Monday, April 12, 2010

बड़े 'ऑपरेशन' की तैयारी

नक्सलियों की कमर तोड़ेंगे, रमन्ना और पापा राव निशाने पर

विनोद अग्निहोत्री, नई दुनिया


नई दिल्ली। केंद्र सरकार अब नक्सलियों के खिलाफ एक बड़े "ऑपरेशन" को अंजाम देने की तैयारी में है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि दंतेवाड़ा हमले के बाद केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस बलों का मनोबल बढ़ाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है। इसके तहत नक्सलियों पर अलग-अलग राज्यों और इलाकों में कई बड़े हमले करके उनकी कमर तोड़ी जाएगी।

सरकार ने इस "ऑपरेशन" के लिए जरूरी खुफिया जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बंगाल और बिहार के पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकों का दौर जारी है। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक दंतेवाड़ा में हमले के बाद नक्सलियों का हौसला बढ़ा हुआ है। दंतेवाड़ा हमले के बाद इस इलाके के बड़े नक्सली नेता वहाँ से चले गए हैं।

खुफिया सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों की योजना अब उड़ीसा और झारखंड में किसी बड़े हमले को अंजाम देने की है, क्योंकि इन दोनों राज्यों में पुलिस और प्रशासन कमजोर माना जाता है। नक्सली सुरक्षा बलों के मनोबल को कमजोर करना चाहते हैं। नक्सली कुछ करें, उसके पहले सरकार किसी आक्रामक ऑपरेशन को अंजाम देकर नक्सलियों का हौसला तोड़े। इसलिए गृह मंत्रालय में बैठकों के दौर जारी हैं। सरकार सुरक्षा बलों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ ऐसे दो-तीन बड़े ऑपरेशन करना चाहती है जिसमें बड़े नक्सली नेताओं को पकड़ा या मारा जा सके। सबसे पहले निशाने पर दंतेवाड़ा कांड के लिए जिम्मेदार रामन्ना और पापाराव जैसे नक्सली नेता हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अब अगर सरकार नक्सलियों से बातचीत भी करेगी तो इन बड़े ऑपरेशनों को अंजाम देने के बाद ही यह प्रक्रिया शुरू करेगी। गृहमंत्री पी. चिदंबरम और गृह सचिव जीके पिल्लई समेत सभी वरिष्ठ अधिकारियों की राय है कि फिलहाल नक्सलियों से बातचीत की गुंजाइश खत्म हो गई है।

नक्सलियों से मुठभेड क़े बाद हाईटेक हुई सुरक्षा

चिंतलनार. 11 अप्रैल. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के नक्सलवाद प्रभावित ताडमेटला के जंगल में हाल ही में नक्सली हमले के बाद पूरे बस्तर संभाग में हाई अर्लट घोषित कर दिया गया है और अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में हाईटेक सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। माओवादी संगठन से लड़ने के लिए क्षेत्र में तैनात जवान फूंक फूंक कर कदम रख रहें हैं। संगीनों के साये में पुलिस बल के जवान मोर्चा संम्हाले हुए हैं और उन्हें अपने सामान्य कार्य भी कड़ी सुरक्षा के बीच करने पड़ रहे हैं। ज्ञातव्य है कि माओवादी संगठन द्वारा पुलिस बल को अपना निशाना बनाने के लिए नदी, नाले, तालाब पोखर, जंगल और सड़क का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन स्थानों में प्रेशर टिफिन बम एवं बारूदी सुरंग, बिछाकर माओवादी घटना को अंजाम देते हैं। कई जवान इन स्थानों पर बम की चपेट में आ चुके हैं। इस तरह की घटनाओं से क्षेत्र में रह रहे अबुझमाड क़े निर्दोष आदिवासियों की भी मौता हुई है। नक्सलियों के बिछाए जाल में जवानों के अलावा कई निर्दोष आदिवासी ग्रामीण भी मारे गए हैं। सुरक्षा बल के अनुसार बल ताड़मेटला कांड भी नक्सलियों द्वारा बिछाए बारूदी विस्फोट का ही एक उदाहरण है। इसलिए क्षेत्र में सचग बड़ा दी गयी है। जवानों को हर कदम पर एहतियात बरतना पड़ रहा है। जवानों को पानी पीने के अलावा अपने आवश्यक कार्यो के लिए पहले सुरक्षा के पुख्ते इंतजाम करने पड़ रहे हैं। चार जवानों की सुरक्षा में एक जवान पानी पीने के अलावा दूसरे आवश्यक कार्य करता है।

रक्षा पर ध्यान देना जरूरी : चिदंबरमरक्षा पर ध्यान देना जरूरी : चिदंबरम


पुड्डुचेरी. 11 अप्रैल. केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने कहा है कि देश को रक्षा पर ज्यादा खर्च करना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान समेत कुछ पड़ोसी देशों का रवैया दोस्ताना नहीं है। कल देर रात एक जनसभा को संबोधित करते हुए श्री चिदम्बरम ने कहा कि ऐसे देश की रक्षा मद में 1.47 लाख करोड़ रूपए खर्च होते हैं जहां महात्मा गांधी ने अहिंसा का रास्ता दिखलाया था। देश की आंतरिक सुरक्षा पर 40 हजार करोड़ रूपए लगते है।देश में सक्रिय अलगाववादी ताकतें और नक्सली संगठनों के मुकाबले के लिए और पैसा खर्च होना चाहिए। गृहमंत्री ने कहा कि देश अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण ही महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना में 41 हजार करोड रूपए खर्च कर सकता है। उन्होंने कहा कि बारह हजार करोड़ रूपए ग्रामीण सड़कों के लिए दिए गए हैं। इसके अलावा आथक विकास की कई योजनाएं चल रही हैं। पिछले पांच सालों में देश की विकास दर औसतन 8.5 प्रतिशत रही है जबकि विश्व के कई देश मंदी की समस्या से जूझ रहे हैं। विश्व के कई बैंक दिवालिया हो गए जबकि भारतीय बैंक मजबूती से खडे हैं। उन्होंने कहा कि इसी वजह से जनता ने कांग्रेस को वोट दिया। साल 2004 में कांग्रेस के पास 145 सीटें थीं वहीं अगले चुनाव में यह आंकड़ा बढ़ कर 206 पर पहुंच गया। उन्होंने लोगों से कांग्रेस से जुडने का आह्वान किया।

आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर मंत्री टिप्पणी नहीं करें - पीएम


नई दिल्ली. 12 अप्रैल. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सभी मंत्रियों से कहा है कि वे मीडिया में आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर टिप्पणी करने से बचें। प्रधानमंत्री की ओर से कैबिनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर ने रविवार को मंत्रियों को इस संबंध में पत्र भेजा था। कैबिनेट सचिव ने अपने संदेश में कहा कि प्रधानमंत्री की इच्छा है कि मंत्रियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के मसलों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए और ऐसे मुद्दों पर अलग-अलग राय भी नहीं रखनी चाहिए। संदेश में कहा गया है कि ऐसे मुद्दों पर केंद्रीय गृह मंत्रालय प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। प्रधानमंत्री का यह निर्देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में हुए नक्सली हमले के बाद आया है, जिसमें 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। माना जा रहा है कि नक्सली हमले के बाद रेल मंत्री ममता बनर्जी और केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय की टिप्पणियों के बाद प्रधानमंत्री ने यह निर्देश दिया है।

नवादा के जंगलों से पांच संदिग्ध माओवादी गिरफ्तार

नवादा. 12 अप्रैल. बिहार में नवादा जिले के अकबरपुर थाना क्षेत्र से पुलिस ने आज प्रतिबंधित नक्सली संगठन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी के पांच संदिग्ध उग्रवादियों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने बताया कि गुप्त सूचना के आधार पर उक्त थाना क्षेत्र के जंगलों से पांच माओवादियों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार माओवादियों के पास से दो पिस्तौल, कुछ कारतूस तथा अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद किये गये हैं। उन्होंने बताया कि सूचना मिली थी कि निर्माण कार्यो में लगे विभिन्न कंपनियों से माओवादी लगातार लेवी की मांग कर रहे थे तथा नहीं दिये जाने पर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इसी आधार पर छापेमारी करके माओवादियों को गिरफ्तार किया गया है।

वायुसेना नक्सलियों से निपटने को तैयार

इलाहाबाद. 12 अप्रैल. भारतीय वायुसेना के प्रमुख प्रदीप वसंत नाईक ने आज कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये लगातार खतरा बनते जा रहे नक्सलियों से निपटने में वायुसेना पूरी तरह से तैयार है लेकिन इस मामले में कोई भी निर्णय केन्द्र सरकार को लेना है। श्री नाईक ने यहां संवाददाताओं से कहा कि पहले केन्द्र सरकार फैसला करे कि नक्सलियों के खिलाफ क्या करना चाहती है। देश की वायुसेना इससे निपटने के लिये पूरी तरह से तैयार है। हालांकि सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों से निपटने के लिये एक स्पस्ट रणनीति होनी चाहिये ताकि कम से कम नुकसान हो। नक्सल इसी देश के नागरिक हैं कोई विदेशी आतंकवादी नहीं। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि वैसा उनका निजी रूप से मानना है कि नक्सलियों या माओवादियों के खिलाफ अभियान में सेना की मदद नहीं ली जानी चाहिये। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि यदि नक्सलियों के खिलाफ अभियान में वायु सेना की मदद ली जाती है तो हमले के लिये स्थान को चिन्हित करना होगा। उनके खिलाफ ऐसे ही 250 किलोग्राम का बम नहीं गिराया जा सकता जो आठ सौ वर्गमीटर में अपना प्रभाव दिखाता है। इस दायरे में कई ऐसे लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं जो नक्सली नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वायुसेना ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के बारे में राज्य सरकार को कोई भी रिपोर्ट नहीं दी थी। वायुसेना ने करीब तीन वर्ष पहले नक्सल प्रभावित इलाके में सर्वेक्षण किया था। सर्वेक्षण के साथ भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर तुरन्त की गयी कार्रवाई से ही फायदा उठाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी बाहुल नक्सल प्रभावित राज्यों में जानकारी के लिये दो वर्ष पहले मानव रहित विमान उपलब्ध कराये गये थे।

नक्सल समस्या का समाधान बातचीत से संभव नहीं


पुड्डुचेरी. 12 अप्रैल. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज कहा कि नक्सलवाद की समस्या का हल बातचीत के जरिए नहीं निकाला जा सकता इसलिए इस दिशा में सबसे पहले नक्सली संगठनों को हिंसा का रास्ता छोडना होगा। अध्यक्ष बनने के बाद पहली बाद यहां आए श्री गडकरी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि नक्सलियों को सबसे पहले हिंसा का रास्ता छोड़कर शांति का रास्ता अपनाना चाहिए और तब ही बातचीत की प्रक्रिया शुरु की जा सकता है। श्री गडकरी ने कहा कि हाल में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों पर हमला कर उन्होंने कानून को अपने हाथ लिया है जो ठीक नहीं है। अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि जिस देश की 42 करोड अाबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है उस देश की जनता के लिए परमाणु ऊर्जा समझौते का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि देश में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और खेतीबाड़ी कम होती जा रही है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दो को सौर ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए।

रमन ने दंतेवाड़ा से किया ग्राम सुराज अभियान का आगाज



रायपुर. 12 अप्रैल. सुरक्षा एजेंसियों के तमाम चेतावनियों के बाद भी मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने आज घुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा के दोरनापाल से ग्राम सुराज अभियान की शुरूआत कर यह जता दिया कि देश की सबसे बड़ी वारदात न तो उनका न तो सरकार का मनोबल तोड़ पाई है। दंतेवाडा हमले के बाद दो चरणों के ग्राम सुराज अभियान में सुरक्षा प्रबंधों खासकर मुख्यमंत्री की सुरक्षा को लेकर सुरक्षा एजेंसियां काफी चिंतित रही है और मुख्यमंत्री से यथासंभव बस्तर के नक्सली क्षेत्रों के दौरे से बचने की सलाह देने की भी खबरें सामने आयी है पर मुख्यमंत्री ने इस सलाहों को नजरअंदाज कर आज अचानक घुर नक्सली जिले में घुर नक्सल प्रभावित गांव दोरनापाल पहुंचकर आतंक के साये में जी रहे लोगो में विश्वास जगाने की कोशिश की। राजधानी से मुख्यमंत्री डा.सिंह सुबह जब रवाना हुए थे तब आला अफसरों के उनके राजनांदगांव में कहीं पहुंचने की जानकारी थी लेकिन उन्होंने हेलीकाप्टर में बैठने के बाद पायलट को सीधे दंतेवाड़ा चलने को कहा। दोरनापाल शिविर के पास जब उनका हेलीकाप्टर उतरा तो वहां पर मौजूद सुरक्षा बलों को पहले लगा कि कोई आला अधिकारी पहुंचा है पर मुख्यमंत्री को देख सभी सकते में आ गए। मुख्यमंत्री डा.सिंह ने शिविर में निवासरत लोगो के हालचाल जानने के बाद सुरक्षाकमयों से भी बात की और उनकी हौसला आफजाई की। उन्होने कहा कि देश द्रोही नक्सलियों के खिलाफ वह बहादुरी से मोर्चा लेते रहे सरकार उनके साथ खड़ी है। मुख्य सचिव पी.जाय उम्मेन तथा प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री एन. बैजेन्द्र कुमार ने भी सुरक्षा कमयों से बात की और उनका मनोबल बढ़ाया। मुख्यमंत्री के पहुंचने पर आश्चर्यचकित ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि राशन बिजली और पानी की व्यवस्था ठीक है। मुख्यमंत्री ने राहत शिविर में सार्वजनिक वितरण प्रणली के तहत आवश्यक वस्तुओं की वितरण व्यवस्था और बिजली तथा पानी की व्यवस्था के बारे में भी ग्रामीणों से जानकारी ली। स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि भी इस दौरान वहां पहुंच गए। मुख्यमंत्री ने उनसे भी बात की। उन्होने विशेष पुलिस अधिकारियों से भी उनकी समस्याओं की जानकारी ली। उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री ने दो चरणों के अभियान की शुरूआत ही घुर नक्सल इलाके से नही की है बल्कि इस दौरान वह अभी कई बार नक्सल इलाकों में आकस्मिक रूप से पहुंचेंगे। सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री को प्रभावित क्षेत्रों में अगर कहीं सरकारी अमले की लापरवाही दिखी तो निचले कर्मचारियों पर नहीं बल्कि जिलों तथा मंत्रालय तक में बैठे आला अफसरों पर गाज गिरेगी।

अरुंधती राय के ख़िलाफ़ पुलिस की जाँच शुरू

नई दुनिया, १२ अप्रैल, रायपुर

दंतेवाड़ा हमले के दोषी पकड़ने को अभियान शुरू

रायपुर। दंतेवाड़ा में हुए नरसंहार में शामिल नक्सलियों को पकड़ने के लिए शुरू किए गए व्यापक तलाशी अभियान के बीच जांचकर्ताओं ने पता लगाया है कि माओवादियों ने इस हमले में अत्यंत लाइट मशीन गन (एलएमजी) का इस्तेमाल किया था। जांच कर रहे दल के सूत्रों ने बताया कि घटना स्थल के सर्वे से पता चला है कि नक्सलियों ने कम से कम दो एलएमजी का इस्तेमाल किया था। ये हथियार हिद्मा और पापा राव के नेतृत्व वाली माओवादियों की केंद्रीय समिति की कंपनी तीन और कंपनी आठ द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं।

सूत्रों ने बताया कि एलएमजी संभवत: आंध्र प्रदेश या उड़ीसा के पुलिस बल से चोरी किया गया है। इस बीच नक्सलियों को पकड़ने के लिए व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया है। पापा राव, रमन्ना और हिद्मा इस नरसंहार के प्रमुख अभियुक्त के रूप में उभर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में जन्मा राव जगरबंधु इलाके में माओवादियों का महासचिव है तथा दण्डकारण्य क्षेत्र के विशेष महासचिव रमन्ना का दाहिना हाथ माना जाता है। गौरतलब है कि छह अप्रैल को हुए अब तक के सबसे बड़े नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 जवान तथा राज्य पुलिस का एक सिपाही शहीद हो गया था।

जवानों का बलिदान बेकार नहीं जाएगा: डीजी

रायपुर। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के महानिदेशक विक्रम श्रीवास्तव ने कहा है कि राज्य में नक्सलियों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा तथा जवानों का बलिदान बेकार नहीं जाएगा।बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर में श्रीवास्तव ने कहा कि उन्होंने दंतेवाड़ा जिले में स्थित घटनास्थल ताड़मेटला क्षेत्र का दौरा किया है तथा हालात का सूक्ष्म परीक्षण किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि इलाके में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान पूरी तरह मुस्तैद हैं तथा ड्यूटी को लेकर कोई तनाव नहीं है।श्रीवास्तव ने कहा कि सीआरपीएफ जवान बहादुरी से लड़े और उन्होंने काफी हथियार बचा लिया, जिन्हें नक्सली अपने साथ नहीं ले जा सके। हालांकि कुछ हथियार नक्सली अपने साथ ले जाने में सफल रहे।

सीआरपीएफ डीजी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा और जवानों का बलिदान बेकार नहीं जाएगा।गौरतलब है कि राज्य के दंतेवाड़ा जिले में मंगलवार को नक्सलियों ने हमला कर 76 जवानों की हत्या कर दी थी, जिसमें सीआरपीएफ के 75 जवान शामिल थे।

राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के समर्थन से इस समस्या से निजात पाने की कोशिश शुरू कर दी है तथा यहां भारी संख्या में पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को तैनात किया है। राज्य में अर्ध सैनिक बलों की लगभग दो दर्जन बटालियन तैनात है, जिनमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 13 बटालियन शामिल हैं।

शहरी क्षेत्रों में नक्सलियों का दबाव, सतर्कता बढ़ी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में अब तक के सबसे बड़े नक्सली हमले की घटना के बाद पुलिस ने राज्य के धुर नक्सली क्षेत्रों में दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है, जिससे नक्सली अब शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। राज्य में शहरों की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जा रही है।

राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बताया कि राज्य के दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटल के जंगल में मंगलवार छह तारीख को नक्सली हमले में 76 जवानों के शहीद होने की घटना के बाद नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में खोज अभियान में तेजी लाई गई है तथा जवानों को नक्सलियों का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह मुस्तैद रहने को कहा गया है।

अधिकारियों ने बताया कि जंगली इलाकों में पुलिस की गतिविधियां बढ़ने और पड़ोसी राज्यों की सीमा में ज्यादा पुलिस बल तैनात किए जाने के बाद पुलिस को सूचना मिली है कि नक्सली अब शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तथा नए स्थानों में गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।

उन्होंने बताया कि सूचना है कि राज्य के धमतरी जिले तथा रायपुर जिले के अंतर्गत गरियाबंद और देवभोग इलाके में नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ गई है जिससे दोनों जिले की पुलिस को सतर्क कर दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि दंतेवाड़ा की घटना के बाद राज्य भर में पुलिस को सतर्क कर दिया गया है तथा मैदानी क्षेत्रों में विशेष चौकसी के निर्देश दिए गए हैं।

राज्य के धमतरी जिले के पुलिस अधीक्षक शेख आरिफ हुसैन ने स्वीकार किया कि जिले में नक्सली गतिविधि बढ़ने की सूचना उन्हें मिली है तथा किसी भी स्थिति से निपटने के लिए संबंधित थानों और पुलिस बल के जवानों को तैयार रहने के लिए कहा गया है।

शेख ने बताया कि पिछले साल जिले के सिहावा क्षेत्र में 11 मई को नक्सली हमले में 12 पुलिस कर्मियों समेत 13 लोगों की मृत्यु की घटना के बाद क्षेत्र में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है तथा नक्सलियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। वहीं क्षेत्र में खोजी अभियान तेज कर दिया गया है।

उन्होंने बताया कि धमतरी जिले के बस्तर क्षेत्र से लगे होने के कारण पुलिस को इस बात का अंदेशा है कि नक्सली अब नए क्षेत्रों में घटनाओं को अंजाम देने की फिराक में है जिसके चलते इन क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

आठ नक्सली भी मारे गए थे जवाबी कार्रवाई में

जगदलपुर। नक्सलवादियों ने स्वीकार किया है कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में गत छह अप्रैल को सीआरपीएफ जवानों पर किए गए हमले में उनके आठ कार्यकर्ता भी मारे गए थे।

प्रतिबंधित संगठन भाकपा माओवादी की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने एक विज्ञप्ति में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीजीएलए) द्वारा अंजाम दिए गए हमले की इस कार्रवाई में अपने आठ कार्यकर्ताओं के मारे जाने की बात स्वीकार की है। मारे गए कार्यकर्ताओं के नाम सेक्शन कमांडर रुकमति और वागाल, सेक्शन उप कमांडर विज्जाल और इंगाल, सदस्य राजू, मंगू, रामाल और रतन हैं।

विज्ञप्ति के अनुसार बस्तर में अंग्रेज शासकों के खिलाफ किए गए आंदोलन भूमकाल की शताब्दी के मौके पर नक्सलवादियों ने सुरक्षाबल पर यह हमला आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर की जा रही पुलिस ज्यादतियों का जवाब देने के इरादे से किया था। इस कार्रवाई में उनके 300 लड़ाकों ने भाग लिया था।

वैसे ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि इस कार्रवाई में करीब एक हजार नक्सली शामिल थे।

दंडाकरण्य विशेष जोनल कमेटी के सदस्य रामन्ना, सचिव कोसा और प्रवक्ता गुड्सा उसेण्डी के हस्ताक्षर युक्त विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि पूरे बस्तर ''वनांचल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े पूंजीपतियों की जागीर बनाने'' के इरादे से संप्रग सरकार ने दोबारा सत्ता में आने के बाद क्रांतिकारियों के सफाए के लिए अभियान चलाया है। उनका दावा है कि इस अभियान के नाम पर पुलिस आदिवासियों पर लगातार अत्याचार कर रही है।

Wednesday, April 7, 2010

कल के नृशंस नक्सली हमले के बाद हालात का जायजा लिया चिदम्बरम ने

जगदलपुर। छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में कल नक्सली हमले में शहीद हुए केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को आज यहां केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ्र राज्य के राज्यपाल शेखर दत्त और मुख्यमंत्री रमन सिंह तथा केन्द्र एवं राज्य सरकार के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पूरे सम्मान के साथ सलामी दी गई और उनके शवों पर पुष्पचक्र चढ़ाए गए।

सुबह दिल्ली से रायपुर पहुंचने के बाद चिदम्बरम, राज्यपाल शेखर दत्त और मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ जगदलपुर पहुंचे और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने जवानों के शवों पर पुष्पांजलि अर्पित की।

राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य पुलिस और अर्धसैनिक बलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी।

चिदम्बरम ने वहां मौजूद कुछ जवानों के परिजनों से संवेदना व्यक्त की और उन्हें ढांढस बंधाया।

चिदम्बरम महारानी मेडिकल कालेज भी गए और वहां भर्ती घायल जवानों के हाल चाल पूछे और उन्हें दी जा रही चिकित्सा की जानकारी ली।

दंतेवाडा जिले के मुकराना के घने जंगलों में कल नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर सीआरपीएफ के 75 जवानों और राज्य पुलिस के एक हेड कांस्टेबल की हत्या कर दी थी।

चिदम्बरम के राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा भी करने की भी संभावना है। नक्सलवादियों ने कल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में अब तक का सबसे घातक हमला करते हुए 'आपरेशन ग्रीन हंट' पर निकले सुरक्षाकर्मियों के दल को मुकराना के घने जंगल में घेर लिया और 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया।

सुबह छह से सात बजे के बीच जब सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के संयुक्त दल में शामिल करीब 100 सुरक्षाकर्मी नक्सलवादियों के खिलाफ सेना के एक अभियान की शुरूआत से पहले सड़क खोलने के काम को पूरा करके वापस लौट रहे थे ्रतब यह हमला जिले के चिंतलनार और टारमेटला गांव के बीच किया गया।

हमले में सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट बी एल मीणा और डिप्टी कमांडेंट सत्यवान समेत 76 पुलिस कर्मी शहीद हो गए। मरने वालों में जिला पुलिस बल का हवलदार सियाराम धु्रव भी शामिल है।

सीआरपीएफ और जिला बल का संयुक्त दल नक्सल विरोधी अभियान के तहत पिछले तीन दिनों से जंगल में था। अभियान के दौरान आज सुबह सुरक्षाकर्मियों का दल जैसे ही तारमेटला और चिंतलनार गांव के जंगल के करीब पहुंचा, नक्सलियों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और उनके वाहन को विस्फोट से उड़ाने के बाद उनपर गोलियों की बौछार कर दी।

इस हमले ने केन्द्र सरकार को विचलित कर दिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल ही गृह मंत्री पी चिदंबरम से टेलीफोन पर बात करके उन्हें हालात का जायजा लेने को कहा। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में समझा जाता है कि माओवादियों के इस घातक हमले पर विचार किया गया। कल की बैठक में चिदंबरम के अलावा मंत्रिमंडल के सदस्यों और तीनों सेनाप्रमुखों ने शिरकत की।

आंसू भी कम पड़े

जगदलपुर। हर किसी की जुबान पर बस यही सवाल था कि कब हमें इस आतंक से मुक्ति मिलेगी? आंखें इसी सोच में डूबी थीं कि कब लौटेगा अमन और चैन? अपने बेटे, भाई और पिता को गंवा चुके लोगों के विलाप ने हर दिशा का सिर झुका हुआ था। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बुधवार की सुबह कुछ ऐसी ही थी।

मंगलवार को नक्सली हमले में शहीद हुए 76 सुरक्षाकर्मियों की शहादत को आखिरी सलाम देने के लिए गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी पहुंचे थे। आखिरी सलामी देने का बिगुल बजते ही माहौल और गमगीन हो उठा। 64 वर्षीय चिदंबरम शोक संतृप्त माहौल में बेहद शांतिपूर्ण ढंग से तिरंगे में लिपटे सीआरपीएफ जवानों के ताबूतों के पास पहुंचे। शहीद जवानों को श्रद्धांजलि स्वरूप पुष्पचक्र अर्पित करते ही जवानों को आखिरी सलाम की मातमी धुन 'लास्ट पोस्ट' बजायी गयी। उसके बाद अ‌र्द्धसैनिक बल की एक टुकड़ी ने शहीद जवानों के सम्मान में अपने हथियार उलटे करके उन्हें अपनी सलामी दी। उसके बाद, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त और मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ-साथ सीआरपीएफ तथा राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने जवानों को श्रद्धांजलि दी। बाद में, चिदंबरम ने शहीद जवानों के कुछ परिजनों से भी बात की। उन्होंने जवानों के परिजनों से संवदेना व्यक्त करते हुए उन्हें ढांढस बंधाया।

चिदम्बरम ने शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी

रायपुर। गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने नक्सली हमले में मारे गए केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों को आज यहां श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके शवों पर पुष्पचक्र चढाया।

चिदम्बरम, राज्य के राज्यपाल शेखर दत्त और मुख्यमंत्री रमन सिंह तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में शहीद जवानों को पूरे सम्मान के साथ सलामी दी गई।

चिदम्बरम ने जगदलपुर के महारानी मेडिकल कालेज जा कर हमले में घायल हुए जवानों के हाल चाल भी पूछे और उन्हें दी जा रही चिकित्सा की जानकारी ली।

उन्होंने हमले में मारे गए जवानों के परिजनों से संवदेना व्यक्त करते हुए उन्हें ढांढस बंधाया।

इसके बाद वह वरिष्ठ अधिकारियों सहित रवाना हो गए। वह जगदलपुर में ही वरिष्ठ अधिकारियों से बैठक कर स्थिति की समीक्षा करेंगे। यह बैठक बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वायुसेना के इस्तेमाल पर विचार सम्भव : चिदम्बरम

जगदलपुर। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षाकर्मियों पर कल हुए बर्बर नक्सली हमले को लेकर भावावेश में कोई प्रतिक्रिया नहीं करने की वकालत करते हुए आज कहा कि अगर जरूरी हुआ तो सरकार नक्सलवादियों के खिलाफ अभियान में वायुसेना का इस्तेमाल नहीं करने के निर्णय पर 'पुनर्विचार' कर सकती है।

चिदम्बरम ने यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि सरकार पर 'युद्ध' थोपा गया है। उन्होंने कहा कि माओवादियों के विकराल खतरे से भारत को मुक्त कराने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें ''इस वक्त शांत होकर खुद पर काबू पाना होगा।''

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलवादियों के नृशंस हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ तथा पुलिस के कुल 76 जवानों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे गृहमंत्री ने नक्सलवादियों के खिलाफ जंग में सेना के इस्तेमाल के प्रस्ताव से पहले इनकार किया।

उन्होंने कहा ''सेना के इस्तेमाल का कोई प्रस्ताव नहीं है। हमारा मानना है कि केन्द्रीय अ‌र्द्धसैनिक बल और राज्य पुलिस अपने दम पर नक्सली खतरे से निपटने में सक्षम हैं। खतरे को लेकर यह हमारा मौजूदा आकलन है।''

बहरहाल, एक अन्य प्रश्न पर चिदम्बरम ने कहा ''नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में वायुसेना या किसी विमान के इस्तेमाल का फिलहाल कोई इरादा नहीं है, लेकिन जरूरी होने पर हम रणनीति में बदलाव के लिए अपने इरादे पर फिर से विचार कर सकते हैं।''

इस मौके पर चिदम्बरम के साथ छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त और मुख्यमंत्री रमन सिंह भी मौजूद थे। चिदम्बरम ने कहा कि लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकना माओवादियों का उद्देश्य है और ''हम उन्हें अपने मकसद में कामयाब नहीं होने देंगे।''

उन्होंने कहा ''जनता की सुरक्षा करना और नक्सलवादियों के कब्जे वाले इलाके को फिर से नियंत्रण में लेना सरकार की जिम्मेदारी है।''

गृहमंत्री ने कहा कि अगर यह युद्ध है तो इसे सरकार पर थोपा गया है। जनता और समूचे देश की रक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें अपने कानूनी और संवैधानिक कर्तव्य निभा रही हैं।

माओवादियों के सुरक्षाकर्मियों पर किए गए भीषणतम हमले की निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि सुरक्षाबलों का कल का अभियान खुफिया सूचना पर आधारित नहीं था बल्कि वह जवानों को इलाके से परिचित कराने के लिए शुरू किया गया था।

चिदम्बरम ने कहा ''जैसा कि मैंने कल कहा था कि कहीं कुछ गलती हुई है। सिर्फ जांच में ही पता लग सकेगा कि कहां पर चूक हुई।'' साथ ही जांच में यह भी पता लग जाएगा कि हमले में एक हजार नक्सलवादी शामिल थे या नहीं।

उन्होंने नक्सलवादियों के खिलाफ जारी अभियान का नाम 'ऑपरेशन ग्रीनहंट' होने से इनकार किया और कहा कि किसी मुहिम में शामिल रहे एक अधिकारी ने यह नाम दिया है।

गृहमंत्री ने यह भी कहा कि नक्सलविरोधी अभियान को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच अच्छा तालमेल है।

उन्होंने कहा कि दंतेवाड़ा में अभियान चलाने का फैसला छत्तीसगढ़ की बस्तर रेंज के महानिरीक्षक तथा पुलिस उपमहानिरीक्षक और सीआरपीएफ के उपमहानिरीक्षक से विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। इस मुहिम का संचालन दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक करेंगे। चिदम्बरम ने कहा ''नक्सलवादियों ने हिंसा छोड़कर बातचीत का रास्ता अपनाने के हमारे आह्वान का जवाब बर्बर और क्रूर हमला करके दिया है।''

उन्होंने कहा ''76 जवानों की कुरबानी के बाद बातचीत की बात बेमानी हो जाएगी। जैसा कि मैंने कहा कि हमें शांत रहकर खुद पर काबू पाना होगा। अगर कोई उग्रवादी संगठन शपथ लेकर हिंसा का रास्ता छोड़ता है तो हम बातचीत पर विचार करेंगे।''

गृहमंत्री ने कहा कि ज्यादातर जवानों की मृत्यु परिष्कृत विस्फोटक, गोलियां लगने, देसी बमों और सम्भवत: हथगोलों से घायल होने की वजह से हुईं।

उन्होंने कहा ''जवानों की पोस्टमार्टम रिपोर्टों, गहन जांच और घायल जवानों के बयानों के जरिए ही वारदात के तथ्यों तथा घटनाक्रम का पता लग सकता है।''

चिदम्बरम ने कहा कि नक्सलवादियों ने ही सरकार को 'दुश्मन' और इस संघर्ष को 'युद्ध' का नाम दिया है।

गृहमंत्री ने कहा कि नक्सलवादियों की इस हौलनाक हरकत पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ समेत नक्सलवाद से प्रभावित राज्यों को केन्द्रीय अ‌र्द्धसैनिक बल मुहैया कराए गए हैं ताकि प्रदेश सरकारें उग्रवादियों के खिलाफ अभियान चला सकें और नक्सलियों के कब्जे वाली जमीन को उनसे मुक्त करा सकें।

चिदम्बरम ने कहा ''अनुसूचित जनजातियों की आबादी वाले इलाकों में तैनाती की वजह से केन्द्रीय अ‌र्द्धसैनिक बलों पर कई पाबंदियां भी लगाई गई हैं।''

ग्यारह नक्सली गिरफ्तार ्रहथियार बरामद

रायपुर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा क्षेत्र में पुलिस ने आज घेराबंदी कर ग्यारह नक्सलियों को गिरफ्तार कर लिया और उनसे 11 भरमार बंदूक एवं विस्फोटक बरामद किए।

पुलिस के प्रवक्ता एवं महानिरीक्षक आर के विज ने बताया कि पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ नक्सली जंगलों में छुपे हुए हैं जिसके बाद वहां धावा बोल कर ग्यारह नक्सलियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

उन्होंने बताया कि गिरफ्तार नक्सलियों से 11 भरमार बंदूकें और विस्फोटक बरामद किए गए हैं।

अप्रत्याशित नहीं था नक्सलियों का हमला

रायपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 76 सुरक्षाकर्मियों की मौत देश के नक्सली हमले के इतिहास में सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। वहीं नक्सली मामलों के जानकारों की माने तो यह हमला अप्रत्याशित नहीं है, क्योंकि नक्सल विरोधी अभियान के शुरू होने के बाद से नक्सली इस क्षेत्र में बड़ी घटना को अंजाम देकर केंद्र और राज्य सरकार को अपनी मजबूत स्थिति का अहसास कराने की फिराक में थे।

छत्तीसगढ़ के वन्य क्षेत्रों में करीब तीन दशक पहले शुरू हुआ नक्सलियों का आंदोलन आज इस राज्य के लिए नासूर बन गया है। नक्सलियों के लगातार बढ़ते हमले और इसमें मरने वाले पुलिस जवानों और आम आदमी की संख्या से राज्य में नक्सल समस्या का अंदाजा लगाया जा सकता है।

राज्य में पिछले लगभग पांच सालों में नक्सलियों ने जमकर उत्पात मचाया है और इस समस्या के कारण लगभग 15 सौ पुलिस कर्मियों, विशेष पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों की मृत्यु हुई है। मंगलवार को दंतेवाड़ा जिले में हुए इस नक्सली हमले ने इस समस्या का ऐसा वीभत्स रूप प्रस्तुत किया है जिससे निपटने के लिए अब सरकारों को नए सिरे से विचार करना होगा।

राज्य के नक्सल मामलों के जानकारों के मुताबिक मंगलवार को हुई घटना को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि नक्सली ऐसी घटना को अंजाम देने के फिराक में थे और वे पहले से इसकी तैयारी में थे। यह माना जा रहा है कि नक्सलियों ने इस हमले के लिए अपने प्रशिक्षित लोगों का उपयोग किया था क्योंकि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देना नक्सलियों के छोटे दल के बस की बात नहीं है। जानकारों का यह भी कहना है कि यह अक्सर देखने में आया है कि नक्सली जब भी वार्ता के लिए आगे कदम बढ़ाते हैं और युध्द विराम की बात कहते हैं तब वे इस दौरान अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

पिछले कुछ समय से नक्सलियों की तरफ से बातचीत और युध्द विराम की पेशकश और बाद में इससे पीछे हटने की घटना के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि नक्सली अब हमले तेज करेंगे और यह आशंका उस समय सच साबित हुई जब उन्होंने तीन दिन पहले उड़ीसा में पुलिस दल पर हमला कर 10 पुलिसकर्मियों को मार डाला।

वहीं कल दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने हमेशा की तरह अभियान में निकले उन जवानों पर हमला किया जो जंगली, पथरीले और उतार चढ़ाव वाले रास्तों से वापस आ रहे थे। नक्सलियों को इस बात की जानकारी थी कि लंबा सफर तय करने वाले सिपाही वापसी के दौरान थके हुए रहते हैं और ऐसे में उन्हें निशाना बनाना ज्यादा आसान होता है और वही हुआ। नक्सलियों के इस सुनियोजित हमले में सुरक्षा बल के जवान फंस गए और 76 सुरक्षा कर्मी मारे गए।

लगातार नक्सली हमले और भारी संख्या में सुरक्षाबल के जवानों के शहीद होने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य शासन को यह जरूर महसूस हो रहा है कि अब नक्सलियों के साथ लड़ाई में रणनीति बदलने की जरूरत है।

राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कंवर कहते हैं कि यह वक्त हालांकि गलती निकालने का नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि कहीं न कहीं इसमें चूक हुई है। कंवर कहते हैं कि राज्य में सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ समय में ज्यादा कामयाबी हासिल की और कई नक्सलियों को गिरफ्तार करने और अनेकों को मार गिराने में सफलता पाई। इस शुरूआती सफलता से राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर और दंतेवाड़ा जिले के नागरिकों को लगने लगा था कि क्षेत्र में जल्द शांति स्थापित होगी लेकिन यह भी सही है कि नक्सलियों के साथ लड़ाई छोटी नहीं है और सुरक्षा बल को इस लड़ाई को उतनी ही सजगता के साथ लड़ना होगा।

गृहमंत्री कहते हैं कि मंगलवार की घटना की जब पूरी जानकारी आएगी और इसकी समीक्षा होगी तो जरूरत होने पर निश्चित तौर पर रणनीति को भी बदलने पर विचार किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि नक्सली आज पूरे देश में अपने पैर पसार रहे हैं और पूरा देश इन लोकतंत्र विरोधी लोगों से परेशान है। यह केवल सुरक्षा बल या राज्य की लड़ाई नहीं बल्कि उन सभी की लड़ाई है जो लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं।

राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस घटना के बाद राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की।

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रविंद्र चौबे कहते हैं कि राज्य सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र से जो भी मांग की वह पूरी हुई। राज्य को बल दिया गया तथा नए साजो सामान मुहैया कराए गए लेकिन इसके बावजूद एक हजार की संख्या में नक्सली किसी स्थान में हमला करने एकत्र होते हैं तो उसकी भनक खुफिया तंत्र को क्यों नहीं लग पाती।

Tuesday, April 6, 2010

नक्सली कमांडर कटकम सुदर्शन ने दहलाया दंतेवाड़ा!

दंतेवाड़ा/ नई दिल्ली. दंतेवाड़ा में हमले का मास्टरमाइंड आंध्रप्रदेश का नक्सल कमांडर कटकम सुदर्शन है। केंद्र सरकार को मिली प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक कटकम पिछले हफ्ते आंध्रप्रदेश की सीमा पार कर छत्तीसगढ़ के सुकमा और कोंटा इलाके में सक्रिय था। सूत्रों ने बताया कि घटना स्थल से मिले कुछ फटे हुए कागजात से यह पता चलता है कि इस वारदात को सुदर्शन ने अंजाम दिया था।पिछले 30 वर्षो से नक्सली गतिविधियों में संलिप्त ५५ वर्षीय सुदर्शन सीपीआई माओवादी के सेंट्रल कमेटी का सदस्य बताया जाता है। सूत्रों ने बताया कि उत्तरी तेलंगाना क्षेत्र में सुरक्षाकर्मी उसकी सघनता से तलाश कर रहे हैं।
नटवरलाल है कटकम -सूत्र बताते हैं कि कटकम कभी शिक्षक तो कभी आम नागरिक की शक्ल में स्थानीय आदिवासियों के बीच घुलमिलकर रहता है। वह बेहद शातिर दिमाग वाला है। वह कहीं बीरेंद्र तो कहीं मोहन, कहीं सुदर्शन तो कहीं केएस के नाम से नटवरलाल की तर्ज पर वेशभूषा बदलकर रहता है। कटकम न केवल मिल्रिटी-कमीशंड है बल्कि सीपीआई माओवादी की सबसे खतरनाक संस्था पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी का महत्वपूर्ण सदस्य है।
हजार नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों को घेरकर मारा-छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मंगलवार को करीब एक हजार नक्सलियों ने सुरक्षा बल केजवानों को घेर कर हमला बोल दिया। इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। इसे अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला बताया जा रहा है। महज 24 घंटे पहले गृहमंत्री पी। चिदंबरम ने नक्सलियों को दो-तीन साल में खत्म करने का ऐलान किया था।यह हमला दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार कैंप से बमुश्किल तीन किलोमीटर दूर सीआरपीएफ व राज्य पुलिस की संयुक्त सर्च पार्टी पर हुआ। मुठभेड़ में पुलिस का एक हवलदार भी शहीद हुआ। हमले के बाद चिदंबरम ने कहा, ‘सॉरी, कहीं न कहीं चूक हुई है।’

पुलिस प्रवक्ता आरके विज ने बताया कि तीन दिन पहले कैंप से 81 जवानों की पार्टी सर्च के लिए निकली थी। उसकी वापसी के समय मुरकम और ताड़मेटला के बीच घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने जबरदस्त हमला किया। सीआरपीएफ के अनुसार नक्सलियों ने जवानों को ऐसी जगह घेरा, जहां कच्ची सड़क पर जगह-जगह बारूदी सुरंगें लगी हुई थीं। हमले के समय सीआरपीएफ के जवान पैदल ही आ रहे थे। एके 47, एलएमजी से लैस नक्सलियों का पहला वार ही सबसे घातक रहा। इसमें 21 से ज्यादा जवान या तो शहीद हो गए अथवा बुरी तरह से घायल हो गए। नक्सलियों ने आसपास के पूरे इलाकेमें आड़ लेकर मोर्चे बना रखे थे। कुछ जवानों ने माइन प्रोटेक्शन व्हीकल (एमपीवी) की आड़ लेने की कोशिश की, तो नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर उसे उड़ा दिया। कई जवान इसकी चपेट में आकर घायल हो गए। नक्सलियों से मुठभेड़ सुबह 11 बजे तक चली। शहीदों में टीम का नेतृत्व कर रहे सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट सत्यवान, असिस्टेंट कमांडेंट बीसी मीणा तथा चिंतलनार पुलिस चौकी में पदस्थ एक हवलदार भी शामिल हैं। सीआरपीएफ जवानों के हथियार नक्सली लूटकर ले गए हैं। नक्सलियों की तलाश में पूरे इलाके में सघन अभियान छेड़ा गया । घायलों व शवों को हेलिकॉप्टरों से जगदलपुर लाया गया। केंद्रीय गृहसचिव जीके पिल्लई ने कहा कि फिलहाल नक्सलियों के खिलाफ हवाई कार्रवाई का निर्णय नहीं किया गया है।

नक्सलियों के शव नहीं मिले -घटनास्थल पर पहुंची पुलिस पार्टियों ने आसपास के पूरे इलाके में तलाशी ली। लेकिन किसी भी नक्सली का शव नहीं मिला।

पड़ोसी राज्यों में भी अलर्ट -चिंतलनार में नक्सली हमले के बाद गृह विभाग ने पूरे छत्तीसगढ़ में रेड अलर्ट जारी कर दिया है। जिला मुख्यालयों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र में भी अलर्ट जारी कर सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया गया है। आंध्रप्रदेश की एंटी नक्सल फोर्स ग्रे हाउंड्स भी सीमा पर पहुंच गई है।

नक्सलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकल्प-प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में उनके निवास पर हुई राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में नक्सलियों से निपटने के लिए सख्त कार्रवाई करने का संकल्प जताया गया। बैठक में गृह मंत्री पी. चिदंबरम, रक्षा मंत्री एके एंटनी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन, गृह सचिव जीके पिल्लई, तीनों सेनाओं के प्रमुख और रॉ के प्रमुख ने हिस्सा लिया।
दैनिक भास्कर, दिल्ली, अप्रैल, 2010

फिर नक्सली हमला

प।बंगाल, उड़ीसा के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस तरह का रक्तपात मचाया है, वह बेहद निंदनीय है। दंतेवाड़ा के जंगलों में सीआरपीएफ व राज्य पुलिस के गश्ती दलों पर घात लगाकर नक्सलियों ने हमले किए, जिसमें अब तक 70 जवानों के शहीद होने की खबर है और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मुठभेड़ जारी है। यह खेदजनक है कि इस स्थान पर लगातार दूसरे दिन नक्सलवादियों की हिंसा पर लिखना पड़ रहा है। गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने इसकी कड़ी निंदा करने की औपचारिकता निभा ली है और सुरक्षा बलों की रणनीतिक चूक को इसका कारण बताया है। आम जनता न सुरक्षा बलों की रणनीति जानती है, न उसमें किस तरह की चूक हुई, यह समझती है। लेकिन इतना समझ में अवश्य आता है कि केंद्र व राज्य सरकारें नक्सलियों से निबटने में अब तक असफल ही रही हैं। मुठभेड़ों में नक्सलियों के मरने या उन्हें गिरफ्तार करने की छोटी-मोटी सफलता भी इसलिए संदिग्ध मानी जाती हैं कि कई बार अपनी काबिलियत दिखाने के लिए निरीह आदिवासियों को बलि का बकरा बनाया जाता है।

इस संदिग्धता की जमीन पर कई मानवाधिकार संगठनों व गैरसरकारी संगठनों की दुकानदारी मजे से चल रही है। इसलिए माननीय केंद्रीय गृहमंत्रीजी रणनीतिक चूक जैसे बयान देने के बजाए वास्तविकता से जनता को अवगत कराएं। दो दिन पहले प।बंगाल के लालगढ़ के दौरे के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य को नक्सलवाद से निबटने की नसीहत दी। इस नसीहत से उपजा बवाल अभी शांत नहींहुआ है कि अब यह रणनीतिक चूक का मसला सामने है। नक्सलवाद को सरकार आतंकवाद की तरह गंभीर मुद्दा मानती है, और ऐसा है भी। जाहिर है इसके खिलाफ रणनीति भी उतनी ही गंभीरता से बनाई जाती होंगी, जितनी बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए। तब रणनीतिक चूक की बात बहुत हल्के किस्म की लगती है। देश के कई रक्षा विशेषज्ञ, पुलिस, खुफिया विभाग के श्रेष्ठ अफसर नक्सलियों के खिलाफ रणनीति बनाते होंगे, अगर इसमें कमी रहती है तो यह बेहद गंभीर बात है। एक बात स्पष्ट है कि राजनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर जरूरत से ज्यादा बयानबाजी इस समस्या को और उलझा रही है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से लेकर पुलिस अधिकारियों तक हर कोई नक्सलवाद पर बयान देने में लगा है। दूसरी ओर ऐसे भी लोगों की कमी नहींहै जो नक्सलियों की छवि आदिवासियों का तारणहार बनाने में लगे हुए हैं। मानवाधिकार का झंडा बुलंद करने के लिए नक्सलग्रस्त क्षेत्र का दौरा करना और फिर रोमांचक भाषा में इसका वर्णन करना, यह परिपाटी चल पड़ी है। हाल ही में अंग्रेजी की वरिष्ठ लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने दंतेवाड़ा का दौरा कर ऐसा ही लेख अंग्रेजी में लिखा, जिसकी तथाकथित बुध्दिजीवी वर्ग में खासी चर्चा है। उन्होंने जो देखा-समझा, महसूस किया, वह लिखा। लेकिन असली तस्वीर वही है, ऐसा नहींहै। बाहर से नक्सल समस्या को समझने वाले तमाम लोगों की दिक्कत यही है कि वे अब भी इसे वंचित-दलित-दमित वर्ग की लड़ाई तक सीमित रख कर देख रहे हैं। जबकि नक्सलियों का दायरा इससे काफी बढ़ गया है। सरकार को भी इस सच्चाई को समझते हुए अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा।

दो क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है रणनीति व कार्यनीति। दंतेवाड़ा जैसा बड़ा हमला बिना स्थानीय सहयोग के नक्सलियों ने कर दिया, यह मानना कठिन है। साम, दाम, दंड, भेद किसी भी तरीके से नक्सलियों ने स्थानीय ग्रामीणों को अपने साथ कर रखा है। ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति भविष्य में न हो, इसके लिए ग्रामीणों को विश्वास में लेना सरकार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। नक्सलबाड़ी से आंदोलन की शुरुआत करने वाले कानु सान्याल व ए।के.मजूमदार ने भी बात में इस विचारधारा को सही नहींमाना। लेकिन नक्सली इसकी आड़ में आतंक का खेल खेल रहे हैं। इसमें किन लोगों के स्वार्थ लिप्त हैं, नक्सलियों का असली मकसद क्या है, इसका विश्लेषण करने के बाद ही सरकार कोई रणनीति बनाए तो शायद किसी नतीजे तक पहुंचने की उम्मीद बंधे।
संपादकीय, देशबंधु, रायपुर, अप्रैल, 2010

नक्सली वहशी और क्रूर: चिदंबरम

नई दिल्ली। केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हुए भीषण नक्सली हमले को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की वहशी प्रवृति और क्रूरता का परिचायक बताया है। चिदंबरम ने हमले के बाद पत्रकारों से कहा कि इससे पता चलता है कि नक्सली किस हद तक हिंसा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच चुके हैं और वह उनकी रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। चिदंबरम ने कहा, "कुछ बहुत गलत हो गया। जवान नक्सलियों द्वारा बिछाए जाल में फंस गए। मैं स्तब्ध हूं।"मंगलवार को हुए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के कम से कम 20 जवान शहीद हो गए और कम से कम 15 घायल हो गए।

सुरक्षा परिषद में बस्तर नरसंहार पर हुई चर्चा

नई दिल्ली ! राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की मंगलवार को यहां हुई बैठक में बस्तर नरसंहार की घटना छाई रही। नक्सलियों ने क्षेत्र के जंगली इलाके में हमला कर दिया जिसमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (केरिपु) के 76 जवान शहीद हो गए।

एक घंटे तक चली बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की। बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, गृह मंत्री पी.चिदंबरम, सेना की तीनों शाखाओं के प्रमुख और शीर्ष अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री ने इस नरसंहार पर आश्चर्य प्रकट किया और नक्सलियों को करारा जवाब देने के अपने संकल्प को दोहराया।

नक्सल प्रभावित जिलों में हाई अलर्ट

कोलकाता । छत्तीसगढ़ में मंगलवार को माओवादियों द्वारा 73 सीआरपीएफ जवानों की हत्या किए जाने के बाद राज्य पुलिस प्रशासन ने बंगाल के तीन नक्सल प्रभावित जिलों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया है। पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया जिले के पुलिस अधिकारियों व कर्मियों को सतर्क रहने को कहा गया है। नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान के लिए बनाए गए कैंप में रह रहे केंद्रीय अ‌र्द्धसैनिक बलों को भी माओवादियों के गुरिल्ला दस्ता को मुंह तोड़ जबाव देने के लिए चौकन्ना कर दिया गया है।

मुख्य सचिव अशोक मोहन चक्रवर्ती ने मंगलवार को राइटर्स में कहा कि छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ पर माओवादियों के हमले के बाद जंगल महल में सतर्कता बढ़ा दी गई है। झारखंड व पश्चिम बंगाल के सीमा क्षेत्रों में कड़ी नजर रखी जा रही है और सीआरपीएफ के जवानों को भी सतर्क कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि दो दिन पहले गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने जो निर्देश दिया था उसके अनुरूप माओवादी क्षेत्रों में काम किया जा रहा है।

जवानों की मदद के लिए आपात बैठक

फोर्स के हवाले कर दें बस्तर

जगदलपुर। बस्तर में लगातार हो रही नक्सली वारदातों में जवानों की शहादत के लिए सरकारें दोषी हैं। केन्द्र और राज्य की सरकारें एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर अपनी गलतियों को ढंकने का प्रयास कर रही है। दरअसल राजनीतिक सामंजस्य के अभाव में बस्तर की हालत बदतर हुई है।

अगर प्रदेश सरकार केपीएस गिल को अपने हिसाब स काम करने देती तो शायद बस्तर की तस्वीर कुछ और होती। नक्सली आतंक से निपटने का एक मात्र विकल्प यही है कि बस्तर फोर्स के हवाले कर दें। राजनीतिक पार्टियां देश हित में अपना स्वार्स्थ छोड़ दें। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता।

सब को अपनी पड़ी है। उक्त बातें संजय मार्केट में खरीददारी करने आए सीआरपीएफ के जवानों ने कही है। दक्षिण बस्तर में मंगलवार की सुबह हुई बड़ी वारदात से क्षुब्ध जवानों ने साथियों की मौत के लिए सरकारों को दोषी मानते हैं। इनका आरोप है कि सरकारों में दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव हैं वे सुरक्षा तंत्र को अपने हिसाब से उपयोग करना चाहते हैं। जवानों ने कहा कि सरकारों की खुदगर्जी के चलते जवान वेतन के लिए नौकरी कर रहा है। उन्हें सीमाओं में बांध कर रख दिया गया है। यह कैसी विडंबना है कि उसे गोली भी अपने अधिकारी से पूछ कर चलानी पड़ती हैं सीआरपीएफ जवानों का कहना है कि केपीएस गिल के पास अपना अनुभव व रणनीति है। अगर प्रदेश सरकार उन्हें अपनी मर्जी से नक्सली उन्मूलन करनेदेती तो वे महज ६-७ महीने में ही आतंकियों का सफाया कर देते। इनकी राय है कि बस्तर सहित सीमावर्ती राज्यों के गलियारे से नक्सलियों का सफाया करने के लिए बस्तर को सेना के हवाले कर देना चाहिए। चूंकि अब आर-पार की लड़ाई जरूरी है। लेकिन अपने अधिकारों के छीनने के डर से नेता मंत्री फोर्स का विरोध कर रहे हैं। ऐसा कर वे देश और यहां की जनता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वहीं जवानों को कठपुतली समझे हुए हैं।
नई दुनिया, जगदलपुर, अप्रैल

नक्सलवाद का घिनौना चेहरा

अधमरे जवानों को छोड़ गए नक्सली

जगदलपुर। ताड़मेटला के घने जंगलों में चली पुलिस नक्सली मुठभेड़ में लगभग हजार की संख्या में हथियार से लैस नक्सलियों ने सुनियोजित ढंग से जाल बिछाकर जवानों को घेरा।

जवाब में जवानों ने संख्या में लगभग सात गुना नक्सलियों को जवाब देते ७५ जवानों ने शहादत दी। नक्सलियों के बीच घिरे ८२ जवानों में से सात जवानों की जान नक्सलियों के उन जूतों से बच गई, जिससे टटोलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि जवानों में अब जान नहीं है। इसके बाद नक्सलियों ने उन्हें वहीं छोड़ दिया और जंगल के रास्ते निकल पड़े। इन्हीं जवानों में से एक प्रमोद कुमार ने अपने अधिकारी को बताया कि नक्सलियों के तादाद का उन्हें अनुमान नहीं था। उनके पास जितनी कारतूस और हथियार थे। वे एक हजार लोगों के लिए कापᆬी नहीं था। पᆬोर्स को अनुमान था कि नक्सली जंगलों में है लेकिन उनकी संख्या इतनी अधिक होगी, इसका इल्म नहीं था।

इस घटना के विवरण में जो खास बात सामने आई वह यह थी कि नक्सली भी पूरी तरह हथियारों से लैस थे और तादाद में अधिक होने से किसी भी समय बैकपᆬुट पर जाते नहीं दिखे। दोनो तरपᆬ से पᆬायरिंग हो रही थी। इससे दोनों ओर लोग मारे जा रहे थे लेकिन नक्सली घेरा बनाते आगे ही बढ़ रहे थे। नक्सलियों के शव को उनकी एक पार्टी खाट पर उठा कर ले जा रही थी। कुछ जवानों ने बताया कि नक्सली भी भारी संख्या में मारे गए हैं। लेकिन उनके पास इतना समय था कि वे अपने साथियों को उठा कर ले जा सकें।

जंगल में जनताना सरकार

अनिल मिश्रा, नई दुनिया, दंतेवाड़ा।

करीब तीन दशक पहले बस्तर आए नक्सलियों ने यहां अपनी तीसरी पीढ़ी तैयार कर ली है। आपरेशन ग्रीन हंट शुरू होने के बाद नक्सलियों ने डिवीजन स्तर तक की कमान स्थानीय आदिवासियों को सौंप दी है। सूत्रों से मिली जानकारी मुताबिक नक्सलियों ने अपनी प्रदेश समिति की सीमाएं भी पुनर्निर्धारित की है। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी से अब महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, उड़ीसा के मलकानगिरी को अलग कर दिया गया है। जबकि रायपुर, धमतरी राजनांदगांव के नक्सल प्रभावित इलाकों को इसमें शामिल किया गया है।

दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में भी बदलाव करने की खबर है। जोनल कमेटी का मुख्यालय अबूझमाड़ में अज्ञात जगह पर है। इस इलाके में आजादी के ६२ साल बाद भी सरकार की कोई पकड़ नहीं है। अंदरूनी इलाकों में नक्सली वन भूमि के पट्टे बांटते हैं आदिवासियों से लगान वसूल करते हैं। अबूझमाड़ में गुडसा उसेंडी, कोसा, राजू, वेलू आदि बड़े नेताओं की हुकूमत चलती है। नक्सली समानांतर व्यवस्था में गांवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जनमिलिशिया सदस्यों पर होती है। बस्तर के गांवों में नक्सलियों की जनताना सरकार चलती है। यहां भारतीय संविधान का कोई मतलब नहीं है। अपराध पर फैसला नक्सली जन अदालत लगाकर करते हैं। अपने इलाके में बुनियादी सुविधाओं की जिम्मेदारी भी नक्सली उठाते हैं। नक्सलियों की विद्या विभाग कमेटी ने प्राथमिक शिक्षा के लिए स्थानीय गोंडी बोली में पाठ्यक्रम तैयार किया है। दक्षिण बस्तर में ही नक्सलियों के १० बड़े रेसीडेंसियल स्कूल चल रहे हैं। इन स्कूलों में शिक्षकों अर्दली को एक समान एक हजार रुपए वेतन दिया जाता है। नक्सली इलाकों में जहां सरकार की पहुंच नहीं है, वहां उनके अपने डाक्टर भी हैं। कृषि तकनीक सिंचाई सुविधाओं के विस्तार जैसे काम भी जनताना सरकार में किए जाते हैं। अपनी ताकत बढ़ाने नक्सली हर साल बड़े पैमाने पर नई भर्तियां करते हैं। इसके लिए जंगल में पोस्टर पर्चों के माध्यम से प्रचार अभियान चलाया जाता है। नक्सली संगठन में बच्चे भी शामिल होते हैं, जो सूचना तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। नक्सली स्कूलों में बचपन से ही क्रांति की शिक्षा दी जाती है। लकड़ी के हथियारों से शस्त्र शिक्षा भी दी जाती है। जंगलों में नक्सलियों के हथियार बनाने के कारखाने चल रहे हैं। सिंगनमड़गू में पिछले दिनों पुलिस ने एक हथियार फैक्ट्री ध्वस्त की थी।

बस्तर में नक्सलियों की आय का प्रमुख साधन तेंदूपत्ता अन्य वनोपज से मिलने वाली लेवी है। विस्फोटकों को लगाने, रेल पटरी उड़ाने सड़कें खोदने जैसे काम वे ग्रामीणों से ही कराते हैं। जंगल में नक्सलियों को गांवों से भरपूर मदद मिलती है। संगठन में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। मुठभेड़ों में महिला नक्सली बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। जोनल कमेटी के अधीन सात रीजनल कमेटी हैं। इनके सेके्रटरी जोनल कमेटी में भी सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। दक्षिण बस्तर में दक्षिण रीजनल ब्यूरो की कमान गत दो दशकों से बस्तर के जंगलों में आतंक का पर्याय बन चुके रमन्ना के हाथों में है।

दक्षिण रीजनल कमेटी के अधीन तीन डिवीजन हैं। इसमें दरभा डिवीजन का गठन हाल ही में हुआ है। इसका प्रभाव जगदलपुर तक है। इस डिवीजन का सचिव गणेश उईके है। कोंटा इलाके में दक्षिण बस्तर डिवीजन की कमान व्येंकटेश के हाथों है। बीजापुर जिले में पश्चिम बस्तर डिवीजन की कमान माधवी नाम की एक आदिवासी महिला कमांडर के हाथों में है। दक्षिण बस्तर में क्रांतिकारी मजदूर संघ, क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, चेतना नाट्य मंच आदि विभिन्न नक्सली संगठनों में हजारों आदिवासी सदस्य हैं।

बर्बर माओवादी

पी। चिदंबरम से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या सोचकर उन्होंने माओवादियों के खिलाफ "ऑपरेशन ग्रीन हंट" शुरू किया था जो एक ही हफ्ते में हमारे सुरक्षाकर्मियों को तीसरा हमला झेलना पड़ा? क्या कोई भी गृहमंत्री पूरी रणनीति बनाए बिना और इलाके के दुर्गम भूगोल को समझे बिना अपने सुरक्षाकर्मियों को इस तरह "युद्ध" में झोंकता है? चिदंबरम कह रहे हैं कि इस संघर्ष में कोई चीज बुरी तरह गलत साबित हुई है और हो सकता है कि हमारे सुरक्षाकर्मी दंतेवाड़ा में घात लगाकर बैठे माओवादियों के जाल में फँस गए हों। सबसे पहली बात तो यह है कि इतने बड़े पैमाने पर हुए इस हमले की भनक तक हमारी सुरक्षा एजेंसियों को क्यों नहीं लगी? नक्सलवादी एक हजार के लगभग थे और तीन बसों में लौट रहे सुरक्षाकर्मी थे १२० जिनमें से ७६ के मारे जाने की खबर है। कई बुरी तरह जख्मी हैं। नक्सलियों ने ऊँची पहाड़ियों और ऊँचे घने पेड़ों से सुरक्षाकर्मियों की इस पेट्रोल-टुकड़ी पर नृशंस हमला किया। घात लगाकर ऐसे हमले या तो कोई शत्रु करता है या फिर बर्बर आतंकवादी। घना जंगल होने के कारण वहाँ सुरक्षा बलों की और टुकड़ियाँ भेजने और राहत कार्य करने में बाँधा आ रही है। दूसरी बात यह है कि इन नक्सलियों के पास भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद है और साफ है कि नक्सलियों ने न केवल अपनी संगठित और बड़ी सेना बना ली है, बल्कि उन्हें जंगल वारफेयर में या जंगल में युद्ध लड़ने में भी महारत हासिल है। इस ऑपरेशन को केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स और स्थानीय पुलिस फोर्स की मदद से अंजाम दिया जा रहा है और इन दोनों बलों के बीच समन्वय का अभाव बताया है। जंगल और जंगलवासियों के समूह जहाँ युद्ध में नक्सलवादियों के अनुकूल पड़ते दिखाई दे रहे हैं, वहाँ शहरों में रहकर कानून और व्यवस्था का जिम्मा संभालने वाली पुलिस फोर्स की कार्यशैली के ये प्रतिकूल है। केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार को यहाँ तक मालूम नहीं कि एक हजार लोगों की इस नक्सली सेना को हथियार कहाँ से मिल रहे हैं? इसलिए यह कहना वाजिब होगा कि सरकार को नक्सलियों की असल ताकत का आभास तक नहीं था। जो प्रारंभिक तस्वीर उभर रही है, वह बताती है कि नक्सलियों ने अपने को कहीं तमिल मुक्ति चीतों "लिट्टे" की तरह तो संगठित नहीं कर लिया है? कहीं यह एक अपरिभाषित से गृह युद्ध की दस्तक तो नहीं है? यदि सरकार को ऐसा जरा सा भी संदेह लग रहा हो तो उसे अपनी लड़ाई को आमूल-चूल बदलना होगा और इन इलाकों में ऐसे लोगों को भेजना होगा जो जंगल वारफेयर में दक्ष हों। उन्हें आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराने होंगे। आदिवासियों के हक की यह लड़ाई बंदूक के बल पर सत्ता परिवर्तन की लड़ाई के रूप में कहीं बदल तो नहीं रही है? ऐसा ही नेपाल में हो चुका है और नेपाली माओवादियों के साथ भारत के माओवादियों के सक्रिय संबंध रहे हैं। हमने कल लिखा था कि इन लोगों के साथ संवाद का रास्ता भी बनना चाहिए, लेकिन आज हम कहना चाहेंगे कि सबसे पहला काम नक्सलियों को निरस्त्र करने का होना चाहिए क्योंकि वे खुद तो हिंसा छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। अतीत में भी उन्होंने अन्यत्र संघर्ष विराम के मौके का लाभ अपने को फिर से संगठित करने में किया है। सरकार एक मोटी-मोटी राजनीतिक सर्वानुमति बनाकर इस समस्या से निपटने के लिए जो भी उचित हो तत्काल करे। हाँ, यह ध्यान रखा जाए कि निर्दोष आबादी की जानमाल का नुकसान न हो।
संपादकीय, नई दुनिया, इंदौर, ७ अप्रैल

माओवादियों में हावी होता गगन्ना गुट

नक्सलियों को अब गोली की भाषा में ही जवाब देना होगा

प्रकाश सिंह, बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस प्रकार से जवानों का खून बहाया है, वह देश के लिए एक गंभीर चुनौती है। ऐसी चुनौती जिसका जवाब उन्हीं की भाषा में उन्हें देना होगा। नक्सलवाद आतंकवाद से कम गंभीर समस्या नहीं है। दंतेवाड़ा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और स्थानीय पुलिस बल के जवानों की हत्या से एक बात साफ है कि नक्सली बोली की भाषा नहीं, गोली की भाषा से ही काबू में आएँगे। कहने का मतलब है कि नक्सलियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई का समय अब आ गया है। मैं मानता हूँ कि स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों के बीच समन्वय की कमी और खुफिया तंत्र में खामी इस हमले का प्रमुख कारण रहा है।

मैं इसे नक्सलियों की सफलता नहीं मान रहा बल्कि पुलिस बल की लापरवाही को इस घटना की वजह मानता हूँ। मैं छत्तीसगढ़ जाता रहता हूँ और वहाँ मैं विभिन्न सुरक्षा बलों और पुलिस बल के जवानों से अनौपचारिक चर्चा करता रहा हूँ तो एक ही बात सुुनने को मिलती है कि नक्सलियों के खिलाफ सरकारी तंत्र में हर स्तर पर समन्वय की कमी है। यहाँ मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि लड़ाई सरकार नहीं बल्कि जवान लड़ता है। लड़ाई में उतरने से पहले इस बात की भलीभांति पड़ताल या कहें दुश्मन की कमजोर और मजबूती का पता लगा लेना चाहिए। सीआरपीएफ के जो जवान छत्तीसगढ़ में नक्सलियों से मुकाबला कर रहे हैं वे असल में स्थानीय पुलिस के ही भरोसे लड़ाई लड़ रहे हैं।

स्थानीय पुलिस जो जानकारी बल को उपलब्ध करवाती है उसी के आधार पर केंद्रीय बल के जवान अपनी योजना बनाते हैं। यह वह कड़ी है जिसमें जरा-सी चूक बड़ी घटना का कारण बनती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह होती है कि लड़ाई के क्षेत्र में उतरते समय या कार्रवाई करते समय ऐसी योजना बनानी चाहिए जिसका आभास भी दुश्मन को न हो। मसलन ऐसे रास्तों से दुश्मन पर हमला किया जाए जिसका आभास भी उसे न हो कि हमला इस ओर से होगा। नक्सली या आतंकवादी आम रास्तों पर घात लगाए रखते हैं। जहाँ तक सरकार का सवाल है तो बात चाहे मुख्यमंत्री रमनसिंह की हो या फिर केंद्रीय गृहमंत्री पी। चिदंबरम की। दोनों को ही मैं ऐसा नेता मानता हूँ जिनकी नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता। रमनसिंह भी नक्सलवाद का खात्मा चाहते हैं और चिदंबरम भी। दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं हैं। कमी खुफिया तंत्र में है जिसे राज्य सरकार को सुधारना होगा। केंद्र सरकार को भी अब नक्सली समस्या के खिलाफ कोई उदारता नहीं दिखानी चाहिए और न ही इस समस्या को राज्य की कानून-व्यवस्था का प्रश्न बनाकर छोड़ देना चाहिए। बिना किसी दवाब के सरकार को नक्सलियों के खिलाफ ग्रीन हंट अभियान जारी रखना चाहिए।
नई दुनिया से साभार

लाल आंतक का लंबा है इतिहास

सीएम और राज्यपाल आज जाएँगे जगदलपुर

रायपुर। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने मंगलवार की रात राज्यपाल शेखर दत्त से मुलाकात कर दंतेवाड़ा के नक्सली हमले की घटना का ब्योरा दिया। हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने बुधवार को दोनों एकसाथ जगदलपुर जाएँगे।

डॉ. सिंह रात नौ बजे राजभवन पहुँचे। वे करीब डेढ़ घंटा वहाँ रहे। इस दौरान उनके साथ सिर्फ प्रमुख सचिव एन. बैजेन्द्र कुमार थे। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को घटना का ब्योरा दिया और हालात से निपटने के लिए किए जा रहे उपायों से अवगत कराया। इस मुलाकात के लिए डॉ. सिंह ने स्वयं पहल की थी। चर्चा के दौरान तय किया गया कि बुधवार की सुबह नौ बजे सरकारी विमान से दोनों एकसाथ जगदलपुर जाएँगे। वहाँ पुलिस लाइन मैदान में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद दोपहर १२.३० बजे राजधानी लौट आएँगे। उनके साथ गृहमंत्री ननकीराम कँवर व मुख्य सचिव पी. जॉय उम्मेन भी होंगे। दूसरी ओर, गृह विभाग के प्रमुख सचिव एनके असवाल ने जगदलपुर पहुँचने के बाद बस्तर रेंज के आईजी, दंतेवाड़ा के कलेक्टर व एसपी से घटना का ब्योरा लिया। उन्होंने महारानी अस्पताल पहुँच कर वहाँ उपलब्ध चिकित्सा व्यवस्था का आकस्मिक निरीक्षण किया।

आंध्र पुलिस ने दी थी सूचना :

दंतेवाड़ा आंध्रप्रदेश पुलिस ने करीब सप्ताहभर पहले केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों को छत्तीसगढ़ में बड़े हमले के प्रति आगाह किया था। सूत्रों के अनुसार आंध्रप्रदेश पुलिस ने बड़ी संख्या में नक्सलियों के सीमा पार करने की खुफिया जानकारी देते हुए आशंका व्यक्त की थी कि नक्सली किसी बड़ी वारदात की कोशिश कर सकते हैं।

पड़ोसी राज्यों में अलर्टः घटना के तुरंत बाद बस्तर की सरहद को सील कर दिया गया। साथ ही पड़ोसी राज्यों- महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा पुलिस को अलर्ट कर दिया गया। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि उड़ीसा से एसओजी, आंध्र से ग्रेहाउंड्स, सीआरपीएफ, सीएएफ, डीएफ व एसपीओ को क्षेत्र की सर्चिंग में लगाया गया है।

नक्सली कमांडर गणेशन्ना व रमन्ना के नेतृत्व में हमला

दंतेवाड़ा । अचानक हमले से जवानों को संभलने का मौका नहीं मिला और ७५ जवान शहीद हो गए। हमले में अभियान दल में सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट सत्यवान असिस्टेंट बीएल नीमा, डीएफ का एक हेड कांस्टेबल आर सियाराम धु्रव भी शहीद हो गए। घटना की सूचना मिलते ही दोरनापाल व चिंतागुफा से अतिरिक्त फोर्स तत्काल घटना स्थल पर रवाना की गई। घायलों व शवों को लेकर लौट रही फोर्स के रास्ते में नक्सलियों ने फिर विस्फोट किया। इसमें वाहन चालक की मौत हो गई। इसके बाद हेलिकॉप्टर की मदद से उन्हें निकाला गया। सर्चिंग पर गए जवानों के पास ८१ स्वचलित हथियार थे, इनमें से ज्यादातर हथियार नक्सली लूट कर ले गए। मौके पर पहुँचे बचाव दल को केवल तीन हथियार मिले।

बचाव दल के जवानों ने वहाँ घायल पड़े सात जवानों रमेश, राज बहादुर, बलदीप, अरविंद, विप्लव, प्रमोद और आदित्य को निकाला। शहीद जवानों के शव निकालने के लिए तीन हेलिकॉप्टर लगाए गए। इनमें बीएसएफ के एक विमान के साथ दिल्ली से आए दो एमआईजी-१७ हेलिकॉप्टर शामिल थे। देर शाम तक ६९ शव निकाले गए। पुलिस अफसरों के अनुसार इसी घटनास्थल पर दो साल पहले नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर जगरगुंडा थानेदार हेमंत मंडावी सहित १२ जवानों को मार दिया था।

इधर आंध्र मीडिया सूत्रों से मिल रही जानकारी में बताया गया है कि उक्त हमले में सीपीआई माओवादी की कुल तीन कंपनियाँ शामिल थी। जिनका नेतृत्व नक्सली कमांडर गणेशन्ना व रमन्ना कर रहे थे। इस पूरे हमले की योजना नक्सलियों की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के बड़े कमांडर कटाकम सुदर्शन (कोसा) ने बनाई थी। बताया गया है कि सीआरपीएफ का लैंडमाइन तलाशी का सिस्टम मौके पर खराब हो गया था। नक्सली लगातार इस गश्ती दल का पीछा कर रहे थे। उन्हें हमले के बाद निकासी के रास्ते पता थे। इस हमले में लगभग एक हजार भूमकाल मिलिशिया सदस्य शामिल थे।

सकते में छत्तीसगढ़ सरकार

रायपुर । अब तक के सबसे बड़े नक्सली हमले ने राज्य सरकार को हिला कर रख दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गृहमंत्री ननकीराम कँवर और आला अफसरों के साथ आपात बैठक करने के बाद कहा कि ऑपरेशन ग्रीन हंट जारी रहेगा। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से टेलीफोन पर बात की है।

हमले की खबर आने के बाद मुख्यमंत्री सचिवालय में हलचल बढ़ गई। डॉ। सिंह ने आपात बैठक बुलाई। इसमें मुख्य सचिव पी। जॉय उम्मेन, डीजीपी विश्वरंजन, सीआरपीएफ के स्पेशल डीजी विजय रमन, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एन. बैजेन्द्र कुमार समेत पुलिस के खुफिया तंत्र की कमान संभालने वाले अफसर शामिल हुए। मुख्यमंत्री ने आला अफसरों के साथ हालात से निपटने और जंगल में फँसे व घायल जवानों को बाहर निकालने के उपायों पर चर्चा की। साथ ही जंगल में नक्सलियों से लोहा ले रहे जवानों को तत्काल समुचित मदद मुहैया कराने को कहा। घायलों के उपचार के लिए रायपुर से डॉक्टरों की टीम सरकारी विमान से जगदलपुर रवाना की गई।

शहीद जवानों के शव उनके घर भेजने के लिए सरकार ने विशेष विमान का इंतजाम किया। डॉ. सिंह ने सरकारी दफ्तरों को इंटरनेट व वायमैक्स प्रणाली से जोड़ने के लिए छत्तीसगढ़ स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क का उद्घाटन करते हुए वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए दंतेवाड़ा कलेक्टर रीना बाबासाहेब कंगाले से घटना की जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने मंगलवार को प्रस्तावित राजनांदगाँव दौरा रद्द कर दिया। वे बुधवार को दिल्ली भी नहीं जाएँगे। दिल्ली में उनकी केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे के साथ मुलाकात तय थी। डॉ. सिंह ने केंद्रीय गृहमंत्री श्री चिदम्बरम को फोन पर ताजा हालात की जानकारी दी। साथ ही मृतकों व घायलों के लिए किए जा रहे उपायों का ब्योरा दिया।

बैठक की सूचना मिलने के बाद गृहमंत्री श्री कँवर जब तक मुख्यमंत्री सचिवालय पहुँचते, तब तक दोनों डीजी डॉ. सिंह से बातचीत कर रवाना हो चुके थे। इसके बाद श्री कँवर ने आधे घंटे तक मुख्यमंत्री से बात की। बाद में आईजी (खुफिया) डीएम अवस्थी ने उन्हें हालात से अवगत कराया। वहीं प्रमुख सचिव (गृह) एनके असवाल ग्राम सुराज अभियान की तैयारी करने के लिए सुबह आठ बजे बस्तर प्रवास पर रवाना हो चुके थे। उन्हें रास्ते में मोबाइल पर हमले की खबर मिली।

लश्कर से भी खतरनाक हैं नक्सली

शंकर रायचौधरी
पूर्व सेना अध्यक्ष

दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों के हमले ने इस बात को रेखांकित किया है कि नक्सल विरोधी अभियान में कोई बुनियादी गलती है। नक्सली आंदोलन देश के सामने सबसे गंभीर चुनौती बन गया है। यह चुनौती लश्कर-ए-तोइबा से भी अधिक खतरनाक है।

इसमें कोई शक नहीं है कि नक्सली हिंसा हमारी ६० सालों की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का नतीजा है। केंद्र सरकार की यह सोच पूरी तरह गलत है कि राज्य सरकारें अपने स्तर पर नक्सली हिंसा का मुकाबला कर सकती हैं। सात राज्यों के लगभग १५० जिलों में नक्सली हिंसा फैल चुकी है। राज्य सरकारों की प्रशासनिक निष्क्रियता ने एक बड़े भू-भाग को नक्सलियों के हवाले कर दिया गया है। नक्सली आंदोलन जम्मू-कश्मीर और पूर्वोतर के राज्यों की तरह अलगाववादी आंदोलन नहीं है। लेकिन देश के बाहरी शत्रु इस ताक में जरूर बैठे हैं कि किस तरह नक्सली हिंसा को हवा देकर भारत में अस्थिरता का वातावरण निर्मित किया जाए।

नक्सली जब भी हिंसा की किसी बड़ी घटना को अंजाम देते हैं तो यह माँग उठने लगती है कि सेना का इस्तेमाल करके नक्सलियों को नेस्तनाबूत किया जाए। नए थलसेना प्रमुख ने हाल ही में इस बात को दोहराया था कि हम अपने देश के लोगों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। मैं थलसेना प्रमुख की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ, लेकिन यदि नक्सली तत्व बाहरी समर्थन से देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करें तो स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। फिलहाल इस तरह के संकेत नहीं है कि नक्सली तत्व देश के दुश्मनों की शह पर हिंसा फैला रहे हैं। राज्यों के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे नक्सलवाद की चुनौती का सामना कर सकें।

मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस हमले में मरने वालों में सीआरपीएफ के कितने अधिकारी शामिल थे? अलगाववादियों के खिलाफ जारी अभियान में सेना के अधिकारी अग्रिम पंक्ति में नेतृत्व करते हैं और बड़ी संख्या में शहीद भी हुए हैं। यदि सीआरपीएफ की टुकड़ी में किसी अधिकारी का नेतृत्व नहीं था, तो यह बड़ी भारी भूल थी।

सबसे बड़ा नक्सली हमले में ७३ जवान शहीद

रायपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में मंगलवार को नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में सीआरपीएफ के 73 जवान शहीद हो गए, जबकि आठ घायल हैं।शहीद होने वालों में एक उप कमांडर और एक सहायक कमांडर शामिल है। नक्सलियों द्वारा देश में किया गया यह अबतक का सबसे बड़ा हमला है। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने इस हमले पर दुख प्रकट करते हुए नक्सलियों के कृत्य की कड़ी निंदा की है। बताया जा रहा है कि अभी भी समाचार लिखते वक्त भी मुठभेड़ कई जगहों पर जारी है ।

पुलिस प्रवक्ता एवं महानिदेशक आर के विज ने बताया कि सीआरपीएफ की 80 सदस्यीय 62वीं बटालियन को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले के मुकराना के घने जंगलों में घेर लिया और उन पर घात लगा कर हमला कर दिया जिससे बल के 72 जवान और जिला पुलिस का एक जवान सहित 73 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए तथा अन्य आठ घायल हो गए।

उन्होंने बताया कि घटनास्थल से इन सुरक्षाकर्मियों के शव बरामद किए गए हैं और समझा जाता है कि लगभग एक हजार नक्सलियों ने इस नृशंस कार्रवाई को अंजाम दिया। विज ने बताया कि घायलों में से आठ को इलाज के लिए ले जाया गया है। सीआरपीएफ के महानिदेशक विक्रम श्रीवास्तव ने बताया कि नक्सलियों के हमले के दौरान सीआरपीएफ के जवान जंगल में नक्सलियों के खिलाफ अभियान पर थे। यह बहुत दु:खद घटना है। चिदंबरम ने कहा कि कहीं न कहीं कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ी हुई होगी। यह माओवादियों की बर्बर प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है कि वे किस तरह की क्रूरता एवं नृशंसता कर सकते हैं। सीआरपीएफ के विशेष महानिदेशक जनरल विजय रमन जंगल की ओर रवाना हो गए हैं। रमन नक्सल-विरोधी कार्यबल के कमांडर भी हैं। घटनास्थल के लिए अतिरिक्त बल भेज दिए गए हैं और इलाके में तलाशी अभियान जारी है। अधिकारिक सूत्रों ने बताया कि हमला उस समय हुआ जब सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन सुबह छह से सात बजे के बीच अभियान के लिए जंगलों में घुसी। सुरक्षा बल के जंगल में घुसते ही माओवादियों ने उन पर हमला बोल दिया।

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन ने बताया कि घायलों को वहां से बाहर निकालने और शवों को लाने के लिए हेलीकाप्टरों की सेवा ली जा रही है। सीआरपीएफ का दल अचानक हुए इस हमले से हतप्रभ रह गया। माओवादी एकदम से पहाड़ी पर आए और उन्होंने अंधाधुंध गोलीबारी और आईईडी विस्फोट शुरू कर दिए। दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा ने बताया कि नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों को ले जा रहे वाहन को उड़ा दिया। मिश्रा ने बताया कि यह घटना जिले के चिंतालनार-मारमेतला गांव में हुई। सीआरपीएफ का दल पिछले तीन दिन से तलाशी अभियान के तहत तारमेतला के अंदरूनी जंगलों में डेरा डाले हुए था। माओवादियों ने इससे दो दिन पहले उड़ीसा के कोरापुट में बारूदी सुरंग विस्फोट किया था, जिसमें नक्सल विरोधी विशेष कार्रवाई बल के 11 जवान शहीद हो गए थे। इसके पहले 15 फरवरी को पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के शिविर में माओवादियों ने हमला किया था, जिसमें सुरक्षा बल के 24 जवान शहीद हो गए थे।

Monday, April 5, 2010

छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ जवानों पर नक्सली हमला

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के गश्ती दल पर मंगलवार को हमला कर दिया। पुलिस के अनुसार दंतेवाड़ा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर हमला बोला। पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा ने हमले की पुष्टि की है। हमले में हताहतों के बारे में फिलहाल पुष्टि नहीं की गई है। मिश्रा ने कहा कि घटनास्थल के लिए पुलिस टीम रवाना हो गई है।

एडीजीपी नक्सल आपरेशन बयानार पहुंचे

जगदलपुर ! राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिर्देशक ,नक्सल आपरेशन श्रीराम निवास बस्तर प्रवास पर 3 अप्रैल को हेलीकाप्टर से बस्तर जिले के ग्राम बयानार पहुंचकर आपरेशन ग्रीन हंट की समीक्षा की। सात ही उन्होंने जगदलपुर में पुलिस अधिकारियों की बैठक लेकर आवश्यक दिशा निर्देशय दिये जाने की जानकारी प्राप्त हुई। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सहायक पुलिस महानिर्देशक श्रीराम निवास के ग्राम बयानार में पहुंचकर नक्सल विरोधी आपरेशन ग्रीन हंट की समीक्षा करते हुए तैनात जवानों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए और उनका मनोबल बढ़ाया। नक्सल विरोधी आपरेशन ग्रीन हंट के चलाए जाने के साथ ही पुलिस को मिल रही सफलता के मद्देनजर पुलिस के द्वारा नक्सलियों पर और भी दबाव बनाये जाने के लिए अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा करने में लगे हुए है।

गेहूं के साथ पिसता घुन

यह केवल संयोग नहींहै कि गृहमंत्री पी. चिदंबरम जब प.बंगाल के नक्सल प्रभावित क्षेत्र लालगढ़ के दौरे पर पहुंचते हैं, उसके ठीक पहले नक्सली उसी इलाके में विस्फोट करते हैं और जब वे केंद्रीय सुरक्षा बलों को वापस न हटाने, हथियार छोड़कर वार्ता की मेज पर आने जैसी बातें कहते हैं तो उड़ीसा के मलकानगिरी में बारूदी सुरंग विस्फोट कर 10 जवानों को शहीद कर जाते हैं। उड़ीसा की घटना पर मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इसे नक्सलियों की कायराना हरकत करार देते हैं और जनता को भरोसा दिलाते हैं कि हमारे जवान नक्सलविरोधी गतिविधियां रोकने के लिए प्रयासरत हैं। जबकि लालगढ़ में हेलीकाप्टर से उतर कर पी. चिदंबरम स्थानीय लोगों से मिलते हैं। उनकी जमीनी सच्चाई से वाकिफ होने का उपक्रम करते हैं और वहां के लोगों को बताते हैं कि नक्सली कायर हैं, वो जंगलों में क्यों छिपे हुए हैं। अगर उन्हें विकास चाहिए तो उन्हें जंगल से निकल कर बात करनी चाहिए। उन्होंने आदिवासी संगठनों व स्थानीय जनता से अपील की है कि वे नक्सलियों का साथ न दें। नक्सली कायर हैं, अविचारित हिंसा पर उतारू हैं, उनके आतंक के कारण आदिवासी इलाकों में विकास कार्य नहींहो पा रहे हैं, सड़कें, अस्पताल, विद्यालय नहींखुल रहे हैं, नक्सली आदिवासियों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, उनमें सीधे बात करने की हिम्मत नहींहै, वे हथियार छोड़ने तैयार नहींहैं, जबकि हम वार्ता के लिए तैयार हैं, हमने उन्हें 72 घंटे संघर्ष विराम का प्रस्ताव दिया, जबकि वे हमारी ओर से 72 दिनों का संघर्ष विराम चाहते हैं। कड़ी सुरक्षा में नक्सल विरोधी गतिविधियों का जायजा लेते साहब बहादुरों के ये सारे तर्क सही हैं, इनमें एक भी बात गलत नहींहै। लेकिन इतनी सरल भी नहींहै कि स्याह-सफेद दो रंगों में बांट कर सही-गलत का फैसला कर लिया जाए।
बेशक आज की तारीख में नक्सली आतंक फैलाने के अलावा कोई कार्य नहींकर रहे। उनकी लड़ाई सरकार से, समाज के सामंती तौर-तरीकों से है, लेकिन इसमें मौत निरीह जनता की हो रही है और लाभ फूटी कौड़ी का नहींहो रहा। छिप कर वार करने वालों को कायर कहते हैं तो नक्सली कायर भी हैं, लेकिन सरकार की ओर से कौन सी बहादुरी दिखाई जा रही है। नक्सली क्षेत्रों में तैनात पुलिसकर्मी, सुरक्षा बलों के जवान जरूर जांबाजी दिखाते हैं, उनके पास इसके अतिरिक्त कोई चारा भी नहींहै। कुछेक हजार के वेतन पर वे मौत हथेली पर रख कर चलते हैं और जब शहीद होते हैं तो घटना की वीभत्सता के मुताबिक कुछ लाख का मुआवजा और निकट परिजन को नौकरी का वादा मिल जाता है। अपना मंतव्य नक्सली बारंबार स्पष्ट कर रहे हैं कि वे हिंसा के रास्ते ही लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। हांलाकि उनके साध्य व साधन दोनों संदिग्ध हैं। पर सरकार का उद्देश्य भी साफ नहींहै। वह नक्सलियों के सफाए की बात कहती है, लेकिन किस तरह से इस कार्य को करना चाहती है, स्पष्ट नहींहै। अभी ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया जा रहा है। हो सकता है सरकार को इसमें सफलता मिले और जंगलों में छिपे नक्सलियाेंका सफाया हो जाए, गेहूं के साथ घुन पिसेगा ही। तब जंगल की विपुल प्राकृतिक संपदा पर किसका कब्जा होगा, आदिवासी क्षेत्रों से उजड़े लोग नागर सभ्यता में कैसे अवस्थित होंगे, इनके जीवन-यापन व सांस्कृतिक, सामाजिक जीवन की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? प्रश्न अनेक हैं और उत्तर शायद एक भी नहीं। ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने से पहले भी कई नक्सलविरोधी अभियान विभिन्न नामों से केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाए गए। इनमें एक भी लक्ष्य के करीब नहींपहुंच सका।

साल दर साल बजट में नक्सलविरोधी अभियान व नक्सलप्रभावित क्षेत्रों के लिए आबंटित राशि की मात्रा बढ़ाई जाती रही। इसका लाभ आदिवासियों या नक्सल प्रभावित इलाकों तक नहींपहुंचा। नक्सलविरोधी अभियानों में सफलता तब तक नहींमिलेगी, जब तक सरकारें दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ-साथ आदिवासियों के दूरगामी हित की सुस्पष्ट नीति सामने नहींरखेंगी। ऐसी नीतियां जिन के क्रियान्वयन पर लोगों को भरोसा हो। आज अगर नक्सली जंगल में अपना राज चला रहे हैं तो इसकी पृष्ठभूमि सरकारी नीतियों की वजह से ही बनी है। नक्सलियों के कब्जे के पहले भी आदिवासी इलाकों में विकास कार्य नगण्य था और शोषण चरम पर था, अब भी स्थिति भिन्न नहींहै। नक्सली अविचारित हिंसा छोड़ें और सरकारें जनता को विश्वास में लेकर अभियान चलाएं, तभी कोई हल निकल सकता है।
संपादकीय, देशबंधु, अप्रैल, रायपुर

आतंकियों-नक्सलियों पर नजर रखेंगे थ्री डी कैमरे

जमशेदपुर। झारखंड पर अतिवादियों व चरमपंथियों के मंडराते खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने चौकसी बढ़ाने का फैसला किया है। इसी क्रम में राजधानी के प्रमुख स्थानों पर पहले चरण में प्रयोग के तौर पर थ्री डी बाडी स्कैनर कैमरे लगेंगे। इन कैमरों से किसी व्यक्ति द्वारा छिपाकर रखे गए हथियार या विस्फोटक की तुरंत पहचान हो सकेगी। सूत्रों के अनुसार इस संबंध में गृह विभाग ने जमशेदपुर की संस्था डिग्निटी इंटरनेशनल के साथ मिलकर एक प्रस्ताव तैयार किया है। पहले चरण में नेपाल हाउस, विधानसभा भवन तथा हवाई अड्डे पर थ्री डी कैमरे लगेंगे। गौरतलब है कि झारखंड के 23 जेलों में हाई स्पीड डोम कैमरा लगाने का कार्य भी सरकार ने डिग्निटी इंटरनेशनल को सौंपा है। जेलों लगने वाले हाई स्पीड डोम कैमरे 360 डिग्री के कोण पर घूमते हुए तीन किलोमीटर तक के एरिया को कवर करेंगे। सभी जेलों के कैमरे एक साथ जुड़े होंगे जिसे रांची में बैठे जेल आईजी अपने कार्यालय से किसी भी जेल की गतिविधियों पर लाइव नजर रख सकेंगे। डिग्निटी इंटरनेशनल के डायरेक्टर मोहम्मद परवेज ने स्वीकार किया कि उन्होंने झारखंड के प्रमुख स्थानों पर 3डी एक्सरे कैमरा कैमरा लगाने का प्रस्ताव सरकार को दिया है। यदि स्वीकृति मिल जाती है तो वह इस महंगे कैमरे को लगाने का कार्य शुरू कर देंगे। उन्होंने बताया कि एक कैमरा को स्टाल करने में लगभग सवा करोड़ रूपये का खर्च आएगा। पहले के कैमरे में केवल सामान का एक्सरे होता था लेकिन अब बाडी का भी स्कैन होगा। मनुष्य के पूरे शरीर का पिक्चर कंट्रोल रुम में नजर आने लगेगा।

कैसे काम करता है थ्री डी एक्सरे कैमरा

चाहे आतंकवादी हों या तस्कर, कैमरे को धोखा नहीं दे पाएंगे। यदि कोई हथियार ले जाना चाहे तो वह जैसे ही कैमरे की जद में आयेगा, कंट्रोल रुम में कुछ ही समय में उसका बाडी स्कैनिंग होकर मोनिटर पर दिखने लगेगा। इसके बाद दस सेकेंड में सुरक्षा के लिए तैनात जवान संबंधित व्यक्ति को अपने कब्जे में ले लेंगे।

नक्सली हिंसा में अब तक 55 लोगों ने गंवायी जान

खडगपुर । श्चिम मेदिनीपुर जिले की नक्सली हिंसा में तमाम प्रयासों के बावजूद सिर्फ वर्ष 2010 में ही 55 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जिनमें पुलिस के जवान भी शामिल है। यह बात केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने कही। अरुणाचल प्रदेश रवाना होने से पूर्व रविवार को पश्चिम मेदिनीपुर जिलांतर्गत झाड़ग्राम तहसील के माओवाद प्रभावित लालगढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए चिदंबरम ने कहा कि नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान का जायजा लेने वे विभिन्न इलाकों का दौरा कर रहे है। बड़ी संख्या में नक्सली साधारण ग्रामीणों के बीच घुसे हुए है। उनकी पहचान कर पकड़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बल के जवान अपना काम कर रहे है। ग्रामीणों को यह बात समझना होगा कि नक्सली समाज का विकास नहीं चाहते। वे हिंसा व खून खराबा में विश्वास रखते है, जो किसी के भी हित में नहीं है। इसलिए नक्सलियों को किसी प्रकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मदद देना गलत है। जानकारी के मुताबिक लालगढ़ से रवाना होने के बाद कुछ देर मेदिनीपुर सर्किट हाउस में रुकने के बाद चिदंबरम कोलकाता की ओर ओर रवाना हो गये।

माओवादियों से निपटने को 67 करोड़ मंजूर

उत्तर मिदनापुर । माओवादियों और आतंकी समूहों से कारगर तरीके से निपटने के लिए राज्य सरकार ने 67 करोड़ रुपये मंजूर किये हैं। विदित हो कि लालगढ़ इलाके के शिल्दा ईएफआर कैम्प पर माओवादियों के हमले के मद्देनजर सरकार ने सुरक्षा तैयारी पर इतनी बड़ी रकम खर्च करने का निर्णय लिया है। राज्य के गृह सचिव अद्र्धेदु सेन ने पुलिस महकमे की मांगों पर विचार करने के बाद उक्त राशि मंजूर की है, जबकि पुलिस विभाग की मांग 91 करोड़ रुपये थे। इसके अलावा राज्य पुलिस को केंद्र सरकार के कोष से भी आर्थिक मदद मिलती है। वैसे सरकार का लक्ष्य एक सौ करोड़ रुपये खर्च करने की है। इसके बावजूद पुलिस को शक्तिशाली व सक्षम बनाने के लिए लगातार कई प्रस्ताव आ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि चालू वित्ता वर्ष में माओवादी गतिविधियों से प्रभावित इलाकों में छापामार कार्रवाईयों के लिए दो हजार एके 47 राइफल, बुलेट प्रूफ जैकेट, 7।47 करोड़ रुपये की अत्याधुनिक बख्तरबंद गाड़ी, 1।9 करोड़ लागत वाली चार विशेष लाइट, 30 अत्याधुनिक मोटरसाइकिल, चार बुलेट प्रूफ मारूति जिप्सी दिये गये हैं। पुलिस व गृह विभाग के सूत्रों के अनुसार जिस तरह से सूबे में आतंकी हमले व माओवादी गतिविधियों की आशंका जतायी जा रही है, उससे सुरक्षा संबंधी तैयारियों को बढ़ाना लाजिमी हो गया है। सूत्रों का कहना है कि यदि सरकार ने यह कदम पहले उठाया होता तो आज राज्य में माओवादी या आतंकी गतिविधियों ने इतनी रफ्तार नहीं पकड़ी होती। सुरक्षा जनित खामियों के चलते जंगल इलाकों में माओवादी अपनी जड़ों को मजबूत करने में सफल रहे हैं। इसीलिए अब संयुक्त सुरक्षा बल को माओवादियों से जूझने में परेशानी हो रही है। रोजाना जंगल इलाकों में 40 लाख रुपये इन अभियानों पर खर्च हो रहे हैं। कुल 15 हजार फोर्स इन अभियानों में संलग्न है। विगत दस माह के दौरान इन बलों पर न्यूनतम 120 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। एक सौ करोड़ से अधिक की राशि खर्च करने के बाद सुरक्षा बल मात्र 400 लोगों को गिरफ्तार करने में सफलता पायी है। लेकिन इन गिरफ्तार लोगों में कितने सक्रिय माओवादी हैं इसमें संदेह है। जबकि माओवादी 170 लोगों की जान ले चुके हैं। बहरहाल देखना है कि इस गंभीर चुनौती का सामना करने की दिशा में सरकार योजनाबद्ध तरीके से कहां तक सक्षम हो पाती है।


सीधी बात में ग्रामीणों ने चिदंबरम को सुनाई खरी-खोटी

समस्या से निजात दिलाने के लिए शुरू किये गये अभियान का जायजा लेने पहुंचे केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम को ग्रामीणों से सीधे संवाद में काफी खरी-खोटी सुननी पड़ी। अपनी करुणगाथा सुनाते हुए ग्रामीणों ने चिंदबरम से साफ कहा कि एक तरफ अराजकता, तो दूसरी ओर उन्हे नक्सली बनाम पुलिस के बीच पिसना पड़ रहा है। पश्चिम मेदिनीपुर जिलांतर्गत लालगढ़ थाने में रविवार को दौरे के क्रम में पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बलों के अधिकारियों के साथ करीब पौने घंटे की बैठक के बाद चिदंबरम की सर्वोच्च प्राथमिकता थाने के पास स्थानीय ग्रामीणों से सीधी वार्ता करने की रही। हालांकि इसमें भाषा एक बड़ी बाधा थी लेकिन जिलाधिकारी नारायण स्वरूप निगम द्वारा दुभाषिये की भूमिका निभाने से संवाद में चिदंबरम ने ग्रामीणों से अपील की कि वे नक्सलियों को किसी भी तरह से मदद न करे, क्योंकि नक्सली उनके हितैषी नहीं, बल्कि शत्रु हैं। वे निरीह लोगों को मार रहे है। गरीबी और पिछड़ेपन की समस्या को स्वीकार करते हुए चिदंबरम ने कहा कि समस्यायें है, उनका निराकरण भी होगा लेकिन लोगों को नक्सलियों से दूर रहना चाहिए। इस पर ग्रामीणों ने अपने अंदाज में जवाब पेश किया। उनकी प्राथमिकता बुनियादी जरूरतों की पूर्ति की रही। लोग सबसे ज्यादा आजिज आये दिन होने वाले बंद से थे। स्थानीय महिलाओं में मिठू सिंह व हीरा राय ने जानना चाहा कि दो जून की रोटी को फिक्रमंद रहने वाला उनका परिवार भला नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष में सरकार की क्या मदद कर सकता है, जबकि लालगढ़ में बुनियादी ढांचे का ही घोर अभाव है। किसी के बीमार पड़ने पर उसे इलाज के लिए चिकित्सा केंद्र तक ले जाने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई में मुश्किलें पेश आती हैं। स्थानीय महिला बिसका कमार ने सरकारी संसाधनों के वितरण में विसंगतियों का आरोप लगाते हुए कहा कि हमें सिर्फ जंगल ने ही बचा रखा है। अन्यथा भूखों मरना पड़ता। लालगढ़ स्वास्थ्य केंद्र में अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम करने वाली आरती डल ने सरकार के खिलाफ गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि वह पिछले 20 साल से एक सरकारी महकमे में सिर्फ सौ रुपये मासिक मेहनताने पर काम कर रही है। उसने सवाल किया कि क्या इतने रुपये में कोई आदमी अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति कर सकता है। बातचीत के दौरान ग्रामीणों को जब चिदंबरम ने माओवाद के खिलाफ एकजुट होने को कहा, तो ग्रामीणों ने उन्हें ही खरी-खोटी सुनाते हुये कहा कि वे माओवादियों के खिलाफ एक नहीं हो सकते हैं, क्योंकि माओवादी हथियार के बल पर उन्हें डराते-धमकाते हैं और उनका हमला रात्रि के दौरान ही अधिक होता है, जिस समय सूचना मिलने पर भी पुलिस उनकी सहायता को नहीं आती है।



लालगढ़ से लौट कर तारकेश कुमार ओझा, जागरण

लालगढ़ जाने वाले को सुरक्षा देगी सरकार

कोलकाता । लालगढ़ जाने के इच्छुक नेताओं को सरकार सुरक्षा मुहैया करायेगी। गृह सचिव अद्धेंदू सेन ने सोमवार को राइटर्स बिल्डिंग में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति स्थिर है। जंगल महल व हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में कानून व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने पर सरकार गंभीर है।

उल्लेखनीय है कि गृहमंत्री पी चिदंबरम राज्य में कानून व्यवस्था व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य से संतुष्ट नहीं है। पश्चिम बंगाल के दो दिवसीय दौरे के बाद उन्होंने कुछ थाना क्षेत्रों में गिरती कानून व्यवस्था व नक्सल प्रभावित लालगढ़ में विकास की रोशनी नहीं पहुंचने पर सरकार व प्रशासनिक मिशनरी पर सवाल खड़े किए। उपेक्षित लोगों का विश्वास जीतने के लिए गृह मंत्री ने राजनीतिक दलों के अन्य नेताओं को लालगढ़ जाने का आह्वान किया। गृह मंत्री के इस विचार से सरकार ने सहमति जतायी है।

सोमवार को राइटर्स बिल्डिंग में गृह सचिव अद्धेंदू सेन ने कहा कि लालगढ़ जाने के इच्छुक राजनीतिक नेताओं की सुरक्षा की व्यवस्था सरकार करेगी। नेताओं को भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करके ही वहां जाना चाहिए। गृह सचिव ने कहा कि लालगढ़ व जंगलमहल क्षेत्रों में 80 पुलिस कैंप हैं। एक हजार जवान तैनात हैं। गृह मंत्री ने किसी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया। श्री सेन ने कहा कि गृह मंत्री के बयान पर वह कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। पुलिस से जो तथ्य मिले हैं उसके आधार पर ही वह कानून व्यवस्था की स्थिति बयान करेंगे। पश्चिम मेदिनीपुर के डीएम और एसपी ने भी गृह मंत्री के समक्ष तथ्यों के साथ कानून व्यवस्था व विकास कार्यो का खाका पेश किया।

उल्लेखनीय है कि लालगढ़ का दौरा करने से पहले गृह मंत्री ने राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य के साथ बैठकर कर राज्य में कानून व्यवस्था की जानकारी ली। श्री भंट्टाचार्य से राज्य की स्थिति पर जो तथ्य मिले और लालगढ़ में जो वास्तविक स्थिति नजर आयी उसके आधार पर ही गृह मंत्री ने अपना असंतोष जाहिर किया। मुख्यमंत्री से उन्होंने स्पष्ट कहा कि गिरती कानून व्यवस्था के लिए किसी दूसरे अधिकारी पर दोष थोप कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। लालगढ़ में गृह सचिव अद्धेंदू सेन और डीजी भूपिंदर सिंह के सामने उन्होंने विकास कार्य पर असंतोष जाहिर किया। उन्होंने लालगढ़ के वाशिंदों से बातचीत की और उनकी पीड़ा सुनने के बाद सर्किट हाउस में जिलाधिकारी तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से इस बारे में जवाब तलब किया।

रमन ने उड़ीसा विस्फोट की निन्दा की

रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने उड़ीसा के मलकानगिरी क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा किए गए बारूदी सुरंग विस्फोट की निंदा की और बस्तर संभाग के पुलिस और सुरक्षा बलों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं।

आधिकारिक सूत्रों ने आज यहां बताया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने पड़ोसी राज्य उड़ीसा के सीमावर्ती मलकानगिरी-कोरापुट मार्ग पर कल नक्सलियों द्वारा किए गए बारूदी सुरंग विस्फोट में सीमा सुरक्षा बल तथा केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की आकस्मिक मृत्यु पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है।

सिंह ने उड़ीसा में हुई इस घटना की तीव्र निन्दा करते हुए कहा है कि यह नक्सलियों की कायरतापूर्ण हरकत है, जो उनकी हताशा और बौखलाहट का परिचायक है। रमन सिंह ने कहा है कि शहीद जवानों ने क‌र्त्तव्य की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दी है। उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।अधिकारियों ने बताया कि मुख्यमंत्री ने इस घटना में घायल जवानों के जल्द स्वास्थ्य लाभ की कामना की है और छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की सीमा से लगे उड़ीसा के इलाके में हुई इस वारदात को ध्यान में रखकर बस्तर संभाग के पुलिस और सुरक्षा बलों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं।

गया में हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार

इमामगंज (गया) । कल गया में प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) का हार्डकोर आदित्य भुईयां को पुलिस ने इमामगंज थाना के बीकोपुर से सोमवार को गिरफ्तार किया है। साथ ही पुलिस ने देसी बम बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाली 100 मीटर तार, एक झोला बेल्ट, 50 मीटर केबुल, एक झोला कैप और नक्सली साहित्य बरामद किया है।

सीआरपीएफ कमांडेंट विजय कुमार ने उपरोक्त जानकारी देते हुये बताया कि पुलिस के साथ रहे सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट छोटे लाल और दीपक कुमार एवं कोबरा बटालियन के सहायक उप कमांडेंट नरेश ने अ‌र्द्धसैनिक बल के जवानों का नेतृत्व किया।

नक्सलवाद देश का सबसे बड़ा दुश्मन


चेन्नई। नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा दुश्मन करार देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि सरकार अगले दो-तीन साल में इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।

पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में माओवादी प्रभाव वाले इलाके का दौरा करने के बाद चिदंबरम ने कहा कि पिछले 10-12 साल में नक्सलवाद से सही तरीके से निपटा नहीं गया इसी वजह से इस समस्या ने विकराल रूप ले लिया है।

गृहमंत्री ने कल रात यहां से 45 किलोमीटर दूर उपनगरीय इलाके में आयोजित एक जनसभा में कहा कि नक्सलवाद देश का अव्वल दर्जे का दुश्मन है।

उन्होंने कहा कि हम नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए दृढ़ हैं। हम पिछले 10-12 साल तक इस समस्या को सहते रहे, इसलिए अब इसने बड़ा रूप अख्तियार कर लिया है।

चिदंबरम ने कहा कि केंद्र मजबूती से कायम है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भी दृढ़प्रतिज्ञ हैं। चिदंबरम ने कल ही नक्सलियों को कायर करार दिया था। उन्होंने बाद में नक्सलवाद और आतंकवाद को एक ही तराजू में तोलने की बात कही।

चिदंबरम ने कहा कि भारत में नक्सलवाद और आतंकवाद की कोई जगह नहीं है। हम उन्हें कोई मौका नहीं देंगे। हम आखिरी दम तक आक्रामकता के साथ आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ लड़ेंगे और आपको भरोसा दिलाते हैं कि हम दो या तीन साल में इन पर पूरी तरह काबू कर लेंगे।

बजट में रक्षा मद पर भारी आवंटन का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और चीन द्वारा भारत के साथ 'शत्रु' जैसा बर्ताव करने के मद्देनजर ऐसा करना जरूरी हो गया था। वर्ष 2010-11 के लिए भारत का रक्षा बजट 147,344 करोड़ रुपए तय किया गया है।

चिदंबरम ने कहा कि पाकिस्तान आतंकियों को प्रशिक्षित करके उन्हें भारत में दाखिल कराने की फिराक में है। साथ ही वह मुल्क में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिश भी कर रहा है। हम जब भी पाकिस्तान से बात करना चाहते हैं, हमें आतंकवाद पर बातचीत करनी होती है, लेकिन उस मुल्क को यह बात रास नहीं आती। गृहमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है और सभी आतंकी गतिविधियों, चाहे अफगानिस्तान में हो या अमेरिका में, सभी जगह पाकिस्तान का दखल देखा जा सकता है।