव सहित में ग्रामीण उपस्थित थे।

आदिवासियों को हथियार न बनाया जाए

नई दिल्ली. 22 फरवरी. उच्चतम न्यायालय ने नक्सलियों से निपटने के नाम पर दलितों और आदिवासियों को सुरक्षा बलों द्वारा निशाना बनाए जाने को लेकर केंद्र सरकार की आज आडे हाथों लिया। न्यायमूत बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूत एस एस निार की खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की याचिका की सुनवाई के दौरान कहा नक्सलियों के खिलाफ अभियान के नाम पर क्या सभी प्रकार के आदेश की अनुमति दी जानी चाहिए। हम यह जानना चाहते हैं कि आखिर क्यों इस तरह की घटनाएं होती हैं। खंडपीठ ने कहा कि नक्सलियों से कथित तौर पर सहानुभूति जताने वालों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जो उचित नहीं है। न्यायालय ने कहा कि पहले सरकार कहती है कि नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। फिर वह कहती है कि नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उसके बाद यह कहेगी कि नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले से जुडे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। आखिर यह सब है क्या। इससे पहले, केंद्र सरकार ने न्यायालय को अवगत कराया कि केंद्र सरकार देश के नक्सल प्रभावित राज्यों में विकास कार्यों के लिए 7300 करोड़ रुपये की योजना के अमल पर विचार कर रही है। अटर्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती ने दलील दी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को हरी झंडी दे दी है. लेकिन सरकार नक्सलियों के हस्तक्षेप की वजह से इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर संशय की स्थिति में है। श्री वाहनवती ने कहा कि सरकार जल्दी ही इन योजनाओं का लेखा-जोखा हलफनामे के रूप में न्यायालय को सौंपेगी। उच्चतम न्यायालय ने मामले की पिछली सुनवाई के दौरान कहा था कि सरकार नक्सली समस्या का समाधान हथियारों के बजाय विकास कार्यों से करे।

A Khaki Shudra To Our New Brahmins

I’m aware that I suffer from multiple handicaps as I stand to defend myself and my police force for planning and executing ‘Operation Green Hunt’ against the Maoist insurgents in the dense jungles of Bastar। I’m acutely aware of the truth of a metaphor I flippantly coined many years ago—that in India’s transformed caste system of today, a policeman is a Shudra, someone to be ridiculed, shouted at, spat upon। Over the years, I have expanded the Shudra label to include writers, poets, intellectuals, journalists and teachers from mofussil towns—what I mean is, those who essentially know and think in Hindi or other regional languages of India। And, by extension of that metaphor, who are the Brahmins? The Anglophile Indians are the Brahmins—those who write and think in English, those who teach in the colleges of Delhi and other big cities। And I, unfortunately being a Hindi poet, can only claim to be a counterfeit poet। Therefore, as policeman and Hindi poet, I’m a double Shudra.





According to ancient Indian jurisprudence, as a Shudra, my evidence is of little value. A Shudra’s cry is a cry in the wilderness. An allegation against a Shudra needn’t be proved; it’s the Shudra who must prove his innocence. Despite the heavy odds, I must still defend myself and my force.
I would like to begin with what Operation Green Hunt is all about। It should not be confused with the operation launched jointly by the central police organisations and the Chhattisgarh police in specific areas of Bastar.

One of the tasks undertaken by the Chhattisgarh police as part of Operation Green Hunt is the large-scale removal of mines laid in public places by the Maoists। Lots of policemen were losing their lives or having their limbs blown off in large swathes of Bastar mined by the Maoists. It’s strange that human rights bodies have never spoken against the mining of roads, farms, jungles and public places by the Maoists.

The second task was to identify and take control of ambush points favoured by the Maoists. This, too, has been largely successful and police casualties have dropped dramatically.
The third task was to conduct intelligence operations to help break up Maoist camps, where cadres are trained in military tactics and field manoeuvres। And our final goal was to win over the minds and hearts of people by organising jan jagaran meetings at weekly tribal markets. They were meant to wean away tribals from the Maoist ambit of influence. From meetings at weekly markets, we expanded the programme into jan jagaran abhiyans in the towns and villages.

What seems to have angered the Maoists the most about Operation Green Hunt are the last two goals। They realised the police programme was effective and villagers were sharing their concerns with the police. So they reacted in the only way they know—by stepping up the terror tactics. Many innocent tribals were killed after having been declared “police informers”. But the Maoists soon realised this was becoming counter-productive, for it was making people respond favourably to the jan jagaran abhiyan.

They changed tactics। The police have since August 2009 been receiving credible intelligence about Maoist designs to oppose Operation Green Hunt by killing tribals or committing other atrocities and then blaming the security forces.

The truth about these inputs was confirmed in a letter dated September 10, 2009, issued by the subcommittee of mass organisations (SUCOMO) of the CPI (Maoist) and seized by the police। The party asked its mass contact groups to launch propaganda at the all-India and state levels about alleged atrocities committed by the security forces. It said such propaganda should include criticism of efforts to crush the revolutionary movement through massive deployment of force. It encouraged flexible methods—from agitations to seminars and signature campaigns—and sought to influence sympathisers into bringing pressure on the upa government, the US, and Indian embassies abroad, all aimed at getting Operation Green Hunt called off.

It isn’t hard to see why criticism of the Salwa Judum at the national and international levels increased after the CPI (Maoist) politburo decided in April 2006 to hit it in all ways। It isn’t hard to see either why the attack on Operation Green Hunt has increased after the SUCOMO letter of appeal and instruction. These two ‘soft’ strategies have resulted in the state and its police officers being dragged to court.

The Supreme Court is hearing the petition of Sodi Sambo, who was shot in the leg, allegedly by a security personnel, so it will be wrong on my part to comment। But let me state that the Chhattisgarh police is not generally known for fake encounters or killing of innocents. If it believed in extra-judicial killing, the prisons wouldn’t be full of arrested Maoist leaders and cadres. This isn’t to say occasional aberrations might not occur. Whenever such instances are brought to the notice of SPs, action has always been taken: in Bastar alone, 25 cases have been registered against police officers and spos from 2005 on. Only a few of these were registered on the directions of the NHRC. Ten have already resulted in chargesheets, with the accused cops being sent to jail. Some cases pertain to rape, murder, rioting. If such cases against policemen could be registered, investigated and taken for trial by local police, how can one accept that the Chhattisgarh police acts in partisan manner? Individual aberrations cannot be drawn to brand the force a “bunch of hoodlums”.

My police will continue its battle against the Maoist cadres। We will fight them on the ideological plane as well as on the field out of our belief in a liberal socialist democracy and the rule of law. We are bound by oath to protect the Constitution of India. We will fight because the fight has been forced on us by a group that openly declares in its book, Strategy and Tactics of Indian Revolution, that “the seizure of power by armed force, the settlement of the issue by war, is the central aim and highest form of revolution”. If this is their main aim, it leaves the security forces very few options. The only difference is that we will be fighting within the constraints of the law of the land, while the Maoists are free to use both legal and illegal means. We have accepted this and will still fight anyone who intends to jettison our Constitution and replace it with a totalitarian system of whatever shade.

To the metropolitan Brahmins, my assertion may be of little value. A Shudra’s testimony is a cry in the wilderness।
विश्वरंजन,
डीजीपी, छत्तीसगढ़
आउटलुक, दिल्ली से साभार

माओवादियों ने रखी केंद्रीय बलों को हटाने की शर्त



मिदनापुर ! माओवादी नेता किशन जी ने पश्चिम बंगाल में संघर्ष विराम के लिये केंद्रीय गृह मंत्रालय के समक्ष जंगलमहल इलाके के तीन जिलों पश्चिमी मिदनापुर बांकुरा और पुरूलिया से केंद्रीय सुरक्षा बलों को 25 फरवरी से 72 दिनों के भीतर हटाने की शर्त रखी है !किशन जी ने आज दूरभाष पर कहा इस अवधि के दौरान हम कोई भी कार्रवाई नहीं करेंगे ! हम 72 घंटों तक संघर्ष विराम के केंद्रीय गृह मंत्री पी। चिदंबरम के प्रस्ताव का भी स्वागत करते हैं1 अगर सरकार हमारे खिलाफ चल रहे अभियान को 72 दिनों तक बंद रखती है और सुरक्षा बलों को उक्त जिलों से हटा लेती है तो हम भी हिंसा का रास्ता छोडने के लिये तैयार हैं ! गत 20 फरवरी को श्री चिदंबरम ने माओवादियों के साथ इस शर्त पर बातचीत करने की पेशकश की थी कि वे अगले 72 घंटों तक हिंसा नहीं करेंगे जिसके बाद आज माओवादियों ने सरकार के सामने यह शर्त रखी है !


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी ने सरकार के बातचीत के प्रस्ताव को ठुकराते हुए इसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है। भाकपा माओवादी की केन्द्रीय समिति की आज जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि पहले तो सरकार को खुद संविधान का पालन करते हुए आदिवासियों और सताए हुए लोगों की हत्या, बलात्कार, अपहरण और यातना देना बंद करना चाहिए। इसके बाद ही उसे माओवादियों के सामने बातचीत का प्रस्ताव रखने या उनसे हिंसा छोड़ने के लिए कहने का हक है। विज्ञप्ति में फर्जी आरोपों में पकडे ग़ए सभी लोगों की रिहाई की मांग की गई। इसमें कहा गया कि सरकार आदिवासियों और अन्य लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन रोके और इस तरह का जुल्म करने वालों को सजा दे। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक कोई भी बातचीत निरर्थक होगी।

Maoists Offer 72-Day Conditional Ceasefire


The Maoists tonight made a conditional ceasefire offer asking the government to halt the offensive against them for 72 days and involve mediators for talks."State governments and the Centre should not indulge in violence between February 25 and May 7 and concentrate on development of tribal areas which will be reciprocrated by Maoists, " top Maoist leader Kishenji said over phone from an undisclosed location.He was responding to Union Home minister P Chidamabaram's statement last week that if the Maoists halted violence for 72 hours the government would be ready for talks with them.In New Delhi, a Union Home Ministry official said the Government was "studying" the Maoist offer and will come with a response at an "appropriate time". Another official said if the offer is unconditional then the government may consider it.Kishenji said, "This is not a problem of 72 hours rather it can take 72 days to solve the problem."Appealing to intellectuals and human rights organisations to come forward as mediators, he said, "We appeal to all the intellectuals, human rights organisations and mass organisations, the organisations which understand the cause of the people and want to stand by their side to mediate with the government and negotiate with the government.""As long as state sponsored terrorism and violence remains stopped we will renounce our revolutionary revenge," Kishenji said."We will cease violence hour wise and day wise considering the state's reciprocation. They will have to take the initiative first," Kishenji said after a two-day Central Committee meeting in deep jungles on the Bengal-Jharkhand border."The Centre and the state should stop their non-stop violence on the common people in the name of Maoists and we assure to renounce violence.""If the state and central government without killing innocent and poor tribals concentrate on development of the people in the villages and in jungle mahal (Maoist-hit areas in West Midnapore, Bankura and Purulia districts) only then can this revenge and counter revenge, violence and counter violence be neutralised," Kishenji said.Reacting to President Pratibha Patil terming Maoists as 'cowards', the Maoist leader claimed "in the last one year, 400 of our members and innocent villagers have been killed, 300 of them have been injured by paramilitary forces. Women have been raped and people have been made homeless.""This is enough to define who are cowards," he said.Home Secretary G K Pillai refused to comment but a spokesman of his ministry said the Government's reaction will be known tomorrow.Congress spokesman Abhishek Singhvi said Maoists can't have conditionalities attached which will make the whole ceasefire meaningless.Singhvi also said, "Distinction has to be made between those who practice violence for criminal acts and those who have to do some violence to combat that violence. Let us not equate these two kinds of violence."Trinamool Congress leader and Railway minister Mamata Banerjee did not want to comment saying the Union Home Minister is looking into it."I haven't received any communication...I have to depend on what the government is saying because the home minister is taking care of that," she added.

छह नक्सली सहयोगी गिरफ्तार

राजनांदगाँव । छह लोगों को मानपुर पुलिस ने धर दबोचा। मानपुर के बसस्टैंड पर पुलिस ने घेराबंदी कर उनको गिरफ्तार किया। आरोपियों के पास से काफी मात्रा में सामग्री भी बरामद की गई है। वे यह सामग्री नक्सलियों के पास पहुंचाने के लिए तेरेगांव जंगल जा रहे थे। पुलिस ने आरोपियों को अंबागढ़ चौकी के न्यायालय में पेश किया जहां से उन्हे रिमांड पर जेल भेज दिया गया। मानपुर पुलिस से प्राप्त जानकारी अनुसार सोमवार को मानपुर का बाजार लगता है। इस दौरान सभी छह आरोपी बसस्टैंड पर उपस्थित थे। सूचना मिलने पर पुलिस ने घेराबंदी की। इसके लिए मानपुर के टीआई एचपी नायक, एएसआई गभरू चंदेल, प्रधान आरक्षक अनवर अली व अन्य जवानों ने नक्सली सहयोगियों को धर दबोचा। उनके अनुसार नक्सलियों के सहयोग के लिए सामान लेकर वे मोहला होते हुए तेरेगांव जंगल जाने वाले थे। पुलिस के अनुसार नक्सली सहयोगियों में जक्के निवासी नम्मूराम (२८) पिता सगनूराम लोहार, रामप्रसाद (५०) पिता परशुराम गोंड़, कुमरकट्टा निवासी वीरसिंह (३०) पिता सुकालूराम गोड़, शिवरूराम (२७) पिता जंगलसिंह गोंड़, लखन सिंह (२८) पिता रजऊ गोंड़ व पन्नाराम (५५) पिता संकेर गोंड़ शामिल हैं। वीरसिंह के पास से दो बंडल तार व बड़ी मात्रा में दवाइयां, लखन सिंह के पास से एक किलो जिलेटिन व टिपिᆬन डब्बे बरामद किया गया है। मानपुर पुलिस ने बताया कि आठ-नौ माह पूर्व नक्सली मुठभेड़ में नम्मूराम भी शामिल होकर नक्सलियों का सहयोग कर रहा था, जिसके खिलाफ पहले से जुर्म पंजीबद्घ है। उसकी तलाश लंबे समय से की जा रही थी। सभी आरोपियों को सोमवार को अंबागढ़ चौकी स्थित न्यायालय में पेश किया गया।सभी को रिमांड पर जेल भेज दिया गया है। आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा १४७, १४८, १४९, ३०७, २५-२७ आर्म्स एक्ट व विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा ३, ५ के तहत जुर्म पंजीबद्घ किया गया है।

मुठभेड़ में एक नक्सली ढेर,चार पकड़े गए

बीजापुर। पुलिस ने बीजापुर जिले के मिरतूर और उसूर थाना क्षेत्रों में घेरेबंदी कर चार नक्सलियों को धर दबोचा। इनके पास से सोलर सेट, एम्प्लीपᆬायर और लाऊड स्पीकर बरामद किए गए हैं। दंतेवाड़ा जिले के भेज्जी थाना क्षेत्र में पुलिस ने एक वर्दीधारी नक्सली को मार गिराया। एसपी दंतेवाड़ा अमरेश मिश्रा ने बताया कि भेज्जी थाना क्षेत्र के मैलासुर गांव के पास सोमवार को दोपहर सर्चिंग पर निकले पुलिस जवानों व एसपीओ के दल पर नक्सलियों ने फायरिंग की। इसके जवाब में जवानों ने भी गोली चलाई। मुठभेड़ लगभग एक घंटे तक चली। बाद में नक्सली भाग खड़े हुए।
मौके से पुलिस ने एक वर्दीधारी नक्सली का शव बरामद किया है जबकि अन्य नक्सलियों के भी मारे जाने की संभावना है। पुलिस ने वहां से डेटोनेटर बम व मजल लोडिंग गन बरामद किया है। एएसपी राजभानू ने बताया कि मिरतूर थाने से सोमवार की सुबह डीएपᆬ के जवानों के साथ एसपीओ का दल सर्चिंग में कोण्डापाल गया था। यहां नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। पुलिस ने घेरेबंदी कर नक्सली श्रीराम कड़ियाम(३९) पिता मंगू, लालू कड़ियाम (२५) पिता पण्डरु और मनकू कड़ियाम(३७) पिता दुला को पकड़ा। कोण्डापाल निवासी ये तीनों नक्सली पिछले तीन वर्षों से हत्या, हत्या का प्रयास आदि के पांच मामलों में शामिल थे। इनकी पुलिस को तलाश थी।
एसडीओपी अशोक सिंह ने बताया कि उसूर थाने से डीएफ और सीएएएफ के जवानों के साथ एसपीओ का एक दल रविवार की सुबह मारुड़वागा में नक्सलियों का कैम्प होने की सूचना पर रवाना हुआ था। रास्ते में मारुड़वाया के समीप जब पुलिस पहुँची तो नक्सलियों ने पᆬायरिंग शुヒ कर दी। यहां करीब पंद्रह मिनट तक मुठभेड़ हुई। इसके बाद नक्सली भाग गए।
यहां से पुलिस जब आगे बढ़ी तो वहां नक्सलियों का एक कैम्प था। यहां घेरेबंदी कर एक नक्सली भीमा पुनेम (२५) को पुलिस ने पकड़ा। वह कैम्प की रखवाली के लिए तैनात किया गया था। कैम्प से पुलिस ने डीवीडी, एंपलीफायर, सोलर बैटरी सेट, स्पीकर, नृत्य दल का सामान, नक्सली साहित्य व रोजमर्रा की जरुरतों के सामान बरामद किए। (नई दुनिया से)

नक्सली मोर्चे पर धन की बारिश


शिल्दा कांड के सबक

पश्चिम बंगाल के अखबारों से
दीपक रस्तोगी
पश्चिम बंगाल के शिल्दा में पुलिस कैंप पर माओवादियों के हमले के बाद मिले सबूतों से साफ हो रहा है कि नक्सलियों की महिला दस्ते की कुछ सक्रिय कैडरों का उस कैंप में बतौर यौनकर्मी आना-जाना था। इस तरह की सूचनाओं से मुख्यमंत्री से लेकर तमाम अधिकारी बौखला गए हैं और आनन-फानन में जांच बैठा दी है। केंद्र सरकार की टीम अपने स्तर पर छानबीन में जुटी है। वहां लापरवाही बरती गई। इससे किसी को इंकार नहीं। बांग्ला दैनिक "बर्तमान" लिखता है कि इस तरह की जानकारियों को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दबाव के चलते मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का सुर नरम हुआ है। अन्यथा बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी गलतियां मानने वाले कॉमरेडों में से नहीं हैं। दैनिक "आनंदबाजार पत्रिका" लिखता है कि शिल्दा कांड में राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव के बीच मतभेद भी उजागर हुए हैं। अंग्रेजी दैनिक "द टेलीग्राफ" लिखता है कि ऐसी ही खामियों के चलते नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की कवायद का नतीजा सिफर रहा है।

नक्सली संघर्ष विराम को तैयार

न लालग़ढ़ में सुरक्षा बलों का अभियान जारी रहेगा
कोलकाता। नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन ग्रीन हंट रोकने पर माओवादी अपनी ओर से ७२ दिनों का संघर्ष विराम कर देंगे । पश्चिम बंगाल के लालग़ढ़ और आसपास के इलाकों में सक्रिय माओवादी कमांडर एम कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने सरकार से बातचीत के लिए अपनी ओर से यह शर्त रखी है। केन्द्रीय गृह मंत्री चिदंबरम ने शिल्दा कांड के बाद कहा था कि नक्सलियों के हथियार डालने के ७२ घंटों के भीतर सरकार उनसे बातचीत करेगी। गृह मंत्री के इसी बयान को लेकर मेदिनीपुर से ४० किमी दूर कनाईशोल के जंगलों में पिछले दो दिनों से नक्सली संगठन सीपीआई (माओइस्ट) की केन्द्रीय कमेटी के ३० सदस्यों की बैठक चल रही थी। सोमवार को किशनजी ने कहा, ऑपरेशन ग्रीन हंट रोकने की प्राथमिक शर्त अगर सरकार मान लेती है तो इसके ७२ दिनों के बाद बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मध्यस्थता में वे लोग वार्ता को तैयार हैं। माओवादियों की ओर से ऐसे प्रस्ताव पहले भी आए हैं। केन्द्र और पश्चिम बंगाल की सरकार शुरू से ही सशर्त बातचीत की संभावना से मना करती रही हैं। कई बार गृह मंत्री चिदंबरम और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा भी कि संघर्ष विराम का प्रस्ताव बिना शर्त हो तभी कोई विचार होगा। माओवादियों को पहले हथियार डालना होगा। माकपा की ओर से पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम और भाकपा के सांसद गुरुदास दासगुप्ता ने कहा है कि माओवादी हथियार डालें, तभी बातचीत होनी चाहिए। बंगाल के मुख्य सचिव अशोक मोहन चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया है कि लालग़ढ़ में सुरक्षा बलों का अभियान जारी रहेगा। यह जरूर है कि खुली जगहों पर स्थित पुलिस के शिविर हटाए जा रहे हैं। शिल्दा कांड के बाद कई बार गृह मंत्री और मुख्यमंत्री ने सुरक्षा बलों का अभियान जारी रखने के बयान दिए और माओवादियों से हथियार रखने की अपील की। इन बयानों की आलोचना करते हुए कोलकाता के कुछ बुद्धिजीवियों ने शनिवार को मध्यस्थता की पेशकश की थी। तृणमूल कांग्रेस के खेमे की बुद्धिजीवी सांवली मित्र और उनके साथियों ने कहा था कि अगर सुरक्षाबलों का अभियान रोक दिया जाए तो वे लोग सरकार और माओवादियों के बीच मध्यस्थ बनने को तैयार हैं। शनिवार से ही कनाईशोल के जंगलों में माओवादियों की केन्द्रीय कमेटी की बैठक शुरू हुई, जिसमें गोपीनाथजी उर्फ दुर्गा हेम्ब्रम की अगुवाई वाले गुट ने जल्द बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव रखा। किशनजी फिलहाल हमले करते रहने के पक्षधर हैं।
दीपक रस्तोगी
नई दुनिया, दिल्ली

नक्सलियों का संघर्षविराम का प्रस्ताव
कोलकाता। केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा माओवादियों को हथियार डालकर वार्ता के लिए दी गई 72 घंटे की मोहलत पर माओवादी नेता किशनजी ने सोमवार शाम प्रतिक्रिया व्यक्त की। किशनजी ने इस मोहलत को बढ़ाकर 72 दिन किए जाने की शर्त रखी है। 25 फरवरी से 7 मई के बीच की इस अवधि में केंद्र व राज्य सरकार के सुरक्षा बलों की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
इस बीच आदिवासी इलाकों में विकास कार्य शुरू होने चाहिए। तब सरकार के साथ शांति वार्ता की स्थितियां बन पाएंगी। किशनजी ने ये बातें एजेंसी से अज्ञात स्थान से किए गए फोन के जरिए कहीं। इधर, नई दिल्ली में गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा है कि सरकार माओवादियों के प्रस्ताव का अध्ययन कर रही है। सही समय पर माओवादियों को जवाब दिया जाएगा।
गृह मंत्रालय के ही एक अन्य अधिकारी ने कहा है कि माओवादी बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव रखते हैं, तो सरकार विचार कर सकती है। किशनजी ने कहा है कि अगर समस्या 72 दिनों में सुलझ सकती है, तो यह कोई बड़ा समय नहीं है। बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों और जन संगठनों से मूल समस्या को समझने का अनुरोध करते हुए किशनजी ने कहा है कि वे आगे आएं सरकार से होने वाली बातचीत में बिचौलिए की भूमिका निभाएं।
जैसे ही सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा खत्म हो जाएगी, वैसे ही माओवादी भी उसका प्रतिकार बंद कर देंगे। माओवादी नेता ने कहा कि सरकार को हिंसा बंद करने में पहल करनी होगी। पश्चिम बंगाल और झारखंड सीमा पर घने जंगलों में भाकपा की केंद्रीय कमेटी की दो दिन की बैठक के बाद किशनजी ने ये बातें कही हैं।
किशनजी ने कहा कि बंगाल के जंगल महल इलाके में निर्दोष लोगों की हत्या रोककर सरकार अगर वहां पर विकास के सही कार्य शुरू करती है, तो माओवादी अपने-आप शांत हो जाएंगे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा माओवादियों को कायर कहे जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए माओवादी नेता ने कहा कि पिछले एक साल में चार सौ निर्दोष लेकिन हमारे समर्थक ग्रामीणों को सुरक्षा बलों द्वारा मारा जाना, तीन सौ को घायल करना और महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने की घटनाओं से पता चलता है कि कायर कौन है?