Thursday, February 25, 2010
नक्सलियों ने डॉक्टर
कोंटा/दंतेवाड़ा/बीजापुर/जशपुरनगर । सुकमा के केरलापाल बस्ती में चिंतुर निवासी डा. मोहम्मद खलील की नक्सलियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इसकी वजह का पता नहीं लग पाया है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे झारखंड के विशुनपुर थाना क्षेत्र में पीएलएफआई दस्ते ने हिंडालको के बाक्साइट माइंस जा रहे तीन ट्रकों में आग लगा दी, जिससे खलासी राजेन्द्र महेता की जलने से मौत हो गई। डॉ. मोहम्मद खलील आरएमपी थे तथा केरलापाल बस्ती में करीब १२ सालों से उनकी क्लिनिक है। वहाँ उनका मकान बन रहा है। बुधवार को वे मजदूरों से काम करा रहे थे। सुबह करीब पौने १० बजे एक नक्सली ग्रामीण वेशभूषा में उनके पास पहुँचा और बात करने लगा। तभी पीछे से हथियारबंद तीन लुंगीधारी नक्सली पहुँचे। जिसमें से एक ने डॉ. खलील की पीठ पर देशी कट्टे से गोली मार दी। डॉक्टर के गिरते ही नक्सलियों ने उन्हें पत्थर से कुचल दिया। जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद नक्सली हवाई फायर तथा नारेबाजी करते जंगल की ओर भाग गए। दिन दहाड़े हुई घटना के बाद से आसपास के इलाके में दहशत का माहौल है। विशुनपुर थाना क्षेत्र के हिंडालको में गुरुवार सुबह ३.३० बजे ड्राइवर नारायण यादव को गोली मारी गई, जिसे गंभीर अवस्था मे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना की जिम्मेदारी पीएलएफआई के भूषण दिलू दस्ते ने ली है। पीएलएफआई सुप्रीमो ने ३ फरवरी को गुमला,लोहरदगा में चल रहे हिंडालको माइंस को बंद करने की चेतावनी दी थी। संगठन ने माँग की थी कि माइंस से निकाले गए मजदूरों को पुनः काम दिया जाए और अस्थायी मजदूरों को स्थायी किया जाए। इसके अतिरिक्त जमीन मुआवजे व कृषकों की सिंचाई व्यवस्था सहित कई माँग इस प्रतिबंधित संगठन ने की थी।
फोन पर वार्ता नहीं
मीडिया को माओवादियों द्वारा दिया गया नंबर एक हवलदार का निकला है। यह वोडाफोन का नंबर ९७३४६९५७८९ है, जो शिशिर कांति नाग के नाम पर है। इस हवलदार को पीसीपीए के छत्रधर महतो को रिहा करने के लिए अगुवा किया गया था। केंद्रीय गृहमंत्री को यह नंबर पहुँचाया गया था, ताकि शांति वार्ता के बारे में बात की जा सके। इसकी सिम खडगपुर से ली गई थी। यह पता नहीं चल सका है कि यह किस डीलर से ली गई है। पुलिस के एक आला अधिकारी ने बताया कि हम संबंधित हवलदार से पूछताछ कर रहे हैं। नाग का सेल नंबर कोटेश्वर राव (किशनजी) द्वारा संभवतः उपयोग किया गया था। गृहमंत्री से कहा था कि इस नंबर पर शाम पाँच बजे बात कर लीजिए। ज्ञात रहे कि नाग और उसके साथी सीतेश्वर प्रसाद को २६ सितंबर को पश्चिम मिदनापुर के तमाजहुरी में बस से अगुवा किया गया था। देर रात को नाग को रिहा कर दिया था।
युद्ध विराम हो सकता है नक्सली रणनीति का हिस्सा
72 दिन तक माओवादियों द्वारा की गई युद्ध विराम की घोषणा के समाचार को पुलिस गंभीरता से ले रही है। आईजी बस्तर रेंज टीजे लांगकुमेर ने बताया कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, बस्तर, नारायणपुर तथा कांकेर जिलों के कुछ हिस्सों में आपरेशन ग्रीनहंट के साथ-साथ त्रिशुल अभियान भी चलाया जा रहा है। जिसमें ग्रामीणों के सहयोग से पुलिस को सफलता मिल रही है। जिसके चलते नक्सलियों पर लगातार दबाव बढ़ा है। पिछले कुछ समय से पुलिस पार्टियां दूर-दराज के इलाकों में पहुंचकर अभियान चला रही हैं।अबुझमाड़ के कुछ क्षेत्रों से ग्रामीणों के हिस्से का चावल नक्सलियों द्वार लेने की सूचना मिली है लेकिन ग्रामीणों के विरोध के चलते वे इस काम में सफल नहीं हो पाए हैं। दूसरी ओर युद्ध विराम को लेकर पुलिस को किसीभी तरह का आधिकारिक निर्देश नहीं मिला है। पुलिस रुटिन में अपना काम करती रहेगी। इस संबंध में यदि कोई निर्देश मिलेगा तो उसके अनुसार काम किया जाएगा । खास बात यह है कि ग्रामीण एवं दूर-दराज के क्षेत्रों में गश्त करते समय या अपने दायित्वों को अंजाम देते समय यदि कोई उन पर गोलीबारी करता है तो आत्मरक्षा के लिए पुलिस भी उन्हे जबाव देगी। कानून हाथ में लेने किसी को अधिकार नहीं है। युद्ध विराम को माओवादियों की किसी रणनीति का हिस्सा होने से इंकार नहीं किया जा सकता।गौरतलब है कि माओवादियों की ऐसी घोषणाओं के बीच आईजी ने पांचों जिला के एसपी, डीआईजी स्तर के अधिकारियों को विशेष तौर पर सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। तय रणनीति के मुताबिक गश्त करनी है तथा आपरेशन चलाना है। क्या हो पाएगी वार्ता ? माओवादियों की युद्ध विराम की घोषणा की चर्चा में अभी तक न तो शासन स्तर पर कोई जबाव आया हैऔर ना ही प्रशासन को उच्चस्तरीय कोई दिशा-निर्देश मिले हैं। ऐसी स्थिति में किसी वार्ता की संभावना नहीं लगती। सूत्रों के मुताबिक आंध्र प्रदेश सहित एक-दो दूसरे स्थानों पर शासन एवं नक्सलियों के बीच वार्ता के अनुभव ठीक नहीं रहे हैं। पुलिस ने पूरी परिस्थिति पर नजर रखी हुई है।
कोई नहीं करेगा फोन नक्सली नेता को
नई दिल्ली. 25 फरवरी. केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ युध्द विराम की घोषणा की पहल करने से इंकार कर दिया है, जबकि नक्सली नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी द्वारा इसके लिए कथित रूप से तय की गई समय सीमा गुरुवार को समाप्त हो गई। केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी के नेता किशन जी के मोबाइल नंबर पर फोन करने का सवाल ही नहीं उठता। हमें लगता है कि भ्रमित करने वाला फोन नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों ने किया था। केंद्रीय गृह मंत्री पी। चिदंबरम की नक्सलियों से हिंसा छोड़ने की अपील के बाद किशन जी ने कहा था कि यदि केंद्र सरकार नक्सलियों के साथ शांति वार्ता चाहती है तो वह गुरुवार तक बात करे। गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा- मंत्रालय से कोई भी इस नंबर पर बात करने नहीं जा रहा है। वैसे भी नक्सली नेता द्वारा दिया गया यह नंबर पहुंच से बाहर है। केंद्र के साथ वार्ता का विरोध करने वाले किशन जी ने सोमवार को एकाएक अपना रुख बदलते हुए युध्द विराम के प्रयास के लिए अपनी तरफ से 72 घंटे की समय सीमा तय की थी। उन्होंने कहा था कि यदि सुरक्षा बल पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में नक्सलियों के विरुध्द चलाए जा रहे अभियानों को बंद कर दें तो उन लोगों की तरफ से हिंसा नहीं होगी। किशन जी की इस घोषणा के तुरंत बाद सशस्त्र विद्रोहियों ने पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर जिले में सुरक्षा बलों के एक कैंप पर हमला कर दिया था। उधर, गृह मंत्री ने दोहराया है कि नक्सली यदि हिंसा छोड़ने और बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव रखते हैं तो सरकार इस पर सकारात्मक रुख अपनाएगी।
Wednesday, February 24, 2010
माओवादियों ने अब कुत्तों को मारना शुरू किया
पुरुलिया । जंगलमहल में माओवादियों को अब सबसे ज्यादा खतरा सुरक्षा बल के विभिन्न कैंप में रखे गये पालतू कुत्तों से महसूस होने लगा है। यही कारण है कि अब वे इन्हें निशाना बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जंगलमहल के विभिन्न गांव के लोगों को माओवादियों ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि यदि उनके घर में कुत्ते हैं तो वे उन्हें जहर देकर मार दें। राज्य पुलिस की ओर से आपरेशन ग्रीन हंट शुरू करने के पहले पुरुलिया, बांकुड़ा एवं पश्चिम मेदिनीपुर के जंगलमहल के सभी थाना एवं सुरक्षा कैंप में कुत्ता पालने की सलाह दी गयी थी। इससे पूर्व 2004 में भी पुलिस प्रशासन ने इस सिलसिले में औपचारिक निर्देश जारी किया था, क्योंकि माओवादियों की गतिविधियों की पूर्व सूचना पुलिस को कुत्तों से ही मिलती है। कुत्तों के भौंकने से सुरक्षा बल सतर्क हो जाते हैं एवं इससे जानमाल की हानि कम होती है। खुफिया विभाग के अनुसार पिछले कुछ दिनों से जंगल महल में माओवादियों द्वारा जहर देकर कुत्तों को मारने की साजिश का पता चला है। पुरुलिया के वान्दोयान, बलरामपुर, बाघमुंडी, बराबाजार, झालदा के माओवाद प्रभावित क्षेत्र की सुरक्षा बलों के कैंप में बड़ी संख्या में पालतू कुत्ते थे। इस क्षेत्र के विभिन्न थानों में भी पालतू कुत्ते हैं। इधर बांकुड़ा जिले के माओवाद प्रभावित बारीकुल, सारेंगा, राइपुर, रानीबांध थाना क्षेत्र में एवं पश्चिम मेदिनीपुर जिला के बलपहाड़ी बिनपुर में माओवादियों की चेतावनी से भयभीत कई ग्रामीणों ने अपने पालतू कुत्तों की जान बचाने के लिए उन्हें दूसरे गांव में रहे अपने रिश्तेदारों के घर पहुंचा दिया है। खुफिया विभाग का दावा है कि बांकुड़ा जिला के बारीकुल थाना क्षेत्र के कुल पांच गांव समेत पश्चिम मेदिनीपुर जिला के बीनपुर एक नंबर ब्लाक के कुछ गांव में कुत्तों की संख्या में अस्वाभाविक रूप से कमी हुई है।
माओवादियों से वार्ता की पहल पर असमंजस में सरकार
कोलकाता। केंद्र सरकार द्वारा माओवादियों से वार्ता की की पहल करने के बावजूद वाममोर्चा सरकार इस मुद्दे पर उदासीन है। लालगढ़ और आस-पास क्षेत्रों में मओवादियों के खिलाफ संयुक्त पुलिस अभियान चलने के दौरान मुख्यमंत्री वार्ता शुरू करने के पक्ष में नहीं है। सूत्रों के मुताबिक श्री भंट्टाचार्य ने राज्यपाल एमके नारायणन को इस मुद्दे पर सरकार के रूख से अवगत कराया है। राइटर्स बिल्डिंग के सूत्रों के मुताबिक श्री नारायण के बुलावे पर मुख्यमंत्री ने मंगलवार को राजभवन जाकर उनसे मुलाकात की। समझा जाता है कि माओवादियों के साथ बातचीत की संभावना व राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पर मुख्यमंत्री की राज्यपाल से बातचीत हुई। मुख्यमंत्री ने लालगढ़ व आस-पास के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस के संयुक्त अभियान को लक्ष्य तक पहुंचाने की इच्छा जाहिर की। पुलिस अभियान के किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मुख्यमंत्री माओवादियों के साथ वार्ता शूरू करने के पक्ष में नहीं है।
बताया जाता है कि राज्यपाल ने राज्य के विभिन्न भागों में अवैध हथियार जमा होने पर चिंता जतायी। मुख्यमंत्री ने अवैध हथियार जब्त करने को लेकर राज्यपाल को आश्वस्त किया। उल्लेखनीय है कि सोमवार को कांग्रेस और तृणमूल के प्रतिनिधियों ने राजभवन में जाकर राज्यपाल को राज्य की गिरती कानून व्यवस्था से उन्हें अवगत कराया। प्रतिनिधि मंडल ने राज्य के विभिन्न भागों में अवैध हथियारों का जखिरा जमा होने की शिकायत की। उसके बाज राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को राजभवन में तलब किया। सिलदा मे इएफआर कैंप पर माओवादियों के हमले के बाद राज्यपाल के साथ मुख्यमंत्री की पहली बैठक को राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बताया जाता है कि राज्यपाल ने राज्य के विभिन्न भागों में अवैध हथियार जमा होने पर चिंता जतायी। मुख्यमंत्री ने अवैध हथियार जब्त करने को लेकर राज्यपाल को आश्वस्त किया। उल्लेखनीय है कि सोमवार को कांग्रेस और तृणमूल के प्रतिनिधियों ने राजभवन में जाकर राज्यपाल को राज्य की गिरती कानून व्यवस्था से उन्हें अवगत कराया। प्रतिनिधि मंडल ने राज्य के विभिन्न भागों में अवैध हथियारों का जखिरा जमा होने की शिकायत की। उसके बाज राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को राजभवन में तलब किया। सिलदा मे इएफआर कैंप पर माओवादियों के हमले के बाद राज्यपाल के साथ मुख्यमंत्री की पहली बैठक को राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निर्दोष ग्रामीण भी होंगे ग्रीन हंट के शिकार
गिरिडीह (तिसरी)। ग्रीन हंट अभियान नक्सल समस्या का समाधान नहीं है। क्योंकि निर्दोष ग्रामीण भी इस अभियान के शिकार होंगे। ये बातें भाकपा माले जिला सचिव मनोज भक्त ने बुधवार को तिसरी मुख्यालय में प्रखंड कमेटी की आहूत बैठक में बतौर मुख्य अतिथि कही।
उन्होंने कहा कि निर्दोष लोग ग्रीन हंट में वेबजह फंसेंगे। उसके लिए भी सरकार को विचार करना चाहिए ताकि निर्दोष को दोषी करार नहीं दिया जा सके। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी कई प्रकार की जानकारी दी। बैठक की अध्यक्षता कर रहे जय नारायण यादव ने कहा कि सरकार ने राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार देने के लिए नरेगा लागू किया। लेकिन प्रखंड के पदाधिकारी की मिलीभगत से तालाब, रोड, सतलीकरण योजना में धड़ल्ले से जेसीबी मशीन का उपयोग हो रहा है, जो जिला प्रशासन से छिपा हुआ नहीं है। मौके पर प्रेस प्रवक्ता नारायण यादव, पिंकेश सिंह, भोला साव, मो. सत्तार, सिकंदर, चेतलाल राय, टुपाली राय, मो. सत्तार, सुरेश यादव, मनोज शर्मा समेत कई लोग मौजूद थे।
पूर्व नक्सली ने दी आत्महत्या की धमकी
गढ़वा। नगर उंटारी थाना क्षेत्र के कमता निवासी पूर्व नक्सली उपलेश सिंह उर्फ बबल सिं ने पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर मदद की गुहार लगाई है। उसने एसपी को दिए आवेदन में कहा है कि वह नक्सली दस्ता कब का छोड़ चुका है तथा मुख्य धारा से जुड़ना चाहता है मगर पिपरी के संजीत सिंह द्वारा उसे बार-बार झूठे मुकदमे में फंसा कर जेल भेज दिया जाता है और मारपीट व धमकी भी दी जाती है। इस संबंध में थाने में वर्ष 2009 में ही संजीत सिंह व सहयोगियों के विरूद्घ नगर उंटारी थाने में नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। मगर उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही है। उसने कहा है कि पुलिस अधीक्षक से वह पूरी उम्मीद लेकर आया है आशा है मदद मिलेगी। उपलेस का कहना है कि मैं एक किसान का बेटा हूं तथा उक्त लोगों की प्रताड़ना से परेशान हूं। इसके पूर्व भी मेरे द्वारा आवेदन दिया गया था मगर संजीत सिंह व उसके सहयोगी खुलेआम घूम रहे है और मुझे धमकी दे रहे हैं। उसने आवेदन में कहा है कि मैं आपके न्याय का इंतजार कर रहा हूं न्याय नहीं मिलने पर पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लूंगा।
शिबू ने कहा नक्सल उमूलन पर केन्द्र के साथ
रांची। मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने केन्द्र सरकार को आश्वस्त किया है कि वह नक्सल समस्या के निदान के प्रति गंभीर हैं। केन्द्र के नक्सल विरोधी अभियान में राज्य सरकार बढ़-चढ़ कर अपनी सक्रियता दिखा रही है। साथ ही उग्रवाद उन्मूलन के लिए प्रदेश केन्द्र के साथ है। गृह मंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता में चार राज्यों की दिल्ली में आहूत बैठक में मुख्यमंत्री अपना पक्ष रख रहे थे।
मुख्यमंत्री ने अभियान को सुस्त करने जैसी बातों का पुरजोर खंडन करते हुए कहा कि अभियान की सफलता से देखा जा सकता है कि राज्य सरकार इस मामले में कितनी गंभीर है। नक्सल प्रभावित चार राज्यों बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल व झारखंड में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान के संबंध में चर्चा के दौरान राज्य सरकार की ओर से अब तक की गयी कार्रवाई से केन्द्र सरकार को अवगत कराया गया। अभियान की सफलताओं का ब्योरा दिखाते हुए राज्य सरकार ने केन्द्र को बताया कि प्रदेश में दूसरे राज्यों की तुलना में पुलिस अधिक सक्रियता के साथ कार्य कर रही है। बाद में केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को अभियान की बारीकियों से अवगत कराया, अभियान के स्वरूप को स्पष्ट किया। साथ ही राज्य को आवश्यकतानुसार अतिरिक्त पुलिस बल भी उपलब्ध कराने का आश्वासन केन्द्र ने दिया। बैठक में मुख्यमंत्री के अलावा उप मुख्यमंत्री रघुवर दास व सुदेश महतो भी शामिल थे। इनके अलावा मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सुखदेव सिंह, गृह सचिव जेबी तुबिद, पुलिस महानिदेशक नेयाज अहमद समेत अन्य अधिकारी बैठक में उपस्थित थे।
नक्सलियों के खिलाफ नहीं हो सेना का इस्तेमाल : भाकपा

जमशेदपुर। झारखंड भाकपा की सोच है कि नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए क्योंकि बल प्रयोग से नक्सलवाद नहीं रुक सकता। संगठन के राज्य सचिव पूर्व सांसद भुवनेश्वर मेहता ने नक्सलियों से वार्ता की वकालत करते हुए कहा कि यह कानून व्यवस्था का नहीं अपितु सुदूर इलाके में विकास नहीं होने की वजह से उपजा मामला है। जब तक विकास नहीं होगा, नक्सलवाद नहीं रुक सकता। माओवादी नेता किशनजी की आलोचना करते हुए कहा कि 72 दिन के सीजफायर की घोषणा के अगले दिन दो जगह पर नक्सली हमला किया गया जो अनुचित है। नक्सलियों द्वारा निर्दोषों की हत्या किया जाना गलत है। कान्हू सान्याल एवं चारु मजुमदार ने भी स्वीकार किया था कि 369 निर्दोष लोगों को मारा गया। जमशेदपुर सर्किट हाउस में पत्रकार वार्ता में उन्होंने कहा कि 5 मार्च को जेल भरो आंदोलन के तहत एटक, इंटक समेत तमाम मजदूर संगठनों द्वारा रेल चक्काजाम एवं सड़कजाम आंदोलन किया जाएगा। झारखंड असंगठित मजदूर यूनियन के बैनर तले कोल्हान प्रमंडल में पांच जगहों पर उग्र आंदोलन होगा। पूर्व सांसद ने बताया कि माकपा, भाकपा, फारवर्ड ब्लाक एवं आरएसपी की ओर से महंगाई के खिलाफ 12 मार्च को दिल्ली मार्च किया जाएगा। इसमें झारखंड के 12 हजार लोग शिरकत करेंगे। झारखंड की राजनीति पर उनका कहना था कि मधु कोड़ा एंड कंपनी द्वारा 4000 करोड़ का घोटाला किए जाने के खुलासे के बावजूद उनकी पत्नी चुनाव जीत गई तो चन्द्रप्रकाश चौधरी के पीए के पास 14 करोड़ मिलने पर भी जनता ने उन्हें दोबारा विधायक बना दिया है। भाकपा का विधानसभा में खाता नहीं खुलने से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यहां संगठन कमजोर हो गया है। उन्होंने न्यूनतम मजदूरी की सीमा 150 रुपये किए जाने की मांग करते हुए कहा कि सरकार द्वारा इसकी अधिसूचना नहीं निकाली गई तो आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने नरेगा में बड़े पैमाने पर गोलमाल का आरोप लगाया है।
ग्रीन हंट अभियान रोकने को फेंका पासा
जमशेदपुर। नक्सलियों ने 72 दिनों के सीजफायर का पासा फेंक कर दूर की कौड़ी खेली है। केन्द्र सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ ग्रीन हंट के नाम से बड़े मुहिम की तैयारी कर रखी है। ग्रीन हंट के शुरू होने से नक्सलियों को काफी नुकसान हो सकता है। इसे नक्सली नेता अच्छी तरह से भांप चुके हैं। उग्रवादियों का प्रयास है कि किसी तरह ग्रीन हंट अभियान मई तक रुक जाये। केन्द्रीय गृह मंत्री पी। चिदंबरम ने बढ़ी नक्सली गतिविधियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उग्रवादियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर मुहिम शुरू करने की रूपरेखा तैयार कर ली है लेकिन झारखंड सरकार की ओर से हरी झंडी नहीं मिलने के कारण ग्रीन हंट अभियान में विलंब हो रहा है। गृह मंत्री व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के बीच ग्रीन हंट अभियान के मुद्दे पर बैठक होनी है। इस बीच नक्सलियों ने अपने स्तर से सीजफायर की घोषणा कर दी है। नक्सली मामलों के जानकार बताते हैं कि एकाएक नक्सलियों की ओर से 72 दिनों के सीजफायर की घोषणा करने के पीछे कई राज छुपे हुए हैं। नक्सलियों को पता है कि जून के बाद बारिश का मौसम आ जायेगा। बरसात के मौसम में पुलिस व अर्द्ध सैनिक बलों को जंगल में तलाशी अभियान चलाने में दिक्कत होगी। ऐसे में बारिश के मौसम में अभियान चलाने की अनुमति नहीं मिल पायेगी। बारिश के मौसम में जंगल के रास्ते पहाड़ों की चोटियों पर पहुंचने में पुलिस को भारी परेशानियां होगी, साथ ही सैनिकों के जंगल में फंसने का डर होगा। नवंबर के बाद ठंड का मौसम रहेगा। ऐसे में नक्सली चाहते हैं कि किसी तरह अभी ग्रीन हंट अभियान रुक जाये। इसी वजह से नक्सलियों ने अपने स्तर से सीजफायर की घोषणा कर दी है।
नक्सली संगठन में मतभेद उजागर
जमशेदपुर: सीजफायर को लेकर नक्सलियों के बीच ही आपसी मतभेद उभर आने की खबर है। सूत्रों के अनुसार किशनजी ने केंद्र सरकार को 72 दिनों के सीजफायर की जो घोषणा की है, उसपर सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी का समर्थन प्राप्त नहीं है। माओवादी नेता गणपति ने युद्धविराम का विरोध किया है। बताया जाता है कि संभवत: इसलिए केंद्र सरकार किशनजी के प्रस्ताव पर किसी भी प्रकार का कदम जल्दबाजी में उठाने के पक्ष में नहीं है।
गृह मंत्रालय का फैक्स ठप, नक्सलियों का फोन जाम
नई दिल्ली। केंद्रीय गृहमंत्रालय और नक्सलियों के बीच फैक्स और मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हुआ था, दोनों पक्षों में बातचीत शुरू करने के लिए। इनके बीच बातचीत तो शुरू नहीं हो पाई अलबत्ता, गृहमंत्रालय का फैक्स और नक्सलियों का फोन जरूर जाम हो गया।
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने माओवादी नेता किशनजी के संघर्ष विराम के प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में गृह मंत्रालय का एक फैक्स नंबर 011-23093155 उनके लिए जारी किया था। जिस पर नक्सली संघर्ष विराम का प्रस्ताव भेज सकें। नक्सलियों ने भी इसके जवाब में एक मोबाइल नंबर- 09734695789 सार्वजनिक करते हुए गृह मंत्री को 25 फरवरी की शाम 5 बजे तक इस पर फोन करने को कहा था।
सरकार के फैक्स नंबर पर अब तक नक्सलियों की ओर से तो कोई प्रस्ताव नहीं आया, बजाय इसके, इस पर भ्रष्टाचार की शिकायतें, पड़ोसियों से झगड़े और पुलिस के कथित अत्याचार की शिकायतें खूब आ रही हैं। नक्सल समस्या से जूझने के लिए ढेर सारे सुझाव भी आ रहे हैं। इसके चलते फैक्स अक्सर ठप हो जाता है।
इसी तरह नक्सलियों का मोबाइल नंबर सार्वजनिक होते ही उस पर मीडिया वालों ने धड़ाधड़ फोन करना शुरु कर दिया। इसकी वजह से नक्सलियों का फोन भी जाम होने की खबर है।
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने माओवादी नेता किशनजी के संघर्ष विराम के प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में गृह मंत्रालय का एक फैक्स नंबर 011-23093155 उनके लिए जारी किया था। जिस पर नक्सली संघर्ष विराम का प्रस्ताव भेज सकें। नक्सलियों ने भी इसके जवाब में एक मोबाइल नंबर- 09734695789 सार्वजनिक करते हुए गृह मंत्री को 25 फरवरी की शाम 5 बजे तक इस पर फोन करने को कहा था।
सरकार के फैक्स नंबर पर अब तक नक्सलियों की ओर से तो कोई प्रस्ताव नहीं आया, बजाय इसके, इस पर भ्रष्टाचार की शिकायतें, पड़ोसियों से झगड़े और पुलिस के कथित अत्याचार की शिकायतें खूब आ रही हैं। नक्सल समस्या से जूझने के लिए ढेर सारे सुझाव भी आ रहे हैं। इसके चलते फैक्स अक्सर ठप हो जाता है।
इसी तरह नक्सलियों का मोबाइल नंबर सार्वजनिक होते ही उस पर मीडिया वालों ने धड़ाधड़ फोन करना शुरु कर दिया। इसकी वजह से नक्सलियों का फोन भी जाम होने की खबर है।
लोहा लेने पुलिस तैयार : तोमर
कांकेर । डीआईजी महेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि पुलिस ने नक्सलियों के खिलाफ बड़ी लड़ाई के लिए लगभग सारी तैयारी पूरी कर ली गई है। मात्र 4 महीने में जिले के सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बीएसएफ की 22 कंपनियां तैनात हो गई हैं। शेष 8 कंपनियों की तैनाती फरवरी माह के अंत तक हो जाएगी। वे यहां एक विमोचन कार्यक्रम में पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कंपनियों की बैरक आदि के निर्माण कार्य में कम से कम 2 साल का समय लगता है। इस काम को जिला पुलिस बल ने 4 माह में पूर्ण कर दिया है । इससे साबित होता है कि पुलिस नक्सलियों के खिलाफ पूरे जब्जा के साथ लडऩे तैयार है। उन्होंने बताया कि फोर्स के साए में जिले के पिछड़े क्षेत्रों में विकास कार्य कराए जाएंगे। इसके लिए रणनीति बन रही है तथा शीघ्र ही इसे अमलीजामा पहनाया जाएगा । बीएसएफ कंपनियों को दूरस्थ क्षेत्रों में तैनात करने कार्रवाई के दौरान पुलिस तथा नक्सलियों के मध्य 13 मुठभेडें़ हुई , जिनमें बड़ी संख्या में पुलिस को नक्सली हथियार, गोला-बारूद तथा अन्य सामग्री बरामद हुई । इस दौरान पुलिस ने 30 नक्सलियों तथा 13 संघम सदस्यों को गिरफ्तार किया, वहीं 21 हथियार, 64 कारतूस, 72 किलोग्राम के 8 लैंडमाइंस भी बरामद किए गए हैं।
बस्तर में नहीं बन सके दर्जनों पुल
माओवादी गतिविधियों के चलते 13 पुल-पुलियों का निर्माण नहीं कराया जा सका है। ये सभी कार्य पिछले कई सालों से लटके पड़े हैं। इनमें से 7 बड़े पुलों के निर्माण के लिए विभाग को कोई भी ठेकेदार नहीं मिल पा रहा है। साढ़े 12 करोड़ की लागत वाले इन कार्यों के लिए बार बार निविदा बुलाए जाने के बाद भी किसी ने भी कार्य में रूचि नहीं ली है। स्थिति यह है कि इनमें से कुछ कार्यों के लिए 11-11 बार तक निविदा बुलाई जा चुकी है। अंतत: हार कर लोक निर्माण विभाग के जगदलपुर स्थित सेतु निर्माण संभाग ने इन पुलों को बजट से अलग करने की गुहार शासन से की है।लोनिवि की सेतु निर्माण संभाग द्वारा 1 सौ 84 लाख रूपए की लागत से कोड़ेकुर्से-मिचगांव मार्ग पर कोटरी सेतु के लिए 27 सितंबर 2001 को प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। लगातार 11 बार टेंडर बुलाए जाने के बाद भी किसी ने भी निविदा नहीं भरा। सरंडी-इरागांव मार्ग पर तारोकी सेतु का निर्माण साढ़े 72 लाख रूपए की लागत से होना था इसके लिए 12 मार्च 2003 को प्रशासकीय स्वीकृति दी गई थी। कोड़ेकुर्से- लोहत्तर मार्ग के 11 वें किलोमीटर पर कोटरी नदी सेतु का निर्माण 2 करोड़ 43 लाख रूपए की लागत से किया जाना था। इसके लिए प्रशासकीय स्वीकृति 7 जनवरी 2005 को दी गई थी। छठवीं बार निविदा आमंत्रित करने पर भी कोई निविदा नहीं मिली। बीजापुर जिले के भैरमगढ़ क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर साढ़े 4 करोड़ की लागत से भैरमगढ़ इतामपारा-छोटे पल्ली मार्ग के 15 वें किमी पर बड़े पुल का निर्माण किया जाना था। इसके लिए 4 करोड़ 40 लाख की प्रशासकीय स्वीकृति 16 नवंबर 2005 को मिली थी। बीजापुर-गंगालूर मार्ग के 14 वें किमी पर पदेड़ा नाला सेतु निर्माण के लिए 1 करोड़ 10 लाख रूपए की प्रशासकीय स्वीकृति भी 16 नवंबर 2005 को मिली थी। बांदे से पीव्ही 109 मार्ग पर कोड़ेनार नदी पर पुल निर्माण के लए 31 जनवरी 2007 को 1 करोड़ 42 लाख की प्रशासकीय स्वीकृति मिली। पांचवीं बार प्रयास करने के बाद भी किसी ने भी निविदा नहीं भरा। कुटरू-बेदरे मार्ग के 14 वें किमी पर करकेली नाला सेतु के लिए 12 दिसंबर 2007 को 65 लाख रूपए की प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी लेकिन किसी भी ठेकेदार ने कार्य करने में रूचि नहीं ली। कार्यपालन यंत्री एसएस मांझी ने बताया कि उक्त कार्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थित हैं । बार बार निविदा बुलाने के बाद भी कोई भी इन कार्यों में रूचि नहीं ले रहा है। जिससे कार्य करना संभव नहीं हो पा रहा है। इन सभी कार्यों को बजट से विलुप्त करने अधीक्षण यंत्री के माध्यम से शासन को पत्र लिखा गया था।
ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल का अधिकारी नकाब में मीडिया से मुखातिब
सालुआ (पश्चिम बंगाल) ! ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स (ईएफआर) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शनिवार को नकाब में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान उसने सिल्दा शिविर पर नक्सली हमले के दौरान 24 जवानों की मौत के बाद ईएफआर के मनोबल को लेकर सवाल खड़े किया।
ईएफआर के विशेष महानिरीक्षक बिनॉय चक्रबर्ती ने प्रशासन पर ईएफआर का दुरुपयोग करने और उसके साथ बुरा बर्ताव करने का आरोप लगाया। लेकिन संवाददाता सम्मेलन के दौरान अधिकारी का अपने चेहरे को छुपाए रखने की कोशिश ने मीडिया का ज्यादा ध्यान खींचा।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ''मैं परेशान हूं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। राज्य के पुलिस महानिदेशक भूपिंदर सिंह ने भी सिल्दा में मीडिया को संबोधित किया था, लेकिन उन्होंने अपने चेहरे को नहीं ढंका था।''
राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने भी पश्चिम मिदनापुर जिले में स्थित सलुआ शिविर में मंगलवार को मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। मृत जवानों के परिजनों की नाराजगी का बहादुरी से सामना किया था और बिना चेहरे को ढंके लोगों से बातचीत की थी।
बहरहाल, चक्रबर्ती से संपर्क करने की कोशिश सफल नहीं हो पाई है।
ईएफआर के विशेष महानिरीक्षक बिनॉय चक्रबर्ती ने प्रशासन पर ईएफआर का दुरुपयोग करने और उसके साथ बुरा बर्ताव करने का आरोप लगाया। लेकिन संवाददाता सम्मेलन के दौरान अधिकारी का अपने चेहरे को छुपाए रखने की कोशिश ने मीडिया का ज्यादा ध्यान खींचा।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ''मैं परेशान हूं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। राज्य के पुलिस महानिदेशक भूपिंदर सिंह ने भी सिल्दा में मीडिया को संबोधित किया था, लेकिन उन्होंने अपने चेहरे को नहीं ढंका था।''
राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने भी पश्चिम मिदनापुर जिले में स्थित सलुआ शिविर में मंगलवार को मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। मृत जवानों के परिजनों की नाराजगी का बहादुरी से सामना किया था और बिना चेहरे को ढंके लोगों से बातचीत की थी।
बहरहाल, चक्रबर्ती से संपर्क करने की कोशिश सफल नहीं हो पाई है।
लोरिक सेना का सफाया करने की मांग
मानवाधिकार के नाम पर लूट का आरोप
अम्बिकापुर ! मानव अधिकारों की समाज में सर्वमान्यता हेतु जारी नंगे पांव सत्याग्रह ने नवपदस्थ पुलिस महानिरीक्षक श्री पी।एन।तिवारी से सरगुजा के सीमावर्ती ईलाके में सक्रिय लोरिक सेना का सफाया करने की अपेक्षा जताई है। भाकपा माओवादी कुछ विचारधारा को लेकर हिंसा पर आमदा हैं, लेकिन लोरिक सेना के पास कोई विचारधारा नहीं है। यह सिर्फ लुटेरों का नेटवर्क है। कुछ पूर्व पुलिस मुखबिर, कुछ जेल के कैदी व कुछ तथाकथित राजनैतिक कार्र्र्यकत्ता इसमें शामिल हैं। जेल के अंदर से माओवादियों की तर्ज पर मोर्बाईल से लोगों को धमकियाँ दी जाती हैं। लोरिक सेना में शामिल लोगों के विरूद्व जिले के विभिन्न थानों में रिर्पोर्ट दर्ज है, लेकिन इनके विरूद्व कार्यवाही नहीं होने से पुलिस की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह लगा है। कुछ माह पूर्व लोरिक सेना के श्री मुनिलाल यादव का पुलिस- हिरासत से फरार हो जाना और अब जक ना पकड़ा जाना, पुलिस की अक्षमता को दर्शाता है।
नंगे पांव सत्याग्रह के संगठक श्री राजेश सिंह सिसौदिया, संगठन समिति सदस्य अन्ना नायडू, संयोजक संजय चौरसिया, व महासचिव नरेश बेक ने नव पदस्थ पुलिस महानिरीक्षक से लोरिक सेना का सफाया करके सरगुजा में शांति बहाल करने की मांग की है।
अम्बिकापुर ! मानव अधिकारों की समाज में सर्वमान्यता हेतु जारी नंगे पांव सत्याग्रह ने नवपदस्थ पुलिस महानिरीक्षक श्री पी।एन।तिवारी से सरगुजा के सीमावर्ती ईलाके में सक्रिय लोरिक सेना का सफाया करने की अपेक्षा जताई है। भाकपा माओवादी कुछ विचारधारा को लेकर हिंसा पर आमदा हैं, लेकिन लोरिक सेना के पास कोई विचारधारा नहीं है। यह सिर्फ लुटेरों का नेटवर्क है। कुछ पूर्व पुलिस मुखबिर, कुछ जेल के कैदी व कुछ तथाकथित राजनैतिक कार्र्र्यकत्ता इसमें शामिल हैं। जेल के अंदर से माओवादियों की तर्ज पर मोर्बाईल से लोगों को धमकियाँ दी जाती हैं। लोरिक सेना में शामिल लोगों के विरूद्व जिले के विभिन्न थानों में रिर्पोर्ट दर्ज है, लेकिन इनके विरूद्व कार्यवाही नहीं होने से पुलिस की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह लगा है। कुछ माह पूर्व लोरिक सेना के श्री मुनिलाल यादव का पुलिस- हिरासत से फरार हो जाना और अब जक ना पकड़ा जाना, पुलिस की अक्षमता को दर्शाता है।
नंगे पांव सत्याग्रह के संगठक श्री राजेश सिंह सिसौदिया, संगठन समिति सदस्य अन्ना नायडू, संयोजक संजय चौरसिया, व महासचिव नरेश बेक ने नव पदस्थ पुलिस महानिरीक्षक से लोरिक सेना का सफाया करके सरगुजा में शांति बहाल करने की मांग की है।
बस्तर में तेजी से पांव पसार रहा एड्स
प्राकृतिक एवं नैसर्गिक नयनाभिराम दृश्यों सहित प्रचुर वन एवं खनिज संपदा के लिए विख्यात बस्तर की सरजमीं में एड्स के खौफनाक विषाणु तेजी से पैर पसार रहे हैं। 2 नए मरीजों के एचआईवी पाजीटिव पाए जाने के बाद पिछले एक वर्ष में एड्स मरीजों की संख्या ढाई गुनी बढ़कर 102 हो गई है। इस लाइलाज रोग ने अब तक 15 लोगों को लील लिया है। एक वर्ष पहले तक एचआईवी पाजीटिव रोगियों का आंकड़ा 40 था। 102 एड्स रोगियों की पुष्टि होना सरकारी पैमाना है। अनेक निजी क्लीनिकों में एलायजा एवं वेस्टर्न रक्त परीक्षण कराए जाते हैं, जिनकी जानकारी नहीं मिल पाती। अब तक जितने भी एड्स रोगियों की पहचान हुई है, वे आश्चर्यजनक रूप से 25 से 40 वर्ग आयु के हैं। अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ विवेक जोशी के अनुसार एड्स के मरीज ज्यादातर आंध्र व उड़ीसा के सीमाई इलाकों के निवासी हैं, जिनमें अधिकांशत: पेशे से ड्रायवर हैं। बस्तर में इस लाइलाज मर्ज के तेजी से फैलने के आसार हैं, क्योंकि जिनकी एड्स रोगी के रूप में पहचान हुई है, उन पर निगरानी की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसा कोई कानून भी नहीं है। एड्स की गिरफ्त में महिलाएं भी आ गई हैं। जिन 102 लोगों में एचआईवी पाजीटिव पाए गए हैं, उनमें 25 महिलाएं भी शामिल हैं। मेडिकल कालेज में महिला कांऊसलर का पद रिक्त होने से, महिलाओं में एड्स के रोकथाम के उपाय नहीं हो पा रहे हैं। बदनामी के भय से अधिकांश रोगी सामने नहीं आते। यद्यपि जिला अस्पताल प्रबंधन इस मामले के प्रति अत्यंत गोपनीयता एवं सतर्कता बरत रहा है, किंतु इस जानलेवा लाइलाज मर्ज के प्रति जब तक समाज में जागरूकता व चेतना नहीं आएगी, एड्स अपने शिकंजे में समाज को आक्टोपस की तरह जकड़ता रहेगा। एड्स के कारणों पर यदि दृष्टिपात करें तो यह पता चलता है कि, यह मुख्यत: शारीरिक संपर्क और रक्त स्थानांतरण से संक्रमित होता है। एड्स के सबसे बड़े संवाहक वे हैं, जो रोटी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों में जाते हैं। अकेलेपन में शारीरिक भूख मिटाने या तो वे समलैंगिक हो जाते हैं अथवा ऐसी महिलाओं के संपर्क में आ जाते हैं, जो जिस्मफरोशी के धंधे में पेशेवर होती हैं। लम्बी अवधि तक घर से दूर रहने वाले तथा इधर-उधर यौन संबंध बनाने की वजह से, अधिकतर इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों के समीप झोपड़ियों में होने वाली वेश्यावृत्ति इस रोग के विस्तारण की अहम कारक है।एड्स का हमला परमाणु हमले से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि परमाणु बम जहां एक निश्चित क्षेत्र की मानव लीला एक बार में समाप्त करता है, वहीं एड्स जैसा भयानक रोग आहिस्ता-आहिस्ता मनुष्य को खोखला कर देता है। परमाणु बम से बचने संधियों जैसे उपाय हैं, किंतु एड्स से निजात पाने अब तक कोई जीवनरक्षक दवा ईजाद नहीं हो पाई है।
धमतरी के ठेकेदार की बस्तर में हत्या
धमतरी निवासी ठेकेदार की बीजापुर जिला के भैरमगढ़ में अज्ञात व्यक्ति द्वारा गला रेतकर हत्या कर दी गई है। मृतक नगर के प्रतिष्ठित गुप्ता परिवार के सदस्य थे। पुलिस घटना की जांच कर रही है।पुलिस से मिला जानकारी के अनुसार बीजापुर जिला के भैरमगढ़ थाना से कुछ दुरी पर बुधवार की सुबह लाश देखी गई, जिसकी शिनाख्ती धमतरी निवासी सतीश गुप्ता के रूप में की गई। मृतक की पहचान होते ही पुलिस ने घटना की सूचना उनके मोबाइल के नंबर से गुप्ता परिवार को दी। बताया जाता है सतीश गुप्ता ठेकेदारी के तहत लोक निर्माण विभाग का काम कर रहे थे। फिलहाल हत्या किसने और क्यों की, इसकी पुष्टी नहीं हुई है। संभावना जताई जा रही है कि हत्या नक्सलियों ने की है। नक्सलियों ने ठेकेदार से रूपयों की डिमांड की थी। रूपए नहीं मिलने पर उन्होंने हत्या कर दी होगी। बहरहाल, पुलिस मामले की जांच कर रही है।
(नई दुनिया, २५ फरवरी, २०१०)
माओवादी सेना में भर्ती के लिए विज्ञापन

एक तरफ नक्सली सरकार के खिलाफ हथियार डालने की बात कहते हैं वहीं दूसरी ओर माओवादी सेना को मजबूत करने ग्रामीण युवक-युवतियों के लिए पीएलजीए में भर्ती होने विज्ञापन जारी कर रखा है। पुलिस इंटलीजेंस की इस बात को नकारा नहीं जा सकता की फोर्स के दबाव के बाद वापस छिन्न-भिन्न हुए नक्सली एकजुट होने के लिए जो समय चाहते हैं, इसी के चलते वे सरकार के सामने हथियार डालने की पेशकश कर रहे हैं। संगठित होने और युवक-युवतियों को जोड़ने जंगलों में व्यापक प्रचार-प्रसार जारी है।दक्षिण बस्तर के जंगलों में पोस्टरों व पर्चों के द्वारा चलाये जा रहे विज्ञापनों की ही तर्ज पर वर्गवार जानकारियां दी गई हैं। जिसमें युवक-युवतियों से माओवादी सेना में जुड़ने का आह्वान किया जा रहा है। मजे की बात यह है कि भर्ती के नक्सली विज्ञापनों में पुलिस में भर्ती न होने की अपील भी की गई है व इसके कारण गिनाये गये हैं। नई दुनिया के पास उपलब्ध एक ऐसे ही पर्चे में २ दिसंबर से १० फरवरी तक भर्ती अभियान चलाने की बात कही गई है।
पर्चे में पीएलजीए में भर्ती क्यों के कालम में बस्तर की जनता के शोषण व दमन के खिलाफ लड़ने के लिए, शोषित जनता के हितो की रक्षा के लिए, बस्तर की संपदा को बड़े दलाल पूंजीपतियों को सौंपे जाने के खिलापᆬ लड़ने के लिए, सरकारी नरसंहार रोकने के लिए, जल जंगल जमीन पर जनता का हक कायम करने के लिए, शोषण विहीन समता मूलक समाज की स्थापना के लिए जैसी बातें लिखी हैं।
भर्ती की योग्याताओं में १६ वर्ष से अधिक के सामान्य कद काठी के सभी युवक युवतियां जो स्वार्थी न हों व कुर्बानी के लिए तैयार हों, लंपट, भ्रष्ट, अराजकतावादी, अत्याचारी, दारूबाज, चरित्रहीन लालची न हो, शोषण, दमन से नफरत करते हों तथा सादा जीवन कठोर परिश्रम के लिए तैयार हों जैसी अर्हतायें निर्धारित की गई हैं।
वेतन भत्ता के कालम में कोई वेतन भत्ता नहीं लिखा है। इसमें कहा गया है कि जनता पर निर्भर होकर खानपान की व्यक्तिगत जरूरतें पूरी की जायेंगी। परिजनों की मदद का भी वादा किया गया है। अंत में लिखा है कि पीएलजीए के योद्घा शोषण विहीन समाज की स्थापना का सपना संजोये मजदूर वर्गीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस, पीड़ित जनता के चहेते बन जन सैनिक का काम करेंगे। शहीद होने पर जनता के दिलो दिमाग में अमर रहेंगे। पर्चे के दूसरी ओर सरकारी सशस्त्र बलों में भर्ती न होने की बात लिखी है। इसमें लिखा है कि सरकारी बलों की भर्ती बस्तर की आदिवासी जनता को मार भगाने के लिए होती है।
इसके तहत हत्यारों, लुटेरों, बलात्कारियों, गुंडों को तैयार कर बस्तर की आदिवासी संस्कृति, जीवन शैली को तहस नहस किया जाता है। पुलिस, सीआरपीएएफ एसपीओ में भर्ती के तौर तरीके वाले कालम में पहली पंक्ति में लिखा है घूसखोरी के जरिये। इसमें कहा गया है कि फोर्स में भर्ती घोटाला कई बार सामने आ चुका है। बस्तर में गोपनीय सैनिकों की भर्ती में भी रिश्वतखोरी का मामला प्रकाश में पहले ही आ चुका है। भर्ती में जनविरोधी, लंपट, अराजकतावादी, अत्याचारी, दारूबाज, चरित्रहीन एवं गुंडा तत्वों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाते हुए नक्सलियों ने कहा है कि कुआकोंडा ब्लाक के समेली गांव के लिंगाराम को जबरन एसपीओ बनाया गया था हाईकोर्ट के आदेश के बाद उसने इस्तीफा दिया। वेतन भत्ता में लिखा है कि जान गंवाने के एवज में विशेष भत्ता दिया जाता है। एसपीओ को भीख की तरह १५ सौ रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। चोरी, लूट, बलात्कार की खुली छूट मिलती है व मरने पर चप्पल घिसने से मुट्ठी भर रूपये नसीब हो सकते हैं। अंत में कहा गया है कि फोर्स में भर्ती होकर लंपट, भ्रष्ट, दारूबाज, चरित्रहीन, लुटेरा आदि बनकर जनता के घृणा के पात्र बन जाते हैं। मरने पर जनता खुशियां मनाती है। लोग याद करना भी पसंद नहीं करते। भर्ती का यह विज्ञापन पर्चे की शक्ल में प्रचार ब्यूरो दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सीपीआई माओवादी की ओर से जारी किया गया है।
अनिल मिश्रा,
संवाददाता, नई दुनिया
दंतेवाड़ा
संवाददाता, नई दुनिया
दंतेवाड़ा
समझौतों से नक्सली ही जीतेंगे

जोगिंदर सिंह
पूर्व निदेशक
केंद्रीय जाँच ब्यूरी
दिल्ली
नक्सली दलों से नरमाई से पेश आकर राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है। जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। यही नहीं, ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।
नक्सली दलों से नरमाई से पेश आकर राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है। जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। यही नहीं, ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।
इसबात में कोई दो राय नहीं की नरम मिजाज देश होने का खामियाजा हिन्दुस्तान को भुगतना पड़ रहा है। नक्सलवादी कहिए, माओवादी कहिए या आतंकवादी, इन हिंसा करने वाले संगठनों को किसी भी नाम से पुकारिए, वे बेखौफ होकर कभी भी, कहीं भी आक्रमण कर देते हैं। जैसा कि पश्चिम बंगाल के शिल्दा में हुआ, जहाँ माओवादियों ने निर्दयी तरीके से पुलिसवालों की नृशंस हत्याएँ कीं। यह हमला उनके योजनाबद्ध आतंकी अभियान का हिस्सा है।भले ही माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हों, पर इसके बावजूद उनमें यह क्षमता है कि वे ऐसे कामों को अंजाम दे सकें।
नक्सलियों का एकमात्र उद्देश्य पुलिस का मनोबल गिराना नहीं बल्कि उन्हें सीमित कर देना भी है जिससे पुलिस अपने क्षेत्र में मुख्यालयों तथा साजो-सामान की रक्षा में लगी रहे। नक्सलियों ने साल २००९ में ६ अप्रैल से १२ जून तक पश्चिम बंगाल के तथा अन्य क्षेत्रों में अपने ऑपरेशन चलाए थे, जिनमें उन्होंने ११२ पुलिस वालों की जानें ले लीं।माओवादियों व नक्सलियों की समस्या से पार पाना कोई असंभव कार्य नहीं है। मुश्किल यह है कि इनसे निपटने की कोई दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई है। पश्चिम बंगाल में २५ लोगों को मारने के बाद माओवादियों ने फरवरी २०१० के तीसरे हफ्ते में बिहार के कोसारी गाँव में ११ लोगों की हत्या कर दी। इस नरसंहार में १०० से ज्यादा माओवादी शामिल थे जिन्होंने डायनामाइट से घरों को उड़ा दिया। इन मारे गए लोगों के अलावा अन्य २५ लोग भी शिकार हुए जो जलने से या गोली से घायल हुए।वास्तव में राज्यों के नेता इस मुद्दे पर जो दृष्टिकोण रखते हैं, वह केंद्र में बैठे नेताओं तथा देश के बाकी लोगों के मतों से भिन्ना है। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना था कि मैं माओवादियों के खिलाफ बल प्रयोग के खिलाफ हूँ।
जमीनी स्तर पर विकास एवं प्रजातंत्र माओवाद को हल करने का एकमात्र तरीका है। कितना अच्छा होता यदि मुख्यमंत्रीजी का यह बयान सच हो पाता। लेकिन सच यह है कि शांति का कोई विकल्प नहीं है, चाहे वह बंदूक से आए या बातचीत से या फिर आत्मसमर्पण से। दुर्भाग्य से बंदूक के सामने झुकना हमारे देश में एक मान्य परंपरा बन गई है। इसकी शुरुआत १९८९ में हुई थी जब स्थानीय लोगों की मदद से पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने साथियों को छुड़वाने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री की बेटी को अगवा कर लिया था। इस घटना के बाद से आतंकियों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों या शुभचिंतकों को छुड़वाने के लिए लोगों को बंधक बनाना आरंभ कर दिया। वर्ष २००८ में एक पुलिस अधिकारी को कैद से छुड़ाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को कुछ माओवादी कमांडरों को रिहा करना पड़ा। २००९ में माओवादियों ने झारखंड में एक पुलिस इंस्पेक्टर का अपहरण करके उसका सिर कलम कर दिया। अब उन्होंने झारखंड के एक प्रखंड विकास अधिकारी को अगवा कर लिया है जिसे छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री १४ माओवादियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गए हैं।यदि गुप्तचर और अन्य स्रोतों की रपटों पर यकीन किया जाए तो पता लगता है कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। जून २००९ के अंत तक ४५५ लोग (२५५ नागरिक व २०० सुरक्षाकर्मी) नक्सलियों ने मार डाले थे और ये कत्लेआम जारी है। ये आँकड़े केंद्रीय गृह मंत्रालय के हैं। इस अवधि में सबसे अधिक यानी ६० प्रतिशत हत्याएँ छत्तीसगढ़ व झारखंड में हुईं जो कि सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य हैं। आँकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा नक्सली हिंसा होती है। पिछले तीन वर्षों के आँकड़े इस बात के गवाह हैं।
समस्या की भयावहता को स्वीकारते हुए केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने फरवरी २०१० में कहा कि नक्सलवाद का खतरा सरकार की उम्मीद से कहीं अधिक भयंकर है। जब तक हम उन्हें छेड़ेंगे नहीं वे आराम से अपना विस्तार करते रहेंगे। वे तब तक फैलते रहेंगे जब तक हम उन्हें चुनौती नहीं देंगे। लोगों का सहयोग हासिल करने के लिए माओवादी हरसंभव तरीके अपनाएँगे। वे मीडिया को फुसलाएँगे, गलत आरोप लगाएँगे और अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाएँगे। अधिकतर लोग सोचेंगे कि समझौता किया जाए या कोई अन्य बीच का रास्ता अपनाया जाए लेकिन यह बहुत बेवकूफी होगी। सबसे मुश्किल चुनौती जो हमारे सामने है, वह है अच्छी तरह प्रशिक्षित तथा बेहतरीन साजो-सामान से लैस पुलिस बल। नक्सलवाद व माओवाद की समस्या से निपटने के लिए मजबूत दिमाग, उससे भी ज्यादा मजबूत दिल तथा इरादों पर टिके रहने की आवश्यकता है। अल्पकालिक समाधानों से कुछ नहीं होगा। एक मासूम व निहत्थे अफसर का अपहरण कर लिया जाता है और उसे छुड़ाने के लिए १४ पके हुए अपराधियों को छोड़ दिया जाता है, इन सब घटनाओं से माओवादियों के हौसले और बुलंद होंगे। मुँह में खून लगने के बाद नक्सली अब और आगे बढ़ेंगे।
राज्य सरकारें आतंकियों, नक्सलियों व माओवादियों के हाथों खिलौना बन रही हैं। वे जैसे चाहे सरकारों को नचाते हैं और अपनी माँगें मनवाते हैं।नक्सली दलों से नरमाई से बातचीत करके राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है। जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। खराब हालात झेल रहे क्षेत्रों को विकसित करने के बजाय ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।
कोई भी आतंकी समूह तब तक कोई समझौता नहीं करेगा जब तक कि वह यह जानता है कि वह जीत रहा है। ऐसा पंजाब, असम व अन्य राज्यों में हो चुका है। दुनिया का कोई भी कोना हो, ऐसे तत्वों से निपटने के लिए गोली का जवाब गोली ही एक तरीका होता है । केवल समर्पण के लिए माओवादियों से बात करना एक कदम पीछे हटना हैऔर उस नीति के खिलाफ जाता है जो भारत सरकार ने नक्सलवाद से लड़ने के लिए बनाई थी । और फिर समझौते तभी होते हैं जब किसी एक पक्ष की रीढ़ टूट चुकी होती है । इस किस्म के समझौते से तो सुरक्षा और पुलिस बलों का मनोबल ही टूटेगा जो अपनी जान की बाजी लगाकर ऐसे तत्वों के खिलाफ लड़ रहे हैं ।
नई दुनिया, में प्रकाशित आलेख
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