Thursday, April 15, 2010

पुलिस व अर्धसैनिक बल के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों को लिखा डीजीपी ने


पुलिस व अर्धसैनिक बल के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम


मित्रो !

यह सारेदेशवासी के लिए दुखद है कि 6 अप्रैल, 2010 को दंतेवाड़ा के चिंतलनार में हमारे 76 जवान एक साथ शहीद हो गये । यह उनके कर्तव्यपरायणता का सर्वोच्च उदाहरण है । यह कुर्बानी और देशभक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है । यह अपने देश, समाज, संविधान, प्रजातंत्र की रक्षा के लिए अब तक का सबसे महत्वपूर्ण त्याग है, जिसे देश का हर सिपाही, सैनिक और नागरिक सदियों तक याद रखेगा । शहीदों को नमन करेगा।


चिंतलनार की जघन्य हत्या से साबित हो गया है कि वे पुलिस, अर्धसैनिक बल के दुश्मन हो चुके हैं । दरअसल नक्सली उस हर व्यक्ति के विरोधी हैं जो शांति के पक्ष में है, जो कानून के पक्ष में है, जो देश के संविधान के पक्ष में है, जो भारतीय प्रजातंत्र के पक्ष में है । दरअसल वे भारतीय प्रजातंत्र को ध्वस्त करके उसके स्थान पर ऐसी ही हिंसक, आतंककारी और अराजक व्यवस्था लाने के लिए लड़ रहे हैं। यही उनका मुख्य उद्देश्य है । वास्तविकता यही है कि वे ग़रीब, मजदूर, कमजोर, आदिवासी के हितैषी हैं ही नहीं ।


सच तो यही है कि उन्होंने अब देश को युद्ध में झोंक दिया है । और हम इस युद्ध से मुँह नहीं मोड़ सकते। इसके लिए किन्तु, परन्तु का सवाल खड़ा नहीं कर सकते, क्योंकि हमने आंतरिक सुरक्षा और शांति बहाली और अपने संविधान को बचाने की शपथ ली है । यदि हम भावावेश में आकर इसी तरह की बातें करने लगें जो हमारे ही मनोबल को तोड़ने लगे तो हम नक्सली हिंसा का मुँहतोड़ जवाब कैसे दे सकते हैं और तब उन गरीबों का क्या होगा जो आप पर विश्वास कर रहे हैं कि राज्य और देश को एकदिन ज़रूर नक्सलियों की हिंसा और आंतक से मुक्ति मिलेगी ?


10 हज़ार हिंसक नक्सली चाहते हैं कि देश की पुलिस, अर्धसैनिक बल, एसपीओ सहित प्रजातंत्र को बचाने में लगे हुए लोगों का मनोबल गिर जाये, वे उनकी अवैध, असंवैधानिक शर्तों के आगे घुटना टेक दें । उनकी मंशा को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि हम नये सिरे से कर्तव्यों को याद करें, अपने शपथ को याद करें । यदि हम विचलित होंगे तो देश सुरक्षित नहीं रहेगा । तब हम भी ऐसे हिंसक व्यवस्था के गुलाम बनने को बाध्य हो जायेंगे।


नक्सलियों द्वारा चिंतलनार की घटना सिर्फ़ छत्तीसगढ़ राज्य के विरोध में नहीं है । यह सिर्फ़ हमारी पुलिस तंत्र के विरोध में नहीं है । यह समूचे भारतीय राज्यों, शांतिप्रिय नागरिकों के विरोध में है। यह नक्सलवाद का भारतीयता पर आक्रमण है । इसे सहज ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए । इस कार्रवाई को उथले ढ़ंग से भी नहीं सोचा जाना चाहिए ।


यह समय धैर्य बाँधने का है । यह समय अधिक सतर्कता और चालाकीपूर्ण कौशल दिखाने का है । यह समय देश के दुश्मनों को सबक सिखाने का है । यह समय निजी विचारों, मान्यताओं में उलझ जाने नहीं है । यह समय देश को बचाने का है । यह समय हमारे 76 सैनिकों के बलिदान को याद में ताउम्र बनाये रखने के लिए संकल्प लेने का है । यह समय और अधिक सतर्कता से नक्सलियों को सबक सिखाने का है । यह समय ज़रूर हृदयविदारक है, किन्तु यही वह समय है, जब हम ऐसे हिंसक तत्वों को देश से सदा के लिए मिटाने के लिए नये विश्वासों के साथ खड़े हो सकते हैं । जो सिपाही ऐसी घटनाओं से टूट जाता है, वह अपने पीछे सारे लोग, समाज, देश को गुलाम बनने के लिए छोड़ जाता है । क्या हम ऐसी घटनाओं से घबरानेवाले सिपाही हैं ? कतई नहीं । 76 शहीदों के लिए हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम और अधिक लगन से इस अभियान को सार्थक बनाये ।


आप सभी जानते हैं - नक्सली अब मारक गुरिल्लावार और मोबाइल वारफेयर का उपयोग कर रहे हैं । ख़तरनाक एबूंस का प्रयोग कर रहे हैं । अतः यह ज़रूरी है कि हम एरिया डोमिनेशन करते समय सही स्ट्रेटेजी एवं टैक्टिस का कड़ाई से पालन करें और हर समय सतर्क रहें । गश्त में जाते समय अधिकतम सतर्कता बरतें । जिस रास्ते से जायें उस रास्ते से दोबारा वापस ना आयें । जब भी चलें, मुख्य मार्ग से हटकर चलें । जब भी चलें, जंगल को समझते चलें । जब पैदल गश्त के लिए निकलते हों, जिस किसी स्थान पर विश्राम करने के लिए रूकते हैं, एक पूर्व निर्धारित स्थान पर ना रूकें । जिस स्थान पर रूकते हैं वहाँ कोई ऐसी अजनबी या अनहोनी चीज़ दिखे तो तत्काल सतर्कता बरतनी चाहिए ।


चिंतलनार घटना से हमें यह भी सीख लेनी होगी कि हम स्थानीय गाँववासियों का दिल जीते बिना नक्सलियों से स्थानीय क्षेत्र, गाँव को मुक्त नहीं करा सकते । गाँववाले जब तक हमारे साथ नहीं होंगे, तब तक हम नक्सलियों से जुड़ी सूचनाएँ एकत्र नहीं कर सकते । नक्सलियों की मंशा और कार्ययोजना की जानकारी समयपूर्व जानने के लिए ग्रामवासियों को अपनी ओर मिलाना अनिवार्य है । परन्तु हर सूचना जो ग्रामवासी देता है उसे परखना भी जरूरी है कि वह सच है या नहीं ।


भविष्य में नक्सली और अधिक धूर्तता से आप पर हमला बोल सकते हैं । इससे बचने और उनके कैंपों को ध्वस्त करने के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि अधिकतम सतर्कता बरती जावे । यह समय डरने का नहीं है, नक्सलियों पर कारगर कार्यवाही करने का है । भारत के सभी 76 वीर पुत्रों को श्रद्धांजलि के साथ


विश्वरंजन

डीजीपी

छत्तीसगढ

बंदूक सेसमाधान संभव नहीं


कुलदीप नैयर
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली
सरकारी तंत्र की विद्यमान प्रणाली से अनेक लोग प्रसन्न नहीं हैं। इसके चलते अनेक गहन असमानताओं ने उभार पाया है और बहुत से लोग एक छोर पर जा पडे हैं। नौकरशाही और राजनीतिक आकाओं का भ्रष्टाचार में संलिप्तता भी नितांत उजागर है। यह एक रुढ बात हो सकती है, किंतु स्थिति को सुस्पष्ट तो करती ही है कि अपराध का राजनीतिकरण हो गया है और राजनीति का अपराधीकरण। आज राष्ट्र के समक्ष जो प्रश्न उपस्थित है, वह यह है कि इस प्रणाली को बदला कैसे जाए? क्या बंदूकके बल पर जैसी कि माओवादी और सिविल समाज में उनके साथ सहानुभूति रखने वालों की धारणा है, अथवा मत पत्र के द्वारा लोग इस कार्य को करें। अब जबकि माओवादी हत्या करने को उन्मत हो उठे हैं, यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक और सटीक हो गया है। इस सप्ताह छत्तीसगढ में दंतेवाड़ा के गहन वनों में एक त्रासदी घटित हुई है, जहां 76 पुलिसकर्मी मारे गए हैं, यह एक सुस्पष्ट प्रमाण है, क्या इससे भी अधिक प्रमाण जताने के लिए जरूरी है कि माओवादी बंदूक के बल पर सत्ता हथियाना चाहते हैं। और भी अधिक बुरी यह हकीकत है कि उन्होंने मात्र हमले को ही नियोजित नहीं किया, अपितु वे पुलिस से सभी हथियार और गोला बारूद भी छीन कर ले गए। इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि माओवादियों ने अपने तौर-तरीकों को तो और अधिक आधुनिक किया ही है। साथ ही आधुनिक शस्त्रास्त्रों का भंडार भी बढाया है। दूसरी ओर पुलिस पूर्णत: सुसज्ज नहीं है साथ ही पूर्णत: प्रशिक्षित भी नहीं हैं। गुप्तचर व्यवस्था के लिहाज से भी वह पर्याप्त जानकारी प्राप्त नहीं कर पाती। एक रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि आंध्र प्रदेश में चार शीर्ष माओवादी काडरों ने घात लगाकर हुए इस हमले की योजना बनाई थी। जिन काउंटर इन्सरजेन्सी विशेषज्ञों ने छत्तीसगढ में हुए इस नरसंहार की विश्लेषण किया है, उनके अनुसार पुलिस को भ्रमित कर मौत के घेरे में फंसाया गया था।

माओवादियों का सशस्त्र क्रांति पथ है नरसंहार। जब भारत ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता प्राप्त की तो विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ता पर एक भी गोली नहीं दागी गई थी। महात्मा गांधी का ऐसी राह अपनाने का कारण यह था कि उनके पीछे लोगों की ताकत थी। निर्धन निरक्षर और पिछडे वर्गो का उन्हें समर्थन प्राप्त था। दरअसल समृध्दजन में से तो अधिसंख्यक व्रिटिश सत्ता के पक्ष में थे ताकि सुख सुविधाओं से भरपूर जीवन यापन कर सकें। नौकरशाही भी साम्राज्यवादी सत्ता का ही हिस्सा थी। फिर भी महात्मा गांधी विजयी हुए। यदि माओवादी निर्धन, निरक्षरों और पिछडाें का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उन्हें यह प्रमाणित करना चाहिए। उन्हें बरगला कर अथवा बंदूक का उपयोग करके नहीं अपितु जो चुनाव होते हैं उनके माध्यम से। तब जब हर कसौटी पर ये चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र रहे। इसके लिए समझाने का रास्ता अपनाने और धैर्य तथा तर्क के बल पर लोगों को कायल करने की आवश्यकता है। माओवादियों की सोच है कि ऐसा करने की उन्हें आवश्यकता नहीं है। यही साम्राज्यवादियों की भी भाषा रही थी।

माओवादी जिस बात को नहीं समझ रहे अथवा अनुभूत नहीं कर रहे, वह यह है कि राज्य के पास उनकी अपेक्षा कहीं अधिक बंदूकें हैं। और अन्ततोगत्वा वे उनकी बंदूकों को खामोश कर सकती है। आज के शासक भले ही उन्हे पसंद नहीं हों, किंतु वे उस प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता में आए हैं, जिसमें लोगों ने मतदान केंद्रो पर पक्तियां लगाकर अपना वोट दिया था। यदि बंदूक ही उन्हे सत्ता से हटाने का रास्ता है तो फिर शासकों द्वारा माओवादियों का दमन करने के लिए बंदूकों या अन्य उपायों का अवलंबन भी उचित मानना होगा। आज के विश्व में हिंसा की कोई सार्थकता नहीं है। क्योंकि सीमित सी हिंसा भी नितांत घातक रूप ले सकती है। भारत में जहां अनेक संकीर्ण और विघटनकारी प्रवृत्तियां हैं, हिंसा कैसा भी रूप ले सकती है। बंदूकों से आह्लादित होने वाले वर्ग या कतिपय अनेक ताकतें, जब बंदूकधारी ही निर्णायक मान लिए जाएं, सत्ता पर कब्जा करने का प्रयास कर सकती हैं। भगत सिंह भी क्रांतिकारी थे। उनको भी सशस्त्र संघर्ष में भरोसा था। फिर भी उन्होंने कभी हिंसा की सीख नहीं दी। न तो उन्होंने और न ही उनके संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट आर्मी ने किसी व्यक्ति का सिर कलम किया। माओवादियाें को उनसे वहुत कुछ सीख लेने की आवश्यकता है। ब्रिटिश सत्ता ने भगत सिंह को फांसी दी थी, क्योंकि वह उनसे नहीं उनके चिंतन-दर्शन से भयभीत थी। अपने लेख 'बम का दर्शनशास्त्र' में भगत सिंह ने, जो उन्होंने 21 वर्ष की आयु में लिखा था, उन्होंने कहा था कि क्रांतिकारी अपनी आलोचना और अपने आदर्शों अथवा कृत्यों की जन कसौटी पर कसे जाने की अपेक्षा नहीं करते। वे तो इनका स्वागत करते और जो लोग वास्तव में आकांक्षा रखते हैं, उन्हें समझने-समझाने का इन्हें अवसर मानते हैं। क्रांतिकारी आंदोलन के मूलभूत सिध्दांत और उच्च एवम पावन आदर्श प्रेरणा और शक्ति संचय का चिरंतन स्त्रोत है। परंतु माओवादी तो वार्ता करने से ही भागते हैं। इन हत्याओं से वे यह नहीं बता पाते कि वे चाहते क्या हैं। माओवादी इस बारे में चिंतन और आत्म निरीक्षण, विश्लेषण कर सकते हैं कि उनकी सशस्त्र क्रांति कैसे एक विवेकपूर्ण हिंसा का रुप लेता जा रही है।

गृहमंत्री पी चिदंबरम जो कुछ करते हैं, उन सभी बातों को मैं पसंद नहीं करता। किंतु माओवादियों के मामले में वह उनके साथ वार्ता के लिए बहुत आगे तक चले गए हैं। उन्होंने उनसे हथियार डालने को नहीं कहा और न ही अपनी विचारधारा त्यागने को कहा है। उन्होंने तो सिर्फ हिंसा त्यागने भर की बात कही है। यदि वे ऐसा करते हैं तो केंद्र सरकार वार्ता की मेज पर उनसे वार्ता करेगी। इस बीच यदि सरकार उद्योगपतियों और व्यापारियों को खनिजों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संचयन से रोक देती है, जो कि आदिवासियों का धन संपदा है तो बेहतर होगा। उन्हें उन उद्यमों में भागीदार बनाया जाना चाहिए जो संसाधनों को उपयोग आने लायक बनाते हैं। माओवादी आदिवासियों की कठिनाइयों और शिकायतों का लाभ अपनी सशस्त्र क्रांति के लिए उठा रहे हैं। एक बार आदिवासी जब यह जान लेंगे कि उनका प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण है, वे माओवादियों का समर्थन करना बंद का देंगे। क्रांति के नाम पर माओवादी ऐसे सूत्रों से धन और हथियार पा रहे हैं, 'जिन पर प्रश्न चिन्ह लग सकते हैं।' वे भारतीय राज्य व्यवस्था से खिलवाड नहीं कर सकते, सरकार में चाहे कुछ भी कमजोरी क्यों नहीं हो। शासकों को चुनावों में अपदस्थ किया जा सकता है। किंतु भारत पर जो प्रहार हुए हैं, जो आघात लगे हैं, उन्हें भरा तो नहीं जा सकता। माओवादी सरकार व भारत को एक ही मानने की भूल कर रहे हैं।

नक्सलवाद : क्या सेना की जरूरत है?


ललित सुरजन
प्रधान संपादक दैनिक देशबंधु रायपुर

विश्व में ऐसे देश उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जहां सेना का राजनीति में हस्तक्षेप नहीं है। इनमें अधिकतर यूरोप के जनतांत्रिक देश हैं। विकासशील दुनिया में भारत संभवत: एकमात्र देश है जहां सेना ने अपने आपको राजनीति से दूर रखा है। कहने को तो अमेरिका विश्व की सबसे प्रमुख जनतांत्रिक देश है, लेकिन वहां सैन्यतंत्र और पूंजीतंत्र के बीच लंबे समय से गठजोड़ चला आ रहा है; और दोनों मिलकर राजनीति को प्रभावित ही नहीं संचालित भी करते हैं। आज यह चर्चा इसलिए कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से निपटने के लिए सेना को तैनात करने की बात पिछले कुछ समय से चल रही है। अभी हाल में 6 अप्रैल को दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने जो तांडव किया उसके बाद यह मांग कुछ ज्यादा ही जोर के साथ उठाई जा रही है। एक भीषण समस्या प्रदेश के सामने है। उसका निराकरण कैसे हो यह हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से सोच रहा है। सेना तैनात करने से समस्या हल हो जाएगी, यह बात भावना के स्तर पर बहुत बड़े वर्ग को अपील कर सकती है, किंतु यह विचार कर लेना उचित होगा कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे।

भारत में ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है कि यह देश जनतंत्र के उपयुक्त नहीं है। उनके बीच एक छोटा वर्ग यह भी मान कर चलता है कि भारत को स्वतंत्र ही नहीं होना चाहिए था। हम कई बार सुनते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। इसी तरह बहुत से लोग मानते हैं कि यहां तो मिलिट्री का राज होना चाहिए था। ऐसे लोग कल्पना करते हैं कि हंटर मारने से सब ठीक हो जाएगा। गनीमत है कि इस तरह की सोच रखने वाले बहुमत में नहीं हैं। जनतंत्र को हिकारत की नजर से देखने वाला यही वर्ग आम चुनावों में भाग नहीं लेता, लेकिन चुनाव के बाद निर्वाचित नेताओं के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने में एक क्षण भी नहीं गंवाता। जब जून 2005 में बस्तर में सलवा जुड़ूम की शुरूआत हुई थी तो इसी वर्ग ने रायपुर व अन्य शहरों में कारों और बाइकों पर सलवा जुड़ूम रैलियां निकाली थी। इनका मकसद सरकार की निगाह में चढ़ना था। वे इसमें कामयाब भी हुए होंगे। वरना इस तथ्य को वे भी जानते थे कि रायपुर में रैली निकालने से नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। आज यही लोग जब बढ़-चढ़ कर सेना का उपयोग करने की मांग कर रहे हैं तो इनके असली इरादे क्या हैं, यह समझा जा सकता है।

ऐसे लोगों की बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन देश में राजनीति की समझ रखने वालों का एक छोटा सा तबका भी है जो सेना का इस्तेमाल करने की मांग कुछ तर्कों के साथ कर रहा है। ऐसे लेख या वक्तव्य प्रकाशित हुए हैं जिनमें कहा गया है कि आंतरिक अशांति से निपटने के लिए सेना को बुलाया जाना कोई नई बात नहीं है। वे कश्मीर से लेकर नगालैण्ड तक और 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' का उदाहरण देते हैं। यह तर्क देते समय वे तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करने से शायद जानबूझ कर बच रहे हैं। एक तो कश्मीर, नगालैण्ड या मणिपुर की स्थितियां बेहद अलग हैं। उसके बावजूद यह सच्चाई सबके सामने है कि सेना को भेजने से शांति कायम करने का लक्ष्य हासिल अब तक नहीं किया जा सका है। इसके विपरीत इन प्रदेशों में भारतीय जनतंत्र के प्रति अनास्था और अविश्वास की भावना दिन-ब-दिन प्रबल होती जा रही है। इसी तरह 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' की परिणति जिस त्रासदी में हुई उससे कौन परिचित नहीं है। इस सच्चाई को जानने के बाद भी यदि कोई सेना के प्रयोग को अनुकरणीय उदाहरण मानना है तो यह पहले दर्जे की नासमझी ही मानी जाएगी।

यह स्पष्ट है कि देश के भीतर पिछले वर्षों में जहां कहीं लंबे समय के लिए सेना का इस्तेमाल किया गया है, उससे फायदे की बजाय नुकसान ही हुआ है। हमारे सैन्य बलों ने प्राकृतिक विपदाओं के समय अथवा साम्प्रदायिक दंगों जैसी स्थितियों में निश्चित रूप से प्रशंसनीय भूमिका निभाई है, लेकिन ऐसे अवसरों पर उनकी तैनाती पांच-सात दिनों से ज्यादा नहीं रही। दूसरी ओर जब भी सेना को लंबे समय के लिए लगाया गया है, उसने जनसामान्य के बीच अपयश ही अर्जित किया है। दरअसल, नागरिक प्रशासन और सैन्य प्रशासन दोनों की अवधारणा व कार्यशैली बिलकुल अलग-अलग हैं। नागरिक प्रशासन सेना के हाथ में सौंप दिया जाए तो सेना के निरंकुश होने की आशंका बन जाती है। यही वजह है कि असम हो या उत्तर-पूर्व, वहां सशस्त्र बलों को दी गई विशेष शक्तियों को समाप्त करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है। इसी संदर्भ में एक और सवाल अपने आप उठता है कि क्या राज्य की पुलिस अक्षम और पंगु हो चुकी है अन्यथा सेना की क्या जरूरत थी। ऐसे में यह प्रश्न भी उठता है पुलिस बल को दुरुस्त बनाने के लिए प्रांतीय सरकारें क्या कदम उठा रही हैं।

इन प्रश्नों का सामना करने के बजाय जब राजनेता सेना को आमंत्रित करने की संभावनाएं टटोलते हैं तो हैरानी होती है। कांग्रेसी इस मुद्दे पर थोड़ा बचकर चलते हैं; या जैसा कि पी. चिदंबरम ने किया, अपनी बात से पलट भी जाते हैं। किंतु मोटे तौर पर भाजपा को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। यह संभवत: इसलिए है कि भाजपा बाहुबल या अस्त्रबल में कुछ ज्यादा ही विश्वास रखती है। इसी वजह से बहुत सारे फौजी अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाते हैं। इनके ध्यान में हम सिर्फ इतना लाना चाहते हैं कि कल को अगर भारत में सैन्य शासन आ गया तो फिर आपको चुनाव लड़ने-जीतने की बात पूरी तरह से भूलनी होगी। सैन्य शासकों के सामने जनप्रतिनिधियों की क्या बिसात!

हम मानते हैं कि यदि भारत के शीर्ष सैन्य अधिकारी सेना को बस्तर में नहीं झोंकना चाहते तो ठीक कर रहे हैं। इतना जरूर हम कहेंगे कि थलसेना प्रमुख और वायुसेना प्रमुख दोनों को टीवी पर इस बारे में कुछ भी बोलने से बचना चाहिए था। उनका जो भी दृष्टिकोण हो, यह रक्षामंत्री या प्रधानमंत्री के माध्यम से व्यक्त होना मर्यादापूर्ण माना जाता। इसके सार्वजनिक बयानों पर छ।ग. के मुख्यमंत्री का रोष स्वाभाविक था। बहरहाल, जिस प्रदेश में के.एफ. रुस्तमजी व पी.वी. राजगोपाल से लेकर अशोक पटेल व विजय रमन तक श्रेष्ठ सुयोग्य पुलिस अधिकारियों की सुदीर्घ परंपरा रही हो, उसी प्रदेश की पुलिस आज इतनी लाचार तथा निस्तेज क्यों नार आ रही है, इस बारे में डॉ. रमनसिंह विचार कर कुछ ठोस निर्णय लें, यही हमारी राय है।

Wednesday, April 14, 2010

कलम पर भारी बंदूक


नई दुनिया, १५ अप्रैल, रायपुर

मानवरहित विमान का परीक्षण कांकेर में

दो नक्सलियों की जमानत खारिज दो



जगदलपुर। बस्तर के दो भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप में जेल में बंद दो नक्सलियों की जमानत याचिका को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया है। दोनों नक्सली संगठन संघम के सदस्य हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के दो जिला स्तरीय कार्यकर्ता उमेश राठौर सूर्यप्रकाश चौहान पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने के लिए सुकमा के ग्राम बड़े गुड़रा गए हुए थे। यहां के थोथापारा में ग्रामीणों को एकत्र कर दोनों कार्यकर्ता रायमशविरा कर ही रहे थे कि उसी समय किसी ने उनके गांव में आने की सूचना नक्सलियों को दे दी। ७०-८० की संख्या में हथियारबंद संघम सदस्य गांव पहुंचे और थोथापारा में बैठक ले रहे श्री राठौर श्री चौहान को घेर लिया। इसके बाद नक्सलियों ने भाजपा के दोनों प्रमुख कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद नक्सलियों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की माति वैन को भी आग के हवाले कर दिया। जाते-जाते ग्रामीणों को संघम सदस्यों ने धमकाया भी था। घटना की सूचना श्री राठौर के भाई ने स्थानीय पुलिस को दी। जांच के दौरान ग्रामीणों ने पुलिस के सामने कई संघम सदस्यों की संलिप्तता की जानकारी दी। इसी बीच दो संघम सदस्य हांदाराम रघुनाथ पुलिस के हत्थे चढ़ गए। जेल में बंद हांदाराम रघुनाथ ने अपने वकील के जरिए जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। शेष पेज १५ पर


जगदलपुर। बस्तर के दो भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप में जेल में बंद दो नक्सलियों की जमानत याचिका को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया है। दोनों नक्सली संगठन संघम के सदस्य हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के दो जिला स्तरीय कार्यकर्ता उमेश राठौर सूर्यप्रकाश चौहान पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने के लिए सुकमा के ग्राम बड़े गुड़रा गए हुए थे। यहां के थोथापारा में ग्रामीणों को एकत्र कर दोनों कार्यकर्ता रायमशविरा कर ही रहे थे कि उसी समय किसी ने उनके गांव में आने की सूचना नक्सलियों को दे दी। ७०-८० की संख्या में हथियारबंद संघम सदस्य गांव पहुंचे और थोथापारा में बैठक ले रहे श्री राठौर श्री चौहान को घेर लिया। इसके बाद नक्सलियों ने भाजपा के दोनों प्रमुख कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद नक्सलियों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की माति वैन को भी आग के हवाले कर दिया। जाते-जाते ग्रामीणों को संघम सदस्यों ने धमकाया भी था। घटना की सूचना श्री राठौर के भाई ने स्थानीय पुलिस को दी। जांच के दौरान ग्रामीणों ने पुलिस के सामने कई संघम सदस्यों की संलिप्तता की जानकारी दी। इसी बीच दो संघम सदस्य हांदाराम रघुनाथ पुलिस के हत्थे चढ़ गए। जेल में बंद हांदाराम रघुनाथ ने अपने वकील के जरिए जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

शहर में भी नक्सली नेटवर्क तगड़ा


नई दुनिया, रायपुर, १४ अप्रैल

लंबी चलेगी लड़ाई


नई दुनिया, रायपुर, १४ अप्रैल

बस्तर में विकास के लिए 2000 करोड होंगे खर्च

रायपुर. 14 अप्रैल. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने कहा है कि राज्य के बस्तर के घुर नक्सली इलाके में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए अगले दो तीन वर्षों में 2000 हजार करोड़ रूपये खर्च किए जायेंगे। मुख्यमंत्री डा.सिंह ने पत्रकारों के साथ कल रात बातचीत में यह जानकारी दी। डा. सिंह ने कहा कि इसके अलावा कैम्पा पंड से मिलने वाले 600 करोड क़ी राशि भी इसी इलाके के विकास में खर्च की जायेंगी। सरकार की पूरी कोशिश इलाके में सड़कों का जाल बिछाने का है। उन्होंने स्वीकार किया कि यह काम इतना आसान नहीं है और इसमें बाधा डालने की नक्सली पूरी कोशिश करेंगे पर सरकार भी पूरी सुरक्षा के बीच सड़कों के निर्माण की कोशिश करेगी। उन्होंने कहा कि सरकार हर कीमत पर अगले दो वर्षो में बने अबूझमाड के प्रवेश द्वार माने जाने वाले ओरछा तक कांक्रीट सडक़ का निर्माण करवायेंगी। अबूझमाड को नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। लगभग चार हजार वर्ग किलोमीटर के इस इलाके का अभी तक सर्वेक्षण नहीं हो सका है। इस इलाके की आबादी 10 व्यक्ति प्रति वर्ग मील है और पूरा इलाका घने जंगलों वाला है। यहां पर अभी तक सुरक्षा बल भी घुसने से कतराते रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि हाल ही में अतिसंवेदनशील सुकमा से कोन्टा की 85 किमी लम्बी सडक को केन्द्र ने मंजूरी दी है। लगभग 150 करोड़ रूपये की लागत से कंक्रीट से निमत होने वाली सडक़ के लिए टेन्डर की प्रक्रिया चल रही है। इसकी स्वीकृति के लिए भूतल परिवहन मंत्री से वह स्वयं मिले थे। उन्होंने कहा कि बस्तर में सडक निर्माण तथा अन्य विकास कार्यों के लिए ठेकेदार सामने आने लगे हैं और पहले जैसी स्थिति नहीं रही। भूतल परिवहन मंत्रालय के टेन्डरों में बडी क़म्पनियां हिस्सा ले रही है उन्हे राज्य सरकार पूरी सुरक्षा मुहैया कराएंगी। उन्होंने कहा कि बस्तर इलाके में पदस्थ युवा पुलिस अधीक्षकों ने उन्हे भरोसा दिलाया है कि चुनौती के बाद भी वे सड़कों को निर्माण करायेंगे।

नक्सलियों ने तंत्र की खामियों का फायदा उठाया - गृह सचिव

नई दिल्ली. 13 अप्रैल. केंद्रीय गृह सचिव जी.के.पिल्लई ने कहा है कि अतिउत्साहित अधिकारियों ने जनजातियों को जंगलों में स्थित उनके आवासों से हटाने का प्रयास किया, जिसका फायदा उठाकर नक्सलियों ने उन्हें अपने पक्ष में कर लिया। पिल्लई ने दिए साक्षात्कार में कहा- अति उत्साहित जिलाधिकारियों और अन्य अधिकारियों द्वारा जनजातियों को जंगल से बाहर करने के प्रयास से समस्या उत्पन्न हुई और इससे पैदा हुई रिक्तता में नक्सलियों ने प्रवेश किया। पिल्लई ने कहा कि अधिकारियों का उदेश्य अच्छा था लेकिन उसे लागू करने का तरीका बुरा था। उन्होंने कहा कि कुछ वन्य ग्रामों से जनजातियों को भगाया गया। पर्यावरण संरक्षणवादियों ने कहा कि ये स्थान वन्यजीव अभयारण्य हैं और सब को भगाओ। पिल्लई ने कहा- प्रशासन के इस कदम से जनजातियों ने समझा कि सरकार केवल जानवरों में दिलचस्पी रख रही है, उनमें नहीं। जनजातियों के इसी सोच का नक्सलियों ने फायदा उठाया। नक्सलियों ने जनजातियों से कहा कि सरकार उनसे अधिक बाघों में दिलचस्पी रखती है। पिल्लई ने कहा कि सरकार वन्य अधिनियमों में संशोधन कर जनजातियों के दिल और दिमाग को जीतने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार जनजातियों को क्षेत्र के विकास में शामिल करना चाहती है। पिल्लई ने कहा-अब हम जनजातियों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि सरकार ने जनजातियों को वन्य भूमि अधिकार दिया है। पिल्लई ने कहा- पुराने वन कानून के अनुसार सभी वन्य उत्पाद सरकार के होते थे। ऐसे में यदि वे जंगल से कुछ लेते थे तो वन अधिकारी उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लेते थे। उन्होंने कहा कि जनजातियों के खिलाफ ऐसे हजारों मामलों को वापस ले लिया गया है।

Monday, April 12, 2010

अपील और चेतावनी के बीच नक्सलवाद

प्रमुख न्यायविदों, शिक्षा शास्त्रियों एवं पूर्व प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने शोषण, असमानता एवं पर्यावरण विनाश पर आधारित विकास के चालू मॉडल की कड़ी आलोचना करते हुए सरकार से कृषि एवं वनभूमि के अधिग्रहण, आदिवासियों के विस्थापन तथा ऑपरेशन ग्रीन हंट पर तुरंत रोक लगाने और स्थानीय आबादी से वार्ता शुरू करने की अपील की है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश पीवी सावंत, न्यायमूर्ति एच। सुरेश, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पूर्व अध्यक्ष मोहिनी गिरि, पूर्व आईपीएस अधिकारी केएस सुब्रह्मण्यम तथा प्रमुख जीव वैज्ञानिक डॉ. पीएम भार्गव के एक निर्णायक मंडल ने भूमि अधिग्रहण, खनिज संसाधनों पर कब्जे तथा माओवाद के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट के मुद्दे पर जनसुनवाई के समापन पर अंतरिम व्यवस्था देते हुए यह अपील की।

उधर
नक्सलियों ने दी और हमले की चेतावनी दी है । भाकपा-माओवादियों ने रविवार को चेतावनी दी है कि वे दंतेवाड़ा जैसे और भी हमले करेंगे। यदि केंद्र ने नक्सलियों के खिलाफ अभियान बंद नहीं किया तो और हमले होंगे। हालाँकि उन्होंने शहीद के परिजनों से सहानुभूति भी व्यक्त की है। साथ ही उनको मुआवजा देने पर भी सहमति जताई। नक्सलियों के अनुसार हम चाहते हैं कि लोग आगे आकर उनकी वित्तीय मदद करें। प्रतिबंधित संगठन ने मीडिया को फैक्स पर भेजे संदेश में कहा कि यदि उनके खिलाफ अभियान नहीं रोका तो सुरक्षाबलों पर और हमले होंगे। नक्सलियों ने लोगों से कहा है कि वे उनके समर्थन में आगे आएँ और लड़ने को तैयार रहें। वे सुरक्षाबलों के लिए सूचनाएँ न दें।

नहीं बदलेगी जंगलवार की रणनीति - पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़

नक्सलियों ने विस्फोट कर कलवर्ट उड़ाया

भुवनेश्वर । शुक्रवार की देर रात नक्सलियों ने कोरापुट जिले के लक्ष्मीपुर-नारायण पाटना रास्ते पर लैंडमाइन विस्फोट कर कलवर्ट को उड़ा दिया। कलवर्ट क्षतिग्रस्त होने के कारण आवागमन बाधित हो गया है। कोरापुट पुलिस मौके पर पर पहुंच घटना की जांच कर रही है। पुलिस तथा सीआरपीएफ द्वारा माओवादियों की तलाश में कांबिंग आपरेशन भी चलाया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार नक्सलियों द्वारा घटनास्थल पर छोड़े गए पोस्टर में आपरेशन ग्रीन हंट तुरंत बंद करने व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के इस्तीफे की भी मांग की गई है।

दंतेवाड़ा जैसे हमले और करेंगे

पुरुलिया। भाकपा (माओवादी) ने सुरक्षा बलों के जवानों पर दंतेवाड़ा जैसे और हमले करने की धमकी दी है। रविवार को मीडिया को भेजे पत्र में माओवादियों ने केंद्र को नक्सल विरोधी आपरेशन ग्रीन हंट को बंद करने का अल्टीमेटम दिया है। नक्सलियों ने कहा कि अगर सरकार का आपरेशन जारी रहा तो हम भी सुरक्षा बलों पर दंतेवाड़ा जैसे और हमले करेंगे। हालांकि माओवादियों ने दंतेवाड़ा हमले में मारे गए जवानों के परिजनों के प्रति सहानुभूति जताई है और उन्हें मुआवजा देने की पेशकश की है।

मीडिया को फैक्स किए पत्र में भाकपा (माओवादी) की ओर से सुरक्षा बलों के जवानों को चेताया गया है कि वे नक्सलियों के खिलाफ जारी आपरेशन ग्रीन हंट से दूर ही रहें अन्यथा और हमले होंगे। अपने पत्र में माओवादियों ने कहा है कि अगर आपरेशन में भाग लिए तो जवानों के लिए उसका परिणाम बुरा ही होगा।

खत में हमलावर तेवरों के साथ माओवादियों ने अपना मानवीय चेहरा भी दर्शाने की कोशिश की है। नक्सली संगठन ने दंतेवाड़ा में मारे गए जवानों के परिजनों के प्रति पूरी हमदर्दी जताई है और कहा है कि भाकपा माओवादी जवानों की मौत का मुआवजा उनके परिजनों को देने के लिए तैयार हैं। माओवादियों ने इसके साथ ही लोगों से भी मृतक जवानों के परिजनों की मदद के लिए आगे आने की अपील की है।

इसके साथ ही नक्सली संगठन ने लोगों से अपील की है कि वे सुरक्षा बलों के मुखबिर न बनें और लड़ाई में माओवादियों की मदद करें।



ममता की अपील, वार्ता शुरू करें माओवादी

कोलकाता। रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने माओवादियों से हिंसा छोड़ कर बातचीत के लिए राजी होने की अपील की है। ममता ने एक बार फिर लालगढ़ में जारी पुलिस व सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान को बंद करने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि आपरेशन लालगढ़ पश्चिम मेदिनीपुर के माकपा सचिव दीपक सरकार के दिशा-निर्देश में चल रहा है।

तृणमूल नेता रविवार को एक समाचार चैनल से बातचीत कर रही थीं। ममता बनर्जी के अनुसार, लालगढ़ में जारी संयुक्त अभियान से दरअसल माकपा को ही मदद मिल रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस और सुरक्षा बलों के साझा अभियान को ठीक तरह से संचालित नहीं किया जा रहा है, जिस कारण इससे माकपा को मदद मिल रही है। ममता ने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार इस साझा अभियान के लिए सुरक्षा बल और फंड दोनों मुहैया करा रही है, लेकिन आपरेशन लालगढ़ की कमान उसके हाथ में नहीं है। तृणमूल नेता ने आरोप लगाया कि दरअसल आपरेशन लालगढ़ का संचालन पश्चिम मेदिनीपुर के माकपा सचिव दीपक सरकार कर रहे हैं और उन्हीं के दिशा-निर्देश में यह आपरेशन चल रहा है।

ममता के अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और गृह मंत्री पी चिदंबरम के समक्ष उठाया है, लेकिन हमारी बात नहीं सुनी जा रही है। उन्होंने माओवादी हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि उन्हें बातचीत के लिए तैयार होना चाहिए। हिंसा की बजाय सरकार के साथ विकास के मुद्दों पर बातचीत करनी चाहिए।

नवादा में चार नक्सली गिरफ्तार

नवादा। ११ अप्रैल । जिले की अकबरपुर थाना पुलिस ने रविवार की दोपहर चार उग्रवादियों को गिरफ्तार की है। उसके पास से अवैध शस्त्र व कारतूस बरामद होने की खबर है। गिरफ्तारी अकबरपुर बाजार में रिक्शा पड़ाव के पास से की गयी। गिरफ्तार माओवादियों की योजना गोविन्दपुर प्रखंड के खखंदुआ व बकसोती पहाड़ों का खनन कर रहे मुधकान व पीपीसीएल कंपनियों से लेवी वसूलने की थी। वे अपने अन्य साथियों के इंतजार में वहां खड़े थे। गिरफ्तार माओवादियों के पास से 23.15 बोर का दो देसी पिस्टल, 4 कारतूस व एक किलो विस्फोटक बरामद हुआ है। सभी नक्सली स्थानीय हैं।

बताया जाता है कि थानाध्यक्ष अशोक कुमार को रिक्शा पड़ाव के पास बने यात्री शेड में संदिग्ध परिस्थितियों में होने व किसी का इंतजार करने की गुप्त सूचना मिली। त्वरित कार्रवाई कर उन्होंने उक्त स्थल की घेराबंदी करते हुए सभी को दबोच लिया। तलाशी के क्रम में असलहे बरामद हुए। सूचना के बाद रजौली एसडीपीओ अजय कुमार अकबरपुर पहुंचे और गिरफ्तार लोगों से पूछताछ की। इनलोगों की निशानदेही पर अन्य ठिकानों पर छापेमारी शुरू की गयी है।

सूत्रों के अनुसार कुछ दिन पूर्व रोहित नाम से अपने आपको एमसीसी का कमांडर बताकर उक्त कंपनियों से लेवी की मांग की गयी थी। रविवार को लेवी दी जानी थी। गोविन्दपुर थाना के अधिकारी सुमेश्वर लकड़ा इन युवकों पर नजर रखते हुए पीछा कर रहे थे। लेकिन गिरफ्तारी का श्रेय अकबरपुर को मिला। सूत्रों के अनुसार गिरफ्तार युवक रजौली थाना क्षेत्र के रमडीहा निवासी सुनील यादव, करिगांव का मंटू राजवंशी, पटना अनिशाबाद का विरेन्द्र उर्फ नेरवा तथा एक अकबरपुर का ही निवासी है। एसपी अनिल किशोर यादव ने इस संबंध में कुछ बताने से परहेज किया। लेकिन स्थानीय लोगों ने गिरफ्तार युवकों को पहचाना है तथा उसके नामों का भी खुलासा किया है।

नक्सल प्रभावित धरहरा में विकास आयुक्त ने टटोली ग्रामीणों की नब्ज

मुंगेर। नक्सलियों के गढ़ धरहरा प्रखंड में सूबे के विकास आयुक्त केसी साहा ने सोमवार को पांच पंचायतों का दौरा कर न सिर्फ विकास कार्यो का जायजा लिया बल्कि आगामी विकास योजनाओं के लिए ग्रामीणों की नब्ज भी टटोली। वरीय अधिकारियों की फौज को साथ ले गांव में पहुंचे विकास आयुक्त ने ग्रामीणों से उनकी समस्याओं के निजात के लिए राय भी मांगी। किसी ने पेयजल तो किसी ने सिंचाई सुविधा व बिजली की समस्या से मुक्ति के लिए श्री साहा से आग्रह किया। ग्रामीणों की समस्याओं को उन्होंने गंभीरता से सुनने के साथ उसके समाधान का आश्वासन दिया।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत सबसे पहले विकास आयुक्त ईटवा पंचायत गये जहां उन्होंने इंदिरा आवास के लाभुकों के बीच पासबुक वितरित किया। पासबुक देते समय मकान बनाने के लिए लाभुकों को नसीहत दी। इसके बाद उनका कारवा बढ़ा धरहरा प्रखंड मुख्यालय की ओर, जहां प्राथमिक स्वस्थ्य केंद्र का मुआयना कर स्थिति से अवगत हुए। अस्पताल की व्यवस्था देख श्री साहा खुश हुए। चिकित्सकों से उनकी कार्यप्रणाली जानी और उनकी समस्याओं के बारे में भी पूछताछ की। सिविल सर्जन केसी सिंह ने स्वास्थ्य कर्मियों के लिए आवास की सुविधा नहीं होने की समस्या से विकास आयुक्त को अवगत कराया। इसके बाद श्री साहा आजिमगंज पंचायत गये। आजिमगंज में मुखिया अजय राय से पंचायत की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी ली। गांव में इंदिरा आवास, पेयजल के साथ ही राशन-किरासन का मुद्दा ग्रामीणों ने उठाया। यहां ग्रामीणों ने तालाब व कुंआ खुदवाने की मांग की। गांव में लगे सोलर के बारे में भी अधिकारियों ने जानकारी की। विकास आयुक्त श्री साहा ने आजिमगंज पंचायत के गोरैया व सखौल गांव में नक्सलियों द्वारा उड़ाये गये विद्यालय भवन को भी देखा और इससे काफी आहत हुए। गोरैया में इंदिरा आवास के लाभुकों से अपने बने आवास को दिखाने की बात कहीं। निरीक्षण में आधा-अधूरा आवास बना मिला। इस पर उन्होंने लाभुकों से मकान बनाने को कहा।

इसके बाद अधिकारियों का काफिला पहुंचा बंगलवा पंचायत स्थित मध्य विद्यालय पर। यहां शिक्षकों की कमी की बात सामने आने पर उसे दूर करने का निर्देश बीईओ को दिया गया। इसके अतिरिक्त ननमाडा योजना अंतर्गत 44 आदिवासियों को दस हजार रुपये प्रति व्यक्ति की दर से ठेला खरीदने हेतु सहायता प्रदान की गयी। यहां ग्रामीणों ने बहुप्रतीक्षित सतघरवा जलाशय परियोजना को चालू कराने का आग्रह किया। इसके अतिरिक्त भी कई मांगों को ग्रामीणों ने विकास आयुक्त के समक्ष रखा। इसके बाद श्री साहा माताडीह पंचायत गये और कई योजनाओं को देखा।

इस अवसर पर डीएम अरविंद कुमार सिहं, डीडीसी एसएन झा, एडीएम सतीशचंद्र झा, वरीय उपसमाहर्ता राजेश कुमार, डीडब्ल्यूओ रमेश चंद्र प्रसाद, डीएसई दिनेश चौधरी, थानाध्यक्ष मनोज महतो, कोतवाली थानाध्यक्ष गौतम कुमार सिंह सहित दर्जनों पुलिस बल व सैप जवान मौजूद थे।

माओवादियों ने सर्वोदय आश्रम को डाइनामाइट लगाकर उड़ाया

बांकेबाजार (गया) गया जिले के इमामगंज थाना अंतर्गत जंगल के बीच अवस्थित सर्वोदय आश्रम लुटुआ का पक्का भवन माओवादियों ने रविवार की रात्रि में डायनामाइट विस्फोट कर उड़ा दिया। विस्फोट से आश्रम का चार पक्का कमरा बिल्कुल ध्वस्त होने की स्थिति में हो गयी है और शेष चार कमरा बिल्कुल क्षतिग्रस्त हो गया है। आश्रम के ही बगल में एक बड़ा बना पक्का छतेदार हाल में आग लगाकर कागजात वगैरह जला दिया गया है। हाल में पत्तल-प्लेट बनाने की रखी मशीन सुरक्षित बच गयी। वहीं कर्कट के दो कमरे भी आग के हवाले कर दिये।

घटना स्थल पर माओवादियों ने कोई पर्चा नहीं छोड़ा था। लेकिन ग्रामीण सूत्रों एवं इमामगंज पुलिस ने घटना का अंजाम देने में माओवादियों का ही हाथ होने की बात बतायी गयी। ग्रामीण ने बताया रविवार की आधी रात में 50-60 की संख्या में आये सशस्त्र माओवादियों ने आश्रम के चारों ओर डायनामाइट लगाकर विस्फोट कर किया तथा भवन उड़ाने के बाद नारे लगाते चले गये।

बता दें कि आज से लगभग 20 दिन पूर्व ग्रीन हंट आपरेशन के लिए लुटुआ आश्रम पर कोबरा बटालियन का कैम्प स्थापित किया गया था। उसी दरम्यान 2 अप्रैल की रात्रि में कोबरा पुलिस एवं माओवादियों के बीच रात भर मुठभेड़ चली थी। बाद में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुई घटना के दो दिन बाद कैम्प हटाकर पुलिस को वापस कर दिया गया था। आश्रम खाली देखकर माओवादियों ने उड़ा दिया। बताया जाता है कि आश्रम में पुलिस कैम्प स्थापित करने के कारण ही भवन को ध्वस्त किया गया है।

हमले के डर से पलायन कर रहे लोग

बिक्रम पालीगंज थाना क्षेत्र के पियरपुरा गांव में माओवादी हमले के भय से लोग पलायन करने लगे है। माओवादी हमले का शिकार मौरी गांव का खौफ पियरपुरा गांव में व्याप्त है। उल्लेखनीय है कि पियरपुरा में प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत मुखिया राजेन्द्र सिंह के पुत्र चंदन कुमार द्वारा काम कराया जा रहा है। माओवादियों द्वारा लेवी की मांग की गई। इस बात पर दोनों पक्षों में मारपीट हुई। घटना के बाद माओवादियों द्वारा हमले की योजना बनाने की अफवाह उड़ रही है। माओवादियों के भय से मुखिया परिवार सहित गांव के दर्जन भर लोग पलायन कर चुके है। क्त घटना के संबंध में पुलिस कुछ भी बताने से इनकार कर रही है। थाना परिसर में बड़े पैमाने पर फोर्स कैम्प कर रही है। ग्रामीण सूत्रों का कहना है कि यदि पुलिस सतर्क नहीं रही तो कभी भी माओवादियों द्वारा गांव पर हमला हो सकता है। बहरहाल माओवादियों की सक्रियता से गांव में दहशत व्याप्त है।

माओवादियों से भिड़ सकती है माले

पटना पूर्वी बिहार के माओवादी घुसपैठ वाले इलाकों में भाकपा(माले) ने अपने जनाधार विस्तार की योजना बनायी है। इस क्रम में माओवादियों से उनके सीधे टकराव की संभावना है। मध्य बिहार में विभिन्न माओवादी संगठनों की घुसपैठ नाकाम बनाने के बाद माले ने यह रणनीति बनायी है। हालांकि इस क्रम में पिछले तीन दशकों में इसके 250 से अधिक कार्यकर्ताओं को इन संगठनों ने मौत के घाट उतारा है। पूर्वी बिहार के जिन इलाकों में माले ने अपने विस्तार की योजना बनायी है उनमें माओवादियों की उपस्थिति वाले जमुई, खगड़िया, अररिया और सुपौल शामिल हैं। जमुई में पिछले दिनों आठ लोगों की हत्या के बाद माओवादियों द्वारा बदले की कार्रवाई में पांच ग्रामीणों की हत्या किये जाने की घटना के बाद से भाकपा वहां की गतिविधियों पर नजर रखे है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि वंचित तबके ने अपने हितों की रक्षा के लिए वहां माओवादियों से आस लगाना शुरू कर दिया था। परन्तु हाल की घटना के बाद उनका मोह भंग हुआ है। वे अब माले से संपर्क कर रहे हैं। पार्टी जमुई में इनकी मदद को जाएगी और इस क्रम में माओवादियों से टकराव हो तो भी इसकी परवाह नहीं की जाएगी। सूत्रों ने कहा कि हमारे लिए ये कोई नयी बात नहीं होगी। जिन माओवादी संगठनों-एमसीसी, पार्टी यूनिटी और पीपुल्स वार को मिलाकर माओवादी संगठन भाकपा(माओवादी) बना है, उसके घटक दलों से पिछले तीन दशकों से हमारा टकराव होता रहा है। तीस साल पहले जब भोजपुर से माले ने अपनी शुरूआत की तब प्रचार के क्रम में हमें एमसीसी और पार्टी यूनिटी दोनों से धमकी मिलती थी। ये संगठन राजनीतिक लड़ाई के बदले सीधे टकराव को अधिक पसंद करते थे। इसके चलते जनता के बीच से हमें उन्हें राजनीतिक तौर पर दरकिनार करने में सफलता मिली। माले ने फिर जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और गया में अपनी सक्रियता बढ़ाई। नतीजतन इन इलाकों से पार्टी यूनिटी और एमसीसी को हटना पड़ा। यह भी हुआ कि जातीय आधार पर बनी निजी सेनाओं से नहीं लड़ पाने और कई प्रमुख जनसंहार में गवाहों की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित नहीं कर पाने के कारण भी जनता से ये दूर होते गये। वैसे, मध्य बिहार में इन माओवादी संगठनों के निशाने पर सबसे अधिक माले कार्यकर्ता ही रहे। अब तक करीब 250 से अधिक माले कार्यकर्ताओं की हत्या इनके द्वारा की जा चुकी है। वीरेंद्र विद्रोही, रामेश्वर मुनी जैसे माले नेता इनके हमलों में मारे गए। 90 के दशक में तो सत्ताधारी दल ने इन नक्सली संगठनों की मदद की। 2005 में पाली स्थित माले कार्यालय में पांच माले कार्यकर्ताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया गया। इस घटना में उस वक्त के विधायक दीना यादव भी नामजद अभियुक्त बनाये गये। उनकी पार्टी ने इस हत्याकांड में शामिल होने के कारण उन्हें छह माह के लिए पार्टी से निलंबित भी कर दिया। यह मुकदमा अभी भी न्यायालय में लंबित है।

जेएनयू का नया घमासान नक्सल बनाम राष्ट्रवाद

नई दिल्ली । दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों के शहीद होने को लेकर जेएनयू के छात्र दो गुटों में बंट गए हैं। कैंपस में वामपंथी छात्र संगठन जहां नक्सलियों की कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं, वहीं एबीवीपी व एनएसयूआई के छात्र इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर विरोध में खड़े हो गए हैं। जेएनयू में पिछले दिनों इस मुद्दे को लेकर हुई झड़प के मामले में कोई कार्रवाई नहीं किए जाने से नाराज छात्रों ने वीसी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रवादी नारे लगाए तथा नक्सलियों का समर्थन कर रहे छात्र संगठनों पर पाबंदी लगाने की मांग की।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोमवार दोपहर कुलपति कार्यालय के सामने नक्सलवाद के विरोध में दर्जनों छात्र एकत्र हुए। स्टूडेंट अगेंस्ट नक्सलिज्म के बैनर तले छात्रों ने नक्सलियों के समर्थन में कैंपस में चल रही गतिविधियों पर नाराजगी जाहिर की। वक्ताओं ने कहा कि परिसर में छत्तीसगढ़ में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों को श्रद्धांजलि देने के बजाय जश्न मनाया जा रहा है। उन्होंने इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन को भी कठघरे में खड़ा किया दिया।

सभा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जेएनयू इकाई के सचिव विनीत चतुर्वेदी ने कहा कि फोरम अंगेस्ट वार ऑन पीपुल के बैनर तले वाम समर्थित छात्रों ने पिछले दिनों कैंपस में बिना अनुमति के नक्सलवाद के समर्थन में कार्यक्रम किया था। इस पर एतराज जताने पर नक्सल समर्थक छात्रों ने उन पर हमला कर दिया था। इसकी जानकारी होने के बावजूद प्रशासन ने न तो कार्यक्रम बंद कराया और न ही दोषी छात्रों के खिलाफ कोई कार्रंवाई की।

एनएसयूआई के जेएनयू इकाई के अध्यक्ष सुनील झाझरिया ने कहा कि उन्होंने संगठन की ओर से इस संबंध में रेक्टर आर. कुमार को अपनी चार सूत्री मांगों का ज्ञापन सौंपा है। अगर उनकी मांगें नहीं मानी जाती तो आगे भी विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। इस मौके पर एनएसयूआई के जेएनयू इंचार्ज शेख शाहनवाज, भरत कुमार, सुधीर कुमार शर्मा व अमित रंजन भी मौजूद थे।

किशन जी पर 12 लाख का ईनाम !

रांची। पुलिस ने राज्य सरकार के पास एक संस्तुति भेजी है जिसमें उसने शीर्ष नक्सली नेता किशनजी का सुराग देने वाले को 12 लाख रुपये का ईनाम दिए जाने की बात कही है। वहीं दूसरी तरफ नक्सलियों ने भी सात पुलिस अधिकारियों को पकड़वाने वाले को 'ईनाम' देने की घोषणा की है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया, "पुलिस मुख्यालय की तरफ से राज्य के गृह मंत्रालय के पास संस्तुति भेजी गई है जिसमें किशन जी की सूचना देने वाले को 12 लाख रुपये तक का ईनाम दिए जाने की बात कही गई है।" गौरतलब है कि नक्सली नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी को पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, और उड़ीसा में वांछित घोषित किया गया है। किशन जी के पश्चिम बंगाल-झारखण्ड सीमा से सटे जंगली क्षेत्रों में छुपे होने की आशंका जताई जा रही है। प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने भी रांची, हजारीबाग, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम, लोहारदगा के पुलिस अधीक्षकों सहित दो अन्य अधिकारियों को पकड़वाने में मदद करने वाले को 10 लाख रुपये का ईनाम देने की घोषणा की है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया, "पुलिस अधिकारियों पर नक्सलियों द्वारा की गई ईनाम की घोषणा के बारे में पता चला है। पहले भी वे ऐसा कर चुके हैं।

बस्तर : कौन पहुंचाता है नक्सलियों को रूपये और हथियार

संवेदनशील क्षेत्रों में चुनौतियों के मध्य कार्य

जगदलपुर ! बस्तर संभाग में आए दिन नक्सलियों द्वारा की जा रही विस्फोटक व हिंसक घटनाओं से बस्तर के जनमानस में अब यह बात कौंधने लगी है कि नक्सलियों के आर्थिक मददगार कौन हैं तथा गोला बारूद सहित हथियारों के जखीरे प्राप्त करने का श्रोत क्या हैं, उन पर कड़ी नजर कैसे रखी जाए ?


बस्तर संभाग के संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को गंभीर चुनौतियों के मध्य कार्य करना पड़ रहा है। आए दिन नक्सलियों द्वारा किए जा रही विस्फोट की घटनाओं से सुरक्षा बलों को अपने सुरक्षा संबंधी निर्देशों के पालन पर गंभीर रहकर हादसों को टालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। विगत दिनों सुरक्षा बल के 84 जवानों की रोड ओपनिंग पार्टी नक्सली हमले का शिकार हो गई। बस्तर में नक्सली सुरक्षा बलों के साथ तू डाल-डाल और मैं पांत-पांत का खेल, खेल रहे हैं। नक्सली पात वितरण में माहिर हैं तभी जवान उनकी कुटिल चालों का शिकार हो गए।


नक्सलियों द्वारा बार-बार किए जाने वाले विस्फोटों के बाद यह विचारणीय प्रश् है कि नक्सलियों को गोलाबारूद एवं आर्थिक सहायता बस्तर के किन श्रोतों से प्राप्त हो रही है साथ ही बस्तर संभाग में हर बार सुरक्षा बलों द्वारा लिए गए फैसलों में ऐसी चूकों से बड़े-बड़े हादसे होते रहते हैं। प्रभावित क्षेत्रों के सुरक्षा बलों की हर पल की खबर नक्सली अपने पास रखते हैं और बार-बार सुरक्षा बलों के जवान उन्हें गाहे-बगाहे हादसों का मौका देते रहते हैं। सुरक्षा बलों की छोटी सी चूक की भारी कीमत चुकाने से शासन भी चिचिंत है और पुलिस अधिकारियों को प्रदेश के गृहमंत्री एवं मुख्यमंत्री अपने सुरक्षा बलों को इस प्रकार की चूक न करने की कडी हिदायत दे रहे हैं। देखना यह है कि बस्तर में तैनात सुरक्षा बल अपनी चूकों को सुधारेंगे या फिर यूं ही हादसों का सिलसिला चलता रहेगा।


इन नक्सली घटनाओं के पीछे दूसरे कारणों में जाने की जरूरत भी संबंधित विभाग को महसूस करने की आज नितांत आवश्यता है। बस्तर में नक्सलवाद को आर्थिक सहायता कहां से प्राप्त होती है, उन्हें गोला बारूद एवं हथियार कहां से प्राप्त होते हैं इन कारणों पर गौर करने की जरूरत है। गौरतलब है कि बस्तर में तेन्दूपत्ता के सीजन में ही नक्सली वारदातें क्यों जोर पकड़ती हैं और हमेशा से यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि बीड़ी पत्ता ठेकेदारों से माओवादियों की साठगांठ होने से ही तेन्दूपत्ता का व्यवसाय बस्तर में निर्विघ् संपन्न होता है। हर साल इस तरह के शिकायतों के बाद भी तथा बस्तर संभाग में पदस्थ कुछ निर्माण एजेंसियों एवं वन विभाग के कर्मचारी-अधिकारी जो बिना अंदर वालों के परमिशन के विभागीय कार्य संपन्न नहीं करा सकते वे करोडों रूपए का खर्च किस तरह इन क्षेत्रों में दर्शाते हैं, जहां पर नक्सली खौफ के चलते कोई भी अधिकारी, कर्मचारी विकास कार्य संपन्न नहीं कराते। यह एक विचारणीय प्रश् है और वक्त की जरूरत है उन कारणों में जाने की जिससे बस्तर में नक्सलियों को रसद, आर्थिक सहायता, गोला बारूद तथा हथियार कहां से प्राप्त होते हैं।

उड़ीसा सीमा से नक्सली घुसपैठ

जगदलपुर ! संभागीय मुख्यालय से लगभग 80-100 किमी। दूर भैंसादरहा के बाद लगनेवाली उड़ीसा की सीमा से नक्सलियों के धुरवा बाहुल्य क्षेत्र में घुसपैठ की खबर है। यही नहीं नक्सलियों के ग्रामिणों के बीच अपनी पैठ बनाने उनकी बोली और संस्कृति को सिखने और समझने शुरू कर देने की भी सूचना मिली है।

खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार दरभा थाना से महज 80 किमी। दूर उड़ीसा की सीमा शुरू हो जाती है, निर्जन और बीहड़ जंगल का फायदा उठाकर नक्सली इस थाना क्षेत्र के उड़ीसा सीमा से लगे कोलेंग, छिंदपुर, कोदानार, ककालुर, पेदावाड़ा, कोटमसर समेत अन्य धुरवा बाहुल्य क्षेत्रों में दस्तक दे गये हैं। दरभा से मगरमच्छों का प्राकृतिक निवास स्थल मानी जाने वाली भैंसादरहा मात्र 40 किमी. दूर उड़ीसा की सीमा प्रारंभ हो जाती है। बताया गया कि उड़ीसा की सीमा बीहड़ जंगल-पहाड़ों से घिरे होने के कारण नक्सली आसानी से धुरवा बाहुल्य उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने लग गये हैं। परपा थाना क्षेत्र के नेतानार क्षेत्र के एक ग्रामीण ने उनके क्षेत्र में नक्सली आमद की पुष्टि करते हुए बताया कि वे धुरवा बोली में बात करते हैं इसलिये उनकी नक्सली के रूप में पहचान करना आसान नहीं है।

गौरतलब है कि इससे पूर्व कांग्रेर घाटी के आस-पास भी नक्सली हलचल की खबर मिल चुकी है। सूत्रों का कहना है कि कोलेंग समेत धुरवा बाहुल्य क्षेत्र के ग्रामीणों को नक्सलियों के आमद की खबर है।

मगर वे किस वजह से पुलिस को इसकी सूचना नहीं देते, यह नहीं मालूम। दरभा के थाना प्रभारी महेन्द्र धु्रव फोन से चर्चा में स्वीकार किया कि दरभा के जंगली इलाकों में इक्के-दुक्के नक्सलियों के आमद की सूचना मिली थी, जिसके बाद उन्होंने स्वयं भैंसादरहा क्षेत्र में सिविल ड्रेस में अपने कुछ साथियों के साथ गश्त पर गये थे इस दौरान उन्होंने गोपनीय ढंग से नक्सलियों के दस्तक के बारे में गेहूंपदर, चलालगुर समेत कुछ अन्य गांव के ग्रामिणों से पूछताछ की थी मगर उनके बारे में कोई सुराग हाथ नहीं लगी।

नक्सली नेताओं ने ली ताडमेटला कांड की जिम्मेदारी

जगदलपुर। छत्तीसगढ के दंतेवाडा जिले के चिंतलनार थाना क्षेत्र के ताडमेटला के जंगल में हाल में सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड की जिम्मेदारी माओवादी नक्सली संगठन के तीन नेताओं ने ली है। इस घटना में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गये थे और 8 नक्सली भी मारे गये थे। नक्सली संगठन (मओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव कोसा, प्रवक्ता गुडसा उसेण्डी और रमा के हस्ताक्षरों से कल जारी एक संयुक्त विज्ञप्ति में 6 अप्रैल. को हुये ताडमेटला कांड की जिम्मेदारी लेते हुये इस वारदात को नक्सली नेताओं की हत्या तथा आपरेशन ग्रीनहंट की जवाबी कार्रवाई बताया है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस घटना को नक्सलियों के पीपल्स लिबरेशन गुरिला स्कॉर्ट .पीएलजीएस. के 300 सदस्यों ने अंजाम दिया था। लगभग तीन घंटे तक चली इस मुठभेड में .सीआरपीएफ .के 76 सुरक्षाकर्मी और 8 नक्सली मारे गये थे। बाद में नक्सलियों ने पुलिस जवानों के 75 हथियार भी लूट लिये थे। विज्ञप्ति में नक्सली नेताओं ने सरकारी कार्रवाई के विरोध में आगे भी इसी प्रकार का संघर्ष करते रहने की चेतावनी दी है।

नक्सलियों से भूखे-प्यासे लड़ेंगे जवान!

सीआरपीएफ के जवानों ने सुनाई आप-बीती
मलेरिया, जहरीले कीड़ों और सांपों से खुद को बचाने में असहाय

दोरनापाल ! पिछले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक कैंप का दृश्य। यह चेक पोस्ट भी है और जवानों के रहने और सोने की जगह भी। छह साल से सरकार गला फाड़-फाड़ कर यह चिल्ला रही है कि भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माओवादी हैं। इसके बावजूद भारत सरकार अपने सैनिकों को भूखे-प्यासे और बिना मेडिकल सुविधाओं के उन्हें माओवादियों से लड़ने के लिए भेज रही है। घने जंगलों में माओवादियों के खिलाफ लड़ रहे सीआरपीएफ के जवानों का कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ा खतरा ( माओवादियों ) एक ही है। चिंतलनार कैंप में सीआरपीएफ की 62 वें बैटालियन के जवान ठहरे हैं , उनका कहना है कि वह माओवादियों के हमले से खुद को बचा सकते हैं , लेकिन मलेरिया , जहरीले कीड़े-मकोड़ों और सांपों से खुद को बचाने में असहाय हैं। दूसरे कैंपों की हालात भी कुछ अच्छी नहीं है। यह बात एक जवान ने अपनी पहचान छुपाए रखने की शर्त पर बताई।

कैंप में रहने वाले एक जवान ने बताया कि हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या मलेरिया से जूझना है। जवान लगातार बीमार हो रहे हैं। हममें से कुछ लोगों को बीमारी के चलते छुट्टी लेनी पड़ी। इससे भी बदत्तर हालात है कि हमारे पास किसी तरह की मेडिकल सुविधा नहीं है। उन्होंने बताया- आप क्वॉलिफाइड डॉक्टरों की बात तो भूल ही जाइए यहां ढंग की दवाई की दुकानें तक नहीं हैं। स्थानीय डॉक्टर आपको मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए भी रेग्युलर दवाइयां दे देंगे। सबसे नजदीकी हॉस्पिटल भी मीलों दूर है। यह दुर्दशा सिर्फ हमारी नहीं है, बल्कि घने जंगलों में बनाए गए हर कैंप का यही हाल है। जवान इन्हीं हालात से गुजर रहे हैं।

सीआरपीएफ के एक कॉन्स्टेबल ने कहा- मेडिकल सुविधाओं का अभाव तो है ही, जवानों को जहरीले कीड़े- मकोड़े और सांप भी काट रहे हैं। रात में कब क्या आपको काट जाए आप कह ही नहीं सकते। गश्ती दल की बात तो छोड़िए कैंप में भी जवान सुरक्षित नहीं है। अगर किसी जवान को कोई जहरीला कीड़ा या सांप वगैरह काट ले तो उसे बचाने का कोई उपाय नहीं है।

कई जवानों ने यह भी बताया कि कई बार गश्त पर जाने वाली टुकड़ियों के पास पर्याप्त भोजन भी नहीं होता। सेना के जवानों को ऑपरेशन के समय पर्याप्त मात्रा में ड्राइ फ्रुट्स और खाने-पीने की दूसरी चीजें मिलती हैं, लेकिन हमें भूखे-प्यासे लड़ना पड़ता है। सीआरपीएफ के एक जवान ने कहा कि जिन परिस्थितियों में हमारे जवानों को लड़ना पड़ता है उन्हें उसी के मुताबिक भोजन चाहिए।

एक जवान ने कहा- कैंपों में पानी की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कैंपों में कुछ पंपों की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन बिजली के अभाव में वह भी बेकार है। यहां पानी एक बहुत बड़ी परेशानी है। उन्होंने कहा कि हमें समझ नहीं आता कि इस तरह के माहौल में जहां हमें काम करना है, जहां दिन में भीषण गर्मी पड़ती है, वहां बिना पानी के हम कैसे काम करें। उन्होंने कहा- पर्याप्त पानी ले जाने की कोई व्यवस्था न होने के कारण जवानों को कई बिना पानी के गश्त पर जाना पड़ता है। आगे उन्हें पानी मिल जाएगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती। कई बार हम उन्हीं तालाबों का पानी पीते हैं जहां जानवर पानी पीते हैं। ऐसे अनहाइजिनिक माहौल में रहते हुए जवान बीमार पड़ रहे हैं। इसके अलावा कई बार अनुशासन के नाम पर हम लोगों को उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ता है।

एक जवान ने कहा- दिल्ली में बैठे नेताओं के लिए बड़े- बड़े दावे करना और छाती ठोकना आसान है, लेकिन जमीन पर असली लड़ाई में जूझने वाले कहते हैं कि वे इस स्तर की लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि, हम ऐसी लड़ाई में जान गंवा रहे हैं, जिसका कभी हल नहीं निकल सकता। और भी कई तरीके हैं, जिनके जरिए हमारी ताकत का बेहतर तरीके से उपयोग किया जा सकता है।

दंतेवाड़ा में कोबरा कमांडो ने संभाली कमान


दंतेवाड़ा ! दंतेवाड़ा हमले के बाद एक बार फिर सीआरपीएफ ने उस इलाके की छानबीन शुरू कर दी है, लेकिन इस बार इस छानबीन की कमान कमांडो के हाथ में है। सीआरपीएफ की स्पेशल एक्शन फोर्स के कमांडो उस इलाके में जा रहे हैं, जिस इलाके में यह हमला हुआ था। इन जवानों को खासतौर पर नक्सली इलाकों में लड़ाई की ट्रेनिंग मिली हुई है। दंतेवाड़ा के चिंतलनार के पास सुरक्षाबलों का जमावड़ा लगातार बढ़ रहा है। गुरिल्ला युध्द के लिए खासतौर पर तैयार की गई कोबरा फोर्स, जिसे अब एसटीएफ कहा जाता है, यहां उतर चुके हैं। साथ ही स्थानीय आदिवासियों की मदद से बनाए गए स्पेशल पुलिस अफसर भी यहां उतर चुके हैं। जाहिर है नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज होगा, तो उसकी मार आदिवासियों पर भी पड़ सकती है। चिंतलनार में जवानों की ह्त्या के बाद यहां सन्नाटा है। यहां की बस्ती उजड़ चुकी है और लोग घर-बार छोड़कर भाग गए हैं। आदिवासी इस डर से भाग गए हैं कि सुरक्षाबलों और नक्सलियों के संघर्ष में कहीं वे पिस न जाए।

नक्सलवाद: जनतांत्रिक विमर्श से ही हल निकलेगा

ह म बात इस प्रश्न से ही शुरू करें कि नक्सल समस्या का हल क्या है। क्या यह ऐसा प्रश्न है जिसे बड़े-बड़े वक्तव्यों से हल किया जा सकता है। क्या पश्चिम बंगाल या छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति शासन लगा देना इसका उत्तर है? क्या सेना की तैनाती कर मामले को सुलझाया जा सकता है?, क्या धरना, बंद और प्रदर्शन मसले को हल करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं? क्या मोमबत्तियां जलाकर राह पाई की जा सकती है? क्या एसएमएस, फेसबुक और टि्वटर पर संदेश भेजने से कोई रास्ता खुलता है? क्या अपने आपको जनसामान्य का प्रवक्ता होने का दावा करने वाला मीडिया असंतुलित टिप्पणियां कर समाधान की दिशा में ले जा सकता है? अभी यही सब हो रहा है। अगर थोड़ा भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश करें तो उत्तर मिलेगा कि इन सबसे नक्सल समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा।

दूसरी तरफ भी देखें। क्या भारत में फर्जी लोकतंत्र या ''फेक डेमोक्रेसी'' है जैसा कि कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं? क्या भारत में नेपाल जैसी स्थितियां हैं या वेनेजुएला जैसी? ऐसा क्यों होता है कि कनु सान्याल जैसे नक्सलवाद के पुरोधा अपने जीवन की संध्या में गांधीवाद की पैरवी करने लगते हैं? क्या इंटरनेट पर लंबे चौड़े बयान जारी करना ही किसी की वामपंथी सामाजिक चेतना का सच्चा सबूत है? क्या निर्दोष नागरिकों की या किसी सिपाही की हत्या कर देना क्रांति का पर्याय है? ये जो 76 सिपाही अभी मारे गए और बहुत से उनके पहले, क्या ये वर्गशत्रु थे? अगर इन प्रश्नों पर भी शांत और संयत मन से विचार किया जाए तो एक बार फिर उत्तर ''नहीं'' में ही मिलेगा।

तब फिर रास्ता क्या है? मैं महाश्वेता देवी का बहुत सम्मान करता हूं। उन्होंने अभी हाल में पुन: चर्चा करने की वकालत की है। लेकिन चर्चा किससे की जाए और कब की जाए और उसका नतीजा क्या निकलेगा? वरवरा राव का भी मैं बहुत आदर करता हूं। किसी समय आंध्र सरकार ने उनकी मध्यस्थता स्वीकार की थी। लेकिन क्या इससे कोई वांछित हल निकल सका? ऐसे ही अनेक संवेदनाओं से भरपूर जिम्मेदार व्यक्ति नक्सलियों अथवा माओवादियों से चर्चा जारी करने का प्रस्ताव जब-तब देते रहते हैं। केंद्र और प्रदेश सरकारों ने भी बीच-बीच में वार्ता के प्रस्ताव रखे हैं। नक्सली नेताओं ने भी कुछ माह पूर्व शस्त्र विराम का प्रस्ताव पेश किया था। लेकिन इनमें कौन कितना गंभीर है और क्या सचमुच वार्ता के लिए अनुकूल माहौल है? मुझे कम से कम इसकी उपयोगिता आज नजर नहीं आती।

दरअसल नक्सल समस्या को बहुत सीमित संदर्भों में देखना ही समाधान पाने की दिशा में सबसे बड़ा अवरोध है। अगर वृहत्तर पृष्ठभूमि में समझने की ईमानदार कोशिश हो तो साफ-साफ दिखाई देता है कि भारतीय जनतंत्र में उसकी तमाम वैधानिकता के बावजूद जनतांत्रिक विमर्श के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। परिणाम स्वरूप जनतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में भी बाधा पहुंच रही है। अगर इसमें सबसे पहले किसी को पहल करना है तो वह सरकार को ही करना होगी। यह हम जानते हैं कि पिछले बीस साल में भारत सहित विश्व के तमाम विकासशील समाजों पर नई प्रौद्योगिकी का सहारा लेकर पूंजीतंत्र बेतरह हावी हो गया है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच के रिश्ते पूरी तरह से बदल गए हैं। अब इससे न तो बचा जा सकता है और न बीते दौर में लौटना ही संभव है; लेकिन जो शासन व्यवस्था एक स्वस्थ संविधान की बिना पर स्वयं को लोककल्याणकारी राज्य घोषित करती है, उसकी जिम्मेदारी क्या है?

आज ''हिन्द स्वराज'' का समय नहीं है। औद्योगिकीकरण हो रहा है और होते रहेगा। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इस नए दौर की अनिवार्य शर्त है। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि जनता को विश्वास में ही न लिया जाए; उसकी राय भी न पूछी जाए। क्या जनता के द्वारा चुनी गई सरकार को ग्रामसभा जैसी जनतांत्रिक तरीकों का आदर नहीं करना चाहिए? क्या पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के लिए संवैधानिक प्रावधानों को ताक पर रख देना चाहिए? अगर सरकार के निर्णय या मंशा से जनता सहमत नहीं है तो क्या थोड़ा सा धीरज रखना बेहतर नहीं होगा? सरकार के किसी भी कदम का जनतांत्रिक तरीके से विरोध देशद्रोह तो नहीं है न! मुश्किल यह है कि राजनीतिक दलों को लोक शिक्षण का जो अनिवार्य काम करना चाहिए वह उन्होंने बहुत पहले छोड़ दिया है। चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि जनता से सीधे-सीधे बात करने में कतराने लगे है। सरकारें यद्यपि लोकहित में बहुत सी योजनाएं बना रही हैं लेकिन उसमें जनता को खैरात देने का भाव है, उनके अधिकार की स्वीकृति नहीं है। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है।

इस मुद्दे पर सरकार को आज गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए कि औद्योगिकीकरण के माध्यम से विकास का जो सपना संजोया जा रहा है, उसमें आम जनता की भागीदारी किस तरह से सुनिश्चित की जा सकती है। यह मानी हुई बात है कि बांध बनने से, सड़क बनने से, कारखाना खोलने से बहुत से जन विस्थापित होते हैं। किसी की जमीन चली जाती है तो किसी का जंगल छिन जाता है। अगर एक क्षण को हम कल्पना भी कर लें कि मुआवजा देने में कोई कमी नहीं रखी गई है तब भी इतना पर्याप्त नहीं है। जमीन और तालाब और पेड़- ये सब स्थायी परिसंपत्तियां हैं और इनके साथ व्यक्ति का, परिवार का भावनात्मक जुड़ाव होता है। मुआवजे में मिली रकम इस भावनात्मक रिक्ति की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकती। अधिकतर लोग हाथ में आई रकम के दीर्घकालीन उपयोग की योजना बनाने में भी सक्षम नहीं होते। तो जो सरकारें संवेदनशील होने के इतने बड़े-बड़े दावे करती हैं, वे विस्थापित हुए लोगों की मनोदशा समझने में क्यों असमर्थ हो जाती हैं? ऐसे में अगर कहीं असहमति और विरोध का स्वर उठे तो उस पर सरकार की प्रतिक्रिया किस रूप में होनी चाहिए? अगर विरोध करने वाले जुलूस निकाल रहे कर सभा कर रहे हों, पदयात्रा कर रहे हों या अखबार में बयान दे रहे हों तो क्या यह कोई अपराध है? क्या सरकार को शांतिपूर्वक इनकी बात नहीं सुननी चाहिए? यह तो जॉर्ज बुश जैसे अहंकारी व्यक्ति ही कह सकते हैं कि जो हमारे साथ नहीं हैं वे हमारे दुश्मन हैं। इस तरह का दर्प भारत की जनता को कुबूल नहीं हैं; और न भारतीय संस्कृति के अनुकूल है।

जहां तक आज के नक्सलियों या माओवादियों की बात है, ये कौन हैं हम नहीं जानते। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये 1967 के नक्सली नहीं हैं। ये 1948 के तेलंगाना के विद्रोही भी नहीं हैं। जो इनमें भगतसिंग का अवतार देखते हैं वे तो सच्चाई को देखने से ही इंकार करते हैं। आज के ये नक्सली तो जॉर्ज बुश की ही तरह उन आदिवासियों को अपना दुश्मन मानकर चलते हैं जो उनके साथ नहीं हैं। सरकार के अपने इरादे जो कुछ भी रहे हों, अगर नक्सलियों में आदिवासियों के प्रति प्रेम होता तो 640 गांव खाली होने की नौबत नहीं आती। और ये जो गांव खाली हो रहे हैं इनका क्या होगा? आने वाले समय में इनकी जमीनें कोई सरकार औद्योगिक घरानों को बेच देगी, बांट देगी तब किसका भला होगा? अगर इनमें आदिवासियों के प्रति ममता होती तो उनके बच्चों को रायपुर के नारायण राव जैसे फर्जी स्वयंसेवकों के आश्रम में आकर रहने पर मजबूर न होना पड़ता। अगर ये सचमुच वर्गयुध्द लड़ रहे होते तो जमीन-जेवर बेचकर सिपाही बने गरीब नौजवानों के खून से अपने हाथ न रंगते। इसके बाद भी जो इन्हें समर्थन या कम से कम संदेह का लाभ दे रहे हैं। उनकी समझ की बलिहारी है।

स्थितियां गंभीर हैं। हल आसान नहीं है। ऐसा कोई राजनेता नहीं है जिस पर जनता का बेहिचक विश्वास हो। जो महात्मा गांधी का नाम लेते हैं, वे गांधीवाद की दुकानें चला रहे हैं। जो नेहरू परंपरा की बात करते हैं, वे नेहरू को कब का भूल चुके हैं। जो लोहिया के वारिस हैं, वे छोटी-छोटी लड़ाईयों में लगे हुए हैं। जो एकात्म मानवतावाद के ध्वजावाहक हैं, उनका मानवतावाद रायपुर के एकात्म परिसर जैसे भवनों तक सीमित हैं। फिर भी आशा की किरणें दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए एक ऐसी किरण मेधा पाटकर के रूप में हमारे सामने हैं। हम सेवाभावी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात नहीं करते; उनका काम अलग तरह का है। लेकिन जो सामाजिक बदलाव के लिए आंदोलन करना चाहते हैं, उनके सामने सत्याग्रह का रास्ता खुला हुआ है। इस पर चलकर ही समाधान की दिशा में बढ़ा जा सकता है, भले ही उसमें अस्थायी तौर पर हार का सामना क्यों न करना पड़े। यही जनतांत्रिक भावना व परंपरा के अनुकूल होगा। लेकिन हिंसा हर रूप में त्याज्य है क्योंकि उससे प्रतिशोध व प्रतिहिंसा का मार्ग प्रशस्त होता है। दूसरे शब्दों में एक अंतहीन लड़ाई जो किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंचाती।

ललित सुरजन, संपादक, देशबंधु,

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