Wednesday, March 24, 2010
चाकुलिया में भी पड़े थे कानू सान्याल के कदम
नक्सलियों ने दो अपहृत भाइयों की जान बख्शी
लहुनीपाड़ा। सुंदरगढ़ जिले के केबलांग थाना अन्तर्गत जामुडीही से नक्सलियों द्वारा अपहृत ढाबा मालिक समेत उसके भाई को नक्सलियों के प्रजा कोर्ट ने निर्दोष करार देने से उन्हें मुक्त कर दिया गया है लेकिन उनके साथ ही अपहृत कोईड़ा के जिला परिषद सदस्य व माकपा नेता आनंद मासी होरो का सुराग लगा पाने में पुलिस विफल रही है।
केबलांग थाना अंचल के जामुडीही पर स्थित मोटु ढाबा के मालिक हरिनाथ मुंडारी तथा राशन दुकान चलानेवाले नरेंद्र मुंडारी समेत राक्सी से कोईड़ा जिला परिषद सदस्य तथा माकपा नेता आनंद मासी होरो का शुक्रवार की रात सशस्त्र नक्सलियों ने अपहरण कर लिया गया था। जिसमें नक्सलियों ने तीनों के चेहरे पर काला कपड़ा बांधने समेत उनके हाथ-पैर बांधकर उन्हें एक डंपर में बिठाकर केबलांग से तकरीबन 30 से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित झारखंड के सीमा के पास सारंडा जंगल में ले गये। नक्सलियों के कब्जे से मुक्त हुए दोनों मुंडारी भाइयों का कहना है कि उन लोगों को वहां पर नक्सलियों के प्रजा कोर्ट में पेश किया गया। प्रजा कोर्ट में नक्सलियों ने दोनों भाइयों के पुलिस मुखबिर न होने तथा किसी राजनीतिक दल से संबंध न होने के कारण उन्हें निर्दोष करार देकर मुक्त कर दिया। जिसके बाद दोनों भाइयों को शनिवार की रात नौ बजे बड़जोर जंगल में छोड़ दिया। इन लोगों से लूटी गयी दो बाइक वापस कर दी गयी। नक्सलियों के कब्जे से छूटकर घर लौटने पर उनके परिजनों में हर्ष देखा जा रहा है। दूसरी ओर अपहृत जिला परिषद सदस्य आनंद मासी होरो का कोई सुराग नहीं मिल पाया है। जिसमें उनकी हत्या किये जाने की आशंका तेज हो गयी है। दूसरी ओर घटना के 48 घंटों बाद भी पुलिस घटनास्थल तक नहीं पहुंची है, जिससे अंचल के लोगों में भय व्याप्त है।
माओवादियों से निपटने को केंद्र व राज्य स्तर पर प्रयास तेज
स्केच की मदद से धरे जाएंगे शीर्ष नक्सल नेता
रायपुर। दशकों से पकड़ में नहीं आ रहे शीर्ष नक्सल नेताओं की अब खैर नहीं है क्योंकि सुरक्षा एजेंसियां इन माओवादियों की तस्वीरें तैयार करा रही हैं।
छत्तीसगढ़ में नक्सलों से लोहा ले रहे पुलिस और सुरक्षा बलों को इस क्षेत्र में सक्रिय कुछ नक्सलियों के स्केच हाल में सौंपे गए।
बड़ी संख्या में शीर्ष नक्सल नेताओं की तस्वीरें अब भी उपलब्ध नहीं है इसलिए गिरफ्तार किए गए माओवादियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर स्केच बनाने के लिए चित्रकारों को तैनात किया गया है।
एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने कहा, नक्सलियों के शीर्ष नेताओं के बारे में जानकारी और खुफिया अभियानों में पैनापन लाने के लिए राज्य और केंद्र दोनों के सुरक्षा बलों को ये स्केच उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
नक्सल क्षेत्र में तैनात बटालियनों में सभी कंपनी कमांडर रैंक और कमान अधिकारियों को फोटोग्राफ उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
खुफिया अभियान चलाने के दिशा निर्देश गृह मंत्रालय और अर्द्धसैनिक बलों के मुख्यालयों के जारी किए गए हैं। अधिकारी ने कहा कि सुरक्षा दलों को तस्वीरें प्राप्त होने के बाद वे नक्सल नेताओं की गतिविधियों का पता लगाने में स्थानीय लोगों की मदद ले सकेंगे।
सूत्रों के अनुसार नक्सल नेताओं की तस्वीरें बनाने के लिए सुरक्षा बल स्थानीय लोगों की भी मदद ले रहे हैं।
बंद, सुरक्षा के कड़े इंतजाम, अंदरूनी क्षेत्रों में व्यापक असर
रायपुर। छत्तीसगढ़ समेत नक्सल प्रभावित छह राज्यों में नक्सलियों द्वारा बंद के आह्वान को देखते हुए राज्य में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है वहीं नक्सल प्रभावित जिलों के अंदरूनी क्षेत्रों में बंद का व्यापक असर पड़ा है।
राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने आज यहां बताया कि नक्सलियों के आज और कल के बंद के आह्वान को देखते हुए राज्य में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
अधिकारियों ने बताया कि राज्य के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को सतर्क रहने के लिए कहा गया है तथा नक्सल प्रभावित और सीमावर्ती क्षेत्र के थानों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।
उन्होंने बताया कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और अन्य भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात किया गया है तथा वाहनों की तलाशी ली जा रही है।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस को किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।
इधर राज्य के धुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा ने बताया कि जिले के शहरी क्षेत्रों में बंद का असर नहीं हुआ है वहीं अंदरूनी क्षेत्रों में बस मालिकों द्वारा बस नहीं चलाए जाने के कारण लागों को आवाजाही में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। मिश्रा ने बताया कि जिले में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं तथा वाहन मालिकों से कहा गया है कि उनके वाहनों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि शहरी क्षेत्रों के बाजार और हाट खुले हैं, लेकिन अंदरूनी क्षेत्रों में बंद का असर हुआ है।
उन्होंने बताया कि सुरक्षा कारणों से जिले के किरंदुल से विशाखापतनम के बीच चलने वाली पैसेंजर गाड़ी को रात में केवल बस्तर जिले के जिला मुख्यालय जगदलपुर तक चलाने का फैसला किया गया है।
बस्तर क्षेत्र के सूत्रों ने बताया कि नक्सलियों द्वारा बंद के आह्वान को देखते हुए ज्यादातर दुकानदारों ने डर के कारण अपने दुकानें नहीं खोली हैं।
अलविदा कामरेड
15 माओवादी गिरफ्तार
झाड़ग्राम । १६ मार्च के जागरण के अनुसार पश्चिम मेदिनीपुर जिले के नक्सल प्रभावित झाड़ग्राम व मेदिनीपुर कोतवाली थाना क्षेत्र से सोमवार को पुलिस व सुरक्षा बल के जवानों ने कुल 13 माओवादियों को हिरासत में लिया है। दूसरी ओर पुरुलिया जिले के अयोध्या पहाड़ से सोमवार की शाम पुलिस ने दो माओवादियों को गिरफ्तार किया।
पश्चिम मेदिनीपुर के एसपी मनोज कुमार वर्मा ने बताया कि मेदिनीपुर कोतवाली थाना क्षेत्र से 11 एवं झाड़ग्राम से दो माओवादियों को गिरफ्तार करने में सफलता मिली है। उनके पास से माओवादी लिफ्लेट, पोस्टर, बम बनाने का सामान व संगठन की हिसाब पुस्तिका भी बरामद की गई है।
इधर, पुरुलिया के आड़षा थाना पुलिस के अनुसार अयोध्या पहाड़ से गिरफ्तार माओवादियों रमेश महतो एवं गोबिंद बेसरा के पास से 300 पीस डेटोनेटर एवं 100 पीस जिलेटिन बरामद किया गया है। गिरफ्तार माओवादी रमेश महतो आड़षा निवासी है, जबकि गोबिंद बेसरा कोटशिला थाना क्षेत्र के सहारजुड़ी गांव का रहने वाला है। दोनों से पूछताछ की जा रही है।
ग्रीन हंट से माओवादियों का नुकसान नही
चंद्रशेखर ने कहा कि आठ-दस दिनों से पश्चिम बंगाल और झारखंड की सरकारों ने सीमांत क्षेत्र में माओवादियों के खिलाफ साझा अभियान छेड़ रखा है। झारखंड पुलिस को माओवादियों के कुछ कैंप नष्ट करने व कुछ को गिरफ्तार करने में सफलता भी मिली है, जबकि बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ एवं बेलपहाड़ी इलाकों में पुलिस को कुछ खास सफलता नहीं मिल पाई है। सिर्फ बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के कन्हाईसोल में पुलिस को माओवादियों का एक बंकर धवस्त करने में ही सफलता मिली है। बंगाल में अभियान के दौरान आज तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। माओवादी नेता ने कहा कि अभियान के दौरान माओवादियों की कोई गतिविधि नजर नहीं आने से राज्य की सरकार और पुलिस मान रही है कि अभियान के चलते माओवादी भय से बैकफुट पर चले गए हैं लेकिन यह उनका दिवास्वप्न ही है। सरकार व पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा कि समय आने पर उन्हें हमारी गतिविधियां नजर आ जाएंगी। माओवादियों की अगली योजना के बारे में पूछने पर चंद्रशेखर ने कहा कि विशेष रणनीति के तहत फिलहाल इस संबंध में कुछ नहीं बताएंगे। इधर, सूत्रों के मुताबिक पुलिस अभियान के चलते माओवादी जंगल छोड़ गांवों में आ गए हैं और वहां पर ग्रामीणों से घुल-मिल गए हैं।
आपरेशन ग्रीन हंट को ले सीएम ने की बैठक
कालोसोना मंडल हत्या मामले में चार नक्सली गिरफ्तार
लालगढ़ छोड़ उड़ीसा भागे किशनजी
पुरुलिया, जागरण समाचार के अनुसार आपरेशन ग्रीन हंट के दबाव में शीर्ष माओवादी नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी, पोलित ब्यूरो के सदस्य माल्ला राजि रेड्डी समेत 10-12 नेता आपरेशन पीस हंट की कमान स्थानीय कमांडरों को सौंप झारखंड होते हुए उड़ीसा भाग गए हैं। यह दावा पश्चिम बंगाल की खुफिया विभाग ने किया है। खुफिया सूत्रों ने बताया कि बढ़ते दबाव के बाद किशनजी ने पिछले हफ्ते लालगढ़ छोड़ने का फैसला लिया था।
उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा नक्सलियों के खात्मे के लिए चलाए जा रहे आपरेशन ग्रीन हंट के जबाव में माओवादियों ने आपरेशन पीस हंट चला रखा है।
खुफिया विभाग के सूत्रों का कहना है कि मोबाइल लोकेशन की जांच से पता चला है कि इस समय किशन जी, माल्ला राजि रेड्डी समेत शीर्ष माओवादी नेता उड़ीसा के वांगरिपोलि-वारिपोदा जंगल में शरण लिए हुए हैं। ये नेता अपने साथ भारी मात्रा में गोला बारूद, विस्फोटक व हथियार साथ लेते गए हैं। कुछ विस्फोटक लालगढ़ में मिट्टी के नीचे दबा दिया गया है। बताया जाता है कि उड़ीसा में आपरेशन ग्रीन हंट नहीं चलने के कारण इन माओवादी नेताओं ने वहां शरण लेने का निर्णय लिया। बंगाल पुलिस ने इसकी जानकारी उड़ीसा पुलिस को दे दी है।
माओवादियों के खिलाफ एक हो नागरिक : कानून मंत्री
कानू सान्याल: अंतिम बात, आखिरी यादें
दरअसल, हाथीघीसा (पश्चिम बंगाल) की एक झोपड़ी और उसके बाशिन्दे ने इन तमाम संदर्भो (सवालों) से मुझे बहुत दिन तक मथा था। यह कानू सान्याल की झोपड़ी थी। उनके रूप में मैंने यहां नक्सलवाद के 'कथा पुरुष' को घुटते-मरते देखा था। और आज खबर आई कि कानू दा फंदे में झूल गए। खुद सबको छोड़ गए। दुनिया ने तो उन्हे पहले ही छोड़ दिया था। (हां, कुछ लोग जरूर अपवाद रहे)। भाई पैसा न देते तो दादा, सांस चालू रखने वाली दवा भी नहीं खा सकते थे।
कामरेड बताएंगे-'दादा की अस्वाभाविक मौत सिर्फ उनकी उम्र का तकाजा थी?' नहीं, बिल्कुल नहीं। 78 साल के दादा को दुनियावी मोर्चे पर कोई मलाल न था। उन्होंने अपेक्षा भी नहीं की। हां, उनको यह बात जरूर कचोटती रही कि कभी साथी रहे लोग या उनकी सरकार (पश्चिम बंगाल का माकपा राज) ने मरणासन्न अवस्था में भी उनकी सुधि न ली। हां, आज पोस्टमार्टम को ले जाने वाली पुलिस इसी राज की थी। आज बुद्धदेव भट्टाचार्य (मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल) की यह मुनादी पूरी हुई कि 'अब पश्चिम बंगाल में कोई नक्सली नहीं बचा।' वे सिर्फ कानू बाबू को नक्सली मानते थे। सभाओं में अक्सर कहते थे -'हम कानू बाबू को अपने साथ करना चाहते है।' वस्तुत: यह गवाही थी कि कैसे नक्सल आंदोलन के किरदारों को उनके ही पुराने साथियों (माकपा) ने दबाया, कुचला? अक्खड़ कानू दा, घोर घुटन के ऐसे कई कारणों को जीते रहे।
मैं, कुछ दिन पहले उनसे मिला था। बैठने नहीं दे रहे थे। मीडिया से बात को तैयार नहीं। किसी तरह बात शुरू हुई। थोड़ी देर बाद मेरे फोटोग्राफर का फ्लैश चमका, तो दादा फिर भड़क गए। बेहद चिढ़े हुए, पूरी व्यवस्था से। अपनों से, खुद से भी। बोले-'अब जीने का मन नहीं करता है।' मैं जब मिला था, वे बीमार थे। सामने दो अखबार। चाय की केतली। उनका बाडी लैंग्वेज यही बता रहा था कि अपना कुछ भी न हो सका; कुछ भी तो नहीं बदला! उनके घुटन के मूल में यही था। उन्होंने तमाम संदर्भो का हवाला देते हुए कहा भी था-'अब मैं सब कुछ भूल चुका हूं। क्या था, क्या हूं-सब कुछ। .. गलती से भी याद आता है, तो तड़प जाता हूं।' तड़प के कारण भी गिनाए। माओवादियों पर भड़क गए थे, उन्हे अराजकतावादी कहा था। उनके अनुसार 'माओवादी, मार्क्सवाद-लेनिनवाद के खिलाफ काम कर रहे है। हथियार तो लादेन भी उठाये हुए है। .. बंदूक के पीछे राजनीति और अनुशासन होना ही चाहिये।'
तब, यह नहीं लगा था कि दादा खुद को इस तरह खत्म करेगे। दरअसल बीमारी के बावजूद उनकी बूढ़ी हड्डियों में बेजोड़ ललक दिखी थी। उन्होंने मुकाम पाने की तकनीक भी बताई थी-'सबको एकताबद्ध कर शिक्षित करना होगा। आम आदमी को लेकर लड़ाई करना होगा। जनता को हथियारबंद करना होगा। देखना, एक दिन ऐसा होगा।'
वे इस बात से भी निराश थे कि 'अभी फैलने की बहुत गुंजाइश है मगर कोई इस लायक काम नहीं कर रहा है। .. माकपा संशोधनवादी है। और हमारे साथियों को टूटने, अलग गुट बनाने से फुर्सत नहीं है।'
खैर, दादा तो चले गये। वे जनता के 'लड़ाकों', उनके रहनुमाओं के लिए हमेशा नसीहत रहेगे। हमेशा इस बात की गवाही देते रहेगे कि कैसे और क्यों कोई आंदोलन बीच रास्ते से भटक जाता है; कितनी सहूलियत से जनता बेच दी जाती है? अभी के दौर में कानू सान्याल होना असंभव सा है। और शायद इसलिए नक्सल आंदोलन चाहे जिस भी स्वरूप को अख्तियार करे, मंजिल दूर, बहुत दूर नजर आ रही है।
एक और बड़ा संकट है-अब लखी को कौन पूछेगा? वह नक्सली आंदोलन के उद्भव के प्रमुख किरदार जंगल संथाल की बेवा है। दादा, उनका ख्याल रखते थे। वह दादा के ठीक बगल की झोपड़ी में अपनी मौत की रोज मनौती मनाती है।
मधुरेश, पटना
ग्रीन हंट के विरोध में नक्सलियों ने खोला मोर्चा
देवघर। पूर्व रेलखंड के मदनकट्टा व विद्यासागर स्टेशन के बीच नक्सलियों द्वारा आपरेशन ग्रीनहंट के विरोध में मंगलवार सुबह रेल पटरी पर बैनर लगाए जाने व उसे उड़ाने के असफल प्रयास की छानबीन में रेल व जिला पुलिस जुटी हुई है। इस घटना को अंजाम देकर इस इलाके में नक्सलियों ने अपनी उपस्थिति खुले तौर पर दर्ज करा दी है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार देवघर के सीमावर्ती जामताड़ा जिले के नारायणपुर व नाला प्रखंड इलाके में पिछले कुछ समय में नक्सली गतिविधि बढ़ी है। आपरेशन ग्रीनहंट शुरू होने के बाद से इस इलाके में अनजान चेहरों को देखा जा रहा है। रेल पटरी पर हुई घटना को भी इन्हीं नक्सलियों की करतूत बतायी जा रही है। ज्ञात हो कि इस जगह से नारायणपुर की दूरी ज्यादा दूर नहीं है। लोगों ने बताया कि घटना के बाद कुछ लोगों को नारायनपुर की ओर जाते हुए देखा गया। घटना स्थल के पूरब में देवघर जिला के करौं थाना क्षेत्र का लाला पोखर व पश्चिम में जामताड़ा जिला के करमाटांड ओपी के सहजपुर व इंदिराटांड गांव है। यह जगह सुनसान है और काफी दूर तक कोई आबादी नहीं है। गौरतलब हो कि रेल पहले से ही नक्सलियों का साफ्ट टारगेट रहा है। खुफिया तंत्र ने पहले भी इस मार्ग पर नक्सलियों द्वारा रेल पुल को उड़ाये जाने की घटना के बारे में अगाह किया था। इसके बाद से रेल पुलिस ने चौकसी बढ़ा दी थी। बाद में धीरे-धीरे चौकसी कम हो गयी और अब नक्सलियों ने खुलेआम अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। सूत्रों के अनुसार नारायणपुर व नाला इलाके में नक्सली ने अपनी गतिविधि बढ़ा दी है। बताया जाता है कि नाला का इलाका बंगाल के वीरभूम इलाके से जुड़ा हुआ है। बंगाल के इस इलाके काफी समय से नक्सली सक्रिय हैं। अब चुकिं बंगाल में आपरेशन ग्रीन हंट व्यापक पैमाने पर चलाया जा रहा है ऐसे में नक्सली नये ठिकाने की जुगाड़ में हैं। ज्ञात हो कि जामताड़ा का यह इलाका देवघर जिले के करौं, चितरा व पालोजारी थाना क्षेत्र से सटा हुआ है और ऐसे में सीमा के इस पार भी ये नक्सली कभी भी दस्तक दे सकते हैं। रेल पटरी को उड़ाने के असफल प्रयास के बारे में आरपीएफ आसनसोल डिविजन के कमंाडेंट आरएसपी सिंह का कहना है कि मामले में अहम सुराग हाथ लगे है। पुलिस मामले की छानबीन में जुट गई है। वहीं, चौकसी बढ़ा भी दी गई है।
काम कर गई नक्सलियों की नयी ट्रिक दिशा का
दुमका। घटना को अंजाम देने के बाद सुरक्षित भाग निकल लेने के लिए जो चाल नक्सलियों ने खेली, उसी के चलते नक्सली आराम से भाग निकलने में सफल रहे। घटनास्थल से बरामद हंसुआ और चप्पल किसकी थी यह अभी तक साफ नहीं हुआ है।
जानकारी के अनुसार घटना की अगली सुबह पुलिस खोजी कुत्ते के साथ उस स्थान पर पहुंची जहां राम पद गोराई ने दम तोड़ा था। चप्पल और हंसुआ सूंघने के बाद कुत्ता दक्षिण दिशा की ओर गया। इससे यही लगता है कि वारदात को अंजाम देने के बाद नक्सली इसी रास्ते से गांव से बाहर निकले। परन्तु ग्रामीणों ने पुलिस को बताया था कि घटना के बाद नक्सली उत्तर दिशा की ओर चले गये। पुलिस की माने तो दोनों बातों में भिन्नता के पीछे भी कई राज छिपे हुए है। वारदात के बाद नक्सली एक चप्पल छोड़कर क्यों भागे। जबकि जंगल में बगैर चप्पल के जाना असंभव है। पुलिस सूत्रों की माने तो जिस हथियार से पहले वार किया गया वह नक्सली का है या किसी ओर का इस दिशा में भी जांच की जा रही है। हो सकता है नक्सलियों ने पुलिस को चकमा देने के लिए जानबूझकर किसी और की चप्पल व हंसुआ का इस्तेमाल किया हो। नक्सली यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि हत्या के बाद पुलिस उनकी तलाश में छापेमारी जरूर करेगी। इसीलिए उन्होंने पुलिस को देर तक उलझाये रखने के लिए यह विधि अपनायी हो। उनकी यह विधि काम कर गई। उन्हे भागने के लिए जितना वक्त चाहिये था वह आसानी से मिल गया।
पुलिस ने छानी जंगलों की खाक
दुमका। टोंगरा के इसमाला पथरिया गांव में राम पद गोराई की हत्या के बाद भाग निकले नक्सलियों की तलाश में बुधवार को पुलिस ने आधा दर्जन से अधिक गांव में सर्च अभियान चलाकर जंगलों की टोह ली। परन्तु पुलिस के हाथ असफलता ही लगी।
पुलिस निरीक्षक बी.एन.सिंह के नेतृत्व में चलाये गये सर्च अभियान के क्रम में पुलिस ने पलन, आसनबनी, चुआंपानी, सिंदूरडीह, बुधुडीह व अगरमला गांव में कई संदिग्ध स्थानों पर छापेमारी की लेकिन पुलिस को नक्सलियों की मौजूदगी का कोई सुराग हाथ नहीं लगा। सर्च अभियान के बाद पुलिस की टीम ने जंगलों पर चढ़ाई की लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी। पुलिस की माने तो घटना को अंजाम देने के बाद नक्सली रातों-रात प्रखंड छोड़कर निकल गये। जिसके कारण पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा।
धनबाद-गिरिडीह में नक्सलवाद फैलाया था सान्याल ने
धनबाद। 24 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से चारू मजुमदार के साथ मिलकर नक्सली आंदोलन की शुरूआत करने वाले कानू सान्याल ने ही 70 के दशक में टुंडी, तोपचांची, पीरटांड़ इलाके में नक्सलवाद की नींव डाली थी जो देखते ही देखते पूरे झारखंड में फैल गया। करीब एक दशक से भी अधिक समय तक कानू सान्याल, चारू मजुमदार, कन्हाई चटर्जी एवं अमूल्य सेन ने इस क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया था और यहां के लोगों विशेषकर आदिवासियों को नक्सली विचारधारा से जोड़ने का काम किया था।
पश्चिम बंगाल की सिद्धार्थ शंकर राय की सरकार ने वर्ष 72 में नक्सलियों के खिलाफ अभियान छेड़ा था। सरकार के बढ़ते दबाव को देखते हुए नक्सलियों के उपरोक्त शीर्ष नेता भूमिगत हो गए और बंगाल छोड़ बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र जो अब झारखंड है को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। गोला प्रखंड के जिलगा पहाड़ के नीचे रहने वाले जीवलाल जो आसनसोल में कार्यरत थे कानू व मजुमदार के संपर्क में आए थे। नक्सली नेताओं का पहला लक्ष्य सबसे पहले आदिवासी समुदाय को जोड़ना था। उस वक्त आदिवासी समाज के प्रतिनिधि के तौर पर टुंडी के दक्षिणी क्षेत्र के गुवाकोला के रहने वाले विधायक लखीराम सोरेन एवं पश्चिमी टुंडी के नावाटांड के रावण मांझी सरकार की ओर से मनोनीत थे। बताया जाता है कि वर्ष 72 में जीवलाल को लेकर चारो नक्सली नेता गुवाकोला पहुंचे और लखीराम को नक्सली विचारधारा से लैस करने का प्रयास किया लेकिन वे सफल नहीं हो सके। इसके बावजूद नक्सली नेताओं ने हिम्मत नहीं हारी। कई साल तक प्रयास करने के बावजूद जब वे सफल नहीं हुए तो रावण मांझी के पास पहुंचे। रावण उनके विचारधारा से काफी प्रभावित हुए। शुरूआत में वे रावण को लेकर उनके रिश्तेदारों के गांव बैगनकोचा, सिलवारीटांड़, मछियारा, कोलाहीर आदि गांव गए और आदिवासियों को गोलबंद कर संगठन खड़ा किया। कार्यकत्र्ताओं को जरूरत पड़ने पर चिकित्सा एवं धन कन्हाई चटर्जी उपलब्ध कराते थे। इसके बाद तो पीरटांड़, तोपचांची, डुमरी का क्षेत्र इनके प्रभाव में आ गया। इस क्षेत्र में संगठन खड़ा करने के लिए नक्सलियों को झामुमो से मुकाबला करना पड़ा था। इस संघर्ष में कई माओवादी एवं झामुमो कार्यकत्र्ताओं की मौत हुई थी। पीरटांड़ के जंगली क्षेत्रों में वर्ष 80 तक कानू सान्याल एवं उनके साथी कार्यकत्र्ताओं को प्रशिक्षण देने आते थे। बंगाल एवं अन्य क्षेत्र के भी लोग यहां प्रशिक्षण लेने आते थे। बताया जाता है कि हर प्रशिक्षण में कानू सान्याल नक्सलबाड़ी की आग को पूरे देश में फैलाने का लक्ष्य कार्यकत्र्ताओं को देते थे। कन्हाई चटर्जी पीरटांड़ क्षेत्र में ही मलेरिया से पीड़ित हुए थे। पश्चिमी टुंडी के पलमा में माओवादी अपने नेताओं कन्हाई चटर्जी, अमूल्य सेन, रावण मांझी आदि का शहादत दिवस 23 मार्च को मनाते थे। हाल के दो वर्षो से अब वहां शहीद दिवस नहीं मनाया जा रहा है। अब माओवादी किसी दूसरे जगह पर शहीद दिवस मनाते हैं।
उड़ीसा में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अतिरिक्त बल
उड़ीसा में नक्सलियों ने पटरी उड़ाई
नक्सलियों ने पुलिसकर्मी की हत्या की
भुवनेश्वर ! नक्सलियों ने उड़ीसा के मलकानगिर जिले में मंगलवार को एक विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) की हत्या कर दी।पुलिस ने बताया कि सशस्त्र नक्सलियों ने जिले के मारीबेड़ा गांव में बासुदेव खिल्ला की हत्या कर दी।पुलिस के अनुसार लगभग 15 की संख्या में आए नक्सलियों ने एसपीओ पर हमला किया और उसकी हत्या कर दी। खिल्ला के साथ रहे एक अन्य व्यक्ति राम पुजारी को भी गोलियां लगी हैं। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
नक्सली मुठभेड़ में 3 जवान शहीद
पुलिस ने बताया कि दोनों तरफ से हुई गोलीबारी में एसओजी के तीन जवानों की मौत हो गई और छह अन्य घायल हो गए। चार घायल जवानों की हालत गंभीर बताई गई है, जिन्हें विशाखापत्त्चनम भेज दिया गया है। मृतकों की पहचान संजीत के. टिरके, बलराम प्रधान और दीपक सानभाय के रूप में की गई है। पुलिस के मुताबिक मुठभेड़ में माओवादियों को किसी तरह के नुकसान का अभी तक पता नहीं लगा है। पुलिस ने कहा कि गोलीबारी के बाद यहां जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर दूर गहन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है, ताकि भाग गए नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा सके।
पुलिस ने कहा कि पास के मल्कानगिरी जिले में एक अन्य घटनाम में माओवादियों ने चित्रकोंडा में खनिजों के परिवहन वाली एक निजी औद्योगिकी कंपनी की पाइपलाइन के पास पंप हाउस और नियंत्रण कक्ष को उड़ा दिया। पुलिस के मुताबिक हथियारों से लैस करीब 50 सशस्त्र उग्रवादियों ने आज सुबह इलाके में धावा बोला और वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों को काबू में करके विस्फोट कर दिया। माओवादियों ने कल भी उड़ीसा में दो विस्फोट किए थे, जिसके बाद 48 घंटे के उनके बंद के दौरान मुंबई-हावड़ा रेल मार्ग पर यातायात प्रभावित रहा।
बिहार में नक्सलियों ने थाना भवन को उड़ाया
नक्सलियों ने रेल पटरी उड़ाई
बीजापुर ! नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल में माकपा के एक नेता की हत्या भी कर दी। बिहार के गया जिले में नक्सलियों द्वारा पटरी को उड़ा दिए जाने के बाद भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। इस वजह से तीन रेलगाड़ियों को रद्द कर दिया गया जबकि 17 रेलगाड़ियों के मार्ग में परिवर्तन करना पड़ा । पुलिस के अनुसार भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस के आठ डिब्बे परैया और काष्टा रेलवे स्टेशनों के बीच सोमवार रात पटरी से उतर गए।
छत्तीसगढ़ सहित आठ राज्यों में नक्सलियों के 22 एवं 23 मार्च के बंद से बीजापुर के अन्दरूनी क्षेत्र- बासागुड़ा उसूर, फरसेगढ़, भोपालपटनम्, इलमिड़ी एवं गंगालूर मार्ग में आवाजाही काफी प्रभावित हुई। मद्देड़ से तारलागुड़ा होते वेंकटापुरम व महाराष्ट्र का सम्पर्क बंद की चपेट में रहा। नक्सलियों के शीर्ष नेता की हत्या एवं आपरेशन के बंद संबंधी बैनर-पोस्टर सड़क मार्गों में अनेक स्थान पर लगाए गए हैं। बीजापुर-आवापल्ली के बीच नुकनपाल पुल एवं दुंगईगुड़ा के पास सड़क खोद कर मार्ग अवरोध किया गया, जिससे बासागुड़ा-उसूर की यात्री बसें वहीं खड़ी रही। रेलवे महानिरीक्षक एस. के. भारद्वाज ने बताया कि इंजन सहित आठ डिब्बे पटरी से उतर गए। नक्सलियों द्वारा लगभग चार मीटर तक पटरी उड़ाने की वजह से यह हादसा हुआ। रेलवे कर्मचारी मरम्मत कार्यो में जुटे हुए हैं। चिकित्साकर्मियों और इंजीनियरों का एक दल घटना स्थल पर पहुंच चुका है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि तीन रेलगाड़ियों पटना-रांची जनशताब्दी, गया-डेहरी ओन सोन और पटना डेहरी ओन सोन को रद्द कर दिया गया है। 17 रेलगाड़ियों के मार्गो में बदलाव किया गया है।
उधर, पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर जिले के कुलडीहा गांव में नक्सलियों ने माकपा के स्थानीय नेता हेमंत प्रधान की हत्या कर दी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक प्रधान का सोमवार रात लगभग 15 सशस्त्र नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था। मंगलवार को उनका शव मिला। राय में नक्सलियों ने गिधनी और खाटकूड़ा स्टेशनों के बीच बारूदी सुंरग से रेल की पटरियों को उड़ा दिया।
रेलवे की संपत्ति को इससे भारी नुकसान पहुंचा है। दक्षिण पूर्व रेलवे के एक प्रवक्ता ने बताया कि इससे कई रेलगाड़ियों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कुछ रेलगाड़ियों का मार्ग परिवर्तित कर दिया गया है। उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले में सोमवार देर रात नक्सलियों ने एक पटरी को विस्फोटक लगाकर उड़ा दिया। इस वजह से एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई। एक अधिकारी के अनुसार नक्सलियों ने बिशरा रेलवे स्टेशन के निकट पटरी उड़ाई। इससे हावड़ा-मुंबई रेलमार्ग प्रभावित हुआ है। रेलवे कर्मचारी मरम्मत कार्य में जुटे हुए हैं। मालगाड़ी के तीन डिब्बे क्षतिग्रस्त हो गए। वरिष्ठ मंडलीय वाणियिक प्रबंधक वी. के. श्रीवास्तव ने बताया, च्चनक्सलियों ने सोमवार देर रात लगभग 1.30 बजे इस घटना को अंजाम दिया। इस घटना के कारण एक मालगाड़ी के पांच डिब्बे पटरी से उतर गए। घटना के बाद कई लंबी दूरी की रेलगाड़ियां विभिन्न स्टेशनों पर खड़ी रहीं। तीन एक्सप्रेस रेलगाड़ियों को रद्द कर दिया गया और कई रेलगाड़ियों के मार्ग में परिवर्तन भी किया गया है। उल्लेखनीय है कि नक्सलियों ने बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश सहित महाराष्ट्र के कुछ जिलों में दो दिवसीय बंद का आह्वान किया है।
नक्सलियों ने बारूदी विस्फोट से एस्सार का पंप हाऊस उड़ाया
जगदलपुर ! छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती उड़ीसा के मलकानगिरी जिले में बीती रात नक्सलियों ने एस्सार समूह के पंप हाऊस को एक के बाद एक लगातार चार बारूदी सुरंग विस्फोट से मलबे में बदल दिया और कंपनी के गेस्ट हाऊस समेत कार्यालय में खड़ी वाहनों को आग के हवाले कर दिया।
अधिकारिक सूत्रों के अनुसार मलकानगिरी जिले के चित्रकोंडा स्थित एस्सार समूह के पंप हाऊस में बीती मध्य रात लगभग दो-ढाई सौ सशस्त्र नक्सलियों ने धावा बोल दिया। नक्सलियों ने एस्सार समूह के पंप हाऊस में मौजूद कर्मचारियों को बाहर निकाला और पंप हाऊस को लगातार 4 बारूदी विस्फोट कर क्षतिग्रस्त कर दिया। इतना ही नहीं नक्सलियों ने पंप हाऊस परिसर में मौजूद गेस्ट हाऊस एवं वाहनों में आग लगा दी। वारदात के बाद नक्सलियों ने पंप हाऊस के मु?य द्वार पर परचा चस्पाकर घटना का कारण आपरेशन ग्रीन हंट का विरोध एवं एस्सार के प्रति नाराजगी बताई है। नक्सली विस्फोट से एस्सार कंपनी को करोड़ों की क्षति का आंकलन किया गया है।
गौरतलब है कि लगभग चार माह पूर्व नक्सलियों ने ग्राम फूलपाड़ एवं पिनकोंडा के समीप एस्सार कंपनी की पाईप लाईन उड़ा दी थी, तबसे आज पर्यंत तक कंपनी का कार्य ठप पड़ा हुआ है।
जनमिलीशिया दलम के 3 नक्सली गिरफ्तार
अधिकारिक सूत्रों के अनुसार नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे आपरेशन ग्रीन हंट के तहत मर्दापाल थाना क्षेत्र के ग्राम चेमा व कोड़ेनार के जंगल में सर्चिंग के दौरान नक्सली जनमिलिशिया दलम के 3 सक्रिय सदस्यों रामलाल पिता विकरू कोर्राम निवासी चेमा, सोनू निगम पिता लच्छन कोर्राम निवासी कोड़ेनार एवं भगत पिता फगड़ूराम कोर्राम दबोच लिया गया। पुलिस के अनुसार तीनों ही आपरेशन ग्रीन हंड के विरोध में कोई बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में थे। गिर?तार नक्सलियों की लगभग आधा दर्जन संगीन अपराधों में तलाश थी। भगत कोर्राम की गिर?तारी पर सरकार की ओर से 2000 का ईनाम घोषित किया गया था।
पुलिस मुठभेड़ में कमांडर सहित 3 नक्सली गिरफ्तार
नक्सली बंद का मिला-जुला असर
एक मात्र रेल यात्री गाड़ी जगदलपुर तक सीमित
जगदलपुर ! माओवादी नक्सलियों के द्वारा ऑपरेशन ग्रीनहंट और ऑपरेशन त्रिशूल के विरोध में आयोजित बस्तर बंद का मिला-जुआ असर देखने को मिला। शहरी क्षेत्रों में दुकानें खुली रही। यातायात यथावत रही, मगर जिले के कुछ अंदरूनी क्षेत्रों में इसका असर देखने को मिला। कहीं साप्ताहिक बाजार का आयोजन नहीं हुआ तो कहीं शहर के आसपास के गांवों में बाजार बंद नहीं हुआ। एक मात्र पेसेंजर ट्रेन सीमित कर दिया गया है मगर नक्सली क्षेत्रों में जाने वाली यात्रीगाड़ियां रोज की तरह आज भी यहां से रवाना हुई।
बस्तर जिले में नक्सली बंद का कोई खास असर नहीं दिखाई दिया मगर बंद की मिला-जुला असर कहीं-कहीं देखने को मिला। बस्तर, बकावंड, कोण्डागांव, तोकापाल, दरभा, बास्तानार, लोहंडीगुड़ा, फरसगांव, कोशकाल आदि राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे पड़ने ब्लॉक मु?यालयों में इसका असर दिखाई नहीं दिया। रोज की तरह यहा कारोबार चलती रही लेकिन अंदरूनी क्षेत्रों में इसका असर दिखाई दिया। तोंगपाल, तुकानार सहित क्षेत्र में इसका असर देखने को मिला। कोण्डागांव, माकड़ी, विश्रामपुरी, बास्तानार और लोहंडीगुड़ा ब्लॉक के भीतरी हिस्सों में कारोबार बंद रहा और इन स्थानों में लगने वाले साप्ताहिक बाजार भी ठप रहा। वाल्टेयर से यहां पहुंचने वाली रेलगाड़ी शाम को पांच बजे जगदलपुर पहुंची और मंगलवार की सुबह 9 बजे से यहां वाल्टेयर के लिए रवाना हो जायेगी।
माओवादी नक्सलियों द्वारा शहीद दिवस के अवसर पर ऑपरेशन ग्रीनहंट के खिलाफ 21 मार्च से 23 मार्च तक तीन दिनाें तक दण्डकारण्य बद का आह्वान किया है, इसकी खबर मिलते ही वाल्टेयर रेल मंडल ने विशाखापटनम से किरंदुल के बीच चलने वाली पेसेंजर ट्रेन को आगामी तीन दिनों तक किरंदुल नहीं भेजने का निर्णय लिया है। रविवार को पेसेंजर को जगदलपुर में ही रोग लिया गया है। अब 23 मार्च तक 1 व्हींके एवं 2 व्हीके पेसेंजर ट्रेन जगदलपुर व विशाखापटनम के बीच संचालित होगी।
रेलवे सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरदार भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू को अंग्रेजों द्वारा फांसी दिये जाने वाले दिवस अर्थात् 23 मार्च को पूरे भारत में शहीद दिवस मनाया जाता है। इस बार नक्सलियों ने शहीद दिवस पर ऑपरेशन ग्रीनहंट सहित नक्सलियों के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ दो दिवसीय दण्डकारण्य बंद का आह्वान किया है। हालांकि इससे संबंधी यादा बैनर-पोस्टर आदि बस्तर में बरामद होने की खबर नहीं है, लेकिन रेलवे खुफिया तंत्र को नक्सलियों के इस आह्वान का पता चलते ही इसकी सूचना वाल्टेयर रेल मंडल को दी। इस आधार पर वाल्टेयर रेल मंडल ने 21, 22, 23 मार्च को तीन दिनों तक एहतियात के तौर पर 1 व्हीके वव 2 व्हीके पेसेंजर को किरंदुल नहीं भेजने का निर्णय लिया है और इन दिनों तक पेसेंजर जगदलपुर से छूटेगी और यहीं तक चलेगी। रविवार को पेसेंजर को जगदलपुर रेलवे स्टेशन पर रोक लिया गया है जिसके चलते दक्षिण बस्तर जाने वाले यात्री काफी परेशान हुए। हालांकि यात्रियों के लिए दक्षिण बस्तर तक जाने रेलवे स्टेशन से बस की सेवा की व्यवस्था की गई थी, बावजूद बस में खचाखच यात्री भर जाने से लोग परेशान रहे।
जिले में पुलिस महानिरीक्षक टीजे लांगकुमेर के निर्देश पर एसपी पी सुंदरराज ने जिले के सभी थानों को अलर्ट कर दिया और पु?ता सुरक्षा का इंतजाम कर इसकी जायजा लिया गया। नक्सल प्रभावित मारडूम, बास्तानार के अंदरूनी इलाका मर्दापाल, विश्रामपुरी सहित नारायणपुर से लगे बस्तर जिले के इलाके में सुरक्षा प्रबंध चाकचौंबध रहा। 21 मार्च को पुलिस थाना मारडूम के अंतर्गत ग्राम सुलेंगा और रायमती के जंगल में पुलिस और नक्सली के बीच आमने सामने हुई मुठभेड़ में तीन वर्दीधारी नक्सली को गिरफ्तार किया गया। इसमें एक नक्सली दलम का कमाण्डर शामिल है। अन्य स्थानों से अभी तक किसी अप्रिय घटना की सूचना बंद के दौरान नहीं मिली है।
नक्सली बंद का छत्तीसगढ के बस्तर संभाग में व्यापक असर
पुलिस सूत्रों के अनुसार ।छत्तीसगढ।के कांकेर जिले के पंखाजूर एंव अंतागढ मार्ग पर माओवादियों ने पेड काट कर गिरा दिए गए हैं परिणाम स्वरप कल से इन मार्गो में यात्री बसें नहीं चल रही हैं ! ज्ञात हो माओवादियों द्वारा हाल ही में आंध्रप्रदेश में पुलिस द्वारा मारे गए माओवादियों के विरोध में दो दिवसीय बंद का फरमान जारी किया गया था1 बंद का नारायणपुर जिले में सर्वाधिक असर पडा है ! ओरछा धनोरा तथा अंतागढ मार्ग पर कल से आवागमन ठप है !
दंतेवाडा जिले के कोंटा मार्ग एंव कटेकल्याण मार्ग पर गाडियां नहीं चल रही है ! ठीक इसके विपरित बैलाडीला मार्ग पर आवागमन पूर्ववत जारी है1 यही स्थिति बीजापुर जिले की भी बनी हुई है ! बीजापुर - गीदम के बीच इसका आंशंकि असर है1 जबकि गंगालूर बासागुडा बीजापुर पटनम व कुटरू मार्ग पर गाडियां नहीं चल रही है !
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर के आसपास भी बंद का असर देखा गया है ! जगदलपुर के लोहण्डीगुडा विकास खण्ड के क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बिन्ता ग्राम में माओवादियों द्वारा बैठक लिए जाने की खबर है ! सूत्रों का कहना है कि माओंवादियों के लगातार बढते दबाव के कारण लोहण्डीगुडा के अलावा बडाजी और घोटिया में दो नए पुलिस थाने खोले गए हैं1 इसके बावजूद स्थिति चिंताजनक बनी हुई है ! फिलहाल कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं है !
टोल प्लाजा पर नक्सली हमले में 2 की मौत
बिहार में नक्सलियों ने थाना भवन को उड़ाया
Tuesday, March 23, 2010
कानू सान्याल के जाने का मतलब
प्रभात गोपाल
हार्डकोर नक्सली नेपाली गिरफ्तार
सरगुजा । छत्तीसगढ़ पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान डेढ़ लाख के इनामी नक्सली कमांडर को गिरफ्तार किया है। मुठभेड़ में दो नक्सलियों के मारे जाने की खबर है। जानकारी के अनुसार, सरगुजा क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक नरेंद्र खरे ने बताया है पुलिस ने बलरामपुर के फ़टपाली के जंगलों में नक्सलियों को देर रात घेर लिया था। दो-तीन घंटे की गोलाबारी के बाद नक्सली भाग गये। पर उसके जोनल कमांडर को गिरफ्तार कर लिया गया।मुठभेड़ में दो नक्सलियों के मारे जाने की खबर है। शवों को उनके साथी ले गये हैं। उन्होंने बताया कि पकड़ा गया कमांडर मैन पाट थाना क्षेत्र के ग्राम ढोहा केसरा का नेपाली उर्फ़ प्रवीण खसे है। उसके खिलाफ झारखंड ने एक लाख और छत्तीसगढ़ सरकार नें 50 हजार रुपये का ईनाम रखा था। घटनास्थल से हथियार और गोला-बाद बरामद किये गये हैं।
आंदोलन के भटकाव से निराश थे सान्याल

उनका मानना था कि किसी भी व्यवस्था में जाकर आप उसे बदलने में सफल नहीं हो सकते। पिनोशे के अलावा और कई देशों में मार्क्सवादी सिद्घांतो को लोकतंत्र के द्वारा स्थापित करने का प्रयास किया गया। जो सर्वथा विफल रहा। हांलाकि कानू सान्याल हाल के कुछ वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन से पूरी तरह निराश थे। वह मानते थे कि नक्सलवादी आंदोलन दिशा से भटक गया है।
हांलाकि एक उल्लेखनीय बात ये भी है कि खुद वर्तमान नक्सलियों ने संशोधन वादी या परिवर्तनवादी मानने लगे थे। 1968 में नक्सलवादी आंदोलन के दौरान कई बार वे जेल भी गए। 1972 में चारू मजूमदार की पुलिस हिरासत में रहस्मयी मौत के बाद सान्याल नक्सलवादी आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे थे। और कई बड़ी घटनाओं में उनका हाथ माना गया था। हांलाकि पिछले कुछ वर्षों से वे एकाकी जीवन गुजार रहे थे लेकिन लगातार किसान औऱ अन्य समस्याओं को लेकर कोलकत्ता में अपनी उपस्थिती दर्ज कराते रहते थे।
नक्सलियों ने उड़ाया रेलवे ट्रैक
कानू सान्याल ने आत्महत्या की
सिलीगुड़ी । नक्सली आंदोलन के जनक कानू सान्याल की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गयी। दिन के एक बजे उनका शव नक्सलबाड़ी ब्लॉक के शिवदेलाजोत स्थित उनके घर में नॉयलान की रस्सी से लटकता पाया गया। उनकी मौत को लेकर रहस्य बना हुआ है। प्राथमिक तौर पर मामला आत्महत्या से जोड़ कर देखा जा रहा है। शव मिलने के बाद नक्सलबाड़ी में कोहराम मच गया। लोगों की भीड़ जमा हो गयी। वयोवृद्ध नक्सली नेता को ओखर आत्महत्या करने की जरूरत क्यों पड़ी, लोग समझ नहीं पा रहे हैं।सुबह छह बजे उठे थे कानू सान्याल की करीबी रही 68 वर्षीय शांति उरांव बताती हैं वह रोज की तरह सुबह छह बजे उठे थे। इसके बाद हाथीघीसा मोड़ तक टहलने भी गये। वहां से लौट कर कपड़े धोने के लिए कहा। नहाने के बाद दोपहर 12 बजे खाना भी खाया। हालांकि अन्य दिनों से अलग मंगलवार को खाना खाने के बाद अखबार पढ़ने लगे। यह देख मैं अपने घर चली गयी। इसके बाद क्या हुआ, किसी को नहीं पता।
शांति उरांव ने दोपहर एक बजे कानू सान्याल के घर की खिड़की से नजर डाली, तो वह बिस्तर पर नहीं थे। वह अंदर गयी। देखा कि कानू सान्याल लकड़ी से बने घर की बीम से लटक रहे थे। शांति ने तुरंत आसपास के लोगों को बुलाया। जो भी इस घटना के बारे में सुना, अवाक रह गया। शांति उरांव का कहना है मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि कानू सान्याल आत्महत्या कर सकते हैं। नक्सल आंदोलन में शांति उरांव कानू सान्याल के साथ थी। वह बताती हैं घर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। अब सवाल यह है कि क्या आत्महत्या करने से पहल कानू सान्याल ने घर का दरवाजा बंद करना जरूरी क्यों नहीं समझा। पुलिस भी इस मामले में फ़िलहाल कुछ नहीं बता रही है।कौन थे कानू सान्यालकानू सान्याल का जन्म 1932 में हुआ था। वर्ष 1967 से पहले तक कानू सान्याल बंगाल की सत्ता में बैठी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक थे। माकपा नेता स्वर्गीय ज्योति बसु व स्वर्गीय प्रमोद दासगुप्ता से वैचारिक मतभेद होने के बाद नक्सल पंथी संगठन की स्थापना हुई। चारू मजूमदार और कुछ नेताओं के साथ मिल कर कानू सान्याल ने 24 मई 1967 में नक्सबाड़ी से नक्सली आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन को सशस्त्र आंदोलन के नाम से जानते हैं। इसके बाद यह आंदोलन विकराल रूप लेता चला गया। बंगाल सरकार ने स्थिति की विकरालता को देखते हुए नक्सल पंथी संगठन को प्रतिबंधित कर दिया गया। 28 जुलाई 1972 को पुलिस कस्टडी में सीपीआइ (एमएल) के संस्थापक सदस्य चारू मजूमदार की मौत हो गयी थी। इसके बाद कानू सान्याल ने सशस्त्र आंदोलन से अपने आप को अलग कर लिया। लगभग डेढ़ साल पहले श्री सान्याल हार्ट अटैक के बाद लकवे से ग्रसित हो गये थे। इसके बाद वह नक्सलबाड़ी में मिट्टी व काठ से बने एक छोटे से घर में जीवन के अंतिम दिन काट रहे थे। सीपीआइ (एमएल) को अपना योगदान नहीं दे पाने के कारण वह काफ़ी हताश-निराश थे। उन्हें इस बात का मलाल था कि वह अपना समय और ऊर्जा पार्टी को नहीं दे पा रहे हैं। हाल में वह कहीं आ-जा भी नहीं रहे थे।
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Saturday, March 20, 2010
आपरेशन ग्रीन हंट का दूसरा चरण जल्द
कोलकाता। माओवादियों के खिलाफ सीआरपीएफ, बंगाल, झारखण्ड और उड़ीसा पुलिस द्वारा चलाये जा रहे संयुक्त अभियान के पहले चरण में अपेक्षित सफलता मिलने के बाद जल्द ही आपरेशन ग्रीन हंट का दूसरा चरण शुरू करने की पहल शुरू हो गयी। बंगाल के पुलिस महानिदेशक भूपिन्दर सिंह ने बुधवार को कहा कि केन्द्रीय रिजर्व बल के स्पेशल डीजी के साथ बैठक हुयी है जिसमें संयुक्त आपरेशन का दूसरा चरण शुरू करने को लेकर विस्तृत चर्चा हुयी है। यह आपरेशन झारखण्ड के जंगलों से शुरू होगा। श्री सिंह ने यह भी कहा कि जनवरी माह में उड़ीसा में छोटे स्तर पर अभियान हुआ था। नक्सलियों के बंगाल में घुसपैठ का मुख्य रास्ता झारखण्ड है जिसे बंद करना आवश्यक है।
उल्लेखनीय है कि पुलिस महानिरीक्षक सुरजीत कर पुरकायस्थ ने नक्सलियों के खिलाफ चलाये गये अंतरराज्यीय संयुक्त अभियान के बाद 11 मार्च को कहा था कि आपरेशन का प्रथम चरण पूरी तरह सफल रहा। संयुक्त बल ने नक्सलियों के कई कैंप व अड्डों को नष्ट किया और स्थानीय ग्रामीणों के मन में कानून व्यवस्था के प्रति आस्था बढ़ा पाने में सफलता मिली है।
माओवादी धमकी से करोड़ों की योजनाओं पर ग्रहण
लातेहार। लातेहार जिले में नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है। भले ही जिला प्रशासन इस बात को झुठला दे, लेकिन अगर ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं पर नजर डाली जाए तो यह अपने-आप प्रमाणित हो जाता है।
जिले के मनिका प्रखंड को ही अगर देखा जाए तो यहां की अगर दर्जन भर योजनाएं नक्सलियों के फरमान के कारण बंद पड़ी है। उदाहरणस्वरूप 3 करोड़ 87 लाख रुपए की लागत से बनने वाली मनिका-कुमंडीह पथ का निर्माण छह माह से रुका है। यह योजना प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से ली गई है। आलम यह है कि धमकी के कारण संवेदक इस ओर देखना भी मुनासिब नहीं समझ रहे हैं। मनिका में ही मनिका से आंटीखेता तक बननेवाली 14 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य रुका है। यह योजना तीन करोड़ 87 लाख रुपए की है, जहां सिर्फ मेटल ही गिरा है। इसी प्रकार, सधवाडीह से जान्हो तक आठ किलोमीटर, कोरिद बयांग से खीराटांड़, मनिका-बरवैया पथ में तीनमुहान से बरवैया तक आठ किलोमीटर, रांची-डालटनगंज पथ से हेरहंज तक 28 किलोमीटर, कुई मोड़ से कोपे तक सड़क निर्माण का कार्य ठप पड़ा है। मनिका से कुमंडीह जाने वाले रास्ते में औरंगा नदी पर पुल निर्माण की निविदा निकाली गई, लेकिन मारे भय के कोई भी ठेकेदार विपत्र नहीं खरीद सका। रांकीकला में औरंगा नदी पर पुल निर्माण का कार्य अधर में लटका हुआ है। इसी प्रकार जिले के सभी प्रखंडों में कमोबेश यही हालत हे। चूंकि माओवादियों द्वारा लेवी की राशि वसूल करने के लिए ठेकेदारों को धमकी देने व काम बंद कराने की घटनाएं लगातार होती है। होता यह है कि लेवी वसूलने के बाद नक्सली काम करने की अनुमति भी दे देते हैं, लेकिन कई रास्ते ऐसे हैं, जिनके बन जाने से उनकी आवाजाही प्रभावित हो व पुलिस पहुंच जाए। इस कारण इन कार्यो पर रोक लगा दी जाती है। आलम यह है कि नक्सलियों के आदेश के बिना विकास का एक भी काम होना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। इस सवाल का जवाब जिला प्रशासन के पास नहीं है या वे कुछ बोलना नहीं चाहते।
नक्सली इलाका करें पार पर न हो वर्दी, न हथियार
धनबाद। आपरेशन ग्रीन हंट शुरू करने की तैयारी से भड़के नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों पर बड़ा हमला करने की आशंका खुफिया एजेंसियों द्वारा व्यक्त की गई है। इधर नक्सलियों के हमलों से जवानों को सुरक्षित बचाने के लिए आरपीएफ ने अपने जवानों के लिए सुरक्षा संबंधी कई गाइड लाइंस जारी किए हैं और उन्हें इसका पालन करने का निर्देश दिया गया है।
ये हैं खतरा : रेलवे की खुफिया एजेंसियों ने आशंका व्यक्त की है कि केन्द्र सरकार के आपरेशन ग्रीन हंट की खिलाफत करने को नक्सली रेलवे के कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को निशाना बना सकते हैं। खासकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे जवानों को अकेला पाकर वे हमला कर सकते हैं। इसी को लेकर सुरक्षा संबंधी निर्देश जारी किए गए हैं।
ये हैं निर्देश : आरपीएफ जवानों को कहा गया है कि वे नक्सली इलाके में अकेले या कम संख्या में जाने से पूरी तरह परहेज करें। यदि जाना जरूरी भी हो तो सादी वर्दी में बिना हथियार के जाए। जब नक्सल प्रभावित इलाकों में छापेमारी को जाना हो तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था और पर्याप्त संख्या में बल लेकर ही जाए।
ये हैं स्थिति : धनबाद रेल मंडल के 80 फीसदी रेल क्षेत्रों पर नक्सली दबदबा है। इन क्षेत्रों में पहले भी नक्सली सुरक्षा बलों पर हमला कर उनके हथियार लूट चुके हैं। हथियार लूटे जाने की आशंका को देखते हुए नक्सल प्रभावित कई आरपीएफ थानों से पहले ही हथियार सरेंडर कराए जा चुके हैं। अब जवानों को अकेले नक्सल क्षेत्रों में वर्दी पहनकर घूमने में भी सावधानी बरतने का निर्देश दिया गया है।
और मिल रही पुलिस को नक्सलियों के खिलाफ सफलता
बोकारो, नावाडीह। इन दिनों पुलिस को मिल रही लगातार सफलता से जहां पुलिसकर्मी उत्साहित हैं। वहीं, नक्सली संगठनों में हड़कंप मचा हुआ है। यह सफलता बीते दिन उग्रवादियों के लैंड माइंस एक्सपर्ट व एरिया कमांडर सह नावाडीह के परसाबेड़ा निवासी पांडु मांझी की गिरफ्तारी के बाद संभव हुई है।
बोकारो पुलिस ने बुधवार को पांडु मांझी से लंबी पूछताछ के बाद उसे तेनुघाट जेल भेज दिया है, लेकिन पूछताछ के दौरान उसके द्वारा दी गई जानकारी पर नावाडीह व बोकारो थर्मल की पुलिस ने सीआरपीएफ बल के सहयोग से ऊपरघाट के जमुनिया व मानपुर के जंगलों में छापेमारी की। इसमें पुलिस ने जमुनिया जंगल से जहां पांच बोरा अमोनियम नाइट्रेट बरामद की वहीं मानपुर से एक सौ मीटर कोटेक्स वायर, दो हैंड ग्रेनेड के अलावा नक्सली द्वारा लेवी के रूप में वसूली गई राशि भी बरामद की है। इतना ही नहीं पुलिस ने तीन संदिग्ध ग्रामीणों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। जिसमें दो क्रांतिकारी किसान कमेटी के सक्रिय सदस्य व एक गालोबार निवासी सह बस कंडक्टर बताया जाता है। इसके अलावे केकेसी के ही भुनेश्वर महतो की गिरफ्तारी ने भी नक्सली के खिलाफ मुहिम छेड़ने में बहुत हद तक मदद मिल रहा है।
ग्रीन हंट के खिलाफ नक्सली बांट रहे पर्चे
माओवादी और संत्रस्त आदिवासी

छत्तीसगढ क़े घने जंगलों में स्थित है एक लघु आदिवासी ग्राम तमार। इस ग्राम के दो कृषक एक युवा कांग्रेसी सांसद के विरुध्द लड़ाई लड रहे हैं, जिसमें वे हार के कगार पर खडे लग रहे हैं। जिसने उनके खेतों में बलात् एक फैक्ट्री बना ली है, जो 10 एकड से अधिक में फैली है। वह हरियाणा के एक प्रौद्योगिक वंश से संबध्द है। एक किसान, जिसकी डेढ एकड भूमि है, पुलिसकर्मी रहा है, जिसने अपनी भूमि वापस पाने के लिए अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है।
उसने तथा दूसरे किसान ने जिसकी साढे सात एकड भूमि है, अक्सर रायपुर तक की चार सौ किलोमीटर की यात्रा की है, जो राज्य की राजधानी है, ताकि शीर्ष अधिकारियों के द्वार पर दस्तक दे सके, क्योंकि इन किसानों को जिला मुख्यालय रायगढ में कोई इंसाफ नहीं मिल पाया।
दोनों किसानों को माओवादी कह कर आरोप लगाया गया है जो अपने नितांत वामपंथी दृष्टिकोण के लिए चर्चित हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बल को ''भारत के लिए एकमात्र सुरक्षा चुनौती'' बताया है। इन दोनों किसानों का माओवादियों अथवा नक्सलियों से, जो उन उग्रपंथियो का समूह है, जिन्होंने 1967 में पश्चिम बंगाल में एक ग्राम से जिसे नक्सलबाडी क़हा जाता है, सशस्त्र संघर्ष शुरू किया था, कोई सरोकार नहीं है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए इन दोनों किसानों को माओवादी बताना भी आसान हो गया है ताकि भूमि पर बलात कब्जे के प्रसंग से ध्यान हटाया जा सके। किंतु ये दोनों किसान भी कोई अपवाद नहीं हैं। मैं इस सप्ताह रायपुर में कई आदिवासियों से मिला, जिन्हें अपनी भूमि और ग्रामों से निष्कासित होना पड़ा है, ताकि वहां विभिन्न श्रेणियों के उद्योगपतियों जिनमें भारतीय और विदेशी दोनों ही शामिल हैं, गुंजाइश हो सके और वे उनके कोयले तथा लौह अयस्क जैसे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर सकें। राज्य सरकार ने 105 सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। लपट-झपट जैसा सलवा-जुडूम बल एक सशस्त्र प्राइवेट संगठन है, जिसे सरकार ने आदिवासियों को बलपूर्वक बाहर भगाने के लिए गठित किया है। उजडे अादिवासी, जिनकी संख्या लगभग दो लाख है, छत्तीसगढ क़ी सीमा पार कर महाराष्ट्र उडीसा और आंध्र प्रदेश के जंगलों में चले गए हैं। अनेक पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं (चालीस हजार अभी भी शिविरों में हैं)। आदिवासियों द्वारा अपने विषाक्त बाणों का उपयोग आत्मरक्षार्थ किया जा सकता था, जैसा कि वह अतीत में करते रहे हैं। किंतु वे कहते हैं कि उन्हें सरकार पर भरोसा है, जिसने उन्हें आश्वस्त किया है कि इन लोगों को अलग भूमि पर बसाया जाएगा, जहां उन्हें अपने अपने बच्चों को स्कूल भेजने की और रोगियों को आसानी से स्वास्थ्य केंद्रों पर भेजने की सुविधाएं सुलभ होंगी। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने आदिवासियों से किए जाने वाले व्यवहार को लेकर एक आलोचनात्मक रिपोर्ट दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिपोर्ट के आधार पर छत्तीसगढ सरकार को निर्देश दिया है कि वे अपने स्थानों से हटाए गए आदिवासियों का पुनर्वास करे। हर कलेक्टर से कहा गया कि वह अपने स्थान से हटाए गए लोगों को पुन: बसाए। परंतु अभी तक न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही कोई भूमि चिन्हित हुई है। दरअसल छत्तीसगढ में ऐसे कुछ जिले हैं, जहां कलेक्टरों को यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि उनका उस क्षेत्र में वश नहीं चलता जो उसके तहत हैं।
गृहसचिव जी.के.पिल्लै कहते हैं कि नक्सली केंद्र में 2050 तक सत्ता पर हावी हो जाने का सपना देख रहे हैं। किंतु जब माओवादी जो नवीनतम हथियारों से लैस होकर उन्हें धमकी देते हैं तो आदिवासियों के समक्ष विकल्प ही क्या रह जाता है? आदिवासी बुनियादी तौर पर तो निवास की कमी और भ्रष्टाचार से दंशित हैं। दरअसल वे खुद को सरकार द्वारा अपेक्षा और माओवादियों की बंदूक इन दो के बीच फंसा पाते हैं। आदिवासी अपने उस पुराने जीवन की ओर लौटना चाहते हैं, जब जंगल उन्हें उनकी आवश्यकता की हर चीज सुलभ कराते थे। जल, जमीन और जंगल की उदारता। वस्तुत: यही उनकी मांग है और वे इन सबकी वापसी हेतु ही आंदोलित हैं। सरकार और निगमित क्षेत्र के बीच गठजोड क़े निर्मम बल और जोड़-तोड क़ो ये भोलेभाले लोग समझ पाने में असमर्थ हैं। माओविदियों ने उनके लिए कठिनाइयां और अधिक बढा दी है, क्योंकि उन के युध्दघोष और उनके द्वारा की जा रही हिंसा ने राज्य को फासिस्ट तौर-तरीके अपनाने पर प्रेरित किया है। नई दिल्ली ने अपने ऑपरेशन को ग्रीन हंट की संज्ञा दी है। यदि यह कुल मिलाकर हंट (शिकार) ही है तो रेड का है और यह जो कुछ बचा-खुचा ग्रीन (हरीतिमा) है, उसके लिए भी खतरा है। जंगलों में कार्रवाई विध्वंसक हो सकती है। निर्दोषों को ही इसकी तपिश झेलनी होगी। यह बात समझ में नहीं आती किसरकार ने दमित आदिवासियों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष पर इतना रोष क्यों दर्शाया। ऐसे लोगों को तो उनके उस शुभ कार्य के लिए मान्यता मिलनी चाहिए जो वे आदिवासियों को माओवादियों के पंजों मे फंसने से बचाने के लिए कर रहे हैं। जो लोग बन्दूक के बल पर रहते हैं, वे बन्दूक से ही मरते भी हैं। हिंसा की संस्कृति शांति की संस्कृति से श्रेष्ठ कैसे हो सकती है? बुलेट बैलेट की स्थान नहीं ले सकती। नक्सलियों का लाभ वह भय नहीं है जो वे सृजित करते हैं अपितु वह आशा है जो समानतापरक समाज के वादे से वे जगाते हैं।
भारतीय राजनीति का संकर-जैसा कि मैं देखता हूं, वह परिवर्तन की संकट है। यह राज्यव्यवस्था और उसके ढांचे के बीच बढते अतंर में झलकता है। गृह मंत्री पी.चिदंबरम, सरकार ने कानून और व्यवस्था के नाम पर जो विपुल यत्र-तत्र व्यवस्था खड़ी की है, उसका उपयोग कर माओवादियों का दमन तो कर सकते हैं जबकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। किंतु उन्हें यह अनुभूति होनी चाहिए कि यदि 70 प्रतिशत लोग निर्धन रहते हैं और लोगों के तथा क्षेत्रों के बीच जो असमानता है, वह कम से कमतर नहीं हो पाती तो कुछ अन्य माओवादी गुट उभर उठेंगे। चिदंबरम ने माओवादियों को हित त्यागने की जो सलाह दी है वह तब बेहतर ढंग से असर करती या करेगी, यदि वह आर्थिक पैकेज की भी घोषणा साथ ही कर देते । उन्हें यह देखना ही होगा कि जो-जो आंदोलन लगभग 50 वर्ष पूर्व पश्चिम बंगाल के कुछ ग्रामों तक सीमित था, वह अब उडीसा बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ तथा आंध्र प्रदेश तक फैल गया है।
प्रमुख माओवादी नेता आजाद गिरफ्तार?
माओवादी नेता गुडसा उसेंडी ने बीबीसी को फोन कर बताया कि गत् 11 मार्च को बस्तर एवं आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र से पार्टी के वरिष्ठ नेता आजाद को आंध्रप्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस गिरफ्तारी के बाद से आजाद को अज्ञात स्थान पर रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है। ज्ञात हो कि पिछले पखवाड़े दो प्रमुख माओवादी नेता अप्पराव और कोंडल रेड्डी पुलिस के मुठभेड़ में मारे गए थे। इसके पूर्व राय स्तर के माओवादी नेता मुरली, महेश, श्याम, चन्द्र मौली व प्रसाद को भी पुलिस मुठभेड़ों में मारा जा चुका है। माओवादियों के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी का कहना है कि आजाद वारंगल जिले से इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएट है और पिछले 35 वर्षों से माओवादी आंदोलन से जुड़े हुए है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि आंध्रप्रदेश की पुलिस कभी भी फर्जी मुठभेड़ दर्शाकर आजाद को मार गिरायेगी। इस नेता ने धमकी दी है कि अगर ऐसा किया गया तो पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी के छापामार दस्ते बदले की कार्यवाही करते हुए पुलिस को अपना निशाना बनायेगे।
संयुक्त अभियान से नक्सली बौखलाए
बस्तर संभाग के पांचों जिले नक्सल प्रभावित है। दंतेवाड़ा जिले के कोंटा विधानसभा क्षेत्र बीजापुर जिले के लगभग सभी क्षेत्र और नारायणपुर जिले के संपूर्ण इलाके नक्सलियों का प्रभावी क्षेत्र है और यहां स्थानीय लोग उनके मदद करते रहे। ऑपरेशन ग्रीन हंट के शुरू होने पर इन जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में पुलिस और फोर्स के दबाव से अब नक्सली पशोपेश में हैं। ग्रीन हंट के सफलता के चलते अब यहां ऑपरेशन त्रिशूल जारी है। इस अभियान में विशेष एसपीओ को प्रशिक्षित कर उनके कंधे पर नक्सल विरोधी का एक बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। अभी हाल में खम्मम जिले के नक्सली संगठन के दो बड़े ईनामी नक्सलियों को मार गिराने की सफलता और पुलिस और फोर्स के दबाव के चलते आंध्रा पुलिस समक्ष एक नक्सली दंपत्ति ने आत्म समर्पण किया यह विशेष एसपीओ सहित फोर्स के ऑपरेशन त्रिशूल का नतीजा बतायी जा रही है। आधं्रा पुलिस ने आत्म समर्पण की इस खबर को सार्वजनिक किया है मगर उनके नामों की घोषणा तफ्तीश के बाद की जायेगी, लेकिन कोंटा क्षेत्र में दो खुंखार नक्सली बस्तर पुलिस के सामने आत्म समर्पण करने की सूचना है परंतु पुलिस इसे सार्वजनिक नहीं कर रही है। संभाग के नक्सलियों के शरणस्थल और उनके कर्मभूमि माना जाने वाला अबूझमाड़ में ऑपरेशन त्रिशूल के सफल अभियान के चलते यहां भी नक्सलियों का हौसला पस्त होने की सूचना है। अबूझमाड़ क्षेत्र के नक्सलियों से निपटने वहां चल रहे अभियान सहित संभाग के अन्य नक्सली जिलों में हो रही संयुक्त अभियान जिसमें पड़ोसी राय आंध्रा, महाराष्ट्र, उड़ीसा के फोर्स शामिल है की कार्यवाही से एक ओर नक्सली नेताओं के भूमिगत होने या अन्यत्र पलायन करने की खबरें भी लोगों की जुबान से मिल रही है। बहरहाल नक्सली और फोर्स दोनों अपने-अपने शक्ति परीक्षण में लगे हैं लेकिन वर्तमान पुलिस और फोर्स की अभियान से नक्सलियों के हौसला पस्त होने के चलते बंद का आह्वान किया जाना माना जा रहा है। बस्तर में इस नक्सल विरोधी अभियान के कमान संभालने वाले अफसर खुलकर कुछ बताने में परहेज करते हैं परंतु इतना अवश्य इंगित कर नक्सल विरोधी अभियान की सफलता पर जरूर बात करते हैं। जाहिर है पुलिस की इस अभियान से दक्षिण बस्तर में नक्सलियों का दबाव कम नजर आने लगा है जबकि पुलिस को बड़ी सफलता प्राप्त हुई है।
छत्तीसगढ़ : हमने 38 नक्सली मारे, सिर्फ एक जवान शहीद

बिलासपुर ! विश्वरंजन का कहना है कि पुलिस में बढ़ते दबाव से अब नक्सली दहशत में है। संयुक्त आपरेशन कांकेर और राजनांदगांव में चल रहा है। ग्रीन हंट प्रदेश का अपना आपरेशन और इससे लोगों में पुलिस के प्रति विश्वास बढ़ाने में आशातीत सफलता प्राप्त हो रही है।
पत्रकारों से यहां बातचीत करते हुए विश्वरंजन ने कहा कि पुलिस और कार्यालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इसकी शुरूआत हो चुकी है। नक्सली क्षेत्रों में जनजागरण अभियान जा रहा है।
हाट बाजार और कस्बाई क्षेत्रों में जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से बताया जा रहा है कि पुलिस उनकी मददगार है। नक्सलियों की पहचान करने में हमें सहयोग मिल रहा है। हमारी जवाबी कार्यवाही से नक्सली दहशत में है। उनका मनोबल टूटने लगा है। श्री विश्वरंजन ने कहा कि ग्रीन हंट आपरेशन प्रदेश का अपना आपरेशन है। यह संयुक्त आपरेश् से अलग है। संयुक्त आपरेशन कांकेर और राजनांदगांव क्षेत्र में चल रहा है। ग्रीनहंट आपरेशन में पुलिस जवानों के हताहत होने घटनाओं में 78 फीसदी की कमी आई है। विगत 3 माह में 1 पुलिस जवान शहीद हुआ है। जबकि हमने 38 नक्सली को मार गिराया है। नक्सलियों के घात लगाकर हमले करने के तौर तरीके, उनके अड्डों को ढूंढा जा रहा है। उनके कैम्प को ध्वस्त किया जा रहा है।
पुलिस बल की कमी के सवाल पर डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि पूर्व में पुलिस में जो भर्तियां हुई वे नक्सली क्षेत्रों के लिए हुई थी। थानों में जल्द ही पुलिस की भर्ती की जाएगी। जल्द ही पुलिस और पुलिस कार्यालयों को आधुनिकीकरण भी किया जाएगा। डीजीपी श्री विश्वरंजन आज शहर में थे। वे पुलिस आफिसर्स मेंस के लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल हुए।
Wednesday, March 17, 2010
दो बड़े माओवादी नेता मारे गए
जगदलपुर। १३ मार्च । बस्तर एवं आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सरकार द्वारा चलाए जा रहे आंॅपरेशन ग्रीनहंट के खिलाफ मोर्चाबंदी करने में जुटे आंध्रप्रदेश के दो प्रमुख माओवादी नेताओं को कल पुलिस मुठभेड़ के बाद मार गिराया।
सीमावर्ती आंध्रप्रदेश के वारंगल एसटीएफ ने बताया कि प्रकाशम जिले के दस लाख के ईनामी माओवादी नेता शक्करपुरी अप्पाराव को कल नेतीगोंडा ग्राम के निकट मार गिराया गया है। इस उग्रवादी नेता के पास से एक ए.के.-47 राइफल भी जब्त की गई है।
इसी प्रकार कोंडल रेड्डी नामक एक अन्य प्रमुख माओवादी नेता को वारंगल जिले के ताड़वाही ग्राम के निकट मार गिराया गया है। रेड्डी के पास से भी पुलिस ने ए.के.- 47 रॉंयफल जब्त की है।
एसटीएफ के अधिकारियों का कहना है कि मारे गए दोनों उग्रवादी नेता माओवादियों के केन्द्रीय समिति के सदस्य थे।
Tuesday, March 16, 2010
टीपीसी के दो नक्सली धराए
ग्रीन हंट: बेरोक-टोक बढ़ रहे सुरक्षा बल
नई दिल्ली । आपरेशन ग्रीन हंट के तहत झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में सुरक्षा बलों का जंगलों व गांवों को खंगालना जारी है। सुरक्षा बलों की कोशिश हर उस स्थान पर पहुंचने की है, जो कभी नक्सलियों के छिपने के लिए मुफीद हुआ करते थे।
साथ ही नक्सलियों के ग्रामीण आबादी में घुल-मिल जाने की आशंका के बीच सुरक्षा बलों ने गांवों की तलाशी का काम भी शुरू कर दिया है। अभी तक नामी नक्सली कमांडर के हाथ आने की खबर नहीं है। इस बीच नक्सलियों की छिट-पुट गतिविधियां जारी हैं। इधर बिहार के गया जिले में आरसीसी [रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट सेंटर] ने आमस थाना क्षेत्र के बनाही लोहा पुल के पास से अपहृत खोखर कंपनी के अभियंता सुमन घोष को मंगलवार को मुक्त कर दिया। पुलिस ने बताया कि सोमवार रात आरसीसी दस्ते ने गैमन इंडिया के बेस कार्यालय पर धावा बोल कर्मचारियों को पीटा और वाहन में बैठे अभियंता सुमन घोष को अगवा कर लिया था।
इसके पूर्व दस्ते ने खोखर कंपनी की जेसीबी मशीन भी फूंक दी थी। नक्सली संगठन ने डुमरिया-पटना सड़क निर्माण में लगी एजेंसी से 10 प्रतिशत लेवी मांगी है। बता दें कि इस सड़क का प्राक्कलन 378 करोड़ रुपये का है। गैमन इंडिया सड़क निर्माण की मुख्य एजेंसी है। गैमन इंडिया का पेटी कांट्रैक्टर खोखर कंपनी है। घटना के बाद निर्माण कार्य में लगे अभियंता व अन्य कर्मचारी गैमन इंडिया के बेस कैम्प को छोड़कर चले गये हैं।
बिहार के ही सीतामढ़ी में बागमती नदी के तटबंध पर निर्माण कार्य में लगी पोकलेन मशीन नक्सलियों ने सोमवार रात फूंक दी। मशीन के केबिन में सो रहे मजदूर अशोक कुमार को नक्सलियों ने एक घंटे तक बंधक बनाए रखा। जाने से पहले पर्चा फेंककर निर्माण कार्य में लगे ट्रैक्टर को बंद करने की चेतावनी भी दी। सूचना मिलने पर एसपी अनवर हुसैन पुलिस ने बांध पर पहुंच स्थिति का जायजा लिया। एसपी ने बताया कि दहशत फैलाने की नीयत से मशीन का केबिन जलाया गया है।
पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में चलाए जा रहे नक्सलियों के खिलाफ अभियान में सोमवार की रात को वांछित ननी गोपाल गोस्वामी समेत 13 नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है। मंगलवार को जिला एसपी मनोज वर्मा ने बताया कि मुखबिर की सूचना पर सोमवार की रात को पुलिस व अर्द्धसैनिक जवानों ने ग्वालतोड़ थाना क्षेत्र के पाथरपाड़ा व आसपास के क्षेत्रों में अभियान चलाया, जिसके तहत 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें ननी गोपाल गोस्वामी प्रमुख है। उन्होंने कहा कि ननी गोपाल कई वारदातों में माओवादियों का नेतृत्व कर चुका है। ग्वालतोड़ समेत आस पास के थानों में दर्ज मामलों में वह वांछित था। इधर झाड़ग्राम से दो व मेदिनीपुर कोतवाली थाना क्षेत्र के विभिन्न गांवों से सोमवार को गिरफ्तार किए गए 11 संदिग्ध माओवादियों को पुलिस ने मंगलवार को अदालत में पेश किया।
मेदिनीपुर कोतवाली थाना क्षेत्र से गिरफ्तार हुए माओवादियों में से एक वृंदावन महतो को अदालत ने तीन दिनों की पुलिस रिमांड व शेष दस को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। झाड़ग्राम थाना क्षेत्र से गिरफ्तार हुए परमेश्वर राय व केसी सुदन महतो को अदालत ने पांच दिनों की पुलिस रिमांड पर भेज दिया।
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के चौका थाना क्षेत्र के गुटुउली गांव के निवासी नक्सली भांद्रू सरदार ने पुलिस अभियान के दबाव में आकर सोमवार को सरायकेला-खरसांवा कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। उसने कोर्ट में यह कहा कि पुलिस की वजह से ही उसने आत्मसमर्पण कर किया है। भांद्रू कई संगीन नक्सली वारदातों में शामिल रहा है। बताते चलें कि सरदार की पत्नी भी गत दस फरवरी को रिवाल्वर के साथ पकड़ी गई थी। झारखंड में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक नेयाज अहमद ने सभी जिला पुलिस प्रमुखों को पुन: बेहद सतर्कता के निर्देश दिए हैं।
Wednesday, March 10, 2010
अपहृत जवान के माता-पिता जंगल तलब
दंतेवाड़ा के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अपहृत सेना के जवान विनय सिंह के परिजनों द्वारा अभी तक पुलिस थाने में किसी तरह की रिर्पोट दर्ज नहीं कराई गई है। ज्ञात हो कि विनय सिंह बस्तर में स्थापित डीआरडीओ के मारडूम स्थित संस्थान में पदस्थ था। कल उसको माओवादियों ने उस वक्त अगवा कर लिया जब वह अवकाश पर अपने गांव गया हुआ था। कुकानार निवासियों का कहना है कि अवकाश पर आने के कारण विनय सिंह अपने साथियों के साथ क्रिकेट खेलने के लिये गोरली गया हुआ था। कल शाम गोरली से लौटते समय चार सशस्त्र नक्सलियों ने विनय सिंह के वाहन को रोककर उसे अगवा कर लिया। इसी बीच यह भी खबर आई है कि नक्सलियों ने विनय सिंह के माता-पिता को मुलाकात हेतु जंगल में तलब किया है। लेकिन अभी तक इस मुलाकात के बारे में विस्तृत विवरण अप्राप्त है। जानकारों का मानना है कि विनय सिंह के माध्यम से नक्सली नेता सेना की तैनाती के बारे में पूरी जानकारी लेना चाहते है। संभव है कि इस जानकारी के बाद वे विनय सिंह को रिहा कर दे। (देशबंधु, मार्च, २०१०)